Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
अधिकारों की ओट में छिपकर उच्छृंखल हो जाना भी उतना ही अश्लील है, जितना संस्कृति की ओट में छिपकर शालीन बनने का ‘दिखावा’ करना। नैतिकता की परिभाषा, काल-पात्र-स्थान के अनुरूप बदल जाती है। शालीनता केवल यौन आचरण तक ही सीमित नहीं है। समय तथा परिस्थिति के अनुरूप आचरण न करते हुए किया गया कोई भी आचरण अश्लील कहलाता है।
लहंगे, जेवर और फूलों से सजी-धजी स्त्री सबको स्वीकार है; किंतु यही स्त्री यदि किसी मातम में ऐसे साज-सिंगार के साथ उपस्थित हो तो असभ्य कही जाएगी। चिड़चिड़ा व्यक्ति कोई यौन दुराचार न भी कर रहा हो तो भी अपने उत्सव-टेलों में उसकी अकारण चढ़ी त्योरियाँ बर्दाश्त नहीं की जा सकेंगी।
कोई बहुत मिलनसार तथा हेल्पफुल मनुष्य भी यदि किसी की सहमति के बिना उसकी देह को स्पर्श करें तो उसे अश्लील कहा जाएगा। उस समय उसके अन्य व्यवहार के कारण उसकी इस अश्लीलता को अनदेखा नहीं किया जा सकेगा। किन्तु चिकित्सक, दर्जी, जिम ट्रेनर या कभी-कभी कोई सहकर्मी भी अनजाने में अथवा विवशता में आपसे स्पर्श हो जावे और आप उसे यौन-शोषण कहकर हंगामा कर दें, तो यह बर्बरता है। आपके बॉस ने आपकी बात नहीं मानी और आपने उसको सेक्सुअल हरासमेंट के पचड़े में घसीट लिया… यह दुराचार है।
हमने दुराचार और अश्लीलता की परिभाषा को सीमित करके बड़ा अपराध किया है। कोकशास्त्र, कामसूत्र तथा खजुराहो के आधार पर जिस समाज की प्रशंसा की जाती है, वहाँ किसी यौन समस्या पर उठे विमर्श को किसी स्त्री के चरित्र का मापदण्ड बना देना भी अश्लीलता है।
हर विमर्श में व्हिसल ब्लोअर ही सही नहीं होता। किन्तु जिसने विमर्श उठाया है, उसकी चरित्र हत्या करनेवाले न तो विमर्श के हित में हैं, न ही समाज के हित में। और तो और, ऐसे लोग जो इस प्रकार का विमर्श उठानेवाली स्त्री को चरित्रहीन कहकर उसकी निजता में प्रवेश कर रहे हैं, ये लोग सभ्यता की ओट में छिपकर अपनी यौन कुंठाओं को तुष्ट करने के लिए प्रयासरत असभ्य बर्बर हैं।
उस समस्या के पक्ष में और विपक्ष में अपना मत सबको देना चाहिए किन्तु ‘आइये हमसे ले लीजिए चरम सुख’; ‘यार बहुत सुंदर है इसको तो मैं ही संतृष्ट कर दूंगा’; ‘बहुत गर्म है यार, इसे मैं ही ठण्डा कर सकूंगा’ -जैसी टिप्पणियाँ करनेवाले अश्लील यौनकुंठितों की मानसिकता इस समाज के लिए किसी भी अश्लीलता से अधिक भयावह है।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध स्त्रियों से पूछो तो आपको पता चलेगा कि उनके इनबॉक्स में ऐसे कितने ही संस्कृति और सभ्यता के ठेकेदारों की अश्लील कुंठाएँ नंगा नाच करती हैं।
मैं उन स्त्रियों का कतई पक्षधर नहीं हूँ जो आज़ादी के नाम पर नंगेपन की सीमा तक सड़क पर घूमने की हिमायत करती हैं। शौच तथा संभोग हमारे जीवन का हिस्सा ही नहीं अपितु सृष्टि के संचालन हेतु आवश्यक भी हैं, किन्तु इन क्रियाओं को यदि हम भरे बाज़ार में सड़क पर करने लगें तो हम दोपायों की काया में चौपायों का आचरण कर रहे होंगे।
