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भारत की पूर्णता

भारत की पूर्णता का भान करने के लिए
वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है
मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो
मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है
कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं
मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है
नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह
राम भी ज़रूरी, रहमान भी ज़रूरी है

मीरा का मुरारी, जसोदा का नंदलाल और
राधिका के सांवरे से कंत भी समान हैं
जन्म से मरण तक कोई-सा भी पंथ रहे
आदि भी समान और अंत भी समान हैं
बैरागी, फ़क़ीर, ब्रह्मचारी, त्यागी, पीर, बाबा
सिद्ध, ऋषि-मुनि, साधु-संत भी समान हैं
यंत्र भी समान, तंत्र-मंत्र भी समान और
भीतर से सारे धर्मग्रंथ भी समान हैं

झाड़-फूंक वाले टोने-टोटके भी अपने हैं
जड़ी-बूटी वाला वो इलाज भी हमारा है
शंख फूंकने से बाँसुरी की तान तक दक्ष
शस्त्र भी हमारा और साज भी हमारा है
शोणित के पान की परंपरा हमारी ही है
क्षमादान करता रिवाज़ भी हमारा है
गंगा जी का तट मणिकर्णिका हमारा ही है
जमुना किनारे बना ताज भी हमारा है

युध्द से विरक्त हो के संत जो बना था वीर
मौर्यवंशी शासक महान भी हमारा है
भोज, अकबर, शेरशाह, रणजीत, हर्ष,
महाराणा, पौरुष, चौहान भी हमारा है
भारतीय दर्शन जान के सुदर्शन
शून्य पे जो बोला था वो ज्ञान भी हमारा है
भारत हमारा, आर्यावर्त भी हमारा ही है
इंडिया हमारा, हिंदुस्तान भी हमारा है

✍️ चिराग़ जैन

हिन्दी पढ़ने वाली लड़की

हिंदी पढ़ने वाली लड़की
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
सीधी-सादी, सहज-सलोनी, कभी न तड़की-भड़की

बातों का भावार्थ समझ लेती है वो झटपट से
उसके सरल वाक्य अपराजित रहते सदा कपट से
स्वाद बढ़ाते हैं बातों का उसके बोले व्यंजन
देवनागरी की अक्षर लिपटे रहते हैं लट से
अनुपम है अनुभूति भाव की
सक्षम है अभिव्यक्ति भाव की
कविता पढ़-पढ़ स्वयं हो गई कविता किसी सुगढ़ की

नियम छोड़ कर रोमन हो गई हैं जब शीला-मुन्नी
ऐसे में भी उसे सुहाए शिरोरेख सी चुन्नी
भीतर-बाहर एक सरीखी उसकी जीवनचर्या
ना कठोर, ना जटिल, न दूभर, ना अभद्र, ना घुन्नी
वो इक रोचक उपन्यास है
वो उत्सव का अनुप्रास है
शायद वो है किसी निराले कवि की बिटिया बड़की

उसको है आभास सभी की लघुता-गुरुता द्वय का
उसे पता है अर्थ शब्द संग अलंकार परिणय का
छंद भंग हों संबंधों के यह संभव कब उससे
ध्यान हमेशा रखती है वो यति-गति का सुर-लय का
कभी अकड़ है पूर्णछन्द सी
कभी रबड है मुक्तछन्द सी
भाषा से सीखी हैं उसने सब बातें रोकड़ की

नवरस की अनवरत साधना उसका धर्म ग़ज़ब है
भाषा से अनुराग उसे जो है, अन्यत्र अलभ है
मात्र भंगिमा के बल पर वह श्लेष साध लेती है
उसे यमाताराजभानसलगा से फुर्सत कब है
हीरामन-होरी से परिचित
हर गौरा-गोरी से परिचित
उसने कंधों से समझी है पावनता काँवड़ की

