Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
मोदी जी की लहर चल रही, योगी की आंधी आई
भूचालों की धमकी लेकर घूम रहे राहुल भाई
बिना बात के उठा बवंडर देते हैं हातिमताई
ये सब देखा तो तूफ़ां की ईगो भी कुछ टकराई
राजनीति ने आफत मचा ली, सुनामी उठा ली
तूफान हुआ तंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो
हमने तूफान को सचिन तेंदुलकर बना दिया :-
ट्रोलिंग की आंधी में दो दिन तूफानों का होल्ड हुआ
पब्लिक का कंसन्ट्रेशन भी वेदर के संग मोल्ड हुआ
पंखे का झोंका भी उस दिन तूफानों में सोल्ड हुआ
प्रेशर में आकर बेचारा ज़ीरो रन पर बोल्ड हुआ
ऐसी कूकर की सिटी निकाली, हवा हुई सवाली
चेहरे का उड़ा रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो
ट्विटर फेसबुक पर ट्रोलिंग का ऐसा अद्भुत खेल हुआ
इस्कूलों की छुट्टी हो गई इतना रेलमपेल हुआ
राई से तूफान बेचारा पर्वत तक इस्केल हुआ
दुनिया भर में शोर मचा पर दिल्ली आकर फेल हुआ
उसने केजरी से सीख यह पा ली, माफ़ी की धुन ली
लौटा यूँ ही बैरंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो
जनता के सेवक तो कर्नाटक दर्शन पर निकल गए
अन्ना जैसे वर्कर धरने और अनशन पर निकल गए
युवा अलीगढ़ में जिन्ना के निष्कासन पर निकल गए
डिक्लेअर करने वाले ही पर्यटन पर निकल गए
हमने आंधियों की हेकड़ी निकाली, यूँ पिकनिक मना ली
उठने न दी उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो
ढंग से आ भी जाता तो क्या पूँछ पाड़ता बेचारा
धूल सने सिस्टम की कितनी धूल झाड़ता बेचारा
भ्रष्टतंत्र के आख़िर कितने पृष्ठ फाड़ता बेचारा
उजड़े व्यापारों को और कितना उजड़ता बेचारा
उसने अपनी दिशा बदल डाली, मानवता निभा ली
भुला दो ये प्रसंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी हैं अब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
पिछला भी सप्ताह महज कानों कानों में बीत गया
कर्नाटक के नाटक में और हंगामों में बीत गया
सोनम की शादी के कुछ फिल्मी गानों में बीत गया
जिन्ना से जो वक़्त बचा था, तूफानों में बीत गया
कभी रैली में खिल्ली उड़ा ली, या खेला गाली गाली
ज़माना हुआ दंग भाइयो
डाँट डपट कर लोकतंत्र में लोग नहीं पाले जाते
गुंडागर्दी से सिस्टम के दोष नहीं टाले जाते
यदुरप्पा जी यूँ सत्ता के दीप नहीं बाले जाते
हाथ-पाँव बंध जाते हैं तो वोट नहीं डाले जाते
ढूंढो अपने दिमाग़ की भी ताली, चलाओ न दुनाली
उल्टी पड़ेगी जंग भाइयो
एक रोज़ कोई अधिकारी टीवी पर बड़बड़ा दिया
राई को बिन बात अचानक पर्वत जितना बढ़ा दिया
चैनल वैनल एफबी शेफबी क्या से क्या गुड़मुड़ा दिया
सच बतलाओ इस अंधड़ में कौन सा मुद्दा उड़ा दिया
हाय आंधियो की सूचना भुना ली, हवाएं बेच डालीं
ये कैसे हैं लफंग भाइयो
कसमें खाने से योद्धा का धीर टूटने लगता है
लक्ष्य भटक जाता है और उद्देश्य छूटने लगता है
कांग्रेस की फेयरवेल के मनसूबे मत पालो जी
पेड़ जहाँ से काटोगे वो वहीं फूटने लगता है
ऐसी चोटी में गाँठ क्यों लगा ली, कसम कोई खा ली
राहुल को किया तंग भाइयो
तुम निश्चय कर लेते तो फिर आड़ लगाना मुश्किल था
दुश्मन की जय कहने वालों का बच पाना मुश्किल था
देश, राज्य, मंत्रालय, कुलपति सब पर राज तुम्हारा है
फिर भी क्योंकर जिन्ना की तस्वीर हटाना मुश्किल था
बिना बात क्यों ये बात भी बढ़ा ली, ये है जनाबे आली
तुष्टिकरण का रंग भाइयो
वे बोले कि कर्नाटक में बहुमत इनका टच होगा
राहुल गांधी का भाषण अब सीरियसली टू मच होगा
मौसम का अनुमान तलक झूठा साबित हो जाता है
ऐसे में संजय राउत का दावा कैसे सच होगा
