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हंस की चाल

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण, अर्जुन को लेकर बर्बरीक के पास गए और उनसे पूछा कि युद्ध का परिणाम क्या रहा? बर्बरीक ने उत्तर दिया कि पाण्डव परास्त हो गए। उत्तर सुनकर अर्जुन चकित हो गए और बोले- ‘सारा संसार जानता है कि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका है। सुयोधन वीरगति को प्राप्त हो चुका है। फिर आपको क्यों लगता है कि पाण्डव परास्त हो गए?’
बर्बरीक बोले- ‘कौरव तो प्रारम्भ से कौरव ही थे और अंत तक कौरव ही रहे। किन्तु पाण्डवों को युद्ध जीतने के लिए कई बार कौरव बनना पड़ा। और जो व्यक्ति अपना मूल स्वभाव छोड़ दे उसको परास्त ही माना जाता है।’
यह कथा भारतीय समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर भी अक्षरशः सही सिद्ध होती है। पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमणों से घबराकर पिछड़ जाने के भय से हमने अपने परिवारों का मूल स्वभाव बिसरा दिया है। कट्टरता से भयभीय होकर हमने अपने धार्मिक परिवेश की सहजता को समाप्त कर डाला है। जिस मानसिक ग़ुलामी का रोना रोकर हम पश्चिमी परंपराओं को कोसते हैं उसके प्रथम अपराधी हम स्वयं हैं।
टेलिविज़न, मोबाइल, इंटरनेट या दूसरा कोई भी तकनीकी माध्यम हमारे सांस्कृतिक परिवेश को क्षति नहीं पहुँचा सकता था यदि हम भीतर से भयभीत न हुए होते। प्राप्त को सस्ता और अनुपलब्ध को महंगा समझने की हमारी प्रवृत्ति ने हमें अपने तूणीर में रखे अस्त्र चलाने की सामर्थ्य से वंचित कर दिया और हम प्रतिद्वंदी के चमकीले कमज़ोर तीरों से बिंधते चले गए।
भाषा से लेकर चाल-चलन तक हम अनवरत दूसरों की थाली के घी पर निगाहें गड़ाकर बैठे रहे और अपने पत्तल में रखे चूरमे की अनदेखी करते रहे। यदि हम इस स्थिति को सांस्कृतिक युद्ध मान लें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि योद्धा का पहला अस्त्र उसका हौसला होता है। हम टूटी हुई हिम्मत लेकर रण में उतर तो गए किन्तु अपने देसी भाले को उनकी देखादेखी बंदूक की तरह चलाने के प्रयास में परास्त होते चले गए।
हम अपने विद्यालयों में भारतीय नागरिक तैयार करने चले किन्तु शिक्षा का माध्यम उनका अपना बैठे। हम यह भी न समझ सके कि थाली में परोसी गई खीर न तो रसना को तृप्त कर सकती है न क्षुधा ही शांत कर सकती है। खीर खानी है तो कटोरी ही उपयुक्त पात्र है।
यही व्यवहार हमने अपनी कलाओं के साथ भी किया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित मण्डप पर भरोसा न कर सके और विदेश से आयातित ऑडिटोरियम बनाकर इतराते फिरे। स्वांग और नौटंकी की प्रस्तुति इन विदेशी सभागारों में समा न सकी और धीरे-धीरे इन सभागारों की कृत्रिमता हमारी कलाओं की सहजता को लील गई।
हम आधुनिक दिखने की होड़ में कविताओं के बिम्ब बदलने लगे। माखन-मिश्री और कुंजवन की किलोल के बिम्ब भारतीयता में रचे-पगे बिम्ब थे, जिन्हें हठपूर्वक चॉकलेट और साइबेरिया के जंगलों में बदलने की कोशिश में हम कविता की लोक-ग्राह्यता नष्ट कर बैठे।
कृष्ण और राम की कथाएँ पढ़नेवाले बच्चे कब शिनचैन और नोबिता के चरित्र बाँचने लगे, हमें पता ही न लगा। आर्दश चरित्रों की कथाओं में व्याप्त परिहास के रस को अपमान समझकर हमने अनजाने में उन चरित्रों से पीढ़ियों को विमुख कर दिया। हम भूल गए कि चौपालों के ठहाके और मेलों की ठिठोली में बसी भारतीय संस्कृति परिहास और चर्चा से आहत नहीं होती, अपितु बल पाती है।
