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अनपढ़ माँ

चूल्हे-चौके में व्यस्त और पाठशाला से दूर रही माँ नहीं बता सकती कि ”नौ-बाई-चार” की कितनी ईंटें लगेंगी दस फीट ऊँची दीवार में …लेकिन अच्छी तरह जानती है कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है एक हँसते-खेलते परिवार में। त्रिभुज का क्षेत्रफल और घन का घनत्व निकालना उसके शब्दों में...

राखी का त्यौहार

महानगर में इस तरह, बदला हर त्यौहार अब तोरण करते नहीं, खड़िया का शृंगार रेडिमेड में ढँक गया, सारा हर्ष-किलोल सोन बनाती बेटियाँ, खड़िया-गेरू घोल ना मोली की सौम्यता, ना रेशम की डोर अब राखी पर दिख रहा, प्लास्टिक चारों ओर कितना डेवलप हो गया, ये पुरख़ों का देस चॉकलेट ने कर...

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ फिर माँ की उंगलियों...

दीपावली

जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग। हर आंगन संदीप्त हो, जाय अंधेरा भाग ॥ दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग। दिव्य अल्पनाएँ बनें, हों सब दिव्य प्रसंग ॥ पावन पुष्पों से गुँथें, ऐसे बन्धनवार। जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥ भोर समीरों में घुलें, गेंदे...
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