+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

मानवता को श्रद्धांजलि

ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।

✍️ चिराग़ जैन

मध्यम वर्ग का लॉकडाउन

किसने बोला काम करो
घर बैठो, आराम करो

कितना कुछ है मुमकिन देख
घर पर बैठ बुलेटिन देख
बहसों से कर टाइम पास
कितने हैं अच्छे दिन देख
भूख लगी हो ख़बरें खा
ख़बरों से ही प्यास बुझा
दिन भर अख़बारों को पढ़
फिर अख़बारों पर सो जा
ख़बरों पर विश्राम करो
घर बैठो आराम करो

बाहर क़ाफ़ी गर्दी है
गर्मी, बारिश, सर्दी है
दो रोटी के चक्कर में
तूने आफत कर दी है
दाम चढ़ेंगे, बढ़ने दे
रोग बढ़ेंगे, बढ़ने दे
तंत्र मलाई खाएगा
तू बस ख़ुद को कढ़ने दे
हर सपना नीलाम करो
घर बैठो, आराम करो

माना, तेरी आदत है
लेकिन बाहर दहशत है
तुझको ज़िंदा रखना है
तेरी अभी ज़रूरत है
भाषण हो तो बाहर जा
रैली में नारे लगवा
नेताजी को वोट दिला
फिर मरता हो तो मर जा
ऐसे उम्र तमाम करो
घर बैठो आराम करो

दुःखड़ा गाकर क्या होगा
सच दिखलाकर क्या होगा
गूंगी-बहरी जनता को
गीत सुनाकर क्या होगा
हम ऐसे फरियादी हैं
हर शोषण के आदी हैं
भीतर दहके अंगारे
बाहर गांधीवादी हैं
मन ही मन संग्राम करो
घर बैठो आराम करो

