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विवेक को सोने दो

चेतावनी: यह पोस्ट आपको विवेकशील बना सकती है। और विवेकशील होना आपके राजनैतिक भविष्य के लिए घातक है।

हम भयंकर संवेदनहीन लोगों से घिर चुके हैं।
‘अपराधी’; ‘विवश’; ‘दरिन्दा’ और ‘बेचारा’ जैसे उपनाम हमारी राजनैतिक प्रतिबद्धता को देखकर तय किए जाते हैं।
भाजपाई होने के लिए मुसलमानों से घृणा न्यूनतम अर्हता है, और कांग्रेसी होने के लिए संघ से नफ़रत ज़रूरी है।
कांग्रेसी होकर कांग्रेस की चूक पर बोलना पाप है। भाजपाई होकर भाजपा सरकार की किसी भी नीति का विरोध महापाप है।
मोदी जी की मिमिक्री करने पर किसी को प्रताड़ित किया जाएगा तो कांग्रेसी और आपिये भाजपा को हास्यबोध विहीन घोषित कर देंगे। लेकिन किसी ने राहुल गांधी या केजरीवाल पर कोई परिहास कर दिया तो यही कांग्रेसी और आपिये उससे परहेज करने लगेंगे।
निष्पक्ष होना कदाचार कहलाने लगा है। विवेकशील लोग राजनीति के लिए ख़तरनाक़ हैं। असहमति जतानेवाला एक दिन ग़लत को ग़लत कह देगा, इसलिए किसी को सदस्य चाहियें ही नहीं। सबको अंधभक्त चाहियें।
अपना विपक्ष किसी को भी बर्दाश्त नहीं है। हर दल वहाँ लोकतन्त्र लाना चाहता है, जहाँ वह सत्ता में नहीं है। सत्ता में आते ही सब तानाशाही के पक्ष में तर्क जुटाने लगते हैं।
विपक्ष में रहकर जो मशालें उठाई जाती हैं, सत्ता में पहुँचते ही उन मशालों को आरती का थाल बनाकर चमचों के हाथ में थमा दिया जाता है।
बलात्कार यदि कांग्रेस शासित राज्य में हुआ है तो कांग्रेस का समर्थक, वहाँ शासन की कार्रवाई से संतुष्ट होगा। ज़्यादा गहरा समर्थक हुआ तो पीड़िता की ग़लतियाँ भी ढूंढ सकता है। छोटा-मोटा समर्थक हुआ तो भी कम से कम चुप लगाने जितनी निष्ठा तो निभाएगा ही। लेकिन यही दुष्कर्म यदि भाजपा शासित राज्य में होगा तो कांग्रेस का कार्यकर्ता सबसे पहले सरकार को अमानवीय घोषित करेगा, फिर मनुष्यता का झंडा उठाएगा, बेटियों के पक्ष में संवेदनात्मक पोस्ट्स लिखेगा।
मणिपुर में महिला को नंगा घुमाया जाएगा तो भाजपावाले उस वीडियो से दहल नहीं जाएंगे। वे उसके वायरल होने के पीछे सरकार को बदनाम करने की मंशा तलाश लेंगे। मणिपुर में होनेवाली विदेशी फंडिंग की काल्पनिक रसीदें दिखाकर मणिपुर के लोगों को राष्ट्रद्रोही साबित करेंगे।
लोकतंत्र और नैतिकता, नंगे बदन, सिर झुकाए, सड़क पर पत्थर खाएगी और राजनीति उसके अंगोपांग को मसलकर अपने बलशाली होने का जश्न मनाती रहेगी।
जनता का विवेक कुंभकर्ण की नींद सो रहा है। राजनैतिक रावण मनुष्यता की लक्ष्मण रेखा लाँघकर भी जन-संवेदना की सीता को अपनी अशोक वाटिका में कैद रखना चाहते हैं।
अपने विवेक को आँखें मत खोलने देना, क्योंकि आँखें खोलते ही उसे अपने राजनैतिक आका के चेहरे पर लगे घिनौने धब्बे साफ़-साफ़ दिखने लगेंगे।