जब यह सब कुछ घटित हो रहा था ठीक उसी समय हमारी संस्कृति पर एक और आक्रमण हुआ। इस बार हमारा सामना विज्ञापनों से था। व्यावसायिक हितों की अंधी होड़ में हमारे औद्यौगिक घरानों ने हमारी प्रचलित जीवनशैली को ‘पुराना’; ‘बासी’; ‘पिछड़ा’ और ‘घिसा-पिटा’ बोल-बोलकर अपने उत्पाद बेचे। दंतमंजन से लेकर डिटर्जेंट तक के विज्ञापनों ने भारतीय संस्कृति को अपमानित किया और हम चुपचाप देखते रहे। ‘अब आ गया नए ज़माने का….’ -इस एक जुमले ने भारतीय संस्कृति की जो छवि हमारे मानस पटल पर अंकित की, उसने हमारी सोच को प्रभावित किया। अब हम अपने बच्चों को अंग्रेजी न बोलने पर डाँटने लगे।
टेलिविज़न के इसी व्यामोह में हमने मुहल्ला संस्कृति का पूरी तरह पटाक्षेप कर डाला और अपने-अपने घरों की दीवारों में क़ैद हो गए। सिमटने का क्रम इस हद तक बढ़ा कि घर सिकुड़ कर कमरे बन गए और उत्सवधर्मी भारतीय मनुष्य एकाकी जीवन की चौखट पर नाक रगड़ने लगा।
इन छोटे-छोटे फ्लैट्स में न तो रंगोली के लिए देहरी की जगह बन सकी न ही तुलसी चौरा पूजने के लिए आंगन की। सुक़ून और संतुष्टि के महामंत्र भूलकर हम आपाधापी में इतने व्यस्त हुए कि संध्या वंदन के लिए गौधूलि वेला कब आकर गुज़र गई हमें संज्ञान ही न रहा।
गुडलने चलते बचपन को संस्कारों का ककहरा पढ़ानेवाला मातृत्व अर्थतंत्र की उहापोह में विलीन हो गया और हमने अपने नौनिहालों को क्रेच और प्ले स्कूल के भरोसे छोड़ दिया। शहरी जीवन की विवशताओं और स्त्री-सशक्तिकरण की मुहिम ने भारतीय परिवारों की वैज्ञानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और केवल आर्थिक स्वावलम्बन को नारी-मुक्ति का नाम दे दिया गया। समाज में स्त्री की भूमिका के महती योगदान को उजागर करने के स्थान पर हमने पाश्चात्य प्रचलन का अंधानुकरण किया और स्त्री के द्वारा पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर निर्वाह किये जा रहे दायित्वों की उपेक्षा कर दी। भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका के आधार पर संस्कारों की पाठशाला बन्द हो गईं और हमारी पीढ़ियाँ ट्यूशन या कॉन्वेंट में डिग्रियाँ बटोरने को शिक्षा समझने लगीं।
इसके अतिरिक्त सिनेमा, जो कि राजा हरिश्चन्द्र की कहानी लेकर भारत में प्रविष्ट हुआ था, उसने बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को सर्वाेपरि मानकर अनैतिक यौन संबंधों और हिंसक अपराधी प्रवृत्तियों की वक़ालत शुरू कर दी। जुआरी, ठग, अपराधी, व्यसनी और स्मगलर्स फिल्मों के नायक बनने लगे। मुजरा और कैबरे फ़िल्म की सफलता की गारंटी बन गए और हमारे फ़िल्म निर्माताओं ने आइटम डांस के भड़कीले संगीत में भारतीय सुगम संगीत की सरगम ख़ामोश कर दी।
हमने संस्कृति को बचाने के लिए सरकार की ओर देखा तो सरकार ने योजनाओं का झुनझुना थमा दिया। संस्कृति के ठेकेदार उस झुनझुने के सहारे समय व्यतीत करते रहे और संस्कृति अपनी जर्जर होती देह को लुकाते-छिपाते समय काटती रही।
धागे से नाड़ी की गति मापनेवाला देश आँख फड़कने पर पेन किलर खाने लगा और जड़ी-बूटियों के रसायन विज्ञान से हमारा भरोसा उठ गया। लट्टू से खेलते बच्चे हमें आवारा लगने लगे और बेब्लेड चलाते बच्चे सभ्य।
भारतीय संस्कृति के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम युद्ध जीतने के लिए कौरव बनते रहे और अपने मूल स्वभाव की उपेक्षा करते रहे। हमें यह समझना होगा कि ऊँट रेगिस्तान का जहाज है। उसे प्रकृति ने रेत पर दौड़ने की शक्ति दी है। यदि कोई कार उसे स्पर्धा के लिए ललकार बैठे तो उस कार को रेत में दौड़ने के लिए आमंत्रित करो, न कि स्वयं हाइवे पर जाकर कार की तरह दौड़ने की होड़ करो।

