Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
यह समय अगर गुज़र भी गया तो इसके बाद दुनिया वैसी ही होगी जैसा नादिरशाह के आक्रमण के बाद दिल्ली का लालकिला था या जैसा महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर था। जिनके होने से सब कुछ अच्छा लगता था, वो अपने इस दौर में हमसे दूर चले जा रहे हैं। हर आँख नम है, हर आंगन में मातम है; हर श्मशान भभक रहा है। इन सबके बिना दुनिया बची भी तो उंगलियों के बिना सितार का करेंगे क्या? अधर ही न रहेंगे तो वंशी से सुर नहीं, कराह निकलेगी।
राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, कला, साहित्य, संगीत, अभिनय, अध्यात्म… कौन-सा ऐसा गलियारा है जहाँ से कोई जनाज़ा न निकला हो। अल्लाह के बंदे हों या राम के वंशज; महावीर के अनुयायी हों या नानक के प्यारे; सब अपनी-अपनी आस्था की देहरी पर घुटने टेक रहे हैं; लेकिन किसी आसमान से कोई मदद नहीं उतर रही।
वो रात-रात भर के जलसे; वो संगीत की लहरियाँ; वो ढोल-नगाड़े; वो शहनाइयाँ; वो उत्सव; वो रथयात्राएँ; वो प्रभात फेरियाँ, वो मॉर्निंग वॉक, वो ईवनिंग क्लब्स, वो किटी पार्टियाँ… यह सब कुछ दुनिया में फिर से लौट पाएगा या नहीं इसका सटीक उत्तर कोई नहीं दे पा रहा।
सबके मन में एक अजीब-सा भय घर कर रहा है। सब एक अनचाही आशंका को निश्चित मान चुके हैं; लेकिन विध्वंस के इस खौफ़नाक सन्नाटे में यदि जीवन का संगीत बजाने की कोशिश जारी रही तो एक दिन सन्नाटे को चहल-पहल के आगे आत्मसमर्पण करना ही होगा।
जो लोग छूट रहे हैं उनके अन्तिम क्षणों में हमारी जिजीविषा यह आश्वस्ति दर्ज करेगी कि यह संसार बचा रहेगा। उनकी लिखी कविताएँ, उनके बनाए राग, उनकी सजाई कलाकृतियाँ एक दिन फिर से इस संसार का सौंदर्य बढ़ाने के काम आएंगी।
इस सब सृजन को जीवित रखने के लिए हमें तब तक हिम्मत बनाए रखनी होगी जब तक इस संसार में जीवन की एक भी निशानी शेष है। हमें यह नहीं भूलना होगा कि उन रचनाकारों को श्रद्धांजलि देते हुए हमने बार-बार लिखा है कि दद्दा! आप अपनी रचनाओं में हमेशा जीवित रहोगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
समय का जो चेहरा इस समय यह विश्व देख रहा है, उसकी मनुष्य ने कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन समय, मनुष्यता का जो आचरण इस समय देख रहा है, उसकी समय ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी!
