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साहित्यिक गोष्ठियों के वक्ता

आज एक साहित्यिक कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला तो पता चला कि आजकल मार्केट में अनेक प्रकार के वक्ता चल रहे हैं। कुछ परंपरागत वक्ता जो पुराने ढर्रे पर विषय का बाक़ायदा अध्ययन करके मंच पर आते हैं, वे आजकल मंच पर आ नहीं पाते हैं। इसके विपरीत वे लोग मंच की अट्टालिकाओं पर सुशोभित हो जाते हैं जो अध्ययन में व्यर्थ होने वाला अमूल्य समय मंच जुटाने में लगाते हैं। ये लोग जानते हैं कि एक बार मंच मिल जाए तो कुछ भी बोल देंगे, श्रोताओं को सुनना पड़ेगा। क्योंकि साहित्यिक गोष्ठियों का श्रोता वह विवश जीव है जो दरी पर बैठी अनपढ़ महिलाओं की तरह इस भंगिमा से मंच को निहार रहा होता है कि पूज्य बाबाजी जो कह रहे हैं वह ठीक ही होगा।
कुछ वक्ता प्रोफ़ेशनल वक्ता होते हैं। ये स्वागत-वुआगत हो जाने के उपरांत बराबर वाले की ओर झुकते हैं और घबराहट प्रदर्शित करने का अभिनय करते हुए प्रश्न करते हैं कि आज क्या बोलूंगा। उनका प्रश्न सुनकर बराबर वाला अतिरिक्त शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए रिरियाता हुआ कहता है, अरे साहब, आप तो कुछ भी बोल दीजिये। इसके बाद दोनों हें हें हें की ध्वनियाँ निकालते हुए सीधे हो जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ अनुभवी लोग पेट के भीतर हो रही गुड़गुड़ाहट को ठोस से गैस में परिवर्तित कर देने का रासायनिक उपक्रम भी पूर्ण कर लेते हैं।
फिर संचालक एक-एक वक्ता को जिन शब्दों में आमंत्रित करता है उनसे स्पष्ट होता है कि अमुक की उत्पत्ति न हुई होती तो इस धरा को स्वयं पर इतराने का अवसर न मिला होता।
एक ख़ास प्रकार के वक्ता अपने रटे-रटाए वक्तव्य को प्रस्तुत विषय से जोड़ने के लिये एकाध मिनिट की त्वरित भूमिका बनाते हैं और जैसे ही उनके तैयार भाषण का शीर्षक उनके आशुभाषण में घुसड़ जाता है, वे तुरंत धाराप्रवाह अपना भाषण पेल कर मुस्कुराते हुए बैठ जाते हैं।
इसके बाद क्रम शुरू होता है उन वक्ताओं का जो किसी भी विषय पर केवल यह बताते पाए जाते हैं कि उनका कई बड़े-बड़े लोगों से बेहद निकट का संबंध रहा है। ऐसे लोगों की सूची सामान्यतया उन लोगों तक सीमित रहती है जो कदाचित् इनसे निकटता के सदमे से दुखी होकर दुनिया छोड़ चुके हैं। इनको सुनकर पता चलता है कि कई भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राज्यपालों ने तो इनकी सलाह सुनने के लिये ही पदग्रहण किया होता है। ऐसों का वक्तव्य सुनकर मेरा मन एक ठंडी आह भरते हुए कहता है कि अच्छा ही है अमुक जी दुनिया से चले गए वरना ऐसी बेसिर-पैर की बातें सुनने में समय नष्ट करने के अपराध में भारतीय दण्ड संहिता की सभी धाराएँ एक साथ उन पर लग जातीं।
कुछ वक्ता एकदम इन्स्टेंट वक्ता होते हैं। वे “हिंदी साहित्य में रामचन्द्र शुक्ल जी का योगदान” जैसे विषय पर भी बोलेंगे तो बात यहाँ से शुरू करेंगे-
“मेरे पास आयोजकों का फोन आया। मुझसे कहा डॉक्टर साहब आपको आचार्य शुक्ल के योगदान पर बोलना है। मैंने कहा अरे भई, कब बोलना है, कहाँ बोलना है, कुछ तो बताओ। तब आयोजक बोले अरे सर, सॉरी सॉरी मैं बताना भूल गया था, फ़लाँ तारीख़ को फ़लाँ जगह फ़लाँ अवसर पर आपको बोलना है। मैंने कहा ये हुई ना बात। अब बताइये आपको मेरा नम्बर कहाँ से मिला। तो उन्होंने बताया जी आपका नम्बर चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी ने दिया है। मैंने कहा अरे राम रे, ये तो मुसीबत हो गई। चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी की बात कैसे टाल सकता हूँ। उनसे इतना पुराना सम्बन्ध है कि क्या बताएँ। मुझे एक आवश्यक कार्य से लखनऊ जाना था लेकिन अब आपने ऐसे धर्म्संकट में डाल दिया है कि क्या कहें। चलिये… अब जो भी हो, आ जाएंगे। इसलिये मुझे आना पड़ा। बहुत बढ़िया कार्यक्रम है आपका। सभी बढ़िया लोग बुलाए हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में आजकल इतने स्तरीय विद्वान कहाँ देखने को मिलते हैं। आज के अध्यक्ष जी को ही ले लीजिये। महोबा में ये और हम घंटों चाय की दुकान पर साहित्य चर्चा किया करते थे। अनेक बार इनके घर भी जाना हुआ है मेरा। और भाभीजी तो क्या शानदार भजिया बनाती हैं। और उसके साथ वो लहसुन की चटनी। आज तक स्वाद नहीं गया उसका। इतने विद्वान आदमी को अध्यक्ष बनाकर आपने साहित्य के प्रति अपने अनुराग और ईमानदारी का परिचय दिया है। समय की सीमाएँ हैं इसलिये अपनी बात को संक्षिप्त कर रहा हूँ, वरना जी तो करता है कि बोलता ही जाऊँ। आचार्य शुक्ल पर जितना कहा जाए उतना कम है। हिंदी साहित्य उनके योगदान के लिये हमेशा ॠणी रहेगा। आपने मुझ अकिंचन को इतने संभ्रांत लोगों के बीच बोलने का अवसर दिया, बहुत बहुत धन्यवाद।”
इस प्रकार के सात-आठ वक्तव्यों के बाद आयोजक सबका धन्यवाद ज्ञापन करता है। वक्ता सम्मान में मिले दुशालों को कंधों पर डाले, अपना अपना गुलदस्ता उठाकर इतराते हूए एक दूसरे की पीठ ठोंकते हैं। सबके मन में एक दूसरे के प्रति समान आदर भाव होता है कि आप भी उतने ही विद्वान हैं जितना मैं स्वयम को समझता था। श्रोता प्रवचन समाप्ति की घोषणा के साथ ही प्रसाद के लिये जलपान की लाइन में लग जाते हैं। और साहित्य मंच के पीछे टँगे बैनर के साथ ही अपने कर्णधारों की योग्यता देख कर ज़मीन पर आ गिरता है।

