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शांति का अवसर

भाग जाने दो कन्हैया
युद्ध भू से अर्जुनों को
यह पलायन ध्वंस के जयघोष से कितना बड़ा है
मत मनाओ
यूँ समझ लो शांति का अवसर खड़ा है

मोहवश कोई धनंजय कीर्ति को तजने लगे तो
छोड़कर गाण्डीव जो हरिनाम ही भजने लगे तो
उस समय उस त्याग की अनुगूंज का सम्मान कर लो
इस पराभव से बचेगा क्या तनिक अनुमान कर लो
उत्तरा का तेज कुछ दिन और जीवित रह सकेगा
भीष्म को कुरुकुल कई दिन तक पितामह कह सकेगा
कर्ण की जननी के सारे पुत्र जीवित रह सकेंगे
गर्भ में पलते सहस्रों भ्रूण विकसित रह सकेंगे
अग्नि का उपयोग भोजन हेतु ही होता रहेगा
अन्यथा श्मशान युग की अस्थियाँ ढोता रहेगा
मृत्यु का विकराल वैभव चैन से सोता रहे तो
मत उठाओ,
यूँ समझ लो काल पर पर्दा पड़ा है

द्रौपदी के केश तो इक दिन समय भी बांध देगा
पर सुभद्रा की उजड़ती गोद का रक्षक न कोई
सैंकड़ों अक्षौहिणी सेना सुसज्जित हैं प्रतीक्षित
डस सके इनको निजी प्रतिशोध का तक्षक न कोई
तर्क की सारी हवाएँ शांति पथ की ओर मोड़ो
हो सके तो कृष्ण पल भर के लिए हठमार्ग छोड़ो
हो सके तो यह समर प्रारम्भ होने से बचा लो
हो सके तो एक पूरा कल्प रोने से बचा लो
हो सके तो बाँसुरी की तान से झखझोर डालो
युद्ध के हर पात्र की हर इक प्रतिज्ञा तोड़ डालो
हैं सभी योद्धा किसी अपमान से आहत यहाँ; पर
मत लड़ाओ,
जो लड़ा है वो स्वयं से ही लड़ा है

इस समर से भी बड़ा इक युद्ध अर्जुन लड़ रहा है
मोह के वश आज उसका शौर्य फीका पड़ रहा है
छोड़ देना चाहता है वह सुयोधन से लड़ाई
वह न चाहेगा शवों को रौंदकर हासिल कमाई
वह न अनदेखा करेगा जननियों के आँसुओं को
वह न शोणित से भरेगा लोभ के अंधे कुओं को
ओट ले कर्तव्य की इस बार वह निर्मम न होगा
उठ चुका है ज्वार जो वैराग्य का अब कम न होगा
इस समर से प्राप्त जय का भ्रम न पालेगा धनंजय
त्याग पथ पर यश-पिपासा तोड़ डालेगा धनंजय
तर्क के मत बाण छोड़ो, और इस-उस रूप से अब
मत डराओ,
इस पलायन में समय का सुख गड़ा है

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव का संयोग

कवि के आँगन में पीड़ा के उत्सव का संयोग हुआ है
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

आँसू ने पलकें धो दी हैं, मुस्कानों के आमंत्रण पर
सपने आँगन पूर रहे हैं, आशा सज आई तोरण पर
वीणा के सोए तारों को छूकर निकली है बेचैनी
कुछ पल ठहरो इन तारों पर पावनतम संगीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

सब कुछ खो देने की पीड़ा एक दिलासा ढूंढ रही है
नदिया की धारा सागर की अमर पिपासा ढूंढ रही है
आलिंगन में बांध लिया है अपनेपन ने हारे मन को
तय है इस किस्से में इस पल एक नया मनमीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

वरदानों की सिद्धि; तपस्या की क्षमता पर आधारित है
जिसने सब कुछ खोया उसका सब कुछ पाना निर्धारित है
मरने की सीमा तक यदि संग्राम किया है इक काया ने
तो अगले पल उस काया में जीवन आशातीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा
✍️ चिराग़ जैन

विध्वंस के बाद

पेड़ की डालियो! नवसृजन में जुटो
पत्तियों को मिला टूटने का हुनर
रात भर मत बिलखियो री सूरजमुखी
सूर्य को भा गया रूठने का हुनर

जो गुंथे एक ही तार में वो सुमन
एक दिन सूखकर तो बिखर ही गए
किन्तु जब तक जिए, तब तलक़ यूं जिए
उत्सवों के सुअवसर संवर ही गए
तुम किसी फूल से सीख लेना प्रिये
मुस्कुराते हुए छूटने के हुनर

चाक ने ही अगर संतुलन खो दिया
प्यास का हर समाधान खो जाएगा
हर कलश, हर सुराही तड़क जाएगी
तृप्ति का साज-सामान खो जाएगा
व्यर्थ अवशेष चुभ जाएंगे याद में
पात्र सीखे न गर फूटने का हुनर

भाग्य की कुछ लकीरों के अवरोह पर
चाह की श्वास हर पल सिसकती रही
सत्य कटुता का बाना पहनता रहा
प्राण की डोर गर्दन जकड़ती रही
नियति की डुगडुगी पर दिखाता रहा
इक जमूरा खुशी लूटने का हुनर

✍️ चिराग़ जैन

इस राह चलकर देखते हैं

चलो, इस राह चलकर देखते हैं
कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं

कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है
मेरे आँसू छलककर देखते हैं

हमें तो दिख रहा है कंठ नीला
यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं

हमारे हौसलों की थाह मत लो
कहाँ तक है समंदर, देखते हैं

अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको
तो जिगरी यार जलकर देखते हैं

अगर मुस्कान से परहेज रखूँ
तो फिर बच्चे सहम कर देखते हैं

अभी मजबूरियों की चल रही है
इरादे आह भरकर देखते हैं

यही एहसास दिल को खुश रखे है
वो हमको छुप-छुपाकर देखते हैं

✍️ चिराग़ जैन

बचपन के किस्सों से पूछो

तुम खरगोशों के अनुयायी
मैं हूँ कछुए का पथगामी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी

जब सारस को आमंत्रित कर
खीर परोसी थी थाली में
लम्बी चोंच लिए बेचारा
कैसे जल पीता प्याली में
दृश्य मगर परिवर्तित होगा
सारस का भी दिन आएगा
शर्बत युक्त सुराही होगी
धूर्त देख कर पछताएगा
बंदर को छलने की नीयत
मूर्ख मगर को रिस्की होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी

आज कथा का पहला दिन है
आज बया का घर टूटेगा
संत लुटेगा, चोर हँसेगा
पाप अभी चांदी कूटेगा
लेकिन ज्यों ज्यों बात बढ़ेगी
कौआ मीठा जल पाएगा
ऊँची हांडी की खिचड़ी से
बूढ़ा ब्राह्मण फल पाएगा
वैसा हाल बनेगा उसका
जैसी करनी जिसकी होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी

ताल किनारे लक्कड़हारा
सच कहने का फल पाएगा
भगत बना बगुला खुद इक दिन
कर्क गरल से छल जाएगा
हाथी को चींटी डस लेगी
सच का मुश्किल पंथ नहीं है
न्याय अगर है न्यून जहाँ तक
वह किस्से का अंत नहीं है
खुद गड्ढे में गिर जाएगा
जिसने भी साजिश की होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी

✍️ चिराग़ जैन

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