ऐसा लग रहा है कि कोई हाथ से सब कुछ छीने लिए जा रहा है। जिनके साथ रोज़-रोज़ यात्राएँ कीं, जिनके साथ रातें काली कीं, जिनको दद्दा कहा, जिनसे दद्दा सुना… वो यकायक हमसे किसी ने छीन लिये। और हम इतने लाचार की जिनकी अटैची उठाई उनको आखि़री बार कंधा भी न दे सके! हथेली में रेत की चमकीली चुभन भी पसीज कर पिघल चुकी है। देह का रोम-रोम शोकग्रस्त है। मन पथरा गया है। और मैं अपनी संवेदनाओं को मौन की शिला में दुबकाए अहल्या मुद्रा में यह सोच रहा हूँ कि मेरी नियति में यूँ ही लाचार खड़े होकर ख़ुद को ख़ाली होते देखना लिखा है अथवा मेरे भाग्य में इन तस्वीरों में शामिल होकर मुस्कुराना तय है। 3 अप्रेल को छत्तीसगढ़ में एक कवि-सम्मेलन में मुझे राजन जी के साथ जाना था, कोरोना के कारण वह कार्यक्रम कैंसिल हुआ तो राजन जी का फोन आया कि यह तो गया, लेकिन अपन जल्दी ही मिलेंगे। …दद्दा! झूठ बोल गए आप मुझसे। अब हम कभी नहीं मिलेंगे। उस दिन मैं बहुत देर तक रोता रहा था दद्दा! उस दिन मुझे दिन भी अंधियारा लगता रहा था। कमलेश द्विवेदी जी से बहुत अधिक संवाद नहीं था, लेकिन मेरी फेसबुक पोस्ट पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी लगभग आती ही थी। यदा-कदा फोन करके भी समालोचना करके आशीर्वाद दे देते थे। आप भी चले गए यूँ ही…! आखि़री बार टोका भी नहीं, सराहा भी नहीं। समीक्षा विशाल जी का गीत ‘कविग्राम’ में छपा तो आपने साधुवाद का फोन किया था। अब न आप हैं, न समीक्षा जी…! और कुँअर दा आप…! अभी तो बता रहे थे कि ठीक हो रहा हूँ। निश्चिंत से हो गए थे हम सब। लेकिन दुनिया भर की चिंताओं पर प्यार के छींटे देकर कैसे चुपचाप चल दिये…! यह भी कोई व्यवहार हुआ! आप तो ऐसे न थे। आप तो सामाजिक व्यवहार में निष्णात थे। आप तो किसी कवि सम्मेलन से भी बिना बताए नहीं जाते थे। आप तो किसी के निःशुल्क निमंत्रण को भी इस संकोच में मना न कर पाते थे कि उसका दिल दुःखेगा…! आज क्या हो गया दद्दा! आज सबको रोता छोड़ गए। इस समय तो आपके इस कुनबे को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी कुँअर दा! छोटे-छोटे फूल से बच्चे इस दिवंगत सूची में छापते हुए कलेजा दो टूक हो गया है। आह! इन सबसे तो अभी काफी व्यवहार करना था। लड़ना था, स्नेह करना था… कभी-कभी डाँटना भी था! कुछ न हो सका। मृत्यु के इस चक्रवात ने नन्हें-नन्हें फूलों को भी नहीं बख्शा! हमें चुप कराने मत आना… क्योंकि हम रो नहीं रहे हैं… हम जड़ हो गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे।
बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को हवा दी गई। कोरोना को ढाल बनाकर दूसरी स्टेट के पुलिस अधिकारी को क्वेरेन्टीन कर दिया गया। फिर सीबीआई, फिर नारकोटिक्स, फिर रिया की गिरफ़्तारी, फिर कंगना राणावत, फिर पूरे बॉलीवुड का ड्रग्स एंगल, फिर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश लाने की बात! पोस्टमार्टम रपट पर संदेह करके पोस्टमार्टम रपट का पोस्टमार्टम कराया गया। जिन्होंने सुशांत को अपने धर्म का विरोधी बताया था, उन्होंने ही बिहार में सुशांत राजपूत के चित्र दिखाकर वोट मांगे। और इतने सब ड्रामे के बाद सीबीआई को आत्महत्या के एंगल से जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया।
कहीं कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटती है तो राजनीति की आँखों में आँसू नहीं, चमक आती है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार हो तो भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञ ख़ुश हो गए कि योगी सरकार को घेरने का मौक़ा मिल गया। अलवर में बलात्कार हो गया तो भाजपा ने राहत की साँस ली कि अब जब कोई हाथरस की बीन बजाएगा तो हम अलवर का नगाड़ा पीट कर उसकी आवाज़ को दबा देंगे।