प्रेम अनुभूति का विषय है जिसकी दैहिक अभिव्यक्ति नितांत निजी होती है। उसे सार्वजनिक करके फेसबुक पर लाइक्स बटोरने की कुत्सित चेष्टा का मैं समर्थक नहीं हूँ। अपनी प्री-वेडिंग शूट पर निर्वसन हो जाने की आधुनिकता मुझे समझ नहीं आती किन्तु ऐसा कर रही लड़की को भी सर्वभोग्या अथवा वेश्या करार देकर, उसके विषय में घृणित बातें लिखने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
हमें कम से कम इतना विवेक तो जागृत करना ही होगा कि हम किसी प्रश्न का उत्तर देते समय अपनी भाषा तथा शालीनता का उत्तरदायित्व निभा सकें। किसी की गाली का उत्तर गलौज से देने वाला व्यक्ति भी गाली देनेवाले से कम अशिष्ट नहीं है।
हर यौनाचार अश्लीलता नहीं होता और हर अश्लीलता यौनाचार नहीं होती। किन्तु सोशल मीडिया के युग में किसी महिला द्वारा किसी यौन-समस्या पर चर्चा करने भर से पूरे समाज की जो नंगी आवाज़ें कमेंट्स और ट्रोल-प्लेटफार्म्स पर गूंज रही हैं उनसे यह अवश्य कहा जा सकता है कि हम मुँह में घास के तिनके दबाए बैठे रंगे सियारों को देवदूत मान बैठे हैं, जो ज़रा सी हुआँ-हुआँ सुनते ही भूल जाते हैं कि वे देवदूत बनकर भाषण झाड़ने निकले थे।
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली – यह केवल एक शहर का नाम नहीं, बल्कि एक अंदाज़ है ज़िन्दगी का। अपने साथ न जाने कितने ही किस्से-कहानियाँ लेकर अपने नम इतिहास के साथ ये शहर, ज़िंदा भी है और आबाद भी।
तोमर, पिथौरा, सीरी, सैयद, लोधी, तुग़लक़, ग़ुलाम, मुग़ल, खि़लजी,और अंग्रेज सभी ने इस शहर को अपने-अपने अंदाज़ में बसाया और अपने-अपने तरीके से उजाड़ा है।
दिल्ली के लगभग हर इलाके ने इतिहास की कोई न कोई करवट ज़रूर देखी है। अनंगपाल तोमर और रायपिथौरा से लेकर जॉर्ज माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू तक न जाने कितने ही तख़्त-ओ-ताज बनते-बिगड़ते देखे हैं इस ज़मीन ने।
लालकोट, किलोकरी, सीरीफोर्ट, सफदरजंग, लोधी गार्डन, तुगलकाबाद, निज़ामुद्दीन, कुतुब मीनार, हुमायूँ का मक़बरा, खानखाना मक़बरा, सब्ज़ गुम्बद, शाहदरा, लालक़िला, जामा मस्जिद, फतेहपुरी मस्जिद, फव्वारा चौक, शीशगंज साहिब, बंगला साहिब, नानकसर साहिब, मजनू का टीला, ख़ूनी दरवाज़ा, दिल्ली दरवाज़ा, नजफगढ़… हर जगह इतिहास के बेहद क़ीमती ज़र्रे जड़े हुए हैं। एक-एक इमारत की अपनी एक मुक़म्मल कहानी है।
कभी मौक़ा मिला तो इन सब कहानियों को आपके साथ साझा करूँगा।
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा उसी ने लूटा है
यह शेर कहानी का केवल एक पहलू बयां करता है। हक़ीक़त यह है कि इस शहर ने हर लुटेरे से कुछ न कुछ रेहन रखवा लिया है, जो तारीख़ के ख़ज़ाने में आज तक महफ़ूज़ है।
मुहम्मद शाह रंगीला की अय्याशियों की वजह से नादिरशाह के हमले को छोड़ दें, तो बाक़ी कोई ऐसा न रहा, जिसने दिल्ली की सरज़मीन पर क़दम रखा हो और इस शहर को कुछ देकर न गया हो। कुछ तो अपना दिल ही इस शहर को देकर दीवाने हो गए।
