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शुभचिंतक

एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव के बाद

जीत और हार के शोर-शराबे के बाद यकायक राजनैतिक गलियारों में सन्नाटा पसर गया है। जीतनेवाले इतने स्पष्ट बहुमत से जीते हैं कि मीडिया के पोस्ट इलेक्शन अलायंस और हॉर्स ट्रेडिंग जैसे कैप्सूल धरे के धरे रह गये हैं।
यही स्पष्ट बहुमत वर्तमान लोकतंत्र की दरकार है। आरोप-प्रत्यारोप जैसे तमाम हो-हल्ले पर चुनाव परिणाम ने पूर्णविराम लगा दिया है।
इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि अब जीतनेवाले सरकार चलाएँ और बाक़ी सबकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी। जो नहीं जीत सके हैं, उनका उत्तरदायित्व अब और अधिक हो गया है। विपक्ष लोकतंत्र को आकार देनेवाली हथेली है। यदि विपक्ष अपना काम ठीक से न करे तो सत्ता के चाक पर घूमती सरकार बेतरतीब आकार लेने लगेगी।
वर्तमान राजनैतिक चर्चाओं में विपक्ष को सरकार का शत्रु मानने की परंपरा चल निकली है, जबकि विपक्ष लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग होते हुए प्रकारांतर से सरकार का हिस्सा ही है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि उसकी भूमिका चाक पर घूमती मिट्टी को लोई को आवश्यक छुअन और दबाव से सार्थक आकार देने तक सीमित है। यदि हथेली मिट्टी की लोई को हटाकर स्वयं चाक पर घूमने का प्रयास करेगी तो स्वयं भी घायल होगी और भविष्य के निर्माण को भी ध्वस्त कर देगी।
इसी प्रकार सरकार को भी यह समझना होगा कि तेज़ गति से घूमती लोई पर यदि कोई अंगुली का दबाव महसूस होने लगा है तो इसका अर्थ है कि अब तंत्र के एक निश्चित आकार में ढलने का समय आ गया है।
हथेली मिट्टी से स्वयं को रिप्लेस न करे और मिट्टी हथेली की छुअन से परहेज न करे तो लोकतंत्र के चाक की गति निर्माण का कारण बन जाएगी।
जनता ने विधायिका की नियुक्ति कर दी है। अब इसके बाद जनता का भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, आपिया या अकाली होना समीचीन नहीं है। अब जनता को भी जनता होकर हर जीते हुए प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधि मानकर उसे तंत्र के प्रचालन का अधिकार देना होगा। अब हर जीते हुए प्रत्याशी को भी जनता को ‘पाँच वर्ष के लिए अनावश्यक’ समझने की बजाय सर्वाेच्च सत्ता समझते हुए प्रत्येक निर्णय से पूर्व इस सर्वाेच्च सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व बोध से युक्त रहना होगा।
-सत्ता को यह मानना होगा कि सवाल पूछनेवाला हर व्यक्ति सरकार का विरोधी नहीं है।
-विपक्ष को यह मानना होगा कि सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध आवश्यक नहीं है।
-जनता को यह जानना होगा कि विपक्ष के अभाव में कोई भी सत्ता जनता की बात नहीं सुन सकती।
-मीडिया को यह समझना होगा कि हर बुलेटिन में शोर भर देने का नाम पत्रकारिता नहीं है।
-साहित्य को यह स्वीकारना होगा कि नारे, जयकारे, आरती, चालीसा और गाली को कभी साहित्य नहीं कहा जाएगा।

