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न्याय व्यवस्था

बलात्कार जैसे अपराध के अपराधी के प्रति पूरा देश घृणा से भरा है। मनुष्य की खाल में छिपे दैत्यों को उनकी करनी का कठोर से कठोर दण्ड मिलना ही चाहिए। हैदराबाद में पुलिस ने केवल उन चार दरिंदों को ही नहीं मारा है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की लचर प्रवृत्ति के मुँह पर भी जोरदार तमाचा जड़ा है जो ‘आरोपी’ को ‘अपराधी’ सिद्ध करने में अरसा गुज़ार देती है। यदि पुलिस ने जानबूझकर यह एनकाउंटर किया है तो आँख पर काली पट्टी बांधे बैठी न्याय की गांधारी को स्वयं अपनी आँखें फोड़कर धृतराष्ट्र हो जाना चाहिए क्योंकि पांचाली चीरहरण पर मूक बैठनेवाले सिंहासन को दुर्याेधन की जंघा पर किये गए गदा प्रहार के समय आपत्ति की उंगली उठाने का अवसर नहीं मिलता।
अभी भी लाखों लोग सच्चे-झूठे मुआमलात में अदालत के फैसलों का इंतज़ार कर रहे हैं। बिल्डर ने फ्लैट बेचकर पूरे पैसे ले लिए और समय पर फ्लैट नहीं दिया… इतने सीधे-सादे मुआमले को भी बरसों-बरस घसीटा जाता हो तो अदालत में किसी का विश्वास रहेगा भी कैसे? शर्म आती है यह कहते हुए कि पीड़ित के अपराधी बन जाने तक अदालतें कोई फैसला नहीं कर पातीं। कोई इस फैसले के इंतज़ार में आत्मदाह कर लेता है, तो कोई हत्यारा बन जाता है। यह एनकाउंटर भारतीय न्याय प्रणाली के लिए संभवतः अंतिम अलार्म है।
जिस तरह लोग हैदराबाद पुलिस को बधाइयाँ दे रहे हैं उससे साफ़ है कि जनता यह मान चुकी है कि यह एनकाउंटर नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति है, जिसे एनकाउंटर की शक्ल देकर प्रस्तुत किया गया है। जनता यह स्वीकार कर चुकी है कि पुलिस को मिले इस क़ानूनी औज़ार का यह बिल्कुल सही प्रयोग है। जनता यह सीख रही है कि अदालत जाने से बेहतर है किसी क़ानून की ओट में बाहर ही मुआमला रफ़ा-दफ़ा कर दो, क्योंकि अदालत के लिए किसी को दोषी सिद्ध करने में जितना समय लगेगा उससे कम में आप स्वयं को निर्दाेष सिद्ध कर देंगे। पता नहीं कि इससे न्याय तंत्र कोई सबक ले पाएगा या नहीं, लेकिन यदि न्याय व्यवस्था का नया रूप इस एनकाउंटर की मिट्टी से निर्मित हो रहा है तो अदालतों को अपनी इति श्री के लिए तैयार रहना होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Hyderabad Rape culprits encountered by police.

जनसंख्या

सैंया पूछने लगी है सरकार
कलैण्डर कब तक छापोगे
अब संभालने दो मोहे घर बार
कलैंडर कब तक छापोगे

कमरों की हालत ख़स्ता है
आंगन पड़ गया छोटा
चौका बोला हो जावेगा
दो रोटी का टोटा
मेरी देह भी करे है इनकार
कलैंडर कब तक छापोगे

संसाधन नाराज़ हुए हैं
रूठी हैं सुविधाएँ
कहीं हमारी लापरवाही
भारी ना पड़ जाएँ
छिन जाएंगे तुम्हारे अधिकार
कलैंडर कब तक छापोगे

✍️ चिराग़ जैन

मृत्यु!

उस पल जब चीख़ बन गई थी
एक नन्हीं किलकारी
जब दहल उठा था सारा ब्रह्मांड
जब दरक गई थी धरती
उस पल केवल तुम आई थीं
उसकी छटपटाहट को आलिंगन में भरकर दुलारने
तुम दूर ले गईं उसे बर्बर वहशी की पहुँच से! …
तुमने उसे मारा नहीं; बचा लिया है मृत्यु!