कहानी कहने बैठें तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि इस शहर को ज़ौक़-ओ-ग़ालिब की दिल्ली कहा जाए या ज़फ़र-ओ-दाग़ की दिल्ली! इसे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का शहर कहा जाए या रायपिथौरा का शहर! इसके निर्माण के लिए शाहजहां को शुक्रिया कहें या सर लुटियन्स को इस शहर के निर्माण का थैंक्स बोला जाए। चांदनी चौक से गुज़रते हुए फव्वारा चौक पर गुरु तेग़ बहादुर के शिष्यों की क़ुर्बानी याद करके मत्था टिकता है तो ख़ूनी दरवाज़े को देखकर 1857 के विद्रोह के सर्वमान्य नायक बहादुशाह ज़फ़र के शहज़ादों के बलिदान याद आते हैं।
जिधर देखो, उधर अतीत का कोई सफ़हा वक़्त की हवाओं पर संगीत सुनाता दिखाई देता है। ऐतिहासिक इमारतों की इस शहर में इतनी तादात है कि दर्जनों बहुमूल्य इमारतें कभी मंज़रे-आम पर रौशन ही नहीं हो पातीं। वज़ीराबाद में जमुना के किनारे मौजूद खण्डहर, लोदी कॉलोनी में नजफ़ खां का मक़बरा और नजफगढ़ का दिल्ली गेट रोज़ दिखाई देता है लेकिन उसका इतिहास जानने की जिज्ञासा शायद ही किसी को होती हो।
तीर्थ करने चलो तो यह शहर किसी तीर्थक्षेत्र से कम नहीं है। मंदिरों की एक पूरी फेहरिस्त है यहाँ। चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर से शुरू करके कालकाजी शक्तिपीठ, झंडेवालान, छतरपुर, पांडवकालीन भैरों मंदिर, इस्कॉन, लोटस टैम्पल, चांदनी चौक का लाल मंदिर, महरौली का अहिंसा स्थल, दादाबाड़ी, लोदी रोड का साईं मंदिर और मलाई मंदिर के अलावा गली-गली में आस्था के इन केंद्रों की बहुतायत है।
औलियाओं की फ़क़ीरी याद करो तो हज़रत निज़ामुद्दीन से लेकर अब्दुर्रहीम ख़ानखाना, अमीर खुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब और बख़्तियार काकी की दरगाह तक का सफ़र किया जा सकता है।
स्वाद के दीवानों के लिए बालूशाही, मालपुए, कुल्फी, हलवा-नागौरी, कचौड़ी, बेड़मी, गोलगप्पे, परांठे, कलमी वड़े और न जाने कितने ही लज़ीज़ व्यंजनों के विकल्प मिल जाएंगे।
मौसम इतना मेहरबान है कि सर्दी, गर्मी और बरसात का भरपूर मज़ा लेता है यह शहर। हर सुख के साथ दुःख जुड़ा होता है इसलिए कोहरा, चिल्ला, लू और बाढ़ भी इसके मुक़द्दर में आ ही जाती है।
गुलमोहर, नीम, अमलतास, पिलखन, कीकर, पलाश, बोगनबेलिया, मधुमालती, गूलर, पपीते और बरगद यहाँ ख़ूब फलते-फूलते हैं।
मकर संक्रांति, वसन्त पंचमी, फूलवालों की सैर, होली, महावीर जयंती, हनुमान जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, गणगौर, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, पर्यूषण, वाल्मीकि जयंती, क्षमावाणी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, प्रकाश पर्व, ईद, मुहर्रम, छठ पूजा, करवा चौथ, क्रिसमिस, न्यू ईयर, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती यहाँ उत्सव का माहौल बनाए रखते हैं।
दिल से जीनेवालों के लिए यह शहर अपनी शानदार किस्सागोई के साथ बेहतरीन पनाहगाह है।
✍️ चिराग़ जैन
