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कोरोना का स्विच सरकार के पास है

न्यूज़ बुलेटिन देखो तो दिमाग़ भन्ना जाता है। एक ख़बर बताती है कि कोरोना के डर के चलते मध्यप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र में सरकारी नियमों में सख्ती। कोरोना के डर के कारण पंजाब सरकार ने बच्चों की परीक्षाएँ रद्द की। महाराष्ट्र के कुछ शहरों में नाइट कर्फ्यू। दिल्ली में 200 लोगों से ज़्यादा की सभा की मनाही। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने कुम्भ पर लगाए प्रतिबंध हटाने को बताया जोखि़म भरा काम।
हम इन ख़बरों से डरने लगते हैं। जनहित के प्रति सरकार की गम्भीरता देखकर मन सरकार के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। तभी ख़बर आती है कि खड़गपुर में केन्द्रीय गृहमंत्री की रैली में उमड़ी भारी भीड़। यह ख़बर देखते ही हमारी श्रद्धा की गति की दुर्गति हो जाती है। फिर एंकर बताती है कि ममता बनर्जी ने रैली में किया शक्ति प्रदर्शन। …हमारी श्रद्धा मुँह बाये हमारा थोबड़ा देखने लगती है। फिर पता चलता है कि तमिलनाडु, असम, पुदुच्चेरी, पश्चिम बंगाल और केरल में जमकर चुनावी रैलियाँ हो रही हैं, जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ दिखाना राजनेताओं की सफलता का मापदण्ड है। इसलिए सरकारों ने कोरोना को समझा दिया है कि तुम्हें कब किस रूट पर रहना है।
सरकार जानती है कि इस देश की जनता अनुशासित नहीं है। इसलिए सरकार ने जनता को अनुशासन में रखने के लिए कड़े कानून बनाए हैं। जैसे फ्लाइट में जाओ, तो एयरपोर्ट पर एक सीट छोड़कर बैठो लेकिन जहाज में एक-दूसरे से चिपककर बैठ सकते हो। क्योंकि सरकार ने कोरोना को समझा दिया है कि फ्लाइट में चिपकने पर मत फैलना।
ऐसे ही फ्लाइट में मास्क लगाकर बैठना ज़रूरी है क्योंकि एक-दूसरे की साँस से संक्रमण फैल सकता है। लेकिन जब एयर होस्टेस खाना बाँटती है, तब सभी यात्री अपना मास्क हटाकर एक-दूसरे से सटे हुए वातानुकूलित कम्पाउंड में बेझिझक खा सकते हैं, क्योंकि उतनी देर के लिए सरकार कोरोना का स्विच ऑफ कर देती है।
कोविड प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात करने के लिए शीर्ष नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके जनता को यह बताएंगे कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कितना जरूरी है। लेकिन बंगाल में वही शीर्ष नेता उन्हीं मुख्यमंत्री के साथ हाथ से हाथ मिलाकर जनता को बताते हैं कि यहाँ कोरोना का स्विच ऑफ है।
स्टेडियम में लाखों लोग बिना मास्क के उछल-उछलकर मैच देखते हैं तो कोरोना नहीं फैलता, क्योंकि वहाँ सरकार ने कोरोना का स्विच ऑफ कर दिया है। लेकिन बिटिया की विदाई के समय यदि बारातियों की संख्या अधिक हुई तो कोरोना फैलने का डर रहता है, इसलिए सरकार वहाँ पुलिस भेज देती है। पुलिसवाला ऑफिशियली या अन-ऑफिशियली कुछ चार्ज लेता है और कोरोना का स्विच ऑफ करके चला जाता है।
अंतिम संस्कार में बीस से ज़्यादा लोग न हों क्योंकि वहाँ स्विच ऑफ नहीं किया गया है। यह स्विच ऑफ करवाने का उपाय सरकार जानती है, इसीलिए जिस प्रदेश में जिस सरकार को जो करना हो, वह कर लेती है। उसके पास कोरोना का स्विच है। लेकिन जनता को छूट दे दी गयी तो बेचारा कोरोना कहाँ जाएगा? और कोरोना चला गया तो न्यूज़ चैनल्स को बाक़ी ख़बरें दिखानी पड़ेंगी। और हमारे लोककल्याणकारी गणराज्य की सरकारें यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी कि न्यूज़ चैनल्स ख़बरों में पेट्रोल डालने का काम करें।
न्यूज़ एंकर बताती है कि बाज़ारों में लोग लापरवाही कर रहे हैं इसलिए सरकार को सख्त होना पड़ रहा है। और अगली ही ख़बर में किसी राजनेता का रोड शो या रैली दिखाई जाती है, जहाँ न कोई मास्क है, न कोई सेनेटाइजर, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग… लेकिन यहाँ तो स्विच ऑफ है।
मध्यप्रदेश में उपचुनाव थे, तब वहाँ स्विच ऑफ था लेकिन अब वहाँ धारा 144 लागू है। पंजाब में हाल ही में चुनाव हुए और चुनाव ख़़त्म होते ही कोरोना का स्विच ऑन हो गया। गुजरात में हाल ही में चुनाव हुए और अब वहाँ कोरोना है। बंगाल में अभी चुनाव हो रहे हैं इसलिए कोरोना की हिम्मत नहीं है कि वहाँ एंट्री कर ले।
सरकार ने कोविड को अच्छे से समझा दिया है कि पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव का माहौल है। देश के महत्वपूर्ण जननायकों को जनता से संवाद करके वोट मांगने हैं। यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। लेकिन बच्चों की परीक्षा को टाल सकते हैं क्योंकि शिक्षा चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। बाज़ारों में धारा 144 लागू है क्योंकि जीना चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। कुम्भ और उर्स जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में सावधानी बरतनी ज़रूरी है, क्योंकि धर्म भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। अंतिम संस्कार में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि मरना भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