✍️ चिराग़ जैन

ख़ास अनुभूतियों की आम अभिव्यक्ति : चिनिया के पापा

स्त्री मन की बेलाग अभिव्यक्ति का दस्तावेज है कवयित्री संध्या यादव का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह “चिनिया के पापा”। कुल 147 कविताओं का यह संग्रह मूलतः नारी की उन अनुभूतियों का बयान है जिनमें पीड़ादायी परिस्थितियों की स्वीकारोक्ति को वरीयता दी गई है।
इन कविताओं में कवयित्री न तो नारी मुक्ति आंदोलन की रवायत निभाते हुए पीड़ा से आज़ाद होने को छटपटाती दिखाई देती है न ही नियति के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार से व्यथित होकर भाग्य को कोसती नज़र आती है। मन की कचहरी में अपने अनुभव और चिंतन की गवाही दर्ज कराने भर का उपक्रम है यह काव्य संग्रह। यह ऐसे ही है ज्यों चोट लग जाने पर एक आह अनायास ही मुँह से निकल जाए; ज्यों छले जाने पर एक सिसकी अनायास ही आँखों से बह निकले। इसमें प्रयास करके आँसू बहाने के परिश्रम की गुंजाइश नहीं है। इसमें स्वयं को दीन-हीन दिखाने का पाखण्ड नहीं है। यही कारण है कि पीड़ा से व्यथित होने के बावजूद कवयित्री की लेखनी स्वाभिमानी तो होती दीख पड़ती है किंतु विद्रोही नहीं।
अपने उत्तरदायित्वों से विमुख होकर परदेस में विलसमग्न पति को चिट्ठी लिखते समय गिड़गिड़ाहट और दोषारोपण के स्थान पर स्वाभिमान से उत्पन्न कटाक्ष की भाषा इन कविताओं की विशेषता है। बलात्कार की शिकार किसी लड़की के साथ सामाजिक व्यवहार की विद्रूपता से पूर्व उसके परिवार के व्यवहार का नश्तर इन कविताओं की विशेषता है। ससुराल की प्रताड़ना के घिसे-पिटे जुमलों से हटकर पीहर के वीभत्स सत्य का शब्दांकन इन कविताओं की विशेषता है।
बहुओं पर हो रहे ज़ुल्म की हज़ारों कहानियां हम लिख-पढ़-सुन चुके हैं। बेटियों के अनकहे मन की आवाज़ भी बहुधा कविता की शक्ल में हमारे सामने से गुज़री है। किंतु ब्याहता बेटी के सम्मुख पीहर के भावनात्मक शोषण के कारण जो चुनौतियां उत्पन्न होती हैं उनकी प्रतिध्वनि संभवतः पहली बार इन कविताओं में आकर ले पाई है।
पुरुष की आकांक्षाओं में दिखाई देती ‘केवल’ दैहिक सुख की कामना से स्त्री मन पर जो खरोंचें पड़ती हैं उनको बयान करते समय कवयित्री साफ़गोई की चौखट तक तो कई बार गई है किंतु उसने कभी भी अश्लीलता के आंगन में प्रवेश नहीं किया। संबंधों पर से जब अपनत्व का मुलम्मा उतर जाता है तो उसके माथे पर कभी न पिघलने वाले कुछ बल पड़ जाते है। इन त्यौरियों को भी कवयित्री ने कई कविताओं में स्वीकारोक्ति के साथ स्वीकार किया है।
इस सबके बावजूद कवयित्री किसी भी सीमा तक जाकर संबंधों को निभाने की पक्षधर है। वह संबंध को बंधन घोषित कर उससे आज़ाद हो जाने की वकालत नहीं करती। वह मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को स्त्री अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह मानकर उसका उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करती।
शिल्प पक्ष की बात करें तो बिल्कुल आम बोलचाल की शब्दावली के साथ सहज प्रतीकों का प्रयोग इन कविताओं में दिखाई देता है। गांधारी की आँखों पर बंधी पट्टी को पुरुष के अहंकार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करने में भी संध्या हिचकती नहीं हैं और गूगल पर अपने अभीष्ट की सर्फिंग से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है। रसोईघर की सामग्री से भी वे अपनी अभिव्यक्ति के बिम्ब खोज लेती हैं और पेड़, जड़, फूल, पत्तियों से भी अपनी कविताओं की क्यारी सजा लेने में दक्ष हैं। इन कविताओं में अपने हिस्से के आधे चांद को कूरियर से भेजने की कल्पनाशीलता भी है और पुरुषवादी मानसिकता के मन में पल रही कुंठाओं का सच भी है।
किताब के सफ़हे पलटते हुए पीड़ा की साफ़गोई से उत्पन्न नकारात्मकता पाठकों को विचलित कर सकती है किन्तु इस विचलन से भी मन की परतों के उघड़ने का रोमांच कहीं कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी की कामकाजी महिलाओं के सामान्य जीवन में सम्मिलित विशेषता को जानने के लिए यह काव्य संग्रह कारगर सिद्ध होगा।
पुस्तक के प्रारम्भ में कवयित्री का आत्मकथ्य और प्रदीप जैन जी की भूमिका के साथ सुरेन्द्र शर्मा की विश्लेषणात्मक टिप्पणी पाठकों को पुस्तक की मूल सामग्री से जुड़ने में सहयोगी सिद्ध होगी।
कवयित्री ने अनुरोध किया है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस पुस्तक के पृष्ठ पलटे जाएं। पाठक यदि इस अनुरोध को स्वीकार कर सकेंगे तो निश्चित रूप से इन कविताओं का सेतु उन्हें रचनाकार की मनःस्थिति का पर्यटन कराएगा।

✍️ चिराग़ जैन

पुरुषोचित

जनक ने कहा-
“प्रत्यंचा चढ़ाओ!”
तुमने धनुष ही तोड़ दिया।

जनता ने कहा-
“धोबी की पत्नी को न्याय दिलाओ!”
तुमने अपनी पत्नी को ही छोड़ दिया।

धनुष तोड़ कर सीता को तो वर लाए
फिर कभी सुधि नहीं ली
उस टूटे वरदान की,
सीता को त्याग कर उदाहरण तो बन गए
लेकिन चिंता नहीं की
अर्धांगिनी के सम्मान की।

मांगलिक कार्यों में
शस्त्र का खण्डन
और ऋषि का कोप
अपशकुन था राम जी!
और सँवारने की कोशिश में
बिगाड़ कर छोड़ देना
तुम्हारा पुरुषोचित गुण था राम जी!

✍️ चिराग़ जैन

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