✍️ चिराग़ जैन

तीन उंगलियाँ अपनी ओर

‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ -ये भारतीय पत्रकारिता के प्रारंभिक तेवर थे। संपादन और क्रांति एक-दूसरे के पूरक थे। संपादकों को भाषा का ज्ञान इतना था कि अख़बार में छपे शब्द वर्तनी का प्रमाण होते थे। अख़बार का काग़ज़ खोटा होता था, पर ख़बरें खरी होती थीं। काली स्याही से जो अख़बार में छप गया, वह इतिहास में दर्ज हो गया।
संपादकीय टिप्पणी के एक-एक वाक्य में सत्ता की चूल हिलाने का सामर्थ्य होता था। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की जो फ़सल हमने काटी उसके खेत की सिंचाई में पत्रकारों का क़ाफ़ी ख़ून-पसीना शामिल था।
आज़ादी के पाँच दशक बाद पत्रकारिता में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए। एक तो अब तक टेलिविज़न भारत में दुर्लभ नहीं रह गया था, दूसरे उद्योग जगत् को अख़बार की आड़ में अपने राजनैतिक हित साधने और औद्योगिक घपले छिपाने का फार्मूला मिल गया। अब तक अख़बार के मुताबिक़ जनता चलती थी अब जनता के मुताबिक़ अख़बार चलने लगे। उधर टेलिविज़न पर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने न्यूज़ रीडिंग को न्यूज़ एंकरिंग में तब्दील करने का पहला प्रयोग ‘आज तक’ नामक समाचार बुलेटिन में किया। लगभग इसी दौरान सुश्री नलिनी सिंह ने ‘आँखों देखी’ के माध्यम से प्रोग्रामिंग और न्यूज़ बुलेटिन के सम्मिश्रण का सफल प्रयोग किया।
इधर ये दोनों कार्यक्रम सफलता के चरम पर थे, उधर चौबीस घण्टे के समाचार चैनल्स की अवधारणा भारत में शुरू हो गई। श्री एस पी सिंह ने जो न्यूज़ एंकरिंग शुरू की थी वह सबसे पहले, सबसे तेज़, सबसे आगे, नम्बर वन और सनसनीखेज़ समाचारों के जंगल में ऐसी फँसी कि उसमें से न्यूज़ ग़ायब हो गई और केवल एंकरिंग शेष रह गई।
ठीक इसी समय प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रतिद्वंद्विता और औद्योगिक घरानों की लाभप्रधान नीतियों के रोग से ग्रस्त होकर ऐसा रंगीन हुआ कि उसमें कुछ भी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं बचा। संपादकीय पृष्ठों पर लगने वाली ऊर्जा ‘पेज थ्री’ को ग्लैमरस बनाने में नष्ट होने लगी। सेलिब्रिटी मैनेजर्स को संपादकों से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा। फिल्मी कलियाँ, स्टारडस्ट और मनोहर कहानियाँ जैसी मसालेदार सामग्री से अख़बार की बिक्री बढ़ाने की होड़ शुरू हो गई।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया; भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, खाना-पकाना और सास-बहू के सीरियल्स को ख़बर बनाकर; चौबीस घण्टे न्यूज़ चैनल चलाने का ढोंग करता रहा और प्रिंट मीडिया क्लासीफाइड, मेट्रीमोनियल, बॉलीवुड, क्रिकेट, ग्लैमर वगैरा से अपने-अपने पन्नों के ढेर को नम्बर वन अख़बार बताने पर तुले रहे।
बाज़ार में खड़ी पत्रकारिता के बीच ‘जनसत्ता’ बेचारा काफ़ी दिन तक उसी चौड़े आकार और काली स्याही पर अड़ा रहा; लेकिन चटपटे काग़ज़ को अख़बार समझकर ख़रीदनेवाले ग्राहकों ने जनसत्ता की दशा इतनी दयनीय कर दी कि वह बन्द होने के कगार पर आ गया। हारकर इस एकमात्र मंदिर को भी अपने चौक में दुकानें और सर्कस लगवाने पड़े ताकि पर्यटकों की चप्पलें गिनवाकर श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफ़ा किया जा सके।
जिस पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म और गटर जर्नलिज्म को हेय समझा जाता था, वहाँ ‘बटर जर्नलिज्म’ तक के दर्शन होने लगे। जिस देश में, राजनीति अख़बार देखकर जनता का मूड भाँपती थी; वहाँ राजनीति का मूड देखकर, अख़बार जनमत बनाने लगे।
जनता की अनदेखी ने दूरदर्शन के सीधे-सादे समाचार बुलेटिनों और जनसत्ता जैसे साफ़-सुथरे समाचार-पत्रों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बाज़ारू होने पर विवश कर दिया।
जिन न्यूज़ चैनल्स को टीआरपी दे-देकर हमने सींचा है, आज वे ही किसी राजनैतिक पार्टी, किसी धन्ना सेठ और किसी मल्टीनेशनल कम्पनी के मन मुताबिक़ हमारी आँखों में धूल झोंक रहे हैं। मीडिया के इस वीभत्स रूप को धिक्कारने वाले एक बार अपने गिरेबान में झाँक कर देखें कि इस मीडिया को इतना उच्छृंखल बनाया किसने है।
जब किसी चैनल की डिबेट में पैनलिस्टों को मुर्गे की तरह लड़ाया जाता है; जब किसी स्टूडियो में बैठे एंकर शालीनता, सभ्यता और शिष्टता की समस्त मर्यादाएँ लांघते हैं; जब पीत पत्रकारिता के दम पर चार-चार दिन लोगों को मूर्ख बनाया जाता है तब भी हम पलटकर दूरदर्शन के समाचार बुलेटिन पर नहीं लौटते। जब हम अख़बार के चालीस पन्नों में से तीस में विज्ञापन और बाकी दस में ग्लैमर और हिंसा देखते हैं, तब हम उस पत्र के दफ्तर में एक चिट्ठी नहीं लिखते कि जिन पन्नों पर ख़बर, समसामयिक लेख, साहित्य, विचार प्रधान संपादकीय छपते थे; जिनमें छपा ‘बच्चों का कोना’ पढ़कर हमारा बचपन अख़बार पढ़ना सीखा है; उन पर ये क्या छाप कर हमारी बालकनी को गंदा कर रहे हो?
विश्वास कीजिये, बीहड़ बन चुके इस मीडिया में अभी भी उस पत्रकारिता के कुछ बीज ‘दबे हुए हैं’ जिन्हें हमारी दृष्टि का थोड़ा-सा पानी और समर्थन की थोड़ी-सी धूप मिल गई, तो ये वीराना फिर से लहलहा उठेगा।