शिक़ायत करना मना है

दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।

✍️ चिराग़ जैन

किसान आंदोलन, सरकार और कोविड

आज भारतीय शासन-तंत्र के प्रति श्रद्धा उमड़ रही है। इतने बड़े देश को सही से चलाने के लिये हर समस्या का समाधान खोजने चले तो सिस्टम के पसीने छूट जायेंगे, इसीलिये इसका श्रेष्ठ उपचार यह है कि जो आपके पास समस्या लेकर आये उसे किसी और समस्या में उलझा दो। इससे उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा, लेकिन नयी समस्या में उलझते ही वह मूल समस्या को भूल ज़रूर जायेगा।
आप अदालत में कोई मुक़द्दमा दर्ज कराओ, अदालत आपको प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के ऐसे जंजाल में उलझा देंगी कि अपनी मूल पीड़ा को बयान करना आपको याद ही नहीं रहेगा। इससे लाभ यह है कि जब आप किसी अन्याय अथवा उत्पीड़न के शिकार होते हैं तो थाने और कचहरी की उलझनों से मिलनेवाले कष्ट की मात्रा का आप कार्यवाहियों से मिलनेवाले कष्टों की मात्रा से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसे ईश्वर एक दिन दण्ड देगा। इससे मनुष्य में ईश्वर के प्रति आस्था पुष्ट होती है।
इसी शानदार विधि से सरकार ने किसानों के आन्दोलन को डील किया। जो किसान कृषि बिल वापस लेने की मांग लेकर घर से चले थे, उनको सरकार ने बताया कि बिल पर चर्चा तब करेंगे जब दिल्ली आकर हमसे बात करोगे। अब किसानों को दिल्ली में घुसना, कृषि बिल वापस लेने की मांग से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा। पूरे देश का ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि किसान दिल्ली में घुस पाएंगे या नहीं। कृषि बिल के औचित्य पर चर्चा करना किसी को महत्त्वपूर्ण लग ही नहीं रहा।
अराजकता को रोकने के लिये राज्य का अराजक हो जाना प्रशंसनीय है। सरकार की मंशा किसानों का अहित नहीं है। वह चाहती है कि मंडी के दाम और मुनाफ़े जैसे भौतिक प्रश्नों से ऊपर उठकर किसान एक दिन अध्यात्म की ओर मुड़ें और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए घर लौट जायें।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था – ‘जय जवान, जय किसान।’ किसान आंदोलन में इस नारे का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है वह आश्चर्यजनक है।
सरकार ने पुलिस के जवानों को निर्देश दिया है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने देना है। इस निर्देश का पालन करने के लिये पुलिस के जवान किसानों पर पानी की बौछार कर रहे हैं, आँसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। सीआरपीएफ, पुलिस और रेपिड एक्शन फोर्स मिलकर ‘किसी भी हाल में’ किसानों को राजधानी में घुसने से रोकने के लिये कटिबध्द हैं।
चूँकि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है इसलिये सरकार को यह क़दम किसानों की भलाई के लिये उठाना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में इकट्ठा होंगे तो इससे कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ सकता है। इसलिये सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक रही है। क्योंकि कोरोना वायरस हरियाणा और पंजाब में जाने से परहेज करता है।
कुछ मूढ़ लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि हरियाणा उपचनाव, मध्य प्रदेश उपचुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में कोरोना फैलने का ख़तरा क्यों नहीं था। उन मूर्खों को इतनी-सी बात समझ नहीं आती कि चुनाव लोकतंत्र के लिये सर्वाधिक आवश्यक हैं किन्तु सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र में अब निषिद्ध हो चुका है।
लोकतंत्र की रक्षार्थ समर्पित पुलिस के जवान, क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये लोकतंत्रात्मक तरीक़े से चुनी गयी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरे किसानों को रोक रही है तो इसमें क्या ग़लत है।
उधर श्रम सुधार के एजेंडे पर लाखों मजदूर हड़ताल पर हैं लेकिन उनकी कोई ख़ास ख़बर दिखाने का समय मीडिया के पास नहीं है। क्योंकि सारे संवाददाता अभी किसानों को रोकने के लिये की जा रही पुलिस कार्रवाई की कवरेज में व्यस्त हैं। कोविड को लेकर इतनी सतर्कता तो बरतनी ही पड़ेगी कि जनता के बहुत सारे मुद्दों को एक साथ इकट्ठा न होने दिया जाये। मुद्दों में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर ही कोविड से लड़ा जा सकता है। सरकारों की इस सदाशयता पर किसी तथाकथित बुद्धिजीवी का ध्यान ही नहीं जाता।
दिल्ली सरकार ने कोविड से बचने के लिये मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का चालान दो हज़ार रुपये कर दिया है। बेचारे ग़रीब किसान दिल्ली में इतना महंगा चालान कैसे भरेंगे – इस चिंता के समाधान स्वरूप सरकार ने पुलिस को कहा है कि किसानों को दिल्ली में न घुसने दो ताकि दिल्ली की क्रूर सरकार उनसे दो-दो हज़ार रुपये न वसूल पाये। हमें केंद्र सरकार की इस सहृदयता की सराहना करनी चाहिये।
लाल बहादुर शास्त्री को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि भविष्य की राजनीति उनके नारे को इतना प्रचारित करेगी। आज अलग-अलग राजनेताओं ने अपनी-अपनी टीम बना ली है। सड़क पर दंगल चल रहा है। एक राजनैतिक दल जवानों को चीयर कर रही है और दूसरा राजनैतिक दल किसानों को। चैनल के स्टूडियो से रनिंग कमेंट्री चल रही है। ‘किसानों का जत्था बॉर्डर की ओर बढ़ा आ रहा है, पुलिस ने पानी की तेज़ बौछार से किसानों में अफरा-तफ़री मचा दी। पानी की बौछार तेज़ होती जा रही है और दर्शक दीर्घा के एक खेमे से ‘जय जवान’ का उद्घोष गूंजने लगा। उधर किसानों ने पानी की बौछार को पछाड़ते हुए बैरिगेट उठाकर फेंक दिये और पुलिस के जवानों पर पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी। बैरिगेट के हवा में उठते ही दर्शक दीर्घा के दूसरे खेमे में जोश आ गया और वहाँ ‘जय किसान’ का नारा गूंजने लगा। अब पुलिस का पलड़ा भारी… अब किसान का पलड़ा भारी… दंगल रोमांचक होता हुआ… दर्शक दीर्घा में जोश बढ़ता हुआ… अब जय जवान के नारे गूंजने लगे… अब जय किसान के नारे गूंजने लगे…
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर जो आँसू गैस के गोले चले उनके कारण लोकतंत्र और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों की आँखों से आँसू बह रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन