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बाँसुरी मेरा प्रिय वाद्य है। अपनी ख़ामियों को ख़ूबी बना लेने का श्रेष्ठतम उदाहरण है बाँसुरी। बाँस के खोखलेपन से सुर निकाल लेने का चमत्कार है बाँसुरी।
श्वास की लिपि से मन की भाषा बोलने का यंत्र है बाँसुरी। अंगुलियों पर थिरकते सुरों को उच्छ्वास की ऊष्मा से मीठा करने का जादू है बाँसुरीवादन।
जब कोई बंसी बजाता है तो उसके नयन स्वतः मुंद जाते हैं। पलक गिरते ही भीतर आनन्द का महारास प्रारम्भ होता है। स्थूल दृष्टि से देखने पर केवल अधरों को बाँसुरी बजाते देखा जा सकता है, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो हम पाएंगे कि अधर ही नहीं; अंगुलियाँ, कान, मस्तिष्क, मन और आत्मा तक सब मिलकर बाँस की इस पोरी को रसाल-सा मीठा करने में जुट जाते हैं।
श्वास चौकन्नी रहती है कि कहीं उसके आधिक्य से सुर न बिगड़ जाए। अंगुलियाँ सावधान रहती हैं कि ज़रा-सी इधर-उधर हुई तो तान में व्यवधान हो जाएगा। पलकें बन्द होकर ध्यान से सबकी चौकसी करने में तल्लीन ही जाती हैं। मन तान की सर्जना करता है और कान उसके साकार होने पर हर्ष की रोमावली को जागृत कर देते हैं।
गहरे ध्यान में उतरने की संगीतमयी वीथि है बाँसुरी। भीतर घटित हुए अनहद नाद का सुरावतार है बाँसुरी वादन। संगीत की सर्वाधिक मुँहलगी विधा है बाँसुरी वादन।
जब बाँसुरी बजती है तो पूरा परिवेश कलात्मक हो उठता है। दसों अंगुलियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो दस गन्धर्व किसी बाँस के पुल पर लास्य कर रहे हों। ओंठ की मुद्रा देखकर ऐसा लगता है ज्यों अनंग ने अपने पुष्पधनु पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे तान दिया हो। ग्रीवा हौले से एक दिशा में घूमकर कोई नाट्यमुद्रा की छवि प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर सब कुछ मधुर हो जाता है। शायद इसीलिए वंशवाले कन्हैया के लिए कहा जा सका- ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं!’
✍️ चिराग़ जैन
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आगरा शहर पीछे छूट रहा था और राजमार्ग सकुचाते हुए एक समान्य सी सड़क में समा गया था। निमंत्रण देते समय ही होलीपुरा के वयोवृद्ध गीतकार शिवसागर शर्मा जी ने बता दिया था कि सड़क पर गाय-मवेशी बहुत मिलेंगे इसलिए गाड़ी आराम से ही दौड़ाना।
ज्यों-ज्यों हम आगरे की शहरी आबोहवा से बाहर निकल रहे थे, त्यों-त्यों सड़क किनारे हरियाली और सड़क पर गैया की मात्रा बढ़ती जा रही थी।
आसमान के बादल रह-रहकर हमारी गाड़ी पर रिमझिम से हस्ताक्षर कर रहे थे। सड़क के बीच मवेशियों की महा-पंचायतें लगी थीं। ऐसा लगता था जैसे गौवंश के महाकुंभ में अलग-अलग अखाड़े अपनी बिछावत सजाए बैठे हों। इनकी संख्या इतनी अधिक थी कि महानगरों में सरपट दौड़ती गाड़ियां यहाँ दबे पांव किनारे होकर निकल रही थीं।
