Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।
बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।
किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।
चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।
शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।
प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।
अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।
हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।
शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है।
किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के लिए आवश्यक है कि मौन रहकर चर्चाकारों के शब्द और उससे भी अधिक उनके मनोभाव को सुना जाए। कई बार व्यंग्यकार चर्चा में इतना वाचाल हो उठता है कि चर्चाकार बोल भी नहीं पाते। ऐसे में व्यंग्य निकालने के प्रयास व्यंग्यकार को निकालने की स्थिति के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अनेक वरिष्ठ व्यंग्यकारों को सीधे-सादे विषय के भीतर से इस प्रकार व्यंग्योक्ति निकालने का प्रयास करते देखा है जैसे कोई प्यासा कौआ पुरानी कहानी से प्रेरित होकर घड़े में कंकर डाल डाल कर प्यास बुझाने की तपस्या कर रहा हो। लेकिन इस प्रयास में काक यह भूल जाता है कि जिस घड़े में कंकर डाले जाएं उसकी तली में इतना जल होना आवश्यक है जो कंकरों का बदन तर करने के बाद चोंच के भीतर आ सकने को पूरा पड़े।
जबरन व्यंग्यकार बनने की चेष्टा में अक्सर कुछ लोग भरी महफिल में कोई जुमला उछालते हैं। जुमला उछालने की प्रक्रिया पूर्ण होते ही वे सदन को मुस्कुरा कर यह भी बताते हैं कि मेरे इस जुमले पर आप सबको इस प्रकार मुस्कुराना चाहिए था। इस सोपान के उपरान्त वे एक एक सदस्य की आँखों में इस भाव से देखते हैं कि इतने सारे मूढ़ों में एक आप तो मुस्कुरा कर मेरी श्रेष्ठ व्यंग्योक्ति समझने की क्षमता सिद्ध करें। अंतिम सदस्य तक पहुँचते-पहुँचते उनकी दृष्टि रिरियाने लगती है। लेकिन इस अपमान से वे हतोत्साहित नहीं होते। बल्कि अपने मुखमंडल पर अजीब सी इतराहत लाकर यह बताते हैं कि अगर तुम अल्पज्ञों में एक भी समझदार मेरे व्यंग्य को समझ लेता तो अब मैं इस प्रकार इतरा रहा होता।
व्यंग्य समाज को आइना दिखा सकता है लेकिन कई व्यंग्यकार उस आईने में चोंच मार मर कर उसे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ते।
एक समय के बाद वे ये अपेक्षा रखने लगते हैं कि उनके बोलने, हंसने, मुस्कुराने, देखने और यहां तक कि उठने-बैठने तक को व्यंग्य समझ कर लोग खींस निपोरते रहें। यदि उनकी एकाध उक्ति प्रचलित हो जाए तो वे आदमी को आदमी क्या शब्द को शब्द नहीं समझते। उनकी सहजता में बैठा व्यंग्यकार उनकी चेष्टाओं में फूलते बदजुबान के आगे धराशायी हो जाता है। इस स्थिति में व्यंग्यकार आनंद कम और कष्ट अधिक देता है। पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाली छैनी भौंथरी होकर कला, कृति और कलाकार तीनों को नष्ट कर डालती है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कविता अपने युग की अकथ कथाओं का जनहितकारी वर्णन है। कवि जब जन पीड़ा से विह्वल होकर शासन के विरुद्ध लेखनी चलाता है उस समय उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए कि सत्ता और तंत्र का गठजोड़ उसे किस सीमा तक व्यक्तिगत हानि पहुँचा सकता है।
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कविता ने पूरा एक आंदोलन खड़ा किया। उस समय वही लेखनी लच्छेदार भाषा में वायसराय और ब्रिटिश राजसत्ता की चरण-वंदना लिख कर व्यक्तिगत लाभ अर्जित कर सकती थी किन्तु उन बूढ़ी हड्डियों ने जनहित को सर्वोपरि रखकर “तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिंदुस्तान की” और “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” जैसे तराने रचे।
आज़ादी के जश्न में ग़ाफ़िल होते समाज की कलाई पकड़ कर उत्सव को सावधान करते हुए गिरिजाकुमार माथुर ने डिठौना लगाते हुए कहा-
आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना
शत्रु हट गया लेकिन उसकी छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है
बाबा नागार्जुन, जो कि स्वयं को वामपंथ का समर्थक कहते थे उन्होंने भी 1962 की लड़ाई के बाद अपनी आजन्म समर्थित विचारधारा को ताक़ पर रखकर स्पष्ट लिखा-
वो माओ कहाँ है वो माओ मर गया
ये माओ कौन है बेगाना है ये माओ
आओ इसको नफ़रत की थूकों में नहलाओ
आओ इसके खूनी दाँत उखाड़ दें
आओ इसको ज़िंदा ही ज़मीन में गाड़ दें
यह काव्यांश इस बात का प्रमाण है कि “आह से उपजता गान” क्रमशः प्रकृति, मानवता, मातृभूमि, जनहित, शासनतंत्र और अंत में स्वयं को प्राथमिकता देता है। हर अच्छी कविता की क़ीमत रचनाकार को व्यक्तिगत बलिदान से चुकानी पड़ती है। कभी कल्पना करें तो सिहरन उठती है कि अपनी 19 वर्षीया बिटिया की मृत्यु की टीस को शब्दों में पिरोकर “सरोज-स्मृति” लिखने वाला निराला कितनी बार बिंधा होगा!