साहिब!

ये तुमने कौन से अंदाज़ से छुआ साहिब
हुई है बेअसर हर शख़्स की दुआ साहिब

सियार करते थे शब भर हुआ-हुआ साहिब
उन्हें भगाने चला आया तेंदुआ साहिब

हमारे चैन की हुंडी का हो गया सौदा
ज़रा बताओ, मुनाफ़ा किसे हुआ साहिब

ज़ुबां तो काट दी, रोटी न छीनना हमसे
सुना है पेट भी देता है बद्दुआ साहिब

ज़रा-ज़रा सा कब तलक करोगे क़त्ल हमें
दबा ही क्यों नहीं देते हो टेंटुआ साहिब

कई करोड़ निवाले हैं दाँव पर इसमें
तुम्हारे वास्ते जो है महज़ जुआ साहिब

सही बताओ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आता?
बहाते रहते हैं क्यों लोग टेसुआ साहिब

तुमसे पहले की मसीहाई चुआती थी छतें
ये तुमने क्या किया, आँखों से कुछ चुआ साहिब

जोंक जब जिस्म से चिपकी तो ये समझ आया
इससे अच्छा था गये साल केंचुआ साहिब

✍️ चिराग़ जैन

क्या करोगे

कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे

बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?

कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे

सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे

अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे

उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे

✍️ चिराग़ जैन

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