इस वृंदावननुमा वातावरण से गुज़रते हुए जब काफ़ी समय बीत गया तो जीपीएस ने हमें मुख्य सड़क से लगभग एक पगडंडी पर उतार दिया। दोनों ओर खेत कतार बाँध कर खड़े थे और उनके बीच से हमारी गाड़ी लहराती हुई पगडंडी पर दौड़ रही थी। खेतों का साम्राज्य संपन्न हुआ तो हम होलीपुरा के रिहायशी इलाके में पहुँच गए।
रास्ता, मौसम और गांव… तीनों ने मन को रमणीक बना दिया था। हवा की नमी से मन भीगने लगा था कि अचानक गाड़ी एक बड़े से गेट में प्रविष्ट हुई और एक मैदान में जाकर रुक गई। सामने बड़ा सा फ्लैक्स लगा था जिसमें आमंत्रित कविगण की सूची में मेरा भी शानदार चित्र छपा था।
बैनर से लेकर आयोजक तक सादगी का समारोह था। गाँव के इंटर कॉलेज के टीनवाले सभागार में आयोजन था। दीवारें ख़ूबसूरत और महंगे पेण्ट से सजी नहीं थीं, लेकिन उन पर जीवन की वे इबारतें लिखी थीं, जिनको आत्मसात करके मनुष्य बना जा सकता है। स्टेज पर गद्दा बिछा था और उस पर मसनद लगाई गयीं थीं। आयोजकों की भागदौड़ (जो कार्यक्रम सम्पन्न होने तक यथावत बनी हुई थी) से गद्दे में सिलवटें पड़ गयी थीं लेकिन स्वागतकर्ताओं की मुस्कान में ज़रा भी सिलवट नहीं मिली।
एनसीसी कैडेट्स और अन्य कुछ बच्चे स्टेज के ठीक सामने बिछी दरी पर विराजित थे। शेष श्रोतादीर्घा कुर्सियों से सज्ज थी। हॉल में थोड़ी आवाज़ गूंज रही थी लेकिन साउंड सिस्टम इतना बढ़िया था कि हॉल की इको का दुष्प्रभाव कवियों की प्रस्तुति पर नहीं पड़ा।
कार्यक्रम का आयोजन सीधे-सादे गीतकार श्री शिवसागर शर्मा की दो पुस्तकों के लोकार्पण के उपलक्ष्य में किया गया था। पीले कुर्ते के नीचे सफेद रंग की धोती पहने शिवसागर जी बड़े ख़ुश थे। सारी व्यवस्था प्रयत्क्ष रूप से वे स्वयं ही कर रहे थे इसलिए कवियों के स्वागत, श्रोताओं की व्यवस्था, माइक, हॉल, पुस्तक लोकार्पण, माला, भोजन, मानदेय, दीप प्रज्ज्वलन की मोमबत्ती और सभी व्यवस्थाओं ने उनको अतिरिक्त व्यस्त कर रखा था।
प्रोफेसर हरि निर्माेही ने प्रारंभिक संचालन किया और पुस्तक लोकार्पण का कार्य सम्पन्न करवाया उसके बाद शिवसागर जी ने काव्यपाठ भी किया और अपने बेहतरीन गीत से कार्यक्रम का स्तर सुनिश्चित कर दिया।
इसके बाद मेरे संचालन में सभी कवियों ने सधा हुआ, संक्षिप्त किन्तु सार्थक काव्यपाठ किया। स्थानीय कवियों को सुनकर भी यह समझ आ गया था कि परिवेश गीत का है। फिर तो सभी कवियों ने अपने मन का काव्यपाठ किया। भोजन का समय होने पर कार्यक्रम में ब्रेक दिया गया। सबने मान-मनुहार से भोजन किया।
एक बार मुझे ऐसा लगा कि इस ब्रेक के कारण श्रोताओं की संख्या कम हो जाएगी लेकिन जब हम भोजन करके लौटे तो हॉल उतना ही भरा हुआ था।
कवि-सम्मेलन क्या था, कविताओं का महोत्सव था। गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया देखकर मैं भी गीत सुनाने की हिम्मत कर सका; जिसे सफल कहा जा सकता है।
एक गर्म दुःशाला, एक डिब्बा गुंजिया, दो सद्य प्रकाशित पुस्तकें और ढेर सारा ‘मन’ लेकर गाँव से घर लौट आया हूँ लेकिन यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तानसेन बनकर घूमते-घूमते आज हरिदास की कुटिया में पहुँचा तो अपनी अट्टालिकाओं का बौनापन समझ आ गया।
