Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ख़र्च ही भेजना रिश्ता नहीं साबित करता
प्यार कितना है, ये पैसा नहीं साबित करता
बस यही बात उसे सबसे बड़ा करती है
वो किसी शख़्स को छोटा नहीं साबित करता
ख़ुद ही दिख जाती है परबत की बुलन्दी सबको
ख़ुद को आकाश भी ऊँचा नहीं साबित करता
सच तो अपनी ही हक़ीक़त बयान करता है
वो किसी और को झूठा नहीं साबित करता
सबको आगोश में भर लेता है आगे बढ़कर
कौन क़तरा है, ये दरिया नहीं साबित करता
रौशनी कितनी है ये बात बताता है ’चिराग़’
कितना गहरा था अंधेरा, नहीं साबित करता।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?
अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
न्याय का सामान्य अर्थ है, परिस्थितियों के सम्यक आकलन के बाद पीड़ित को मरहम देना और अपराधी को दंडित करना। इस प्रक्रिया में किसी की जाति, लिंग, धर्म या आयु का प्रश्न कहाँ से जुड़ गया?
हमने विशेष-अधिकारों, वर्ग आधारित विशेष प्रकोष्ठों और इस तरह की अन्य व्यवस्थाओं से न्याय प्रक्रिया को अपाहिज बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है। इन प्रावधानों ने उस वर्ग को सर्वाधिक हानि पहुँचाई है, जिसके पक्ष में ये कानून बनाए गए हैं।
महिलाओं के पक्ष में दहेज कानूनों का प्रावधान हुआ तो उसकी गाज पारिवारिक जीवन की सहिष्णुता पर गिरी। जब घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के अपराधी को दंडित करने के लिये न्याय व्यवस्था सुसज्जित थी तो इस विशेष प्रावधान की आवश्यकता क्यों पड़ी। स्त्रियों के साथ ससुराल में होनेवाले दुर्व्यवहार की चिंता व्यक्त करते हुए ‘दहेज कानून’ बन तो गए लेकिन इस हथियार के दुरुपयोग के हज़ारों मुआमले अदालतों में ज़ाहिर होने लगे। दाम्पत्य जीवन की ज़रा-सी खटपट सीधे दहेज और घरेलू हिंसा के आक्षेपों तक जा पहुँची। लड़कियों ने परिवार बसाने के लिए प्रयास करने की बजाय थाने पहुँचना आसान समझ लिया। सास-ससुर, नंद-ननदोई, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी और यहाँ तक कि दोस्तों तक के नाम प्रताड़ना में लिखवाए; स्त्री सुरक्षा को कटिबद्ध पुलिस ने सबको लॉक अप में डाल दिया। परिवार के परिवार तबाह हो गए।
एक दिन अचानक अदालत को महसूस हुआ कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अब लड़की की शिकायत पर प्रमाण मांगे जाने लगे। अब ससुरालवाले डरते तो थे लेकिन त्वरित गिरफ्तारी की प्रक्रिया बन्द हो गई। किन्तु परिवार में सौहार्द कायम नहीं हो सका क्योंकि लड़कियों को बता दिया गया है कि कानून लड़की के पक्ष में झुका हुआ है।
‘चार बर्तन होंगे तो आवाज़ होगी ही’ -यह कहावत हम सबने सुनी है। लेकिन दाम्पत्य में साथ रहनेवाले बर्तनों को यह बताया गया कि यदि थाली और गिलास में टकराहट हो तो गिलास को आवाज़ करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि कानून थाली के पक्ष में झुका हुआ है।
क्यों जी, जिन लड़कियों ने दहेज कानूनों का दुरुपयोग करके अपने ससुराल पक्ष के सभी लोगों का जीवन नर्क कर दिया है, उनको किस अदालत ने दंडित किया है। पारिवारिक कलह को आधार बनाकर कन्यापक्ष, वरपक्ष से मोटी रकम वसूलता है और हमारे न्यायालय इसे सेटलमेंट का नाम देकर उस पर ठप्पा लगा देते हैं।
