Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
…कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।
लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!
ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं
जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं
बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं
मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं
वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं
क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं
जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं
दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं
ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी
बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना
जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें
नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जीवन बीता घातों में प्रतिघातों में
दौलत की शतरंजी चाल-बिसातों में
दुनियादारी के ही वाद-विवादों में
अब तनहा रोते हैं काली रातों में
जिस धरती पर सम्बन्धों को उगना था
हम उस पर दौलत की फसल लगा आए
जिन आँखों में सीधे-सादे सपने थे
उनको दौलत का अरमान थमा आए
एक अदद इन्सान कमाना ना आया
यूँ चांदी के सिक्के खूब कमा लाए
अपने ही भीतर से उखड़े-उखड़े हैं
सारे जग पर अपनी धाक् जमा आए
जीवन का सब वक़्त सुनहरा काट दिया
बिन मतलब, बेकार फिजूली बातों में
हमने महलों में भी तनहाई भोगी
उनके चैपालों पर शाही ठाठ रहे
हमने अपनों के भी दर्द नहीं बाँटे
उनको ग़ैरों के भी मरहम याद रहे
हाथ हमारे दौलत खूब रही लेकिन
उनके हाथों में अपनों के हाथ रहे
हम सुख में भी निपट अकेले होते थे
वे दुख में भी सम्बन्धों के साथ रहे
अब समझा है राम तुम्हें क्या स्वाद मिला
शबरी के जूठे फल, कच्चे भातों में
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर
दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर
कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां
बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर
अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी
पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर
इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा ज़रूर
सबके आंगन में हँसी बोता रहा जो उम्र भर
मौत को देखा तो वो भी कसमसा कर रो दिया
ज़िन्दगी को बोझ-सा ढोता रहा जो उम्र भर
मौत ने आकर जगाया तो सुबककर रो पड़ा
ऑंख में सपने लिए सोता रहा जो उम्र भर
मौत जब आई तो मौक़ा देखते ही बेहिचक
उड़ गया पिंजरे में इक तोता रहा जो उम्र भर
✍️ चिराग़ जैन