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महानगर में गर्मी का एक दिन

गर्मी अपनी पर आई हुई है। तमाम भागदौड़ के बावजूद सड़कों पर एक वीराना पसरा हुआ है। ज्यों-ज्यों सूर्य धरती के निकट आता है त्यों-त्यों धरती का तापमान बढ़ता जाता है। जन्मों का प्यासा सूरज, चलते-फिरते लोगों की दैहिक जलराशि से प्यास बुझाने का उपक्रम कर रहा है। मनुष्य पसीना बहा-बहाकर आसमान को बारिश का स्मरण करा रहे हैं।
जेठ के कुकृत्य से बदहवास सड़कों को अमलतास की ओढ़नी से ढाँपकर मौसम अपना पाप छुपाने के प्रयास कर रहा है। उधर गुलमोहर भी अपने लाड़ले मौसम के ऐब छुपाने के लिए लीपापोती करने में पूरा ज़ोर लगाए हुए है। बालमखीरा के दरख़्तों पर झूमर जैसे फूल लटकाकर ध्यान भटकाया जा रहा है। लेकिन नीम, कच्ची निम्बोलियों जैसा कड़वा सच बोलकर अपने फूल की तरह बरस पड़ता है। आम के बौर में केरियाँ फूटने लगी हैं। मौसम के आवारा थपेड़े और तूफानों के बेग़ैरत झोंके इन मासूम आम्बियों को तब तक छू-छूकर गुज़रते रहते हैं जब तक वे हार कर टूट न जाएँ। इस सारी बेईमानी को देखकर हवाएँ आग-बबूला हो चली हैं। बहते पसीने को शांत करने के लिए जो झोंका गात को स्पर्श करता है वह पसीने के नीचे त्वचा की एक परत झुलसा जाता है। ऊमस ने ऊर्जा का कोष रिक्त कर दिया है।
सड़क किनारे शिकंजी, कुल्फी, पानी, कोल्डड्रिंक, छाछ और चुस्की बेचनेवाले पेट के लिए अपने तन को तपाकर कंचन कर रहे हैं। वातानुकूलित वाहनों और पक्के मकानों के भीतर का तापमान स्वर्ग की अनुभूति करा रहा है इसलिए बाहर का नर्क और गहराता जा रहा है। ग़रीबों के बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए सड़कों पर रोज़गार तलाश रहे हैं और अमीरों के बच्चे मोबाइल के जीपीएस पर वॉटर पार्क तलाश रहे हैं।
शाम ढलते-ढलते मौसम अपनी ज़िद्द छोड़कर कुछ देर को सुहाना होने लगता है, लेकिन जल्द ही वह मूड बदलकर वापस अड़ियल हो जाता है। प्रकृति हीटर चलाकर भूल गई है और हमने अपनी कृत्रिम सुविधाओं के ब्लोवर से इस प्रकोप को कई गुना बढ़ा दिया है। महानगरों के निस्तेज चेहरे और भी क्लान्त हो गए हैं। गाँव की चौपाल से आए झोंके महानगरों के ऊपर से अट्टहास करके गीत गाते हुए बहे जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कोई खिलने पे आ जाए तो

महीना जून का है तिश्नगी हद से गुज़रती है
ज़मीं दो बून्द पानी के लिए भी आह भरती है
ख़ुदाया तल्ख़ हैं तेवर हवाओं के मग़र फिर भी
कोई खिलने पे आ जाए तो हर डाली सँवरती है

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

प्रह्लाद जीवित है

हार भी है, जीत भी है
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

✍️ चिराग़ जैन

प्यास ठहरी है

रेत का साम्राज्य है बस
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है

पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है

स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है

श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है

✍️ चिराग़ जैन

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