कभी अपने मुहल्ले से गिरफ़्तार होकर निकलने की कल्पना करेंगे तो शायद फ़ैज़ की ये एक पंक्ति पढ़कर दिल बैठ जाएगा- “आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो”। फ़ैज़ इस स्थिति में भी जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सत्ता को आईना दिखाने के एवज़ में अपने संभावित हश्र को लिखने से नहीं बाज़ आए कि –
हाकिम-ए-शहर भी, मज़मा-ए-आम भी
तीर-ए-इलज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी
रख़्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारो चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो
अश्रुओं से सिक्त कृति ही श्रोता के अधरों और नायन-कोर को एक साथ स्पंदित करने में सक्षम होती है। सत्ता के विरुद्ध लेखनी कवि का धर्म नहीं है लेकिन जनहित के हित को स्वर देते समय शासक के पक्ष अथवा विपक्ष का गणित लगाना रचनाकार के लिए अधर्म अवश्य है।
कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद जब दिनकर ने नेहरू जी की नीतियों के विरुद्ध “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” गाया तब उनके स्वर में किसी भय का कम्पन सुनाई नहीं दिया।
यूँ आपातकाल भुगतने वाली पीढ़ी बताती है कि उस समय सरकारी कर्मचारी समय पर दफ़्तर पहुँचने लगे थे। लोग अनर्गल आलस्य को त्यागकर अनुशासित हो चले थे। कानून तोड़ने से लोग घबराने लगे थे, आदि। लेकिन यह अनुशासन जनता को किसी नैतिक प्रेरणा की बजाय बलपूर्वक सिखाया गया था। लोकतंत्र की आत्मा को मसोस कर तानाशाही के बीज रोपने का क्रूर प्रयास किया गया था। यही कारण था कि दुष्यन्त के अशआर आपातकाल के विरुद्ध जनता की आवाज़ बन गए, यथा-
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
—–
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर ये तमाशा देखकर हैरान है
—–
जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ है
तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिला कर फेंक दी
शासन की आत्ममुग्धता पर चोट करते हुए शायर कह उठा कि
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा
जेपी के समर्थन में दुष्यंत ने बेबाक़ कहा कि
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यूँ कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है
यहाँ तक कि जनक्रांति को पुनर्जीवित करने के प्रयासों से भी दुष्यंत पीछे नहीं हटे-
कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
—-
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आहत हुई तो भवानी प्रसाद मिश्र लिख बैठे-
बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़नेवाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें, सब उसे मनायें
कभी-कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये
हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें, कौए-कौए गायें
बीस तरह के काम दे दिये गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में
बड़े-बड़े मंसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदलकर ऐसे ढाले
उड़नेवाले सिर्फ़ रह गये बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ, सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा क़िस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?
नागार्जुन ने तो काव्य के माधुर्य को विस्मृत कर तत्कालीन प्रधानमंत्री के विरुद्ध यहाँ तक लिख डाला-
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको
रानी-महारानी आप
नवाबों की नानी आप
सुन रही सुन रही गिन रही गिन रही
हिटलर के घोड़े की एक एक टाप को
छात्रों के खून का नशा चढ़ा आपको
और भी अधिक कड़वे होकर बाबा लिखते हैं-
देखो यह बदरंग पहाड़ी गुफ़ा सरीखा
किस चुड़ैल का मुँह फैला है
देखो तानाशाही का पूर्णावतार है
महाकुबेरों की रखैल है
यह चुड़ैल है।
अटल बिहारी वाजपेयी जी जनहित के पाले में खड़े हुए तो नैराश्य को चुनौती देते हुए चिंघाड़ उठे थे- हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूंगा।
इन्हीं अटल जी की शिखर वार्ता के विरोध में ओम् प्रकाश आदित्य जी ने लालकिले से कविता पढ़ी –
तूने ये क्या किया अटल बिहारी मुशर्रफ़ को महान कर दिया
उसपे मेहरबान हुए इतने भारी, गधे को पहलवान कर दिया