© चिराग़ जैन

जबरन वेक्सिनेशन

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाखि़ल किया है कि किसी को जबरन वेक्सिनेशन नहीं लगाया जा सकता। यह ख़बर टीवी पर देखी और याद आ गया वह सब कुछ जो पिछले कुछ समय में व्यवहार में देखा है।
हवाई जहाज में यात्रा करने के लिए वेक्सीन की दोनों डोज़ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा न हो तो हर बार यात्रा से 48 घंटे पूर्व का आरटीपीसीर दिखाना होगा (मूल्य न्यूनतम 500 रुपये प्रति टेस्ट)। लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि सरकार ने किसी को वेक्सिनेशन के लिए विवश किया है।
सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों, पुलिसवालों के साथ साथ ओला-उबर ड्राइवरों, डिलीवरी बॉय, चौकीदार, अर्बन क्लैप सर्वर व अन्य लोगों के लिए वेक्सिनेशन अनिवार्य किया गया। लेकिन किसी को जबरन वेक्सिनेशन के लिए विवश नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के इस हलफ़नामे को फाइल में सहेज लेगा। आप जब मॉल, दफ़्तर वगैरह पर जाएंगे तो वहाँ गार्ड के व्यवहार से आपको महसूस होगा कि दोनों वेक्सिनेशन के बिना आपकी कहीं कोई इज़्ज़त नहीं है। लेकिन यह तय है कि किसी को वेक्सिनेशन के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
आपके घर पर काम करनेवाली मेड को, आपकी गाड़ी साफ़ करनेवाले को (सरकारी निर्देशों का हवाले देकर) बिना वेक्सिनेशन के सोसाइटी में घुसने नहीं दिया जाएगा लेकिन किसी को भी वेक्सीन लगवाने के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि मेरी यह पोस्ट वेक्सीन अथवा कोविड संबंधी नियमों के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई राय प्रस्तुत नहीं करती। इसका उद्देश्य केवल काग़ज़ी ख़ाना-पूरी और व्यवहारिक परिस्थिति के मध्य का अंतर स्पष्ट करना है।
इस वितण्डे में सभी सरकारें बराबर हैं। दिल्ली में आप कैब में दो से अधिक लोग नहीं बैठ सकते। मैं कई दिन से समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि इससे कोरोना कैसे रुक जाएगा? मैं अपने माता-पिता को लेकर एक ही घर से निकलूँ लेकिन अगर एक ही कैब में बैठकर ट्रेवल करूँ तो कोरोना हो जाएगा।
मैं उन्हें लेकर अपनी गाड़ी में चलूँ या हायर करके टैक्सी में घूमूँ तो भी कोरोना नहीं होगा लेकिन ओला-उबर में बैठते ही कोरोना हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी की चुनावी रैली में पीछे बैनर पर ‘वर्चुअल रैली’ लिख दिया जाएगा और कोरोना उस बैनर को पढ़ते ही चुनाव आयोग के नियमों का सम्मान करते हुए वापस लौट जाएगा।
दिल्ली में दुकानें खुलेंगी तो लोगों की भीड़ से कोरोना फैल जाएगा, लेकिन उन्हीं दुकानों के आगे रेहड़ी-पटरी लगाने पर कोरोना नहीं फैलेगा।
किसी राजनेता की रैली की तैयारी में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ती रहें लेकिन किसी बिटिया की विदाई के लिए आशीर्वाद देने वाली हथेलियों और किसी दिवंगत की शवयात्रा में कंधों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
कोरोना के नाम पर समाज को जागरूक करने की बजाय ये जो ढोंग-ढकोसला चल रहा है, उसके चलते लोग इन नियमों के प्रति कैज्युअल हो रहे हैं। अदालतों में हलफ़नामे देकर आप काग़ज़ों का पेट तो भर देंगे साहब लेकिन आपने अपने आचरण से जनता के मन की इस उलझती गुत्थी को न सुलझाया तो आने वाले चुनावों में यही गुत्थी आपकी जीत की रफ़्तार को उलझा देगी।

~चिराग़ जैन

अलविदा 2021

जब ढलेगा आज का सूरज
तो उसके साथ ही बुझ जाएगी
वो आख़िरी उम्मीद भी
जो साल भर पहले
लगा बैठे थे तुमसे हम सभी।

याद है मुझको
करोड़ों कामनाएं गूंज उठी थीं
सभी मोबाइलों में;
शुभ, मुबारक़ और कितने ही
हसीं अल्फ़ाज़ लिखे थे तुम्हारे साथ

घड़ी के एक-एक सेकेण्ड की आवाज़ पर
उम्मीद का आकार बढ़ता जा रहा था
ठिठुरती रात में
जब रूह तक जमने लगी थी
तुम्हारी पहली आहट को तरसते लोग
सड़कों पर खड़े थे

घड़ी में जिस जगह बारह लिखा था
घड़ी की सबसे छोटी सूई
उस जानिब बहुत धीरे सरकती आ रही थी
बड़ी सूई ज़रा सी तेज़ थी
पर तीसरी दोनों बड़ी-छोटी को मिलवाने की ख़ातिर
कई चक्कर लगाती जा रही थी
मुझे सेकेण्ड की सूई का हर ठुमका
अभी तक याद है अच्छी तरह

बहुत बेचैन थी उस रात ये दुनिया
तुम्हारी इन्तज़ारी में

तुम्हारी राह में जो फूल बिखरे थे
अभी वो ठीक से सूखे नहीं थे
कि तुमने ख़ूबसूरत ख़्वाब सारे तोड़ डाले
तुम्हारे नाम से जो दिन नुमाया थे
उन्हें रोती हुई आँखों का चस्का लग गया था
तुम्हारे कान आहों का नशा करने लगे थे
तुम्हारी एक-एक तारीख़ डाकू की तरह
हर रोज़ दुनिया के कई गौहर चुराती जा रही थी

सुनो, ये जो तुम्हारे कारनामे हैं
उन्हें भूला भी जा सकता नहीं है
और उनकी याद के आगोश में
उम्मीद का दामन पकड़ने से
हमें डर लग रहा है

निगाहें फिर घड़ी पर टिक रही हैं
किसी जादू की गुंजाइश नहीं है
मग़र ये आज पहली बार होगा
कि दुनिया
आने वाले साल की ख़ातिर
भले ख़ुश हो या ना हो
मग़र तुम जा रहे हो
इस ख़ुशी में नाच उठेगा ज़माना।
✍️ चिराग़ जैन

जनरल विपिन रावत की शहादत

भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन

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