ग़ज़ब का न्याय है! पत्नी ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर हिंसा का आरोप लगाया। इन तीनों आरोपों में अपराधी को जेल भेजने की बजाय पैसे से पत्नी का मुँह बंद करने की सुविधा दे दी गई। अगर अदालत पति को अपराधी मानती है, तो उसे कारावास क्यों नहीं दिया जाता। और अगर अदालत जानती है कि पत्नी केवल क्रोध में उक्त आरोप लगा रही है तो किस अपराध में पति को आर्थिक मुआवजा देने के लिए बाध्य किया जाता है। कितने ही निर्दाेष लोग इस कानूनी व्यवस्था में असहाय होकर आत्मघात तक पहुँच गए।
इन प्रश्नों पर विचार करेंगे तो हम पाएंगे कि इस प्रकार की हर सेटलमेंट हमारी न्याय प्रक्रिया की विफलता को प्रमाणित करती है।
ठीक यही स्थिति एससी/एसटी कानून की भी है। दो व्यक्तियों के सामान्य से झगड़े को भी जातीय अपमान का मुद्दा बनाकर कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। हज़ारों निर्दाेष इस प्रावधान की भेंट चढ़ गए। एक दिन अचानक माननीय न्यायालय को लगा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। इसमें शिकायत दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी की बजाय पहले शिकायत की वास्तविकता की पड़ताल कर लेनी चाहिए। इतना सुनते ही झूठी शिकायतों को हथियार बनाकर ब्लैकमेल करनेवाले तथाकथित दलित भड़क गए और उन्होंने देश भर में उत्पात मचाकर न्यायलय को धमकी दी कि यदि हमारी शिकायत की वास्तविकता जाँचने की कोशिश की तो हम पूरा देश जला डालेंगे। सरकार ने इन बेचारे ब्लैकमेलर्स की बात सुनी और सुप्रीम कोर्ट को कहा कि तुमने बिना सोचे-समझे बेचारे दलितों के फटे कानून में टांग अड़ाई है, चलो दोबारा अपने निर्णय की पड़ताल करो, वरना ये बेचारे देश जला डालेंगे।
समझ नहीं आता कि संसद में बैठे विधिनिर्माताओं के पास वास्तव में दूरदर्शिता है ही नहीं या फिर वे जानबूझकर अगले इलेक्शन से आगे देखना नहीं चाहते। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता समाज का विश्वास जीतने की प्रथम सीढ़ी है। दहेज कानूनों से बर्बाद हुए परिवार और जातीय कानूनों से त्रस्त हुए लोग आज भी देश की संसद और न्यायालय की ओर इस आशा से देखते हैं कि हम तो शहीद हो गए साहब लेकिन अयोग्य योद्धा के हाथ से इन घातक अस्त्रों को वापस ले लो। इन अस्त्रों से ये अपने आसपास के लोगों को ज़ख्मी कर रहे हैं और अंततः अपनी भी जान के दुश्मन बन चुके हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
फिर से एक प्रश्न पर
अटक गये हैं मिस्टर यक्ष;
कि सामान्यतया
बलात्कार के होते हैं दो पक्ष।
एक बलात्कारी,
जो बलात्कार करता है,
और एक बलात्कृता
जिसका बलात्कार होता है।
पहला पक्ष
यानि बलात्कारी
एक से लेकर
दस-बीस तक हो सकते हैं
अपनी संख्या
और बलात्कृता की लाचारी के अनुपात में
ये लोग
बलात्कार की सिचुएशन को
कुछ मिनिटों,
कुछ घंटों,
कुछ दिनों
और कुछ वर्षों तक
ढो सकते हैं।
यहाँ तक तो बात है बिल्कुल साफ़
लेकिन प्रश्न ये है
कि बलात्कार की सिचुएशन में
किसको कहा जाता है इंसाफ़!