✍️ चिराग़ जैन

विभक्त

सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।

तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
…हर की पौड़ी पर।

कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।

एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

पिताजी की भाषा की अलंकारिकता

यद्यपि उन गद्यांशों में मेरी कभी बहुत रुचि नहीं रही तथापि उनको सुनना मेरी विवशता है क्योंकि उनके वाचक मेरे पिताजी हैं, जो स्वयं को पूज्य बनाने की जुगत में समय की सूक्ष्मतम इकाई में भी मुझे प्रवचन पेलने से नहीं चूकते। गत 32 वर्ष में से प्रारम्भ के 4-5 वर्ष छोड़कर; जिनमें परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से मुझे कुछ समझ नहीं आने की नैसर्गिक सुविधा प्राप्त थी; मैं यही समझने की कोशिश में लगा रहा हूँ कि आख़िर मुझ निर्दोष अर्जुन को अलग से बुलाकर बिना किसी कारण अष्टादश अध्यायी सुनाने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा!
ये बातें मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि अब जब कभी इनकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं उनका साहित्यिक और वैयाकरणिक अन्वेषण करने लगता हूँ। इस अन्वेषण के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि पिताजी की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अलंकृत है।
बचपन में दो रुपये का नोट भी जब वे ये कहते हुए देते थे कि संभाल के रखियो कहीं खामाखा खो-खा न जाए; तब ख वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास की छटा देखते ही बनती थी। कई बार तो मैं अनुप्रास की छटा देख ही रहा होता था कि पिताजी दो रूपये देने के अपने इरादे को पीठ दिखा देते थे।
दादाजी के खाना खाने बैठते समय दही लेने निकालना और आधी रोटी ख़त्म होने से पहले दही ले आने की घटना वे इतनी बार सुना चुके हैं कि पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत हो गया है। बाद में इसी घटना में दही वाले की दुकान को घर से डेढ़ किलोमीटर दूर बताकर वे लगे हाथ अतिशयोक्ति अलंकार भी चिपका देते हैं।
अकेले “नहीं” शब्द को वे इतने अलग-अलग बलाघात के साथ उच्चार लेते हैं कि यमक और श्लेष दोनों के अश्व उनके इस एक शब्द के अस्तबल में घास चरते बंधे रहते हैं। शब्द की प्रयोजनीयता का उनकी भाषा में ऐसा श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है कि रसख़ान और कालिदास की रचनाएँ भी उकड़ू बैठ कर पिताजी का भाषाई कौशल देखती रह जाती हैं। मेरे घर में प्रवेश करते ही वे तीन शब्दों के एक युग्म का प्रयोग करते हैं। इस वाक्यांश से मुझे अनायास ही यह समझ आ जाता है कि आज डिनर करते समय कौन से उपनिषद का पाठ होगा।
“कहाँ गया था” या “घड़ी देखियो ज़रा”; इस प्रकार के वाक्यांश का अर्थ है कि स्थिति सामान्य है और भोजन के समय छुटपुट नीतिशतक से अधिक और कुछ नहीं सुनने को मिलेगा।
“आ गए हुज़ूर” अर्थात् मेरे अवतरण से कुछ पल पूर्व तक माँ के साथ मेरे भविष्य की चिंता को लेकर गरज के साथ छींटे पड़ चुके हैं और मुझे भोजन के समय श्रीमद्भागवत गीता का कर्मयोग सिखाया जायेगा जिसे स्थितप्रज्ञ होकर सह लेने में ही मेरा कल्याण है।
“आ जा बेटा” अथवा “लो आ गया” सुनते ही मैं समझ जाता हूँ कि आज गरुड़ पुराण से कम में पीछा नहीं छूटना। सही समय पर सही शब्द बरतने का यह कौशल उनकी भाषा को अन्य लोगों के पिताजियों की भाषा से विलग करता है। “हमने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं” और “हम उड़ते पंछी के पर गिन लेते हैं” जैसे वाक्यों का प्रयोग कर वे सिद्ध करते हैं कि उनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियाँ सहज ही उतर आती हैं।
अपनी अभिव्यक्ति को अधिक समर्थ बनाने के लिए मेरे पिताजी संस्कृत के वैयाकरणिक सिद्धांतों का विलोमानुकरण करने में भी सिद्धहस्त हैं। जब वे मुझे संबोधित करते हुए मध्यम पुरुष एकवचन का हिंदी में प्रयोग करते हुए “तू/तेरा” आदि शब्द प्रयोग करते हैं तो वास्तव में मैं यथोचित सम्मान पा रहा होता हूँ किन्तु जैसे ही मेरे प्रति उनके सम्बोधन मध्यम पुरुष द्विवचन पर पहुँच कर “तुम/आप” आदि हो जाते हैं तो मेरे अपमान के प्रतिमान खड़े हो जाते हैं।
पिताजी के इस भाषाई कौशल में मेरी भंगिमा सदैव अवाक् और मेरे कंठ में घुँटा हुआ शब्द संस्कृत के सम्बोधन कारक का हिंदी अनुवाद ही होता है। लेकिन करत-करत अभ्यास के मेरी जड़मति इतनी सुजान अवश्य हो गई है कि जब वे पाणिनी होकर फलम् फले फलानि जपने लगते हैं तो मैं वरदराज बनकर अपने अंगूठे से फर्श की सिल पर पड़े निशान देखता रहता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

