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वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की देहलीज पर बैठकर दफ़्तर से लौटते पापा की राह तकतीं नन्हीं-नन्हीं आँखें रोज़ शाम आशावादी दृष्टिकोण से निहारती थीं सड़क की ओर …कि पापा लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी हमारे लिए। लेकिन लुप्त हो रही है ये स्नेहिल परंपरा पिछले कुछ वर्षों से बच नहीं पाती...

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश...

नए नग़मे सजा लेना

मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना ✍️ चिराग़...

तनहा रोते हैं

जीवन बीता घातों में प्रतिघातों में दौलत की शतरंजी चाल-बिसातों में दुनियादारी के ही वाद-विवादों में अब तनहा रोते हैं काली रातों में जिस धरती पर सम्बन्धों को उगना था हम उस पर दौलत की फसल लगा आए जिन आँखों में सीधे-सादे सपने थे उनको दौलत का अरमान थमा आए एक अदद इन्सान...

हादसा थी ज़िन्दगी

हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा...
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