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तूफान

मोदी जी की लहर चल रही, योगी की आंधी आई
भूचालों की धमकी लेकर घूम रहे राहुल भाई
बिना बात के उठा बवंडर देते हैं हातिमताई
ये सब देखा तो तूफ़ां की ईगो भी कुछ टकराई
राजनीति ने आफत मचा ली, सुनामी उठा ली
तूफान हुआ तंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

हमने तूफान को सचिन तेंदुलकर बना दिया :-
ट्रोलिंग की आंधी में दो दिन तूफानों का होल्ड हुआ
पब्लिक का कंसन्ट्रेशन भी वेदर के संग मोल्ड हुआ
पंखे का झोंका भी उस दिन तूफानों में सोल्ड हुआ
प्रेशर में आकर बेचारा ज़ीरो रन पर बोल्ड हुआ
ऐसी कूकर की सिटी निकाली, हवा हुई सवाली
चेहरे का उड़ा रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

ट्विटर फेसबुक पर ट्रोलिंग का ऐसा अद्भुत खेल हुआ
इस्कूलों की छुट्टी हो गई इतना रेलमपेल हुआ
राई से तूफान बेचारा पर्वत तक इस्केल हुआ
दुनिया भर में शोर मचा पर दिल्ली आकर फेल हुआ
उसने केजरी से सीख यह पा ली, माफ़ी की धुन ली
लौटा यूँ ही बैरंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

जनता के सेवक तो कर्नाटक दर्शन पर निकल गए
अन्ना जैसे वर्कर धरने और अनशन पर निकल गए
युवा अलीगढ़ में जिन्ना के निष्कासन पर निकल गए
डिक्लेअर करने वाले ही पर्यटन पर निकल गए
हमने आंधियों की हेकड़ी निकाली, यूँ पिकनिक मना ली
उठने न दी उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

ढंग से आ भी जाता तो क्या पूँछ पाड़ता बेचारा
धूल सने सिस्टम की कितनी धूल झाड़ता बेचारा
भ्रष्टतंत्र के आख़िर कितने पृष्ठ फाड़ता बेचारा
उजड़े व्यापारों को और कितना उजड़ता बेचारा
उसने अपनी दिशा बदल डाली, मानवता निभा ली
भुला दो ये प्रसंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

✍️ चिराग़ जैन

अंधेरा खुद पिघलकर आ गया

अकेला छोड़ दे जब ये मुकद्दर, कौन आता है
किसी के आँसुओं से आँख भरकर कौन आता है

अंधेरा खुद पिघलकर आ गया रौशन चिरागों में
हमारी बाँह में वरना सिमटकर कौन आता है

हमें तो उम्र भर बस तीरगी से जंग लड़नी है
चिरागों की खबर लेने पलटकर कौन आता है

कमसकम झूठ तो हरगिज नहीं किस्से फरिश्तों के
मुसीबत में हवा का रुख बदलकर कौन आता है

हम अपना दर्द लेकर राह पर नजरें बिछाए हैं
जरा देखें फरिश्ता या सितमगर, कौन आता है

✍️ चिराग़ जैन

बारहमासा

मीत! तुम्हारी सुधियों का ये कैसा बारहमासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

पल में मुखड़े पर जगमग दीवाली-सी आ जाती है
पल में मन में चैत दुपहरी की वीरानी छाती है
पल में डरकर मन बेचारा पूस निशा-सा कँपता है
पल में आषाढ़ी चातक-सा चंद्रकिरण को तकता है
क्षणिक हताशा, क्षणिक पिपासा, क्षणिक मिलन अभिलाषा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

जब पुरवा के बहकाने से मन भरमाने लगता है
तब बिन मौसम की बारिश से खेत लजाने लगाता है
दुनियादारी के पचड़ों से आलस करने लगता है
इस बैरागी मन में महुए का रस झरने लगता है
मन संतृप्त हुआ बैठा है पर तन भूखा-प्यासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

इधर हृदय के पास अचानक जेठ पिघलने लगता है
उधर पुराने पल से तपकर अन्तस् गलने लगता है
सपनों के कजरारे बादल अम्बर तक बढ़ जाते हैं
धूप चढ़े तो इच्छाओं के मृग काले पड़ जाते हैं
इस पल शांत तथागत है मन, अगले पल दुर्वासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

प्रह्लाद जीवित है

हार भी है, जीत भी है
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

✍️ चिराग़ जैन

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