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सागर प्यासे छूट गए हैं

कुछ तालाबों की चर्चा कर क़िस्से महफ़िल लूट गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं

कौन बताए तूफ़ानों से कैसे जूझा बूढ़ा बरगद
अंधा बनकर देख रहा था गिरते पेड़ जमूरा बरगद
उस बूढ़े का द्वंद समूचे समरांगण से बहुत बड़ा था
उसने भी तो अठारह दिन ख़ुद से भीषण युद्ध लड़ा था
किन्तु विजय का ताज पहनने बस कीकर के ठूँठ गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं

घाटों तक पहुँची नदिया के गीत सुना देते हैं क़िस्से
पानी की हर इक हलचल को गरज बना देते हैं क़िस्से
जिससे प्यास धुली धरती की, उसकी कोई फ़िक्र नहीं है
जो खेतों में खेत हुई है, उस धारा का ज़िक्र नहीं है
बलिदानों के शव पर अवसरवादी चांदी कूट गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं

राजतिलक पर जिन माँओं के नैन झरे; उनकी चर्चा हो
कायर के आगे अड़ कर जो वीर मरे; उनकी चर्चा हो
ये चर्चा हो युग केवल पाँचाली के आभारी क्यों थे
पाँचाली के केश, हिडिम्बा की ममता पर भारी क्यों थे
उन नयनों की पीड़ा गाओ, जिनसे सपने रूठ गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं

✍️ चिराग़ जैन

वादा खि़लाफ़ी

सागर
मुक़द्दमा कर रहा है नदी पर
वादाखि़लाफ़ी का।
कहता है
मिलने का वादा करके
पहुँची ही नहीं
अब कोई प्रश्न नहीं है मुआफ़ी का।
नदी बेचारी
पर्वत की कृपणता
और मरुथल की वासना के बीच
बून्द-बून्द सिमटती रही
घाट-घाट घटती रही।
नदी के भीतर उग आई
सभ्यताओं ने
कठघरे में खड़ी नदी को
दोषी क़रार दिया
फ़ैसला सुनकर
पर्वत ने नदी से
मुँह फेर लिया
मरुथल ने उसके मुँह पर
धूल का तमाचा मार दिया।
और सागर…
…वह निरंतर
एक मीठी छुअन के अभाव में
मर रहा है
किसी नदी के वादा निभाने की
प्रतीक्षा कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

निर्बल से प्रतिशोध

जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे

मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे

कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे

वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

महानगर में गर्मी का एक दिन

गर्मी अपनी पर आई हुई है। तमाम भागदौड़ के बावजूद सड़कों पर एक वीराना पसरा हुआ है। ज्यों-ज्यों सूर्य धरती के निकट आता है त्यों-त्यों धरती का तापमान बढ़ता जाता है। जन्मों का प्यासा सूरज, चलते-फिरते लोगों की दैहिक जलराशि से प्यास बुझाने का उपक्रम कर रहा है। मनुष्य पसीना बहा-बहाकर आसमान को बारिश का स्मरण करा रहे हैं।
जेठ के कुकृत्य से बदहवास सड़कों को अमलतास की ओढ़नी से ढाँपकर मौसम अपना पाप छुपाने के प्रयास कर रहा है। उधर गुलमोहर भी अपने लाड़ले मौसम के ऐब छुपाने के लिए लीपापोती करने में पूरा ज़ोर लगाए हुए है। बालमखीरा के दरख़्तों पर झूमर जैसे फूल लटकाकर ध्यान भटकाया जा रहा है। लेकिन नीम, कच्ची निम्बोलियों जैसा कड़वा सच बोलकर अपने फूल की तरह बरस पड़ता है। आम के बौर में केरियाँ फूटने लगी हैं। मौसम के आवारा थपेड़े और तूफानों के बेग़ैरत झोंके इन मासूम आम्बियों को तब तक छू-छूकर गुज़रते रहते हैं जब तक वे हार कर टूट न जाएँ। इस सारी बेईमानी को देखकर हवाएँ आग-बबूला हो चली हैं। बहते पसीने को शांत करने के लिए जो झोंका गात को स्पर्श करता है वह पसीने के नीचे त्वचा की एक परत झुलसा जाता है। ऊमस ने ऊर्जा का कोष रिक्त कर दिया है।
सड़क किनारे शिकंजी, कुल्फी, पानी, कोल्डड्रिंक, छाछ और चुस्की बेचनेवाले पेट के लिए अपने तन को तपाकर कंचन कर रहे हैं। वातानुकूलित वाहनों और पक्के मकानों के भीतर का तापमान स्वर्ग की अनुभूति करा रहा है इसलिए बाहर का नर्क और गहराता जा रहा है। ग़रीबों के बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए सड़कों पर रोज़गार तलाश रहे हैं और अमीरों के बच्चे मोबाइल के जीपीएस पर वॉटर पार्क तलाश रहे हैं।
शाम ढलते-ढलते मौसम अपनी ज़िद्द छोड़कर कुछ देर को सुहाना होने लगता है, लेकिन जल्द ही वह मूड बदलकर वापस अड़ियल हो जाता है। प्रकृति हीटर चलाकर भूल गई है और हमने अपनी कृत्रिम सुविधाओं के ब्लोवर से इस प्रकोप को कई गुना बढ़ा दिया है। महानगरों के निस्तेज चेहरे और भी क्लान्त हो गए हैं। गाँव की चौपाल से आए झोंके महानगरों के ऊपर से अट्टहास करके गीत गाते हुए बहे जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कोई खिलने पे आ जाए तो

महीना जून का है तिश्नगी हद से गुज़रती है
ज़मीं दो बून्द पानी के लिए भी आह भरती है
ख़ुदाया तल्ख़ हैं तेवर हवाओं के मग़र फिर भी
कोई खिलने पे आ जाए तो हर डाली सँवरती है

✍️ चिराग़ जैन

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