भव्य मंच, ग्लैमरस साज-सज्जा, चकाचौंध और बेतहाशा शानो-शौक़त से दूर आज गाँव का कवि-सम्मेलन करके लौटा हूँ। ऐसा लग रहा है ज्यों बहुत दिन तक पिज़्ज़ा और डबलरोटी खाने के बाद यकायक किसी ने चूल्हे के पास बैठाकर पानीवाले हाथ की रोटी, ताज़ी पिसी चटनी के साथ परोस दी हो।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले कुछ वर्ष में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध एक ऐसा डिजिटल षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ है, जिसके शिकंजे में हमारे हज़ारों युवा फँसते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति अपनी आर्य परम्परा, सहिष्णुता, सौहार्द तथा वात्सल्य के दम पर पूरी दुनिया में शीर्ष पर रही।
इन मूल्यों के कारण ही यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से लेकिन हमारी संस्कृति का बाल बांका न कर सके। मुग़लों ने भारत पर इतने लंबे समय शासन किया लेकिन सनातन परंपरा की गहरी जड़ों को हिला न सके। अंग्रेजों ने भौतिकवाद के तमाम अस्त्र छोड़े किन्तु विनम्रता और परस्पर उपकार करने की आदत के आगे उनका एक भी शस्त्र सफल न हो सका।
भयावह क्रोध में किसी के प्रति आक्रोश उमड़ता था तो भी घर की दीवार पर लगी मर्यादा पुरुषोत्तम की मुस्कान हमारे द्वेष को विगलित कर देती थी और हम उसकी नकारात्मकता से होड़ करने की बजाय अपनी सकारात्मकता की लकीर को बड़ा करने में जुट जाते थे।
हमने श्रीराम से सीखा है कि रावण से युद्ध जीतने के लिए रावण होना कोई उपाय नहीं है। स्वयं को राम बनाए रखते हुए अपनी सीता वापस लेने का नाम ही विजय है। यदि सामने वाले ने आपको अपने जैसा बनने के लिए विवश कर दिया तो फिर काहे की जीत?
यही आदर्श पूरी दुनिया को हमारे सामने घुटने टेकने पर विवश करता रहा है। इसीलिए मेरा ऐसा मत है कि दुनिया भर में सनातन संस्कृति से ईर्ष्या रखने वालों ने सोशल मीडिया पर ऐसी लाखों प्रोफाइल्स बनाई हैं, जिनके डीपी में या तो हिन्दू ध्वज होता है, या श्रीराम के उग्र स्वरूप का चित्र होता है या फिर ‘मैं कट्टर हिन्दू हूँ’ का उद्घोष होता है। इन प्रोफाइल्स पर आप नीचे तक स्क्रॉल करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में चार-पाँच बार डीपी चेंज करने के अलावा कुछ और नहीं होता। ऐसी कुछ प्रोफाइल्स में कट्टरता की पोस्ट्स भी कभी-कभार शेयर कर ली जाती हैं। कुल मिलाकर आप इन प्रोफाइल्स पर विचरण करेंगे तो आसानी से समझ सकते हैं कि यह किसी की ओरिजनल प्रोफ़ाइल नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य विशेष के लिए बनवाई गयी फेक प्रोफाइल्स में से एक है।
ये सभी प्रोफाइल्स भारतीयता की बात करनेवालों को, लोकतंत्र की बात करनेवालों को, सद्भाव की बात करने वालों को और वर्तमान शासन की आलोचना करनेवालों की पोस्ट पर गंदी गालियाँ लिखकर आती हैं। इसमें सरकार की आलोचना करनेवालों को गालियाँ बककर वे यह सिद्ध करते हैं कि ये प्रोफाइल्स भाजपा सरकार ने बनवाई हैं। जबकि वास्तव में उनका उद्देश्य सनातन संस्कृति को बदनाम करना है।
