Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद तक छितरा गया है कि अब इस ताने-बाने का हर ताना अपने बाने पर प्रतिशोध तानकर खड़ा दिखाई देता है।
दूसरी ओर है लोक, जो तन्त्र से नाराज़ रहते हुए भी सदैव तन्त्र की ओर ही आशा भरी निगाहों से देखता है। यह लोक वर्तमान में अपने-अपने ‘सोशल मीडिया समूहों’ द्वारा प्रसारित विचारधाराओं तथा नैतिकताओं का अनुसरण करते-करते इतना अंधा हो गया है कि अराजकता की सीमा-रेखा इसे दिखाई देनी बंद हो गयी है।
एक शिष्ट तथा समृद्ध लोकतन्त्र में तन्त्र, लोक की भावनाओं का सम्मान करते हुए संविधान लागू करवाता है और लोक, तन्त्र की सीमाओं को समझते हुए संविधान लागू करने में सहयोग करता है। किन्तु वर्तमान स्थितियों में कम से कम अपने देश में लोकतन्त्र का यह सौहार्द लगभग धूमिल हो चुका है। न जनता के मन में तन्त्र के लिए कोई सम्मान शेष रह गया है, न ही तन्त्र के मन में जनता के लिए कोई सौहार्द।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नामक तीन शक्तियाँ लोकतन्त्र के ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में लोकतन्त्र की समूची सृष्टि को सुचारू रूप से संचालित करती हैं। सृष्टि के संचालनार्थ कभी सुरों को तो कभी असुरों को वरदान दिये जाते रहे हैं। यदि किसी परिस्थितिवश कोई एक शक्ति किसी अयोग्य पात्र को अनुचित वरदान दे भी आई तो शेष दोनों शक्तियों ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस वरदान का निदान खोजा और सृष्टि को विनाश से बचा लिया।
चूँकि मूल उद्देश्य सृष्टि का कल्याण ही है, इसलिए यदि किसी वरदान को निष्फल करने का उपाय ढूँढने में किसी शक्ति को विषपान भी करना पड़ा तो वह उससे कभी पीछे नहीं हटा। ऐसी किसी चूक का सुधार करने के लिए किसी शक्ति को अपमान भी झेलना पड़ा तो वह शक्ति उससे पीछे नहीं हटी।मैंने ‘पुरुषोत्तम’ में दो पंक्तियाँ लिखी हैं-
जब राजसभा पर राजा की निजता हावी हो जाती है
तब राजनीति की चाल अचानक मायावी हो जाती है
किन्तु वर्तमान संदर्भों में लोकतंत्र के इन त्रिदेवों के मध्य ऐसा ईगो-क्लैश जारी है कि देव और दानव अपनी समस्याएँ लेकर इनके पास जाने की बजाय अपने स्तर पर ही लड़-भिड़कर समाधान निकालने में विश्वास रखने लगे हैं।
यह परिस्थिति घातक ही नहीं, विध्वंसक भी है। यह परिस्थिति स्वीकार्य नहीं है। तन्त्र को चाहिए कि वह लोकतन्त्र के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने-अपने वर्चस्व की लड़ाई से बाहर निकलें। और लोक को चाहिए कि स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की बजाय तन्त्र की विवशताओं का सम्मान करना सीखे।
हमने विधायिका के चेहरे पर स्याही फेंकी, हमने राजनीति के गाल पर तमाचे मारे, हमने कार्यपालिका के साथ धक्का-मुक्की की, हमने पुलिसवालों का अपमान किया …यह सब हमेशा से होता रहा है। यद्यपि मैं व्यक्तिगत रूप से इस आचरण को भी अराजकता ही मानता हूँ। किन्तु अब जब हमने न्यायपालिका पर जूता फेंकना सीख लिया है तब मैं अपने ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ दोनों के सम्मुख यह निवेदन रखना चाहता हूँ कि अराजकता की आंधी जब आपका घर उजाड़ रही हो तो अपनी जान बचाना स्थिति-सम्मत है, किंतु अराजकता की आंधी के साथ मिलकर अपना घर उजाड़ने में सहयोग करना कोरा पागलपन है।
भारत एक सक्षम देश है। विचारधाराओं की कहासुनी इसके लोकतान्त्रितक स्वरूप को पुष्ट करती है किन्तु खरेपन और बदतमीज़ी के मध्य का अंतर करना यदि हमने अपने युवाओं को नहीं सिखाया तो हमारी यही युवापीढ़ी एक सुंदर देश को गृहयुद्ध की त्रासदी से ग्रस्त होते देखेगी।
✍️ चिराग़ जैन
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आजकल पूरी दुनिया में चौंकानेवाली राजनीति का ट्रेंड है। मुझे तो लगता है कि दुनिया भर के राजनेता रात को सोने से पहले यह सोचकर सोते होंगे कि कल ऐसा क्या करना है, जिससे लोग भौंचक्के रह जाएँ। जब तक चौंकाने का कोई सॉलिड उपाय मिल न जाए, तब तक नेताजी को नींद नहीं आती होगी।