✍️ चिराग़ जैन

इनक्रेडिबल इण्डिया

दुनिया की समस्या ये है कि विश्व से आतंकवाद कैसे समाप्त हो। फ़्रांस इस सोच में व्यस्त है कि isis को कैसे समाप्त किया जाए। अमरीका ये सोच रहा है कि हमला ज़मीनी होना चाहिए या हवाई। चीन इस चिंता में है कि विश्व की अर्थव्यवस्था को अपने पक्ष में कैसे पलटा जाए। पाकिस्तान यह जुगत भिड़ा रहा है कि चीन और अमरीका दोनों से मित्रता कैसे बनाई रखी जाए। ऐसे में हमारे प्रश्न ये हैं कि हमें शाहरुख और आमिर की फ़िल्म देखनी चाहिए या नहीं। हमारी चिंता ये है कि मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर काटे गए केक में कितना ख़र्चा हुआ। हम इस मुद्दे पर उलझे हैं कि रामदेव की मैगी नेस्टले की मैगी से बेहतर है या नहीं।
न्यूज़ का इंटरनेशनल बुलेटिन देख कर समझ आता है कि ‘इनक्रेडिबल इण्डिया’ का मतलब क्या है।
जब आमिर खान अतुल्य भारत के विज्ञापन कर रहे थे तो ऐसा लगता था जैसे भोला-भाला पीके दाढ़ी बनाते नाई की तशरीफ़ में घुसा पायजामा निकाल रहे हों। और असहिष्णुता वाला बयान देकर उन्होंने वो पायजामा वापस वहीँ घुसा दिया।

