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सच और विकास के बीच दीवार

एक वर्ग है जो दीवार के पीछे बनी झुग्गियों पर प्रश्न पूछना चाहता है। दूसरा वर्ग है, जो झुग्गियों के आगे बनी दीवार को विकास समझ कर झुग्गी के प्रश्न पूछने वालों को राष्ट्रद्रोही कह रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Donald Trump’s India Visit

दुःख के दम पर पुजता है तू

दुनिया को भरमाने वाले
सारा खेल रचाने वाले
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

जग का कर्ता-धर्ता तू है, जग में कष्ट अपार भरे हैं
पहले तूने पापी भेजे, फिर तूने अवतार धरे हैं
पहले आग लगाने वाले
फिर पानी बरसाने वाले
तेरा, सुख देने के दावा
कोरा आडम्बर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

सब कुछ सहज चले दुनिया में, यह तुझको स्वीकार न होगा
कष्ट नहीं हो तो दुनिया में, तेरा कारोबार न होगा
हँसते लोग रुलाने वाले
दुःख देकर इतराने वाले
सुख की मांग बढ़ाता फिरता
तू इक सौदागर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

आँसू, पीड़ा, कष्ट, विवशता -इनसे रिश्वत लेता है तू
सुख के झोला देता है तो, उनमें दुःख रख देता है तू
सुख के स्वप्न दिखाने वाले
दुख के पेड़ लगाने वाले
सबके सुख के परिधानों में
क्यों दुःख का अस्तर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

✍️ चिराग़ जैन

अपशकुनों का दोष

सागर खारा, नदिया सूखी
ताल-तलैया में कीचड़ था
लेकिन प्यास नहीं बुझने का,
हर आरोप ओक ने झेला

पेट अन्न को तरस रहा था
और शिरा में रक्त नहीं था
प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी
आलिंगन का वक़्त नहीं था
चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी
पर फिर भी बंध्या जीवन का, सारा दंश कोख़ ने झेला

मुस्कानों में आडम्बर थे
उत्सव थे कोरी मजबूरी
हवन बिना मन के होते थे
और अर्चना रही अधूरी
श्रम ने भाग्य भरोसे रहकर, कोशिश का अपमान किया था
लेकिन फिर भी अपशकुनों का, सारा दोष शोक ने झेला

इन्द्रासन, त्रैलोक्य, अमरता
शस्त्रों का संधान दे दिया
मंशा की अनदेखी करके
सबको ही वरदान दे दिया
निशदिन कठिन साधना करके, असुरों ने वरदान जुटाए
फिर इन सारे वरदानों का, हर अभिशाप लोक ने झेला

✍️ चिराग़ जैन

द्वितीयो नास्ति

भारत देशभक्तों का देश है। किसी भी आपदा की स्थिति में हम आपदा के निवारण करने की बजाय अपनी देशभक्ति साबित करने में व्यस्त हो जाते हैं। हमारे पास देशभक्ति की कसौटी पर कसने के लिए राजनीति है और देशभक्ति के रास्ते पर मिटने के लिए सेना। इसलिए हम अपने हिस्से की देशभक्ति निभाना आवश्यक नहीं समझते।
हम चौकन्ने देशभक्त लोग हैं। देशभक्ति हो या न हो, परंतु देशभक्ति का शोर होता रहना चाहिए। इसीलिए हमारी रुचि स्वयं को देशभक्त बनाने में कम है और शेष लोगों को देशद्रोही साबित करने में अधिक हैं। किसी ने पुलवामा हमले पर श्रद्धांजलि नहीं दी तो वो देशद्रोही हो गया। किसी ने फेसबुक पर प्रोफ़ाइल फ़ोटो में तिरंगा नहीं लगाया तो वह भी देशद्रोही हो गया। हम दूसरों को कसमें दे-देकर देशभक्ति के फ़ॉर्वर्डेड संदेशों के प्रचार हेतु बाध्य करते हैं ताकि मनुष्यों में न सही, पर कम से कम मोबाइलों में तो देशभक्ति भर ही जाए।
हम लालबत्ती जम्प करते समय दिलेर हो जाते हैं और देश के नियमों की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। पूरे देश में कुल तीन प्रतिशत लोग भी टैक्स नहीं भरते लेकिन शत प्रतिशत लोग सरकार की नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगाने को तैयार रहते हैं। ट्रैफिक हवलदार को रिश्वत देने की पेशकश करते समय, देशभक्ति हमारी आत्मा को नहीं धिक्कारती। नक्शा पास कराए बिना चोरी से एक्स्ट्रा कमरा बनाकर हम पूरी सोसाइटी के सौंदर्य का सत्यानाश कर देते हैं। गाड़ी पार्क करते समय देश के अन्य नागरिकों को होने वाली असुविधा का ध्यान नहीं रखते, लेकिन हम देशभक्त हैं।
अफ़वाहों के प्रचार में हम अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स को आगे करके देशभक्ति के शोर में योगदान देते हैं। सड़क पर खड़े होकर ट्रकों से वसूली करता हवलदार भी हर उच्छ्वास के साथ राजनीति को देश की बर्बादी का कारण बता देता है। दफ़्तरों में रिश्वत और कामचोरी को पोसने वाले बाबू भी जब शाम को घर लौटते हैं तो रास्ते भर सरकार को कोसते हुए घर पहुँचते हैं। टैक्सी-रिक्शावाले मीटर से चलने को राज़ी नहीं हैं, लेकिन सरकार से अपेक्षा करते हैं कि सरकार सवारी की जेब का सारा पैसा उनकी झोली में क्यों नहीं डाल देती!
अस्पतालों से इलाज की बजाय बीमारियाँ मिल रही हैं, डॉक्टर्स अंगों का कारोबार कर रहे हैं; दवाई कंपनियों और पैथलैब की कमीशन पर उनका पूरा ध्यान केंद्रित है लेकिन भारत को खोखला करने का आरोप सरकार पर लगता है। इंजीनियर्स और ठेकेदारों ने देश की मज़बूत बुनियाद पर चूना लगाया है। लेकिन देश की कमज़ोरी का जिम्मेदार सिस्टम को माना जाता है। परचूनिया मिलावट से पीछे नहीं हटता, अध्यापक ट्यूशन का धंधा कर रहा है, अधिवक्ता अपराध को अभयदान दे रहे हैं, न्यायालय सेटिंग और जुगाड़ की कार्यशाला बनते जा रहे हैं। पुलिस जनता को जानवर समझती है और जनता पुलिस को चौपाया।
एयरलाइंस जनता को लूटने का पूरा तंत्र विकसित कर चुकी हैं। बैंकर्स नोटबन्दी में कमाने लगे और नोटबन्दी फेल हो गई। सरकारी फ्लैट बनते हैं तो दलालों का नेटवर्क भी साथ-साथ तैयार हो जाता है। बस कंडक्टर टिकट दिए बिना पैसे ले लेता है। प्राइवेट ड्राइवर पैट्रोल चुरा रहे हैं। निगम के पार्कों में लगवाले गए बैंच, झुग्गियों में सोफ़े की भूमिका अदा कर रहे हैं। और उन्हीं बैंचों पर बैठ कर हम चर्चा कर रहे हैं कि- ‘सब साले चोर हैं, देश के लिए कोई नहीं सोचता।’
✍️ चिराग़ जैन

प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

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