Protected: लंकादहन
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राज्य में नियम बना कि जो भी नागरिक राजा की आलोचना करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा।
भयभीत प्रजा मौन हो गई।
एक दिन एक मंत्री ने राजा का मूड देखकर सलाह देने की हिम्मत की- “महाराज, यदि प्रजा के बोलने पर रोक लगी रही तो लोगों के भीतर-भीतर गुस्सा भर जाएगा। और इससे क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
राजा ने अगले ही दिन ‘भड़ास उत्सव’ का आयोजन किया। राज्य के मेला ग्राउंड में माइक लगाया गया। और आलोचना के लिए दो घंटे की अवधि सुनिश्चित कर दी गई।
आश्वस्त किया गया कि इन दो घंटों में राजा, राज्य, योजना, नीति, प्रक्रिया या तंत्र की आलोचना करनेवाले पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
नगर में आयोजन प्रारंभ हुआ और राजा अपने कानों में कपास उगाकर अपने महल में सो गया।
सभी नागरिक शिकायतों के पोथे लेकर आयोजन स्थल पर पहुँचे, लेकिन एक भी नागरिक राजा के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं बोल पाया। क्योंकि दो घंटे तक तो मंत्रियों ने ही माइक नहीं छोड़ा।
✍️ चिराग़ जैन

अमेरिकी उद्योगपतियों के लिए ऑक्सीजन के बिना जीवित रहना संभव है किन्तु राष्ट्रपति जी को प्रसन्न किये बिना अपना अस्तित्व बचा पाना असंभव हो गया है। उनकी हालत देखता हूँ तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह का अमर वाक्य याद आता है- ”गब्बर के ख़ौफ़ से तुम्हें केवल एक आदमी बचा सकता है, और वो है ख़ुद गब्बर।“
उद्योगपति सहयोग की उम्मीद से न्यायपालिका की ओर देखते हैं, लेकिन न्यायालय अपने महंगे दुशाले में अपने कटे हुए हाथ छिपाकर चुपचाप खड़ा है। वह जानता है कि अगर थोड़ा भी हिलने-डुलने की कोशिश की तो गब्बर सिंह की हवाएँ उसका दुशाला गिरा देंगी और उसे फ्लैशबैक में जाकर हाथ कटने की पूरी कहानी सबको सुनानी पड़ेगी। इस डिप्रेसिंग सीन से बचने के लिए न्यायालय मुँह फिराकर लिबर्टी की मूर्ति से नैन-मटक्का करने लगता है।
मीडिया के एकाध जय और बीरू, बंदूक लेकर पानी की टंकी पर चढ़ ज़रूर गए हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके चैनल में सांभा और कालिया का पैसा लगा हुआ है। इसलिए माइक को बंदूक की तरह पकड़कर वे दोनों, गब्बर सिंह पर फूल बरसा रहे हैं। कैमरे पर वे बंदूक चलाते हुए दिखते हैं लेकिन मालिक के मालिक पर केवल फूल बरसते हैं।
उधर उद्योगपतियों को अच्छी तरह समझ आ गया है कि गब्बर का मनोरंजन किये बिना काम नहीं चलेगा, इसलिए वे ख़ुद अपनी-अपनी धन्नो को चाबुक मारकर डायलॉग बोल रहे हैं- ”चल धन्नो, तेरी बसंती के धंधे का सवाल है।“ धन्नो पूरी जान लगाकर दौड़ती है, और बसंती को गब्बर के अड्डे पर ले आती है। गब्बर के अड्डे पर पहुँचते ही बसंती मुजरे की महफ़िल जमा लेती है।
गब्बर सिंह को संगीत और कला की भी उतनी ही समझ है, जितनी मनुष्यता की। इसलिए वे ठुमरी को डिस्को कहकर दाद दे रहे हैं। बसंती गब्बर सिंह की मूर्खता को विद्वत्ता सिद्ध करने के लिए ठुमरी की कैसेट चलाकर डिस्को करने की कोशिश करती है। बाहर खड़ी धन्नो, बसंती की इस हरकत पर हँसती है, लेकिन बसंती उसकी हँसी को इग्नोर करके गब्बर स्वामी की मुस्कान पर रीझती रहती है।
जमी हुई महफ़िल में जब थोड़ी देर तक कुछ हैप्पनिंग नहीं होता तो गब्बर सिंह अपने आसन से उठकर एकाध ठुमका लगा देते हैं। गब्बर का ठुमका लगते ही बसंती उनको नृत्यकला का गंधर्व सिद्ध कर देती है। जय और बीरू ड्रोन से पुष्पवृष्टि करने लगते हैं। न्यूयॉर्क हार्बर में लिबर्टी और न्याय की देवी का नैन-मटक्का डांस-शो में बदल जाता है।
गब्बर ठुमका लगाकर ऊंघने लगते हैं और पूरा अमरीका नृत्य करने लगता है। सभी बुद्धिजीवी, सूरमा भोपाली के अंदाज में अपने-अपने मजमे जुटाकर नृत्य की डींगें हाँकते हैं।
जय और बीरू को जिस काम के लिए स्क्रिप्ट में रखा गया था, वह काम उनसे छिन गया है। इसलिए स्क्रिप्ट में बने रहने के लिए बेचारा जय, अपने ही अन्नदाता की विधवा बहू के घर के सामने बैठा माउथ ऑर्गन बजा रहा है। उसके हुनर से इम्प्रैस होकर सूने आंगन में लालटेन जलने लगती हैं।
जो मस्क ख़ुद को घर का मालिक समझकर मसका लगाता फिर रहा है वह दरअस्ल रामलाल है। जिसे बंद कमरे में ठाकुर को चादर ओढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है।
पूरा अमरीका गब्बर की दहशत से नाच रहा है। सबको पता है कि उसके केस्टो मुखर्जी अमरीका के कोने-कोने में फैले हुए हैं। जो थोड़े बहुत पुराने लोग ज़िन्दा बचे हैं वे इस सबसे उकताकर चर्च की ओर बढ़ते हुए डायलॉग बोलते हैं- “पूछूंगा ऊपरवाले से, इस देश को नचाने के लिए एकाध ट्रम्प और क्यों नहीं दिया?”
