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कौन क़तरा है

ख़र्च ही भेजना रिश्ता नहीं साबित करता
प्यार कितना है, ये पैसा नहीं साबित करता

बस यही बात उसे सबसे बड़ा करती है
वो किसी शख़्स को छोटा नहीं साबित करता

ख़ुद ही दिख जाती है परबत की बुलन्दी सबको
ख़ुद को आकाश भी ऊँचा नहीं साबित करता

सच तो अपनी ही हक़ीक़त बयान करता है
वो किसी और को झूठा नहीं साबित करता

सबको आगोश में भर लेता है आगे बढ़कर
कौन क़तरा है, ये दरिया नहीं साबित करता

रौशनी कितनी है ये बात बताता है ’चिराग़’
कितना गहरा था अंधेरा, नहीं साबित करता।

✍️ चिराग़ जैन

भीष्म पितामह ये बतलाओ!

भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?

अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार

फिर से एक प्रश्न पर
अटक गये हैं मिस्टर यक्ष;
कि सामान्यतया
बलात्कार के होते हैं दो पक्ष।

एक बलात्कारी,
जो बलात्कार करता है,
और एक बलात्कृता
जिसका बलात्कार होता है।

पहला पक्ष
यानि बलात्कारी
एक से लेकर
दस-बीस तक हो सकते हैं
अपनी संख्या
और बलात्कृता की लाचारी के अनुपात में
ये लोग
बलात्कार की सिचुएशन को
कुछ मिनिटों,
कुछ घंटों,
कुछ दिनों
और कुछ वर्षों तक
ढो सकते हैं।

यहाँ तक तो बात है बिल्कुल साफ़
लेकिन प्रश्न ये है
कि बलात्कार की सिचुएशन में
किसको कहा जाता है इंसाफ़!

जिसका हुआ है बलात्कार
उसका न कोई मुक़द्दमा
न कोई एफ़ आई आर
न कोई तारीख़
न कोई सुनवाई
…सीधी फ़ाइनल कार्रवाई

टिमटिमाते हुए बुझ जाती है
जीवन की ज्योत
उसके हिस्से आती है सज़ा-ए-मौत।

और जिसने किया है ये दुराचार
उसको
पहले तो पुलिस प्रोटेक्शन देती है सरकार
फिर पुलिस के सामने
सेलिब्रिटी की मुद्रा में बैठता है वो ढीठ
और उससे पूछ-पूछ कर पुलिस बनाती है चार्जशीट।

फिर अदालत, तारीख़ और जाँच
तब तक ठंडी हो चुकी होती है
पीड़ित लड़की की चिता की आँच।

फिर सही और ग़लत की खेंचम-खेंच
फिर क़ानून की ऊँची अदालतों के पेंच
जैसे-तैसे फाँसी तक पहुँचती है सरकार
तब तक सामने आ जाते हैं
दोषियों के मानवाधिकार।

कुल मिलाकर कैंसिल हो जाता है फाँसी का प्लान
कोई नहीं लेता फ़ैसले का संज्ञान
बार बार दोहराया जाता है यही स्टाइल
हर बार इसी तरह बंद हो जाती है
बलात्कार की फ़ाइल।

इस यक्ष प्रश्न पर सारा समाज मौन है
यक्ष समझ नहीं पा रहा है
कि सभ्य क़ानून की निगाह में
बलात्कार का असली दोषी कौन है।

✍️ चिराग़ जैन

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

1. लड़की शाॅप लिफ्टिंग में पकड़ी गई और जेल गई। बाप जमानत करा कर लाया और गुस्से में बोला- ‘आज से इसका कॉलेज बन्द। कोई लड़का देखकर इसकी शादी करा दो।’
2. लड़की अपनी ही सगाई में फोटोग्राफर के साथ सेक्स करती पकड़ी गई। लड़की की माँ ने देख लिया और उस पर लिपिस्टिक-पाउडर की लीपापोती करके उसे सगाई में बैठा दिया।
3. लड़की अपनी माँ से पूछती है कि मेरी शादी की इतनी क्या जल्दी है? लड़की की माँ बोलती है – ‘मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है। तुझे वक्त दिया तो फिर से तू किसी के साथ मुँह काला कर लेगी।’
ये ऊपर की तीनों लड़कियाँ जिस भी लड़के से ब्याह करेंगी उसके प्रति समाज और कानून की क्या जिम्मेदारी है? जब आपकी पाली हुई लड़की आपके हिसाब से ‘बिगड़ चुकी है’ तब आप किसी के गले से फटे ढोल की तरह लटका कर अपनी इज्जत और आपकी जिम्मेदारियों की लीपापोती कर लेते हैं। आपके मापदंडों पर जो लड़की ‘बिगड़ी हुई लड़की’ बन चुकी है उसे किसी निर्दोष के पल्ले बांधते समय क्या आप उसकी खामियों का जिक्र करते हैं?
और इतने पर भी तुर्रा ये कि शादी के बाद जब उस लड़की की उन्हीं हरकतों से परेशान होकर वह लड़का शिकायत करने पहुँचता है तो वही माँ-बाप, वही समाज और वही कानून उल्टे लड़के को ही आँखें दिखाने लगते हैं।
लड़की के माँ-बाप उसकी हरकतों से दुखी होकर उसका कॉलेज बंद करें तो यह ‘उत्तरदायित्व का निर्वाह’ है लेकिन उसी लड़की का पति वैसी ही हरकतों की वजह से उसे घर से बाहर निकलने से मना कर तो यह ‘क्रूरता’ है।
लड़की की माँ उसे किसी लड़के से मिलने से रोके तो यह माँ की बेटी के प्रति चिंता है। लेकिन उसी लड़की का पति उसी लड़के से मिलने से उसे रोके तो वह लड़का ‘रुढ़िवादी और गँवार’ है।
समाज का यह दोहरा रवैया न्याय की अवधारणा को तार-तार करता है। माँओं द्वारा लीप-पोत कर विदा की हुई लड़कियाँ जब ससुराल पहुँच कर मेकअप उतारती हैं तो उनके अतीत के चेहरे पर पड़े हुए नील उनके वैवाहिक जीवन में अंधियारे की ऐसी लकीर खींच देते हैं जिसके साये में सैंकड़ों नौजवानों का जीवन अवसाद के संत्रास को झेलता हुआ समाप्त हो जाता है।
‘लिपिस्टिक अंडर माई बुरका’ का फिल्मकार महिलाओं की आजादी के नाम पर ‘बोल्डनेस’ का जो हवाई झरोखा खींचना चाहता है उसमें से विवाह संबंधों के इस कड़वे सच का लकवाग्रस्त चेहरा साफ दिखाई देता है।

✍️ चिराग़ जैन

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