साहित्यिक गोष्ठियों के वक्ता

आज एक साहित्यिक कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला तो पता चला कि आजकल मार्केट में अनेक प्रकार के वक्ता चल रहे हैं। कुछ परंपरागत वक्ता जो पुराने ढर्रे पर विषय का बाक़ायदा अध्ययन करके मंच पर आते हैं, वे आजकल मंच पर आ नहीं पाते हैं। इसके विपरीत वे लोग मंच की अट्टालिकाओं पर सुशोभित हो जाते हैं जो अध्ययन में व्यर्थ होने वाला अमूल्य समय मंच जुटाने में लगाते हैं। ये लोग जानते हैं कि एक बार मंच मिल जाए तो कुछ भी बोल देंगे, श्रोताओं को सुनना पड़ेगा। क्योंकि साहित्यिक गोष्ठियों का श्रोता वह विवश जीव है जो दरी पर बैठी अनपढ़ महिलाओं की तरह इस भंगिमा से मंच को निहार रहा होता है कि पूज्य बाबाजी जो कह रहे हैं वह ठीक ही होगा।
कुछ वक्ता प्रोफ़ेशनल वक्ता होते हैं। ये स्वागत-वुआगत हो जाने के उपरांत बराबर वाले की ओर झुकते हैं और घबराहट प्रदर्शित करने का अभिनय करते हुए प्रश्न करते हैं कि आज क्या बोलूंगा। उनका प्रश्न सुनकर बराबर वाला अतिरिक्त शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए रिरियाता हुआ कहता है, अरे साहब, आप तो कुछ भी बोल दीजिये। इसके बाद दोनों हें हें हें की ध्वनियाँ निकालते हुए सीधे हो जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ अनुभवी लोग पेट के भीतर हो रही गुड़गुड़ाहट को ठोस से गैस में परिवर्तित कर देने का रासायनिक उपक्रम भी पूर्ण कर लेते हैं।
फिर संचालक एक-एक वक्ता को जिन शब्दों में आमंत्रित करता है उनसे स्पष्ट होता है कि अमुक की उत्पत्ति न हुई होती तो इस धरा को स्वयं पर इतराने का अवसर न मिला होता।
एक ख़ास प्रकार के वक्ता अपने रटे-रटाए वक्तव्य को प्रस्तुत विषय से जोड़ने के लिये एकाध मिनिट की त्वरित भूमिका बनाते हैं और जैसे ही उनके तैयार भाषण का शीर्षक उनके आशुभाषण में घुसड़ जाता है, वे तुरंत धाराप्रवाह अपना भाषण पेल कर मुस्कुराते हुए बैठ जाते हैं।
इसके बाद क्रम शुरू होता है उन वक्ताओं का जो किसी भी विषय पर केवल यह बताते पाए जाते हैं कि उनका कई बड़े-बड़े लोगों से बेहद निकट का संबंध रहा है। ऐसे लोगों की सूची सामान्यतया उन लोगों तक सीमित रहती है जो कदाचित् इनसे निकटता के सदमे से दुखी होकर दुनिया छोड़ चुके हैं। इनको सुनकर पता चलता है कि कई भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राज्यपालों ने तो इनकी सलाह सुनने के लिये ही पदग्रहण किया होता है। ऐसों का वक्तव्य सुनकर मेरा मन एक ठंडी आह भरते हुए कहता है कि अच्छा ही है अमुक जी दुनिया से चले गए वरना ऐसी बेसिर-पैर की बातें सुनने में समय नष्ट करने के अपराध में भारतीय दण्ड संहिता की सभी धाराएँ एक साथ उन पर लग जातीं।