✍️ चिराग़ जैन

हल्ला : विकास का एक पर्याय

हल्ला। ये एक ऐसा भाव है जो मचता है। इसके मचने के लिए मुद्दा कतई ज़रूरी तत्व नहीं है। भारत जैसे राजनैतिक रूप से परिपक्व (जिसे कुछ संकुचित मानसिकता के लोग ढिठाई की संज्ञा देते हैं) देश में हल्ले की आड़ में मुद्दों को सुरक्षित रखा जाने की परंपरा होती है।
हल्ला मचाना यूं तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है किन्तु जो इस कला में दक्षता प्राप्त कर लेता है वह किसी भी पेशे से क्रमबद्ध विकास करता हुआ राजनीति की सुनहरी लंका तक जा पड़ता है। इस कला का अभ्यास हमारे विद्यालयों से प्रारम्भ हो जाता है। कक्षा में अध्यापक का पढ़ाई पर ध्यान न चला जाए इस हेतु अध्यापक को हल्ले में अटका दिया जाता है। धीरे धीरे अध्यापक इसी बात को अपना लक्ष्य मानने लगता है की छात्र हल्ला न करें। ”पढ़ लो रे” के गायत्री मन्त्र से शुरू हुई मास्टरी जब ”हल्ला न करो बे“ के महामृत्युंजय तक पहुँच जाती है तो छात्र कॉलेज का जीर्णोद्धार करने निकल पड़ता है।
”प्रवेश प्रक्रिया में धांधली चल्लई है!“ जैसे क्रांतिकारी वाक्य की शिरोरेखाओं पर सवार होकर हल्ला भी कॉलेज चला आता है। प्रवेश के बाद जागरूक हल्लाधर्मी छात्र कॉलेज के भवन की जर्जर अवस्था देख कर दुखी होता है और छात्रहित में पाठ्यक्रम को तिलांजलि देते हुए सड़क पर उतर आता है। इस प्रकार हल्ले का सहारा लेकर सड़क पर उतर आने से वह बेंच पर चढने की जटिल प्रक्रिया से भी बच लेता है। हल्ले का जलवा ये है कि जो प्रोफ़ेसर उसकी अनुपस्थितियों और लापरवाही का हवाला देकर उसे एडमिट कार्ड देने से इनकार करने वाले थे वे ही दुई कर जोड़े उससे परीक्षा देने की अनुनय करने लगते हैं।
तीन चार साल तक कॉलेज बिल्डिंग की दशा पर दुखी होने के बाद छात्रगण संन्यास भाव के साथ भवन को उसी दशा में और अपने छोटे भाइयों को उसी भवन में छोड़ कर कभी पलटकर न देखने के प्रण के साथ विदा हो जाते हैं।
छात्र जीवन के कठिन अनुशासनों के पालन करने के पश्चात् ये लोग अलग अलग व्यवसायों की भट्ठी में तपने लगते हैं। कोमल हृदयी होने के वशीभूत अपने-अपने पेशे से जुड़े लोगों के जीवन की चुनौतियाँ इनको टिक कर बैठने नहीं देतीं। ये एक एक आदमी के पास अपने निजी पैरों से चलकर जाते हैं और उनको ये बताते हैं कि उनके ऊपर की कुर्सियों पर बैठे लोग उनके जीवन में चुनौतियों का विष घोल रहे हैं इसलिए अपने हक़ की लड़ाई के लिए हम सबको मिलकर हल्ला करना होगा।
कुछ ही समय में दफ़्तर के बाहर किसी साफ़-सुथरी रेलिंग पर लाल रंग के कपड़े पर कर्मचारी यूनियन लिख कर टांग दिया जाता है। इस दिव्य बैनर के आगे कर्मठ हल्लावादियों के स्वागत में बिछी दरी पर बैठ कर कुछ मेहनती लोग उन कर्मचारियों के हिस्से का ताश खेलते हैं जो ऊपर की कुर्सियों पर बैठे जुल्मी अफसरों के कारण ताश खेलने तक का समय नहीं निकाल पाते। ताश की किसी बाज़ी में नंबर गिनते वक़्त हुई छुटपुट वारदात को अफसरों के प्रति आक्रोश की शक़्ल देकर अख़बार में छपने भेज दिया जाता है।
दस-पाँच बार अख़बार में छपने से दफ़्तर का प्रशासन उनसे हल्ला बंद करने का अनुरोध करता है और इस एवज में उन्हें ताश खेलने की आधिकारिक अनुमति भी प्रदान करता है।
दफ़्तर के कष्टों का निवारण कर ये परोपकारी बन्दे अपने मुहल्लों की नालियों की दशा पर दुखी होने लगते हैं और हल्ले की चटाई बिछाते बिछाते नगर निगम के अहाते तक पहुँच जाते हैं। वहां कुछ पुराने हल्लेबाज़ उनके हल्ले की सरगम को पहचानकर उन्हें अहाते से उठा निगम की बेंच पर बैठा देते हैं। निगम से विधानसभा और विधानसभा से संसद तक पहुँचने के लिए भी हल्ला जारी रहता है। विकास का यह क्रम उस स्थिति में और भी द्रुत हो उठता है जब किसी समाचार चैनल से आधा घण्टा हल्ला करने का न्यौता आ जाता है।
शुरू-शुरू में चैनल पर हल्ला करने के लिए इन लोगों को अनिवार्य रूप से बुलाया जाता था लेकिन अब स्थितियाँ बदल गई हैं अब इन्हें चैनल पर बुलाया तो जाता है लेकिन ये दिखाने के लिए कि तुम लोग चुक गए हो। तुमसे ज़्यादा हल्ला तो हमारा संवाददाता कर लेता है।
भूख की कराह कहीं आवाज़ न बन जाए इसलिए विदेश यात्राओं का हल्ला करो। ठन्डे चूल्हे की राख विस्फोट न कर दे इसलिए हिन्दू मुस्लिम का हल्ला करो। राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्न चिंघाड़ने न लगें इसलिए पुरस्कार वापसी का शोर उठा दो। 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी याद न आ जाए इसलिए स्वच्छता अभियान का हल्ला कर दो। गांधी की मूर्ति तोड़ने में कानून आड़े आता हो तो गोडसे का मंदिर बनाकर कानून की रीढ़ तोड़ दो। जहाँ 19 नवम्बर को कांग्रेस इंदिरा जी को नमन करे उसी पृष्ठ पर 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस घोषित करवाने वाला विज्ञापन छपवा दो। मनमोहन सिंह को गाली देने के लिए जंतर मंतर पर हल्ला करो और लालू यादव के साथ गांधी मैदान पहुंचकर गले मिलो। कोई तुमसे जनलोकपाल बिल का हश्र न पूछ ले इसलिए केंद्र सरकार को गाली देते रहो। वो स्मृति ईरानी की डिग्री का हल्ला करें तो तुम तेजस्वी यादव और जितेन्द्र तोमर की शिक्षा का हंगामा कर दो। ख़बरों की रोटियां सिकती रहें इसलिए मुद्दों की आग भड़काए रखो। हल्ला, हंगामा, शोर, शराबा चलता रहना चाहिए। पहला हल्ला रुकने से पहले दूसरा हल्ला तैयार रखो। कुछ न मिले तो हो-हल्ले को चुप कराने का शोर उठा दो।
साथ ही एक गायक पकिस्तान से बुला लो जो बीच बीच में खरद में अलापता रहे- “हंगामा है क्यों बरपा…..।”

