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अंदाज़ा न कर

पीर की ज़द का अंदाज़ा न कर कल की आफ़त का अंदाज़ा न कर ज़ख़्म गहरा है दर्द होगा ही अब रियायत का अंदाज़ा न कर वक़्त पर ख़ुद-ब-ख़ुद पनपती है यूँ ही हिम्मत का अंदाज़ा न कर बीज में पेड़ छिपा होता है क़द से ताक़त का अंदाज़ा न कर सिर्फ़ दो दिन की मुलाक़ातों से उनकी आदत का अंदाज़ा न कर हँस...

सूरज

फिर अंधेरा निगल गया सूरज फिर चिराग़ों को खल गया सूरज चंद पहरों की ज़िन्दगानी में कितने चेह्रे बदल गया सूरज गर हुआ ऑंख से ज़रा ओझल लोग कहते हैं ढल गया सूरज रात गहराई तो समझ आया सारी दुनिया को छल गया सूरज आज फिर रोज़ की तरह डूबा कैसे कह दूँ सँभल गया सूरज ✍️ चिराग़...

आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में बहुत बड़ा आयोजन हुआ जिसमें सर्वप्रथम भारत माँ के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्वलन और फिर मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ। भाषण में अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था भाषण का सार कुछ यूँ था- “भैंसा दल के अध्यक्ष श्री कालूूप्रसाद जी! टबासीन मछलियो! रंग-बिरंगी...
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