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परवीन बॉबी

22 जनवरी 2005 को शाम के बुलेटिन में ख़बर आई की दक्षिणी मुम्बई के एक फ्लैट से परवीन बॉबी का शव बरामद हुआ है। समाचार वाचक ने बताया कि परवीन बॉबी की मौत के दो दिन बाद पुलिस ने उनका शव बरामद किया।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि उस दिन वह समाचार बुलेटिन मेरे भीतर एक सिहरन पैदा कर गया था। मैं देर तक यह सोचता रहा कि जिन सितारों को दूर से देखकर हम रोमांचित होते हैं उनके भीतर का भयावह अकेलापन उनके जीवन को किस हद्द तक असह्य बना देता है।
एक अदद ज़िन्दगी अनबूझ पहेली की तरह दुनिया से विदा हो गयी, और इस भयावह सन्नाटे में अचानक खुसर-फुसर की आवाज़ें सरसराने लगीं। किसी ने कहा कि वह शराब बहुत पीती थी इसलिए किडनी फेल हो गयी। किसी ने कहा कि डैनी के प्यार में पागल होकर मर गयी। किसी ने अमिताभ बच्चन से नाम जोड़ा तो किसी ने महेश भट्ट से। किसी ने कबीर बेदी की दीवानी बताया तो किसी ने कहा कि काम मिलना बंद हो गया था इसलिए भूखी मर गयी।
कनबतियाँ चटखारे लगाती रहीं और फिल्मी ग्लैमर के चरम को छूकर लौटी एक नायिका अपने भोगे हुए सच को अपनी पलकों में मूंदे हुए दुनिया से रुख़सत हो गयी। उस दिन मैं बहुत देर तक उदास रहा था। आज तक पर देखी वो खिलखिलाती सूरत देर तक मेरे ज़ेहन में ठहाका मारकर हँसती रही और मैं उसके ठहाकों की व्यंजना में संवेदना की कराह को देर तक सुनता रहा।
उस दिन से मैंने किसी भी सामाजिक व्यक्ति की निजता में झाँकना बन्द कर दिया। उस दिन के बाद मैंने जाना कि फलों से लदा हुआ हर वृक्ष अपनी जड़ों में दमघोंटू उमस से घिरा होता है।
आज बस यूँ ही तारीख़ पर निगाह पड़ी तो याद आ गया वह एहसास जो मैंने एक क्षण में उस अभिनेत्री के साथ जी लिया था। एक ऐसी अभिनेत्री के साथ जिससे मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, जिससे मैं कभी मिला नहीं था…
लेकिन यह एहसास मुझे आज भी हिला देता है कि जिस दुनिया के मनोरंजन के लिए उसने अपने आँसुओं पर खिलखिलाहट का मेकअप पोत लिया था, उस दुनिया ने उसकी मौत को भी गॉसिप की थाली में रखकर मिर्च-मसाला लगाकर यूज़ कर लिया।

✍️ चिराग़ जैन

जनरल विपिन रावत की शहादत

भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन

अनवरत साधना

कवि-सम्मेलन करते हुए दो दशक बीत गये, इन दो दशकों में जिन लोगों को पूंजी की तरह कमाया, उनमें से एक नाम है श्री अमीरचन्द जी का। यह नाम मेरे जीवन में एक ऐसा अध्याय है, जिससे मैंने समर्पित होकर अनवरत साधनारत रहना सीखा। क्रोध तथा मान-अपमान के चिन्तन से विलग रहते हुए अनवरत सामाजिक जीवन कैसे जिया जाता है, यह मैंने अमीरचन्द जी से सीखा।
उनके साथ बिताये हर पल में मैं किसी पाठशाला से गुज़रने जैसा महसूस करता रहा। आज अचानक मेरे जीवन की यह जीवन्त पाठशाला हमेशा के लिये बन्द हो गयी। उफ़! यह अहसास ही कितना हृदय-विदारक है कि अब अमीरचन्द जी कभी नहीं मिलेंगे। खाने की टेबल से लेकर प्रवास तक, उनके पास सुनाने के लिए हमेशा कोई न कोई क़िस्सा ज़रूर होता था। उस क़िस्से की भूमिका बनाते हुए वे एक ब्लॉग का ज़िक्र करते थे कि मेरा एक ब्लॉग है, ‘मेरा गाँव मेरा देश’…. एक दिन मैंने इंटरनेट पर ख़ूब सर्च किया लेकिन मुझे अमीरचन्द जी का ऐसा कोई ब्लॉग नहीं मिला। बाद में पता चला कि जब कोई बैठक या बातचीत विषय से भटकने लगती थी, तो उसे वापस विषय पर लाने के लिए वे इस काल्पनिक ब्लॉग का सहारा लेते थे। ऐसा कोई ब्लॉग न कभी था, न होगा। और जिन क़िस्सों को वे सुनाते थे, वे वहीं उपजकर वहीं समाप्त भी हो जाते थे।
अनुभवों का एक पूरा ग्रंथ थे अमीरचन्द जी। सुबह, दोपहर, रात… हमेशा कार्यरत। जैसे ज़िन्दगी के एक-एक पल को सदुपयोग कर लेने की शर्त लगा रखी हो। …अब वे निष्क्रिय हैं।
उन्हें याद करते हुए आज आँखें भीग गयी हैं। अनेक विषयों पर मेरा उनसे मतभेद रहता था, लेकिन फिर भी वे किसी श्रेष्ठ अभिभावक की तरह हमेशा मुझे अपने साथ कर लेते थे। मैं कभी उन्हें बता ही नहीं पाया कि मैं उनसे प्रेम भी करता हूँ और सम्मान भी।
मई-जून के बाद से उनसे मिला नहीं था…. और अब कभी मिल भी नहीं पाऊंगा।
आज डॉ. संध्या गर्ग की एक क्षणिका अमीरचन्द जी सरीखे व्यक्तित्व पर सटीक जान पड़ती है-
किसी ने बताया
कि आज शाम को
उन्होंने अन्तिम साँस ली
मैंने सोचा-
‘चलो,
उन्होंने साँस तो ली।’
✍️ चिराग़ जैन