हर युग में कविता ने सत्ता की आँखों में आँखें डालने की ज़ुर्रत की है। वागीश दिनकर जी ने इस सन्दर्भ में साफ़ साफ़ लिखा है कि-
युग की सुप्त शिराओं में कविता शोणित भरती है
वह समाज मर जाता है, जिसकी कविता डरती है
शिवओम अम्बर जी ने तुलसी के वंशजों की सत्यभाषी परम्परा को सम्बल देते हुए कहा कि-
या बदचलन हवाओं का रुख़ मोड़ देंगे हम
या ख़ुद को वाणीपुत्र कहना छोड़ देंगे हम
जब हिचकिचएगी क़लम लिखने से हक़ीक़त
काग़ज़ को फाड़ देंगे, क़लम तोड़ देंगे हम
इस निर्भीक स्वभाव का ही परिणाम था कि जब उत्तर प्रदेश में कला के कंगूरे यश भारती की आस में शासन के गलियारों में फानूस से कालीन तक बनने को तैयार थे तब लेखनी की कतार का सबसे छोटा बेटा प्रियांशु गजेन्द्र मुज्ज़फरनगर के दंगों में जनता की कराह सुनकर लिख रहा था कि-
भोर का प्यार जब दोपहर हो गया
भावना का भवन खंडहर हो गया
तुम संवरते-संवरते हुईं सैफ़ई
मैं उजड़कर मुज़फ्फरनगर हो गया
एक बार पुनः जनता की सहनशक्ति और शासन की इच्छाशक्ति का आमना-सामना हुआ है। कवियों-लेखकों-व्यंग्यकारों और व्यंग्यचित्रकारों ने एक बार पुनः देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री की किसी नीति से आहत जन की अकथ पीर को लेखनी और तूलिका पर साधने का प्रयास किया है। किन्तु प्रधानमंत्री जी के प्रशंसक उस सारे प्रयास को पूर्वाग्रह का नाम देकर सोशल मीडिया पर गाली-गलौज तक की भाषा से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। यह दुःखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी।
वर्तमान में प्रधानमंत्री जी ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसका भविष्य संभवतः सुखदायी है किन्तु उस निर्णय के क्रियान्वयन की तैयारी इतनी कमज़ोर थी कि जनता का एक बड़ा वर्ग आर्थिक विपन्नता के कूप में आ पड़ा है। इस कुएँ के भीतर इतना अँधेरा है कि इस बड़े निर्णय की कुक्षि से निकलती रौशनी दिखाई नहीं दे रही है। चाटुकारों से घिरा नेतृत्व जनता की समस्याओं को देखकर भी अनदेखा कर रहा है और आत्ममुग्धता के ज्वर के परिणामस्वरूप अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहा है।
किसी नीति के क्रियान्वयन से यदि काम-धंधे ठप्प हो जाएं, अराजकता जैसा माहौल बनने लगे, लूटमारी, कालाबाज़ारी, जमाखोरी, आपसी विद्वेष, वर्ग-संघर्ष और मृत्यु तक की घटनाएँ अचानक बढ़ जाएं तो शासन का कर्त्तव्य बन जाता है कि वह अपनी दूरदर्शिता की विफलता स्वीकार करे। ऐसा करने की बजाय समस्याओं से घिरी जनता और परेशानी से चिल्लाने वालों को “बेईमान” और “देशद्रोही” कहा जाने लगा है।
स्वयं प्रधानमंत्री जी ने इन सब ख़बरों से पीठ फेरते हुए कह दिया कि- “बेईमान चिल्ला रहे हैं और ग़रीब आदमी चैन की नींद सो रहा है।” इस देश की स्थिति एक रेतीली पगडण्डी जैसी है। इस पगडण्डी पर बढ़ाया गया हर क़दम कुछ धूल ज़रूर उड़ाएगा। उस धूल से यदि आपके पीछे खड़े किसी व्यक्ति को धँसका लग जाए और वह खाँसने लगे तो उसे शुष्क कण्ठ को पानी का स्पर्श देनेकी बजाय उसे बेईमान कहा जाना न तो नैतिकता का द्योतक है न मानवता का।
नोटबंदी के विरुद्ध जो भी कुछ कहा जा रहा है उसका केवल इतना ही तात्पर्य है कि रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर दौड़ाने से पूर्व यदि परिपक्व तैयारियों का छिड़काव कर लिया जाता तो आपकी मोटर के पीछे पुष्पवृष्टि करने वाली जनता का खाँस-खाँस कर बुरा हाल न होता।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
भारत के ओज स्वरावतार
जनता के मन की दृढ़ पुकार
कविता के तेजस्वी सपूत
वाणी में शौर्य सुधा अकूत
ज्वाला से जब भर गए नेत्र
शब्दों में उतरा कुरुक्षेत्र
गाया करुणा की भृकुटि तान
वह रश्मिरथी का महागान
गीतों में सामधेनी धधकी
जनहित की ज्यों दामिनी दमकी
श्रृंगार रचा उर्वशी सजी
कविता के घर पाजेब बजी
ऐसा शब्दों का प्यार सधा
श्रृंगार सधा, अंगार सधा
शोध अरु इतिहास मिलाय रचे
संस्कृति के चार अध्याय रचे
शासन से आँख मिलाय जिया
नभपिण्डो से बतियाय जिया
है कौन निविड़ जो हरा नहीं
दिनकर जीवत है मरा नहीं
जब भी सत्ता बौराती है
जनता दिनकर को गाती है
जब भी अंधियारा गहरेगा
दिनकर प्राची में प्रहरेगा
रश्मियाँ नहीं लेतीं विराम
दिनकर को शत्-शत् है प्रणाम
✍️ चिराग़ जैन