कल्पना कीजिए, दिन भर के सब काम निपटाने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प अपने बिस्तर पर लेटे हैं। उनका एक हाथ उनके तकिये और सिर के बीच में फँसा हुआ है। उनकी नज़रें छत पर टिकी हुई हैं और उनके मस्तिष्क में भारत के खि़लाफ़ कोई नई ख़ुराफ़ात चल रही है। अचानक उनका चेहरा ऐसे खिल उठा, मानो किसी मासूम लड़की को छेड़ने के बाद कोई लपूझन्ना मुस्कुरा रहा हो।
सुबह उठते ही व्हाइट हाउस ने वीज़ा फ़ीस बढ़ाने की घोषणा कर दी। चारों ओर हाहाकार मच गया। इस अफ़रा-तफ़री को देखकर ट्रम्प मन ही मन नागिन डांस कर उठे होंगे। प्रवासी भारतीयों के माथे से जो पसीना बहा, उसे देखकर ट्रम्प के कलेजे को ठण्डक पड़ी होगी। भारत सरकार और भारतीय मीडिया में पूरी तरह छा जाने के बाद ट्रम्प इस खेल से बोर हो गए और उन्होंने स्पष्टीकरण जारी करके सूचना दी कि मैंने भारत की ओर पत्थर तो फेंका है, लेकिन वह उतना बड़ा नहीं है, जितना आपको लग रहा है।
स्पष्टीकरण के बाद मामला लगभग ठण्डा पड़ गया और ट्रम्प फिर से अपने बैडरूम में लेटकर कोई नई खुराफ़ात सोच रहे होंगे। मुझे पूरा विश्वास है ट्रम्प के दिल में ज़रूर ऐसा कोई टुल्लू पम्प फिट है, जिसमें से रोज़ कोई नया पंगा निकलता है।
मोदी जी के पास ऐसा अवसर आया था कि वे इस टुल्लू पम्प का इलाज करवा सकते थे। कुछ वर्ष पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प कुछ घंटों के लिए भारत आए थे तो मोदी जी ने उन्हें सीधे आगरा भेजा था। आगरा भेजने के मोदी जी के निर्णय से मुझे यह भ्रम हुआ था कि मोदी जी बहुत दूरदर्शी आदमी हैं। लेकिन जब बिना इलाज कराए उन्होंने ट्रम्प को छोड़ दिया तो लगा कि हमने हाथ आया अवसर छोड़ दिया।
आप कहेंगे कि इंटरनेशनल डिप्लोमेट इम्यूनिटी के तहत ट्रम्प का इलाज नहीं किया जा सकता था लेकिन ह्यूमेनिटी भी कोई चीज़ होती है। और विश्वगुरु बनने जा रहा भारत कम से कम ट्रम्प जैसे मस्तिष्क को ह्यूमेनिटी सिखाकर विश्व कल्याण में सहयोगी तो बन ही सकता था।
✍️ चिराग़ जैन
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चारों ओर हल्ला मचा हुआ है कि आज़म ख़ान आ रहे हैं। शोर-शराबा सुनकर मुझे लगा कि शायद कोई युद्ध-वुद्ध जीतकर आ रहे होंगे। मैंने हो-हल्ले की दिशा में कान लगाकर सुना तो पता चला कि जेल से आ रहे हैं।
मेरा माथा भनभना गया। मैंने अपने एक पत्रकार मित्र को फोन करके पूछा, ”क्यों भाई, ये आज़म ख़ान के जेल से छूटने पर ख़ुशी का माहौल क्यों है?
वे बोले, ”चिराग़ भाई, दरअस्ल अदालत ने उन्हें सभी 72 मामलों में ज़मानत दी है।”
मैंने टोकते हुए पूछा, “मतलब, अभी निर्दोष सिद्ध नहीं हुए हैं। और वो भी 72 मामले… ऐसा उन्होंने क्या किया था भाई?“
पत्रकार मित्र बोले, “अरे भाईसाहब, राजनीति में ये सब सामान्य बात है। राजनीति में सौ-पचास मुक़द्दमे तो हो ही जाते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इससे किसी को अपराधी नहीं कहा जा सकता।“
भारतीय राजनीति के प्रति पत्रकार मित्र के भाव सुनकर मेरा मन श्रद्धा से भर गया। मैंने जिज्ञासावश पूछा, “अगर ये सब सामान्य है तो उन्हें जेल क्यों भेजा गया?“
वे बोले, ”वो तो सरकार बदल गई इसलिए उन्हें जेल जाना पड़ गया। वरना ये सब मामले तो तब भी थे जब वो ख़ुद सरकार में थे। लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं थी जो उनको हाथ लगा दे।“
“मतलब उन्हें सरकार ने जेल में डाला है, न्यायालय ने नहीं?“ मेरे स्वर में आश्चर्य था।
”अरे भाई आदेश न्यायालय का ही रहा होगा। गिरफ़्तार कार्यपालिका ने ही किया होगा। लेकिन होता सब कुछ सरकार के इशारे पर ही है।“ पत्रकार मित्र ने मेरी जानकारी में इज़ाफ़ा किया।
”सरकार किसी को तेईस महीने जेल में रखने के लिए पूरे सिस्टम को बाध्य कर सकती है?“ मैंने डरते हुए पूछा।
पत्रकार मित्र ठहरकर बोले, “सरकार कुछ भी कर सकती है भाईसाहब।“, पत्रकार मित्र का स्वर गंभीर हो गया।
मैंने फिर पूछा, ”सरकार कुछ भी कर सकती है तो अब ये ज़मानत कैसे मिल गई।“
