+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है प्यार अगर सच्चा...

वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की देहलीज पर बैठकर दफ़्तर से लौटते पापा की राह तकतीं नन्हीं-नन्हीं आँखें रोज़ शाम आशावादी दृष्टिकोण से निहारती थीं सड़क की ओर …कि पापा लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी हमारे लिए। लेकिन लुप्त हो रही है ये स्नेहिल परंपरा पिछले कुछ वर्षों से बच नहीं पाती...
error: Content is protected !!