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खोते मंज़र

चाहकर भी नहीं बचा पा रहे हैं हम वह सब जो आनंदित करता है हमें तनाव के क्षणों में। क्षमा नहीं करेंगी हमें हमारी ही सन्तानें क्योंकि छीन लेते हैं हम रोज़ाना आनंद के अनिवार्य तत्व अगली पीढ़ी से …आधुनिक बनने की कोशिश में मिटा देते हैं रोज़ाना प्रकृति में बिखरे काव्यांश...

मानवता

अपने आप से दूर हो रहे लोग इंसानियत से अधिक आवश्यक हो रहे भोग अदालतों में टूटता भाई-बहन का प्यार अस्सी साल की नारी का बलात्कार पश्चिम की धुनों पर थिरकता यौवन चुनाव-दर-चुनाव बढ़ता प्रलोभन बेटियों को बेचकर ख़रीदा गया राशन धर्ममंचों से पढ़ा जा रहा राजनैतिक भाषण स्कूलों के...
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