कुछ वक्ता एकदम इन्स्टेंट वक्ता होते हैं। वे “हिंदी साहित्य में रामचन्द्र शुक्ल जी का योगदान” जैसे विषय पर भी बोलेंगे तो बात यहाँ से शुरू करेंगे-
“मेरे पास आयोजकों का फोन आया। मुझसे कहा डॉक्टर साहब आपको आचार्य शुक्ल के योगदान पर बोलना है। मैंने कहा अरे भई, कब बोलना है, कहाँ बोलना है, कुछ तो बताओ। तब आयोजक बोले अरे सर, सॉरी सॉरी मैं बताना भूल गया था, फ़लाँ तारीख़ को फ़लाँ जगह फ़लाँ अवसर पर आपको बोलना है। मैंने कहा ये हुई ना बात। अब बताइये आपको मेरा नम्बर कहाँ से मिला। तो उन्होंने बताया जी आपका नम्बर चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी ने दिया है। मैंने कहा अरे राम रे, ये तो मुसीबत हो गई। चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी की बात कैसे टाल सकता हूँ। उनसे इतना पुराना सम्बन्ध है कि क्या बताएँ। मुझे एक आवश्यक कार्य से लखनऊ जाना था लेकिन अब आपने ऐसे धर्म्संकट में डाल दिया है कि क्या कहें। चलिये… अब जो भी हो, आ जाएंगे। इसलिये मुझे आना पड़ा। बहुत बढ़िया कार्यक्रम है आपका। सभी बढ़िया लोग बुलाए हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में आजकल इतने स्तरीय विद्वान कहाँ देखने को मिलते हैं। आज के अध्यक्ष जी को ही ले लीजिये। महोबा में ये और हम घंटों चाय की दुकान पर साहित्य चर्चा किया करते थे। अनेक बार इनके घर भी जाना हुआ है मेरा। और भाभीजी तो क्या शानदार भजिया बनाती हैं। और उसके साथ वो लहसुन की चटनी। आज तक स्वाद नहीं गया उसका। इतने विद्वान आदमी को अध्यक्ष बनाकर आपने साहित्य के प्रति अपने अनुराग और ईमानदारी का परिचय दिया है। समय की सीमाएँ हैं इसलिये अपनी बात को संक्षिप्त कर रहा हूँ, वरना जी तो करता है कि बोलता ही जाऊँ। आचार्य शुक्ल पर जितना कहा जाए उतना कम है। हिंदी साहित्य उनके योगदान के लिये हमेशा ॠणी रहेगा। आपने मुझ अकिंचन को इतने संभ्रांत लोगों के बीच बोलने का अवसर दिया, बहुत बहुत धन्यवाद।”
इस प्रकार के सात-आठ वक्तव्यों के बाद आयोजक सबका धन्यवाद ज्ञापन करता है। वक्ता सम्मान में मिले दुशालों को कंधों पर डाले, अपना अपना गुलदस्ता उठाकर इतराते हूए एक दूसरे की पीठ ठोंकते हैं। सबके मन में एक दूसरे के प्रति समान आदर भाव होता है कि आप भी उतने ही विद्वान हैं जितना मैं स्वयम को समझता था। श्रोता प्रवचन समाप्ति की घोषणा के साथ ही प्रसाद के लिये जलपान की लाइन में लग जाते हैं। और साहित्य मंच के पीछे टँगे बैनर के साथ ही अपने कर्णधारों की योग्यता देख कर ज़मीन पर आ गिरता है।

✍️ चिराग़ जैन

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