✍️ चिराग़ जैन

बजट 2024

मैंने सरकार से पूछा
जब एक लाख सालाना आय वाले
पैसे मांगने आए
तो आप क्या कर लेंगे
सरकार बोली करना क्या है
हम उन्हें जॉब देने वालों को
न्यूनतम वेतन कानून उल्लंघन का
चार्ज लगाकर धर लेंगे

हमने पूछा
ये इंटर्नशिप की योजना में तो काफी लोचा है
क्या आपने सोचा है
लोग नकली इंटर्नशिप दिखाकर
पाँच हज़ार रुपये महीने का दावा करेंगे सरकार से
सरकार ने हमें समझाया प्यार से
देखो इस स्कीम में सबकी भलाई है
इसमें बेरोज़गारों के हिस्से छाछ
और उद्योगपतियों के हिस्से मलाई है
उद्योगपति नई भर्ती इंटर्नशिप के नाम पर भरेगा
और 5000 रुपये महीना
अपने CSR FUND से भरेगा
नया रंगरूट 5000 रुपये कमाकर लाएगा
और ख़ुद को बेरोजगार भी नहीं कह पाएगा
तो हुई ना बात सबके अधिकार की
CSR उद्योगपति का
Job उद्योगपति की
और वाहवाही सरकार की

लेकिन जनाब
इससे पुराने employee की हालत हो जाएगी ख़राब
सरकार बोली
हमने नए रोज़गार देने का वादा किया था
पुराने रोयेंगे तो उन्हें भी देख लेंगे
अगले बजट में नयों की पट्टी खोलकर
पुरानों पर लपेट देंगे।

✍️ चिराग़ जैन

मनमोहन सिंह के बयान पर सियासत

जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े

कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

✍️ चिराग़ जैन

आधुनिक गणितज्ञ

माननीय आर्यभट्ट से कहीं आगे चीज़ हैं। वे एक और एक ग्यारह कभी नहीं करते, अपितु 5 और 6 ग्यारह करते हैं। प्लस का निशान (➕️) न दिखा तो 56; वरना 11 तो है ही..!
इन्होंने छोटी संख्या में से बड़ी संख्या को घटाने जैसे उल्टे-सीधे प्रयोग कभी नहीं किए। मामला हमेशा सीधा-सपाट रखा; बड़ी संख्या से छोटी को घटाना है। इस मामले में वे हमेशा क्लियर रहे हैं, मॉनीटर बनने से गुरु बनने तक!
सोच बड़ी है, इसलिए ‘अल्प’ और ‘बहु’ के बीच कोई प्रमेय सिद्ध करते समय पाइथागोरस ने अल्प से हमेशा बहु ‘त’ दूरी बनाए रखी है। कुछ विदेशी अल्पों के साथ वे निकट खड़े होकर फोटो खिंचा लेते हैं, क्योंकि तब उनकी संख्या में उनकी क्रय क्षमता जोड़ ली जाती है।
स्वयं को रामानुजन समझनेवाले ये महान गणितज्ञ गणित में अपवाद खोजनेवाले विश्व के प्रथम और एकमात्र व्यक्ति हैं। इन्होंने अनेक जोड़-तोड़ करके यह सिद्ध किया है कि- “चुनावी जीत का आँकड़ा हासिल करने के लिए कम पड़ रही संख्या में पार्टी फण्ड की कोई भी संख्या जोड़कर किसी को कहीं से भी तोड़ा जा सकता है। एक बार सरकार बनने के बाद इस जोड़े गए को निचोड़कर छोड़ देने का भी नियम है।”
कूटनीति के गणितीय सिद्धांत की गहन साधना के परिणामस्वरूप ये किसी भी लघुत्तम का नाम बदलकर महत्तम रखते हैं और अवसर के अनुसार उसे समापवर्त्य बना लेते हैं।
ऐसा कोई भी व्यक्ति जो इसके कद को आघात पहुँचा सकता है उसके पद को ‘घात’ देकर कोष्ठक में बंद करने में माननीय सिद्धहस्त हैं। बीजगणित के इतने उद्भट विद्वान हैं कि संख्या, मान, घात और कोष्ठक को अलग-अलग करके जोड़-घटा लेता है। भास्कराचार्य जानते हैं कि सूत्र के साथ चाहे कुछ भी करना पड़े किंतु सार में लाभ न दिखा तो यह असार संसार विस्तार से इनका ‘समूचा राजनीति शास्त्र’ तार-तार कर देगा।
चूँकि किसी बैंक का वार्षिक घाटा मित्र के नाम के आगे लिखी गई ऋणात्मक संख्या के बराबर होता है, इसलिए बैंक इनके मित्रों को ‘धन’ और धन्यवाद एक साथ प्रदान कर देते हैं। नीति आयोग की योजना के अनुरूप अब समूचे राष्ट्र में ‘बैंक’ शब्द को ‘धर्मशाला’ शब्द से रिप्लेस कर दिया जाएगा ताकि परिग्रही बैंककर्मी, घाटे में जा रही गीताप्रेस गोरखपुर का साहित्य ख़रीदकर आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो सकें।
महान गणितज्ञ जानते हैं कि जब अंत में शून्य ही बचना है तो क्यों न छोटी-बड़ी तमाम संख्याओं को निपटाकर शून्य के विकास में हाथ बँटाया जाए!