✍️ चिराग़ जैन

इसे कहते हैं बाज़ी

सियासत के एक खेमे ने कुछ कलाकारों को बटोरा …सरकार का विरोध करने के लिए।
फिर सियासत के दूसरे खेमे ने कुछ कलाकारों को बटोरा …कलाकारों का विरोध करने के लिए।
अब कुछ दिन हो-हल्ला होगा।
एक खेमे के कलाकार दूसरे खेमे के कलाकारों को गालियाँ देंगे। खूब शोर होगा। सोशल मीडिया पर खेमेबाज़ी होगी। जब माहौल खूब बिगड़ लेगा तो एक दिन टीवी चैनल पर दो बड़े दलों के राजनेता दुखी होते हुए बयान देंगे – “हमें बहुत दुःख है कि साहित्य और कला के क्षेत्र से जुड़े लोग आपस में इस तरह लड़ते-मरते हैं। अरे भाई! तुम कलाकार हो, सृजन करो, कविता लिखो, मनोरंजनकरो। राजनीति करना आपको शोभा नहीं देता।”

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी का अर्थ

मंज़िल की धुन में राह के मंज़र निकल गये
ख़ुशियों के गाँव आए तो छूकर निकल गये
कुछ लोग ज़िन्दगी का अर्थ बूझते फिरे
कुछ लोग इसे शान से जीकर निकल गये

✍️ चिराग़ जैन

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