Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
‘सुन!
धनतेरस का दीया
जोड़ रही हूँ।
ध्यान रखियो
बाहर मत आइयो।’
-कहते हुए
हर साल
धनतेरस पर
दीपक बालती थी माँ।
अगली सुबह
चुरा लेता था मैं
उस दीये के
तेल में भीगा रुपैया।
‘क्यों रे
ये दीये में से
सवाया किसने उठाया’
‘मुझे नहीं पता मम्मी
मैंने तो
दीया ही नहीं देखा
आपने ही तो कहा था
अंदर रहने को।’
मेरा धनतेरस तो
शुभ ही रहता था
लेकिन
माथे में त्यौरियाँ डाले
देर तक
बड़बड़ाती थी माँ!
आज दीवाली के लिए
फूल लेने बाहर निकला
किसी की चैखट पर
दीया रखा था
धनतेरस का
पाँच रुपैये भी थे उसमें
तेल में भीगे हुए।
…किसी ने
चुराए ही नहीं अब तक।
जी तो बहुत किया
चुराने का
लेकिन छोड़ आया
…उस बड़बड़ को मिस करूंगा!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
“ओहो!
कितना कूड़ा हो गया।
आग लगे इस मौसम में।
मार आंधी-तूफ़ान…
सारे आंगन में कीचड़ हो गई।
देखियो,
उधर सारी अंबियाँ झड़ गईं।
कैसी हरी डाल टूट गई नीम की!
…इस रामजी को भी चैन ना है!
कै तो पसीना चुआवै
कै ऐसा तूफान मचावै।”
अपने आपसे बतियाती हुई
पानी सूँत रही है नानी।
और
हौले से सूरज चमका कर
हैल्प कर रहे हैं
शर्मिंदा रामजी!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आज
डिनर टेबल पर
गोल्डन एप्पल नहीं खाए
माँ ने।
बस कह भर दिया-
“मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।”
और फिर
हम सब
चट कर गये
सारे सेब
हाथों-हाथ।
…रात में तकिये पर सिर टिकाए
छत पर चमकते रेडियम के सितारों में
अचानक उभरकर याद आई
माँ की बात-
“सुन रे!
सेब लिअइयो
भोत दिन हो गए सेब खाये!“
सम्पन्नता या विपन्नता से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
उसकी आदत पर
दूसरों को खिलाकर ही
ख़ुश होती है माँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा
उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल
यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा
हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है
अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा
तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा
आज उन लोगों के आंगन में बसी है पछुआ
जिनके पुरखों ने कलेजे में संजोई पुरवा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
भली कहाँ है भला ये तनाव की आदत
ज़रा-सी बात से आँखों में ताव की आदत
हरेक राह से मंज़िल तलक़ पहुँचता है
नहीं चुनाव पे निर्भर बहाव की आदत
माँ ने चीज़ें भी सहेजी सदा रिश्तों की तरह
हमने अपनाई नहीं रखरखाव की आदत
कभी ये देश धड़ी में हिसाब करता था
सभी को पड़ गई है आज पाव की आदत
ख़ामोश रह के सबको पार लगा देती है
एक दिन नाव डुबोएगी नाव की आदत
भरा, बड़ा, नरम, लदा, उदार और भारी
इन्हीं में तो सदा दीखी झुकाव की आदत
✍️ चिराग़ जैन