✍️ चिराग़ जैन

कुएं में भांग

मन यह सोचकर आतंकित है कि हम उस स्थिति तक आ चुके हैं जहाँ कुँआ और खाई में से किसी एक को चुनने की विवशता है। एक ओर वे हैं, जिनसे छीनकर सत्ता भाजपा को दी गई थी और दूसरी ओर ये हैं जो ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किसी भी कीमत पर इन्हें सत्ता से बाहर न किया जा सके।
हमें इन दो में से एक का चुनाव करना है। इनसे इनकी खामियों पर प्रश्न करो तो ये कांग्रेस की कमियाँ गिनाने लगते हैं। और कांग्रेस से उसकी गलतियों पर सवाल पूछो तो वे भाजपा के अपराधों की सूची थमा देती है।
जो भाजपा जीवन भर महबूबा मुफ्ती को ग़द्दार साबित करने पर तुली रही, वही कश्मीर में सत्ता के लिए उसी महबूबा मुफ्ती से गठबंधन कर लेती है। उधर, जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में DMK के कुछ नेताओं का नाम आने पर कांग्रेस गुजराल सरकार पर दबाव बनाती है कि वह DMK को सरकार से बाहर करे। इंद्रकुमार गुजराल कांग्रेस की यह शर्त नहीं मान पाते तो कांग्रेस उनकी सरकार गिरा देती है। बाद में यही कांग्रेस उसी DMK के साथ गठबंधन कर लेती है।
बचपन से हम एक नेता का किस्सा सुनते आए हैं कि उसने किस तरह बुलडोजर चलाकर तुर्कमान गेट का इलाक़ा ख़ाली करा लिया था। उस सनक में यह तक नहीं विचारा गया कि रातोंरात बेघर हुए इतने लोग कहाँ पनाह लेंगे! अब यही बुलडोजर उत्तर प्रदेश में किसी और का डंका पीटने निकल चला है।
कांग्रेस ने एशियाड और कॉमनवेल्थ खेलों में पानी की तरह पैसा बहाया। भाजपा के हिस्से G20 सम्मेलन आया तो इन्होंने भी सारी कसर निकाल ली।
इंदिरा सरकार में सत्ता की आलोचना अपराध था। सरकार का विरोध करना जेल की यात्रा को निमंत्रण था। वर्तमान सरकार में सत्ता से कुछ पूछ लो तो पूरा सिस्टम और पूरी ट्रोल आर्मी आपके पीछे पड़ जाती है। केंद्रीय मंत्री पत्रकार को सर-ए-आम धमकी देती हैं कि मैं आपके मालिक से बात करूंगी।
रामदेव और अन्ना हज़ारे ‘जन आंदोलन’ करने लगे तो कांग्रेस सरकार ने बल प्रयोग किया। गांधी के देश मे सत्याग्रही को जेल में ठूस दिया गया। अब आदर्श अनुगामी की तरह किसान आंदोलन और पहलवान आंदोलन पर बल प्रयोग करने में सरकार बिल्कुल नहीं हिचकिचाई।
भाजपा ने अपनी ट्रोल आर्मी को अभयदान दे रखा है कि गांधी, नेहरू पर जितनी कीचड़ उछाल सकते हो, उछालो। इधर कांग्रेस ने भी सावरकर के अपमान पर यही नीति अपनाई हुई है।
कांग्रेस ने इंदिरा जी की हत्या के बाद हुई हिंसा को जस्टीफाई करने में शर्म नहीं की। इधर भाजपा ने भी गोधरा के वीभत्स हत्याकांड के बाद हुई हिंसा को बेशर्मी से जस्टीफाई किया।