”ये सब राजनीति के खेल हैं भैया, सरकार जब चाहे उठा ले, जब चाहे छोड़ दे। आज ज़मानत मिल गई, कल ज़रूरत हुई तो फिर उठा लेंगे।“ पत्रकार महोदय बेपरवाह होकर बोले।
मैंने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा, “जिसे आप खेल कह रहे हैं, वह दरअस्ल सिस्टम से खिलवाड़ है।“
सुनकर पत्रकार महोदय की हँसी छूट गई, ”आप जिसे सिस्टम समझते हैं ना चिराग़ भाई, उसी का नाम सरकार है।“
✍️ चिराग़ जैन
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एक समय था
जब मीडिया वाले भी सच बोलते थे
सरकारी घोषणाओं की कलई खोलते थे
फिर हर तरफ बस एक ही तस्वीर छा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
विश्वास करो भाईसाहब
पैट्रोल पंप पर सिर्फ़ ईंधन का व्यापार होता था
फिर आ गई भाजपा
अब वहाँ भी साहिब का प्रचार होता था
ईडी और सीबीआई
लोकतंत्र के सिपाही थे
अपराध और भ्रष्टाचार के लिए तबाही थे
फिर आ गई भाजपा
अब इनके रिमोट ख़ुद जिल्ले-इलाही थे
जो हमसे पंगा ले
उसी को रगड़ दो
कैसे भी करके उस पर एक चार्जशीट जड़ दो
बाद में कोर्ट में डाँट पड़ती हो
तो पड़ने दो
विपक्ष को जेल में सड़ने दो
ख़ुद भाजपा के कार्यकर्ता
सारी ज़िन्दगी मेहनत करते थे
कि कभी तो उनके भी झंडे तनेंगे
आडवाणी जी को उम्मीद थी
कि एक दिन वो कुछ बनेंगे
फिर देश में भाजपा आ गई
सारी उम्मीदों पर पानी फिरा गई
पहले रेलमंत्री रेल का उद्घाटन करते थे
विदेश मंत्री विदेशों में विचरते थे
फिर हर मंत्रालय की योजनाओं पर
एक ही तस्वीर छप-छपा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
मंदिर, पद्मावत जैसे मुद्दे छाने लगे
महँगाई को विकास बताने लगे
रोज़गार, ग़रीबी जैसे मुद्दों को
गाय माता चबा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
पहले उद्योगपतियों के टैक्स के पैसे से
सरकार भरती थी घाटा
लेकिन फिर लोकहित को करके टाटा
सरकारी कंपनियाँ
उद्योगपतियों की जेब में समा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई।
आते हुए जो सड़क बनी थी
वो जाने से पहले ही लड़खड़ा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
संसद लीक, पेपर लीक
एयरपोर्ट की छत धड़ाम
खिलाड़ी, डॉक्टर, किसान सड़क पर
अधबने मंदिर में श्रीराम
करोड़ों की मूर्ति ध्वस्त
साहिब फोटो खिंचवाने में मस्त
दो-दो इंजन के बाद भी
ट्रेन पटरी को ठेंगा दिखा गई
कमाल ही हो गया
इस देश में भाजपा आ गई
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह व्यवस्था शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। अब धनपशु और लाभासुर नागरिकों को प्रताड़ित करने आते थे, तो व्यवस्था उनके प्रयासों को विफल कर देती थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए लाभासुरों ने व्यवस्था की घेराबंदी में भ्रष्टकीट छोड़ दिए और धनपशुओं ने जगह-जगह रिश्वत का गोबर करके व्यवस्था की धरती में दीमक प्रविष्ट करवा दी। भ्रष्टकीटों ने व्यवस्था के अस्त्र-शस्त्रों को नपुंसक बना दिया और दीमकों ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया। इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुए लाभासुरों और धनपशुओं ने व्यवस्था के भीतर अपने प्रतिनिधियों को घुसा दिया। करत-करत अभ्यास के… ये प्रतिनिधि नियामक बन गए और इन्होंने पूरी व्यवस्था को धनपशुओं और लाभासुरों के पक्ष में नागरिकों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अब जो नागरिक, धनपशुओं और लाभासुरों को अपना रक्त पीने से रोकता था, उसे विकास-विरोधी कहा जाने लगा। जिसने दया की गुहार की, उसे व्यवस्थाद्रोही कहा जाने लगा।
व्यवस्था ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके नागरिकों के हाथ-पैर बांधकर लोभारण्य में फेंक दिया और नागरिकों को यह आदेश दे दिया कि जब कोई तुम्हारा रक्त पीने आए तो प्रतिकार करके उसका अपमान न करना। बल्कि हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहना – ‘हमारा लोकतन्त्र महान!’
✍️ चिराग़ जैन