विश्वास कीजिये, ये सब घटनाएँ राजनीति के लिये ‘अवसर’ से अधिक कुछ नहीं हैं। आज पाँच पुलिसवाले सस्पेंड कर दिए गए, ताकि हम सरकार की वाहवाही कर सकें। हम यह कभी नहीं समझेंगे कि जब तक राजनीति के रिमोट पर उंगली नहीं लगती, तब तक न तो पुलिस हिलती है न ही प्रशासन! डीएम का निलंबन भी हो जाए तो रिमोट पर उंगलियाँ तो वही रहेंगी।
इस हंगामे के बीच हम पुलिस के रवैये पर इतने फोकस्ड हो गए हैं कि अपराधियों पर किसी का ध्यान ही नहीं है। और यह वही पुलिस है जिसकी गाड़ी पलटने पर हुए एनकाउंटर की घटना पर उसके गुण गाए जा रहे थे। उन्नाव हो या जयपुर; दिल्ली हो या मुम्बई; राजनीति, मुद्दों की खरपतवार में सत्ता का फल ढूंढ ही लेती है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब ये सब राजनैतिक दल खरपतवार में घुसकर सत्ता का फल ढूंढ रहे होते हैं तब हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि ये खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह इनकी आपसी खेल भावना है कि हारनेवाला भी कभी यह भेद नहीं खोलता कि खेत में दरअस्ल हुआ क्या था।
जनता, इस राजनैतिक खिलवाड़ के लिए आपस में दुश्मनी पालने की बजाय, यदि केवल मौन रहना भी शुरू कर दे तो राजनीति के हाथों देश का छला जाना बंद हो जाएगा। क्योंकि जब जनता आपस में लड़ने लगती है, तो राजनीति के पासों की आवाज़ सुनाई नहीं देती।
✍️ चिराग़ जैन
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ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
शायरी का एक जज़्बा आज ख़ामोश हो गया है। हिंदी कवि-सम्मेलन को उर्दू मुशायरों से जो चंद तोहफ़े अता हुए, उनमें से एक आज रुख़सत हो गया। कितने ही खट्टे-मीठे वाक़यात आँखों के सामने तैर रहे हैं। मंच पर उनका जलवा सबने देखा है, लेकिन मंच के इतर जो उनका हास्यबोध था, जो उनकी बेबाक़ी थी उससे सिर्फ़ उनके सहकर्मी ही वाक़िफ़ हैं।
हमने शायरी के इस सितारे को बहुत क़रीब से देखा है। उनका अक्खड़पन, उनकी शरारतें और उनका बेलौस लहजा उनके क़िरदार पर ख़ूब फबता था। जब कभी मंच पर उन्हें महसूस होता था कि उन्हें ढंग से नहीं सुना जा रहा है तो वे अपनी अदा से डाँट-डपटकर पूरी कोशिश करते थे, लेकिन जैसे ही उन्हें यह आश्वस्ति हो जाती थी कि यहाँ कोशिश करना बेकार है, तो वे बेहद ख़ूबसूरती से अपनी पारी अचानक समाप्त करके बैठ जाते थे।
उनकी इसी आदत से अनुमान लगा रहा हूँ कि ज़िन्दगी के इस मुशायरे में उन्होंने मौत की हूटिंग को काबू करने की भरपूर कोशिश की होगी लेकिन जब तमाम कोशिशें बेकार होती दिखी होंगी, जब उनका दिल टूट गया होगा तो पूरी शानो-शौक़त के साथ मौत के गले में बाँहें डालकर चलते बने।
…मैं उनकी इस बेईमानी का कभी समर्थक नहीं रहा लेकिन इस बेईमानी की अदा इतनी ख़ूबसूरत होती थी कि मन ही मन अच्छी भी लगती थी। पर आज, मुआफ़ करना राहत भाई! …आज ये बेईमानी अच्छी नहीं लगी।
जब अस्पताल में भरती होने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर मैसेज पोस्ट किया तो उनके तेवर उसी जिंदादिल शाइर के तेवर थे, जिसका बेलौस लहजा लोगों को आसानी से हजम नहीं होता था। उनकी शायरी कितने ही लोगों के दिल की धड़कन रही, लेकिन आज वे अपनी ही धड़कन को कोई शेर सुनाकर वापिस न ला सके।
✍️ चिराग़ जैन