✍️ चिराग़ जैन


आजकल पूरी दुनिया में चौंकानेवाली राजनीति का ट्रेंड है। मुझे तो लगता है कि दुनिया भर के राजनेता रात को सोने से पहले यह सोचकर सोते होंगे कि कल ऐसा क्या करना है, जिससे लोग भौंचक्के रह जाएँ। जब तक चौंकाने का कोई सॉलिड उपाय मिल न जाए, तब तक नेताजी को नींद नहीं आती होगी।
कल्पना कीजिए, दिन भर के सब काम निपटाने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प अपने बिस्तर पर लेटे हैं। उनका एक हाथ उनके तकिये और सिर के बीच में फँसा हुआ है। उनकी नज़रें छत पर टिकी हुई हैं और उनके मस्तिष्क में भारत के खि़लाफ़ कोई नई ख़ुराफ़ात चल रही है। अचानक उनका चेहरा ऐसे खिल उठा, मानो किसी मासूम लड़की को छेड़ने के बाद कोई लपूझन्ना मुस्कुरा रहा हो।
सुबह उठते ही व्हाइट हाउस ने वीज़ा फ़ीस बढ़ाने की घोषणा कर दी। चारों ओर हाहाकार मच गया। इस अफ़रा-तफ़री को देखकर ट्रम्प मन ही मन नागिन डांस कर उठे होंगे। प्रवासी भारतीयों के माथे से जो पसीना बहा, उसे देखकर ट्रम्प के कलेजे को ठण्डक पड़ी होगी। भारत सरकार और भारतीय मीडिया में पूरी तरह छा जाने के बाद ट्रम्प इस खेल से बोर हो गए और उन्होंने स्पष्टीकरण जारी करके सूचना दी कि मैंने भारत की ओर पत्थर तो फेंका है, लेकिन वह उतना बड़ा नहीं है, जितना आपको लग रहा है।
स्पष्टीकरण के बाद मामला लगभग ठण्डा पड़ गया और ट्रम्प फिर से अपने बैडरूम में लेटकर कोई नई खुराफ़ात सोच रहे होंगे। मुझे पूरा विश्वास है ट्रम्प के दिल में ज़रूर ऐसा कोई टुल्लू पम्प फिट है, जिसमें से रोज़ कोई नया पंगा निकलता है।
मोदी जी के पास ऐसा अवसर आया था कि वे इस टुल्लू पम्प का इलाज करवा सकते थे। कुछ वर्ष पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प कुछ घंटों के लिए भारत आए थे तो मोदी जी ने उन्हें सीधे आगरा भेजा था। आगरा भेजने के मोदी जी के निर्णय से मुझे यह भ्रम हुआ था कि मोदी जी बहुत दूरदर्शी आदमी हैं। लेकिन जब बिना इलाज कराए उन्होंने ट्रम्प को छोड़ दिया तो लगा कि हमने हाथ आया अवसर छोड़ दिया।
आप कहेंगे कि इंटरनेशनल डिप्लोमेट इम्यूनिटी के तहत ट्रम्प का इलाज नहीं किया जा सकता था लेकिन ह्यूमेनिटी भी कोई चीज़ होती है। और विश्वगुरु बनने जा रहा भारत कम से कम ट्रम्प जैसे मस्तिष्क को ह्यूमेनिटी सिखाकर विश्व कल्याण में सहयोगी तो बन ही सकता था।
✍️ चिराग़ जैन