वो सुबह कभी न आए!

उस दिन सुबह जब आँख खुली तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। मोबाइल पर आदित्य जी की मृत्यु का समाचार था। तब सोशल मीडिया इतना एक्टिव नहीं था। सो, परस्पर फोन से ही सूचनाएँ मिल पाती थीं। कुछ कवियों को फोन मिला तो पता चला कि दुनिया लुट चुकी है। रात को जो कवि-कुनबा उत्सवों की रौशनी में नहाया हुआ था, अब उसके आंगन में मातम पसरा है।
टेलिविज़न पर न्यूज़ चैनल खोला तो वहाँ भी शोक ही शोक दिखा। कहीं हबीब तनवीर साहब की श्रद्धांजलि चल रही थी तो कहीं देर रात घटी इस दुर्घटना की रपट प्रसारित हो रही थी। प्रकृति हम मनुष्यों के सुख-दुःख से हमेशा स्वयं को बचाए रखती है। हम ज़मीन में धँसे जा रहे थे, और सूरज रोज़ की तरह अंगारे बरसाता हुआ ऊपर चढ़ रहा था।
दिल्ली, बैतूल, शाजापुर… सबके चेहरे लटक गये थे। एक जहाज़, हास्य के शिखर को बांधकर दिल्ली ला रहा था, तो उधर पंजाब से बैतूल पहुँचनेवाले एक हवाई जहाज में क्रन्दन सवार था। एक मातम भोपाल से बैतूल जा रहा था, तो दूसरी एम्बुलेंस शाजापुर की नम आँखों की दर्शनेच्छा को लिए सड़क पर दौड़ रही थी। उधर ओम भाई अस्पताल में मल्टीपल सर्जरी करवाते हुए अर्द्धमृत्यु में जा चुके थे।
दिल्ली में जब आदित्य जी का शव आया तो मालवीय नगर श्मशान घाट के द्वार पर मैंने अल्हड़ जी को देखा। उनकी देह में पीड़ा, आँखों में आँसू और होंठों पर बहुत गहरा मौन था। मुझे याद है कि किसी छले गये व्यक्ति की भाँति वे श्मशान के बाहर ही एक चबूतरे पर बैठ गये थे। उनकी गर्दन नीचे झुक गयी थी और मन ही मन किसी बात पर अस्वीकृति देते हुए नकारात्मक मुद्रा में हिल रही थी।
उधर मुखाग्नि से पूर्व कुछ कवियों ने आदित्य जी के अंतिम दर्शन की इच्छा प्रकट की तो बड़े लोगों ने मना कर दिया। दुर्घटना के कारण चेहरा देखने लायक नहीं बचा था। ठहाकों के ऋषि को चिता पर लिटाकर जब श्मशान से बाहर निकले तो हर आँख नम थी।
उधर बैतूल और शाजापुर ने पूरे शहर में पुष्पवृष्टि करके अपने रचनाकारों को विदा किया। उधर अल्हड़ जी अस्पताल में भरती हो गये थे और ओम व्यास ओम जी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे थे। आदित्य जी का शोक पूर्ण होने से पूर्व ही अल्हड़ जी चले गये। पीड़ा पर एक परत और चढ़ गयी। श्रद्धांजलियों, अंत्येष्टियों और शोक सभाओं के इस दौर से उबर पाते कि तब तक ओम भाई भी विदा हो गये।
…आज एक युग बीत गया उस अशुभ काल का। लेकिन अभी तक उस दौर को याद करके मन सिहर उठता है। मुझे आज भी लगता है कि साँची से भोपाल आनेवाली उस सड़क पर अभी कोई गाड़ी दौड़ती हुई आएगी लेकिन आगे खड़े ट्रॉले को देखकर उसके ब्रेक लग जाएंगे…!

✍️ चिराग़ जैन

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