✍️ चिराग़ जैन

विज्ञापन का जनहित

कोरोना वायरस लॉन्च होते ही साबुनों के विज्ञापन की भाषा बदल गई। हमें बताया गया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए अमुक साबुन से बीस सेकेंड तक हाथ धोएँ।’ च्यवनप्राश कम्पनियों ने बताया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अमुक च्यवनप्राश खाएँ।’ डिजिटल फाइनेंस कम्पनियों ने बताया कि ‘डिजिटल पेमेंट अपनाएँ, ख़ुद को कोरोना के ख़तरे से बचाएँ।’ रिटेल होम डिलीवरी सर्विसेज ने बताया कि ‘घर से बाहर निकलकर कोरोना को आमंत्रित न करें, हम आपका सामान आपके घर पहुँचा देंगे।’ दवाई कम्पनियाँ भी ठीक इसी तर्ज पर ‘पहले से उपलब्ध दवाइयों को बेचने के लिए’ कोरोना की परिस्थितियों का लाभ उठा रही हैं।
मज़े की बात यह है कि इनमें से एक भी कम्पनी अपने विज्ञापन में शत प्रतिशत झूठ नहीं बोल रही। यह बाज़ार की सामान्य प्रवृत्ति है कि वह कोई भी चोगा पहन ले, लेकिन उसका प्राथमिक उद्देश्य व्यापार ही होगा।
बाज़ार हमारे भय का लाभ उठाता है। उसे पता है कि इस समय हम कोरोना से भयभीत हैं, इसलिए इस भय का नाम लेकर जो कुछ बेचा जाएगा, वह बिक जाएगा। इसी भय का लाभ अधकचरे ज्योतिष, पोंगा पंडित, नीम हकीम, तंत्र-मंत्रवाले बाबा, झाड़-फूँक वाले मौलवी भी उठाते हैं।
बाज़ार पहले मांग पैदा करता है, फिर माल बेचता है। और अगर किसी प्राकृतिक कारण से कोई मांग स्वतः उत्पन्न हो जाए तो अपने माल की पैकेजिंग उसकी पूर्ति के अनुरूप कर लेता है।
भूकम्प, बाढ़, महामारी, भुखमरी, अकाल जैसी परिस्थितियों में ऐसी नई पैकेजिंग अक्सर दिखाई देती है। जब कोई बड़ा भूकम्प आ जाए तो सरिया, सीमेंट और फ्लैटबेचने वाले तुरन्त चिल्लाने लगते हैं- ‘भूकम्परोधी सरिया ले लो; भूकम्परोधी सीमेंट ले लो; भूकम्परोधी फ्लैट ले लो!’ कोई आश्चर्य नहीं कि किसी दिन कोई साबुन कम्पनी यह दावा कर दे कि जो हमारी साबुन से नहाएगा उसकी खूबसूरती भूकम्प के मलवे से ख़राब नहीं होगी। और कोई आश्चर्य नहीं कि हम इसको सच मान लें, क्योंकि हम पानी में डूबी कुर्सी देखकर फेविकोल के मजबूत जोड़ की बात को सच मानते ही आए हैं।
बाज़ार चाहे मजहब का चोगा पहन ले, चाहे समाजसेवा का; चाहे अस्पताल का चेहरा लगा ले, चाहे मीडिया का; चाहे कविता के मंच पर सवार हो, चाहे राजनीति के गलियारों में; उसका प्राथमिक उद्देश्य मुनाफ़ा ही होगा। उसकी नीतियाँ भी बाज़ारू ही होंगी। वह जनता की अभिरुचियों का अध्ययन करते हुए उसके अनुरूप अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग करेगा। ध्यान रहे, वह प्रोडक्ट नहीं बदलता सिर्फ़ पैकेजिंग बदलता है। विज्ञापन का शरीर लोककल्याण की भाषा बोलता है लेकिन उसकी आत्मा बाज़ार की फड़ पर खड़ी होकर माल बेचने में संलग्न होती है।
जो लोग बाज़ार तलाशते हुए साहित्यकार या कवि बने फिरते हैं, वे समाज को न तो कोई नया विचार दे पाते हैं, न ही कोई नई बात। यदि समाज उद्वेलित हो तो वे भड़काऊ लेखन से उनके उद्वेलन में वृद्धि करने लगते हैं। वे अपने लेखन के दम पर समाज का मूड बदलने का कोई उपक्रम नहीं करते, वरन समाज का मूड देखकर अपने लेखन की भाषा बदल लेते हैं।
इस सबसे ज़्यादा भयावह यह है कि अब राजनीति भी बाज़ार के सिद्धांतों पर चलने लगी है। वही डर का सिद्धांत। पहले तंत्र की अनियमितताओं को उजागर किया जाता है। वर्तमान सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ावा दिया जाता है। और जैसे ही जनता असंतोष से भर जाती है, तो बेनक़ाब करनेवाले ख़ुद वोट मांगने के लिए झोली पसार देते हैं।
यह कथन किसी भाजपा, किसी कांग्रेस, किसी वामपंथ, किसी समाजवाद पर ही नहीं अपितु वर्तमान राजनीति की पूरे चरित्र पर लागू होता है।
ऐसे में सही राजनेता, सही साहित्यकार, सही दवा विक्रेता, सही मीडिया और सही मजहब की पहचान करने का तरीका क्या है। हो सकता है मेरा मत शत प्रतिशत सटीक न सिद्ध हो, किन्तु यदि गम्भीरता से विचार करें तो सम्भवतः हम वर्तमान बाज़ारवाद के शिकंजे को कुछ तो ढीला कर सकेंगे।
‘समाज की सामान्य सोच के विपरीत बात कहनेवाला व्यक्ति इस बात की पुष्टि करता है कि वह व्यक्तिगत रूप से हानि उठाकर भी अपनी बात कहने के लिए कटिबद्ध है। ऐसे व्यक्ति की बात को भी यदि हम आँख बंद करके सुनने की बजाय थोड़ा-सा विवेक लागू करके सुनें/समझें तो बाज़ार के हो-हल्ले में शायद सच की हल्की-सी आवाज़ हमारे कानों तक पहुँच सके।’

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!