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कर्ण का परिताप

तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना
मैं समर के हर नियम को मान दूँगा
तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना
मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा

हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी
अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या
न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो
झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या
तुम निहत्थे वीर पर पौरुष दिखाना
मैं किसी अभिशाप को सम्मान दूँगा

धर्म के हाथों तिरस्कृत ही रहा हूँ
पाप का आभार ले-लेकर जिया मैं
दंश बिच्छू का सहा तो ये मिला फल
शाप का उपहार ले-लेकर जिया मैं
तुम धनुष के ज्ञान पर ऊर्जा लगाना
मैं बस अपने जाति-कुल पर ध्यान दूँगा

द्रोण, कुंती, कृष्ण, पांचाली, पितामह
मैं सभी के द्वार से लौटा अभागा
आज अर्जुन और मुझमें युद्ध तय है
आज पहली बार मेरा भाग्य जागा
जो मुझे कुछ भी न दे पाए जनम भर
मैं उन्हीं की इक ख़ुशी पर प्राण दूँगा

✍️ चिराग़ जैन

घर उससे नाराज़ रहा है

जिसकी छाया में आँगन ने अपना हर त्यौहार मनाया
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
जिसके फूलों की ख़ुश्बू ने घर का हर कोना महकाया
उसके सूखे पत्तों पर झल्लाना एक रिवाज़ रहा है

जिस नदिया ने जीवन सींचा, वो बरसातों में अखरेगी
बारिश का मौसम बीता तो, छतरी हमको बोझ लगेगी
जिन अपनों के बिन जी पाना इक पल भी दूभर लगता है
जब वे अपने मर जाते हैं, तब उनसे ही डर लगता है
ऋतुओं के संग आँख बदलना, सबका सहज मिजाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है

प्यास न हो तो पानी भूले, भूख न हो तो रोटी भूले
मन से बचपन बीत गया तो, व्यर्थ लगे सावन के झूले
बचपन में कुछ खेल-खिलौने, यौवन में दिल का नज़राना
फिर घर भर की ज़िम्मेदारी, फिर बिन कष्ट सहे मर जाना
जितनी देर ज़रूरत जिसकी, उतनी देर लिहाज रहा है
जब उस पर पतझर आया तो, घर उससे नाराज़ रहा है

मन के छोटे से झोले में सब कुछ ढोना नामुम्किन है
यादों की डोरी में सबके नाम पिरोना नामुम्किन है
जिससे जितनी साँसें महकी, उससे उतनी प्रीत रही है
रात अंधेरा, भोर उजाला, ये ही जग की रीत रही है
जैसा है अंजाम किसी का कब वैसा आगाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है

✍️ चिराग़ जैन

सत्य के निशान

जब घिरे सवाल तो निदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

लोग जो परोपकार की मिसाल हो गए
दूसरों का दर्द ओढ़कर निहाल हो गए
उन प्रजातियों का ख़ानदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

प्रीति की प्रतीतियों में लीन राधिका हुई
प्रेम की हवाओं में विलीन साधिका हुई
ज्ञानवान प्रीति के प्रमाण खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

गौण हो गईं तमाम नीतियाँ ज़मीन पर
सत्य का असर हुआ न न्याय की मशीन पर
सुर्ख़ियों में रोज़ संविधान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

कर्मशील, भाग्यवान से परास्त हो गया
योग युद्ध का बना, तभी नसीब सो गया
तीर हाथ में रहा, कमान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

✍️ चिराग़ जैन

भीष्म पितामह ये बतलाओ!

भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?

अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!

✍️ चिराग़ जैन

आओ नया धर्म बनाएँ

आने वाली पीढ़ियों को
मेहनत करने से बचाएं
आओ, एक नया धर्म रचाएं!

धर्म रचने के लिए चाहिए
एक अदद इंसान
जो किसी भी सूरत में इंसान न हो।
जिसे भगवान बनाया जा सके
जिसके हर काम को
महान बताया जा सके
और जिसकी हर मूर्खता को
उसकी लीला कहकर भुनाया जा सके।

धर्म रचने के लिए चाहिए
ठाली लोगों का एक कोर ग्रुप
जो उस आम इंसान के चमत्कारों की
माउथ टू माउथ मार्केटिंग करे
पहली बार आने वाले हर शिकार को
स्पेशल फील कराने की सेटिंग करे
और सोशल मीडिया पर
नवजात भगवान की
सस्पेक्टिंग शिष्याओं से चैटिंग करे।

ये कोर ग्रुप तिनके को भी
बांस की तरह तना देता है
और पड़ोसी के झगड़े को भी
देवासुर-संग्राम बना देता है।

ये ठाली कोर ग्रुप
मार्किट में खड़ा होके
’आइए भैनजी’ की आवाज़ लगाता है
और कोई साड़ी मांगे या सूट
उसे धर्म के शोरूम तक ले आता है
शोरूम तक लाने का जिम्मा क़द्रदान का है
और आगे का काम भगवान का है।

ख़ुद पर यक़ीन न करने वाले लोग
ऐसे भगवानों पर
आसानी से यक़ीन कर लेते हैं
और आश्रमों को धनवान बनाने के लिए
ख़ुद को दीन-हीन कर लेते हैं।

जैसे जैसे बढ़ने लगता है ग्रेड
वैसे वैसे मिलने लगती है एड
जैसे जैसे चमकने लगता है धंधा
वैसे वैसे बरसने लगता है चंदा
जब मंत्री से लेकर संतरी तक
आश्रम में पैर फेरने लगते हैं
तब भगवान धर्मोत्थान के लिए
सरकारी ज़मीनें घेरने लगते हैं

जब ठीक से बजने लगता है
भगवान का डंका
पूरी तरह सेटल हो जाती है
रावण की लंका
तब भक्तों को बना लिया जाता है हथियार
चुनाव से लेकर
घेराव तक का किया जाता है व्यापार

भक्तों के पास दो ही काम होते हैं
भगवान की रक्षा के लिए लड़ना
और भगवान की भक्ति करना

जो भक्त भगवान की शरण में आए थे
वे ही भगवान की रक्षा करने लगते हैं
मादा भक्त भगवान पर मरती फिरती हैं
और नर भक्त भगवान के लिए मरने लगते हैं

और भगवान के मर जाने के बाद
आश्रम में रह जाते हैं भगवान के आदमक़द चित्र
अब धर्म धारण करता है अपना असली चरित्र
शरीर मिट गया रह गई छाया
जैसे काजू के फल से काजू निकल आया
अब भगवान वह सब कुछ कर सकता है
जो जीते जी नहीं कर पाया

जो भक्त अब भी भगवान पर विश्वास करता है
भगवान उन भक्तों के बच्चों को पास करता है
ऑफिस में प्रमोशन दिलाता है
कन्याओं की शादी कराता है
भक्ति में डूबने वालों को मज़ा देता है
धर्म के विरोधियों को सज़ा देता है
भक्तों के सारे काम करता है
और रात रात भर सपनों में विचरता है

बुद्धि के तर्क बेकार जाते हैं
नियम-क़ानून हार जाते हैं
आस्था जीत जाती है
और भगवान की भक्ति में
कई पीढ़ियों की ज़िंदगी बीत जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

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