जिसका हुआ है बलात्कार
उसका न कोई मुक़द्दमा
न कोई एफ़ आई आर
न कोई तारीख़
न कोई सुनवाई
…सीधी फ़ाइनल कार्रवाई
टिमटिमाते हुए बुझ जाती है
जीवन की ज्योत
उसके हिस्से आती है सज़ा-ए-मौत।
और जिसने किया है ये दुराचार
उसको
पहले तो पुलिस प्रोटेक्शन देती है सरकार
फिर पुलिस के सामने
सेलिब्रिटी की मुद्रा में बैठता है वो ढीठ
और उससे पूछ-पूछ कर पुलिस बनाती है चार्जशीट।
फिर अदालत, तारीख़ और जाँच
तब तक ठंडी हो चुकी होती है
पीड़ित लड़की की चिता की आँच।
फिर सही और ग़लत की खेंचम-खेंच
फिर क़ानून की ऊँची अदालतों के पेंच
जैसे-तैसे फाँसी तक पहुँचती है सरकार
तब तक सामने आ जाते हैं
दोषियों के मानवाधिकार।
कुल मिलाकर कैंसिल हो जाता है फाँसी का प्लान
कोई नहीं लेता फ़ैसले का संज्ञान
बार बार दोहराया जाता है यही स्टाइल
हर बार इसी तरह बंद हो जाती है
बलात्कार की फ़ाइल।
इस यक्ष प्रश्न पर सारा समाज मौन है
यक्ष समझ नहीं पा रहा है
कि सभ्य क़ानून की निगाह में
बलात्कार का असली दोषी कौन है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Nazariya, Prose, Reviews
1. लड़की शाॅप लिफ्टिंग में पकड़ी गई और जेल गई। बाप जमानत करा कर लाया और गुस्से में बोला- ‘आज से इसका कॉलेज बन्द। कोई लड़का देखकर इसकी शादी करा दो।’
2. लड़की अपनी ही सगाई में फोटोग्राफर के साथ सेक्स करती पकड़ी गई। लड़की की माँ ने देख लिया और उस पर लिपिस्टिक-पाउडर की लीपापोती करके उसे सगाई में बैठा दिया।
3. लड़की अपनी माँ से पूछती है कि मेरी शादी की इतनी क्या जल्दी है? लड़की की माँ बोलती है – ‘मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है। तुझे वक्त दिया तो फिर से तू किसी के साथ मुँह काला कर लेगी।’
ये ऊपर की तीनों लड़कियाँ जिस भी लड़के से ब्याह करेंगी उसके प्रति समाज और कानून की क्या जिम्मेदारी है? जब आपकी पाली हुई लड़की आपके हिसाब से ‘बिगड़ चुकी है’ तब आप किसी के गले से फटे ढोल की तरह लटका कर अपनी इज्जत और आपकी जिम्मेदारियों की लीपापोती कर लेते हैं। आपके मापदंडों पर जो लड़की ‘बिगड़ी हुई लड़की’ बन चुकी है उसे किसी निर्दोष के पल्ले बांधते समय क्या आप उसकी खामियों का जिक्र करते हैं?
और इतने पर भी तुर्रा ये कि शादी के बाद जब उस लड़की की उन्हीं हरकतों से परेशान होकर वह लड़का शिकायत करने पहुँचता है तो वही माँ-बाप, वही समाज और वही कानून उल्टे लड़के को ही आँखें दिखाने लगते हैं।
लड़की के माँ-बाप उसकी हरकतों से दुखी होकर उसका कॉलेज बंद करें तो यह ‘उत्तरदायित्व का निर्वाह’ है लेकिन उसी लड़की का पति वैसी ही हरकतों की वजह से उसे घर से बाहर निकलने से मना कर तो यह ‘क्रूरता’ है।
लड़की की माँ उसे किसी लड़के से मिलने से रोके तो यह माँ की बेटी के प्रति चिंता है। लेकिन उसी लड़की का पति उसी लड़के से मिलने से उसे रोके तो वह लड़का ‘रुढ़िवादी और गँवार’ है।
समाज का यह दोहरा रवैया न्याय की अवधारणा को तार-तार करता है। माँओं द्वारा लीप-पोत कर विदा की हुई लड़कियाँ जब ससुराल पहुँच कर मेकअप उतारती हैं तो उनके अतीत के चेहरे पर पड़े हुए नील उनके वैवाहिक जीवन में अंधियारे की ऐसी लकीर खींच देते हैं जिसके साये में सैंकड़ों नौजवानों का जीवन अवसाद के संत्रास को झेलता हुआ समाप्त हो जाता है।
‘लिपिस्टिक अंडर माई बुरका’ का फिल्मकार महिलाओं की आजादी के नाम पर ‘बोल्डनेस’ का जो हवाई झरोखा खींचना चाहता है उसमें से विवाह संबंधों के इस कड़वे सच का लकवाग्रस्त चेहरा साफ दिखाई देता है।
✍️ चिराग़ जैन