जब कोई डीपी में भगवान राम का चित्र लगाकर माँ-बहन की गालियाँ बकेगा तो उससे साख तो श्रीराम की ही धूमिल होगी। जब कोई ‘मैं कट्टर हिंदू हूँ’ लिखकर अभद्र टिप्पणियाँ करेगा तो इससे बदनामी उसकी नहीं होगी, हिंदू धर्म की होगी।
ऐसे में मोदी सरकार के भोले-भाले समर्थक इनके झाँसे में आकर इनके जैसा आचरण करने को ही राष्ट्रवाद मान बैठे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना में मातृभूमि के जिस गुण की सबसे पहले पूजा की गई है वह है ‘वात्सल्य’ (नमस्ते सदा ‘वत्सले’ मातृभूमे)। ऐसी विचारधारा के लोग भला कट्टरता और गाली-गलौज का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
श्रीराम को आदर्श माननेवाली परम्परा भला बदले की भावना को कैसे भड़का सकती है? यदि बदला लेना ही उचित होता तो क्या श्रीराम सीता के अपहरण के बदले मंदोदरी का अपहरण न कर लेते! लेकिन श्रीराम ने हमें सिखाया कि उस युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी सीता वापस लेना है। इस प्रयास में जो लंका उन्होंने जीती उस पर भी अधिकार नहीं किया।
‘हमने दुश्मन को गले मिल-मिल के शर्मिंदा किया है’ जैसे सूक्ति वाक्यों का अनुगमन करने वाली परम्परा को गाली-गलौज और वैभत्स्य के अखाड़े में खींचने का यह षड्यंत्र श्रद्धेय डॉ हेडगेवार और पूज्य गुरु गोलवलकर जी के सपनों को ध्वस्त करने का एक कुचक्र है।
आप स्वयं देखिए, जबसे ये प्रोफाइल्स बनी हैं तबसे हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी का कोई नाम भी उद्धृत नहीं करता। क्योंकि इनके विचारों पर विवाद नहीं किया जा सकता। सब लोग सावरकर के नाम को उछालते हैं, नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं क्योंकि इनके नाम पर विवाद करके हमारी संस्कृति, परम्परा और विचारधारा को विवादित सिद्ध किया जा सकता है।
श्रीराम के मुस्कुराते हुए चित्र, वन को जाते हुए श्रीराम के चित्र, हनुमान को गले लगाते हुए श्रीराम के चित्र, शबरी के बेर खाते हुए श्रीराम के चित्र हमारे जीवन से ग़ायब कर दिए गए हैं। क्योंकि इन सब चित्रों को देखकर श्रीराम उनके लिए भी पूज्यनीय हो जाते हैं, जो जन्मतः वैष्णव नहीं हैं। इसके स्थान पर आपको क्रोधित राम की पेंटिंग दी गयी है डीपी पर लगाने के लिए। ज़रा याद करके देखें कि आपने अपने बचपन में क्रोधित राम का चित्र कहाँ देखा था? आपको समझ आएगा कि ये पेंटिंग्स पिछले कुछ वर्षों में एक षड्यंत्र के तहत बनवाई गई हैं ताकि अपनी मुस्कान से सबका मन मोहनेवाले भगवान राम की उस छवि को बदला जा सके।
अपनी विनम्रता से पूरी दुनिया को दीवाना बना लेने वाले सनातन धर्म को लड़ाकों और कट्टरवादियों का धर्म सिद्ध किया जा सके। काश मेरे इस महान धर्म की युवा पीढ़ी इस षड्यंत्र से बच सके ताकि ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की इस अद्वितीय संस्कृति को बचाया जा सके।
✍️ चिराग़ जैन