कांग्रेस जब तक शासन में रही उसने 84 के नामजद आरोपियों को न केवल जेल की सलाखों से बचाए रखा, बल्कि उन्हें सत्ता का सुख देकर पुरस्कृत भी किया। 2002 के नामजद आरोपियों के साथ भाजपा भी ठीक यही कर रही है।
कांग्रेस ने के कामराज और पी वी नरसिम्हा राव के साथ जो व्यवहार किया, भाजपा ने वही व्यवहार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ किया।
भाजपा को पानी पी पीकर कोसनेवाले कपिल मिश्रा आज भाजपा में माननीय हैं। उधर कांग्रेस में रहकर भाजपा से रोज़ ग़द्दारी का सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाले सिंधिया और गुलाम नबी आज़ाद, आज कांग्रेस को भ्रष्टाचारी बताते फिरते हैं।
भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आनेवाले नेता कांग्रेसियों को ईमानदार लगते हैं और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले नेता भाजपाईयों को देशभक्त लगते हैं।
ऐसे और भी हज़ारों उदाहरण मिल जाएंगे। सत्ता की ओर दौड़नेवाले तभी तक सिद्धांतों की दुहाई देते हैं, जब तक वह सिद्धांत उनका पथ अवरुद्ध न करे। जनता इनसे भागकर उधर जाती है तो वे घाव पर मरहम लगाने के बहाने चिकोटी काटने लगते हैं। उनकी चिकोटी से त्रस्त होकर इधर आती है तो ये घाव सहलाने के बहाने छेड़खानी करने लगते हैं।
नागरिकों को विवेकयुक्त होकर आचरण करना होगा। सभी राजनैतिक दल सत्ता की रस्साकशी में व्यस्त है, प्रशासन शासन की उँगलियों पर कठपुतली की तरह ठुमक रहा है, न्यायपालिका शासन और प्रशासन की इच्छाशक्ति के अभाव में जर्जर हुई जा रही है और पत्रकारिता तलवार से यशगान लिखकर दिन काट रही है। ऐसे में अपने देश को बचाने की ज़िम्मेदारी नागरिकों के कंधों पर है l
हम जो कर सकते हैं, वह अभी इसी वक़्त से प्रारंभ करें। जहाँ तक सम्भव हो नियमों का पालन करें। धर्म-संप्रदाय और जातियों पर चर्चा न करें। शिक्षा, सफाई और रोज़गार पर ध्यान केंद्रित करें। अपने-अपने परिवार को सामाजिक विद्वेष के सोशल मीडिया प्रचार से बचाए रखें।
इन सब कार्यों को करने में जहाँ सिस्टम का भ्रष्टाचार अवरोधक बने, वहाँ स्वयं को गांधी बनाकर धैर्य और अहिंसा का मार्ग अपनाएं। जहाँ सत्ता तुम्हें विवशता के दोराहे पर खड़ा कर दे वहाँ सावरकर बनकर अपनी जान बचा लो, क्योंकि आप बचे रहे तो ही कुछ कर सकोगे। देश को गांधी और सावरकर ही नहीं; राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और अम्बेडकर भी चाहिएं। पढ़ो ताकि आपको बरगलाया न जा सके! समझो, ताकि आपको डराया न जा सके।

✍️ चिराग़ जैन

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