© चिराग़ जैन

स्त्री तुम कल आना

स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”।
हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा रहा है, और फ़िल्म में ये दोनों रंग बख़ूबी भरे भी गए हैं, लेकिन फिल्मकार ने चुपके से स्त्री की वर्तमान परिस्थितियों का संदेश भी इन रंगों में मिला दिया है।
फ़िल्म में नायक राजकुमार राव ने एक संवाद बोला है- “हमारा सामना एक ऐसी चुड़ैल से है जो पढ़ी-लिखी है, और आज्ञाकारी भी है। हम अपनी पर आ जाएं तो इससे जो चाहे करा सकते हैं।” बस यही संवाद स्त्री की सामाजिक स्थिति का संपूर्ण ग्रंथ है। स्त्री की स्थिति आज भी ठीक पहले जैसी ही है। बस अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि पहले जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तो पुरुष उसे मार-पीट कर अपनी मनमानी करता था और आज जब वह पढ़-लिख गई है तो हम सभ्यता से दीवार पर लिख देते हैं- “ओ स्त्री कल आना”; बस इसे पढ़कर सदियों से आज्ञाकारी रही स्त्री कल का इंतज़ार करने लगती है, और पुरुष उसे टरका कर अपने जश्न में मशगूल हो जाता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में चौकीदार रात में पहरा देते हुए पुरुष प्रधान समाज पर एक और तीखा प्रहार करते हुए आवाज़ लगाता है -“ओ स्त्री, मत आना! इस शहर में कोई मर्द नहीं है।” यह एक वाक्य समाज की अंतरात्मा को झखझोरने वाला वाक्य है। पुरुष को मर्दानगी के वास्तविक मआनी बताने वाला महामंत्र है यह वाक्य। स्त्री की अपेक्षाओं के समक्ष पुरुष की दुर्बलता का तमाचा है यह एक वाक्य।
फ़िल्म में श्रद्धा कपूर स्त्री सशक्तिकरण के अभियानों पर व्यंग्य करते हुए कहती है कि- “स्त्री अपने घर में बहुत शक्तिशाली होती है, उसे घर से बाहर लाओ, फिर मारो।” अद्भुत कटाक्ष है यह। समाज में नारी को उसकी भूमिका निर्वाह करने से रोककर उसे अर्थोपार्जन की मशीन बना देने के कुत्सित षड्यंत्रों पर कुठाराघात किया है इस संवाद ने।
स्त्री के स्त्रीत्व को भी फिल्मकार ने बख़ूबी समाहित किया है। “स्त्री की शक्ति उसकी चोटी में है, चोटी काट दो तो वह मरेगी नहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाएगी।” यह वाक्य स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लेने की कहानी कहता है।
स्त्री के मन को स्वर देते हुए फ़िल्म कहती है कि “आज तक इस शहर ने उसे दो चीज़ें नहीं दी, एक प्यार और दूसरी इज़्ज़त। वह इन्हीं दो चीज़ों की भूखी है।” यह बात समझ कर फिल्मकार ने पुनः एक करारा कटाक्ष करते हुए दिखाया कि पुरुषों ने एक इबारत लिखकर आज की पढ़ी-लिखी स्त्री से अपनी मनमानी करवा ली और लिखवा दिया “ओ स्त्री रक्षा करो”। यहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है क्योंकि समाज आश्वस्त है कि इस वाक्य को पढ़कर स्त्री समाज की रक्षा करने लगेगी।
फ़िल्म के निर्माता की सोच को प्रणाम करने का दिल करता है। साथ ही दर्शकों की समझ पर मन भर आता है कि जिन संवादों का ज़िक्र मैंने ऊपर किया था उन सब पर हॉल में ठहाके गूंज रहे थे।

✍️ चिराग़ जैन

ज्ञान की सजावट

भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

महलों में वनवास

अकथ वेदना करती होगी रह-रहकर परिहास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

धीर धरो मैया वैदेही
अनगिन झेले कष्ट भले ही
मृग आकर्षण में अंकुर थे
स्वर्ण नगर की पीड़ा के ही
पल भर का सम्मोहन लाया जीवन भर का त्रास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हर इक सुविधा द्वार पड़ी थी
प्राण बिना इक देह खड़ी थी
माँ सीता की आँखें नम थीं
पर उर्मिल की पीर बड़ी थी
भीतर-भीतर घुलकर सींचा प्रियतम का विश्वास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

अश्रु बहाने पर अंकुश था
पीर जताने पर अंकुश था
अगन सेज पर इक लक्कड़ को
धधक बताने पर अंकुश था
वरना सबको हो जाएगा, पीड़ा का आभास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हमें बताया रामायण ने
भीषण पाप किया रावण ने
किन्तु देह की पर्णकुटी से
जिसका हरण किया लक्ष्मण ने
उस बेचारी ने कब की थी कंचन मृग की आस
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

✍️ चिराग़ जैन

वीरे दी वेडिंग

“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं। पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती। .
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है। चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है! ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है।
अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया। “मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है। इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

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