देखो ये तो पुलाव हैं खयाली, बिना हथेली ताली
ये बातों की है जंग भाइयो
सारे यार तुम्हारे उनके घर जा बैठे राहुल जी
कई राज्य अपनी ज़िद में तुम निपटा बैठे राहुल जी
कांग्रेस की सारी इज़्ज़त लुटवा बैठे राहुल जी
सिद्धरमैया भी मोदी के गुण गा बैठे राहुल जी
अपने हाथों से लुटिया डुबा ली, बजाते रहो ताली
चाकू पे लगा ज़ंग भाइयो
पिछला भी सप्ताह महज कानों कानों में बीत गया
कर्नाटक के नाटक में और हंगामों में बीत गया
सोनम की शादी के कुछ फिल्मी गानों में बीत गया
जिन्ना से जो वक़्त बचा था, तूफानों में बीत गया
कभी रैली में खिल्ली उड़ा ली, या खेला गाली गाली
ज़माना हुआ दंग भाइयो
डाँट डपट कर लोकतंत्र में लोग नहीं पाले जाते
गुंडागर्दी से सिस्टम के दोष नहीं टाले जाते
यदुरप्पा जी यूँ सत्ता के दीप नहीं बाले जाते
हाथ-पाँव बंध जाते हैं तो वोट नहीं डाले जाते
ढूंढो अपने दिमाग़ की भी ताली, चलाओ न दुनाली
उल्टी पड़ेगी जंग भाइयो
एक रोज़ कोई अधिकारी टीवी पर बड़बड़ा दिया
राई को बिन बात अचानक पर्वत जितना बढ़ा दिया
चैनल वैनल एफबी शेफबी क्या से क्या गुड़मुड़ा दिया
सच बतलाओ इस अंधड़ में कौन सा मुद्दा उड़ा दिया
हाय आंधियो की सूचना भुना ली, हवाएं बेच डालीं
ये कैसे हैं लफंग भाइयो
कसमें खाने से योद्धा का धीर टूटने लगता है
लक्ष्य भटक जाता है और उद्देश्य छूटने लगता है
कांग्रेस की फेयरवेल के मनसूबे मत पालो जी
पेड़ जहाँ से काटोगे वो वहीं फूटने लगता है
ऐसी चोटी में गाँठ क्यों लगा ली, कसम कोई खा ली
राहुल को किया तंग भाइयो
तुम निश्चय कर लेते तो फिर आड़ लगाना मुश्किल था
दुश्मन की जय कहने वालों का बच पाना मुश्किल था
देश, राज्य, मंत्रालय, कुलपति सब पर राज तुम्हारा है
फिर भी क्योंकर जिन्ना की तस्वीर हटाना मुश्किल था
बिना बात क्यों ये बात भी बढ़ा ली, ये है जनाबे आली
तुष्टिकरण का रंग भाइयो
वे बोले कि कर्नाटक में बहुमत इनका टच होगा
राहुल गांधी का भाषण अब सीरियसली टू मच होगा
मौसम का अनुमान तलक झूठा साबित हो जाता है
ऐसे में संजय राउत का दावा कैसे सच होगा
देखो ये तो पुलाव हैं खयाली, बिना हथेली ताली
ये बातों की है जंग भाइयो
सारे यार तुम्हारे उनके घर जा बैठे राहुल जी
कई राज्य अपनी ज़िद में तुम निपटा बैठे राहुल जी
कांग्रेस की सारी इज़्ज़त लुटवा बैठे राहुल जी
सिद्धरमैया भी मोदी के गुण गा बैठे राहुल जी
अपने हाथों से लुटिया डुबा ली, बजाते रहो ताली
चाकू पे लगा ज़ंग भाइयो
वही पुरानी काठ की हांडी नहीं चढ़ेगी साहब जी
जनता अपने अनुभव से ही निर्णय लेगी साहब जी
कर्नाटक की हार देखकर इतना तो सीखे होंगे
अब जुमलेबाज़ी से जनता नहीं फँसेगी साहब जी
अपनी ख़ुद की फेयरवेल करा ली, अपनी ही मुंह की खा ली
हारे हो बड़ी जंग भाइयो
घर से उठवाने के दावे को भी त्राटक नहीं मिला
उन्हें सड़क पर लाने वालों को ख़ुद फाटक नहीं मिला
हिन्दू-मुस्लिम, लिंगायत, जिन्ना, तूफान, दलित, अगड़े
इतना सारा नाटक करके भी कर्नाटक नहीं मिला
ईवीएम ने भी राखी खुलवा ली, नज़र फेर डाली
ठगे गए दबंग भाइयो
सच मानो पहले से अब मैच्योर हो गई है जनता
कांग्रेस-बीजेपी में इग्नोर हो गई है जनता
पहले जैसी नहीं रही है, और हो गई है जनता
जुमलों से और ड्रामे से अब बोर हो गई है जनता
जीडीएस ले ले सत्ता की ताली, तुम बैठे रहो ठाली
अब बदलो अपने ढंग भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
त्रिपुरा में इक विप्लव अपनी सारी मर्यादा भूला
मोदी जी ने शी के संग फिर चाइना में झूला झूला
लालक़िले पर डालमिया के कब्ज़े का हल्ला-गुल्ला
राहुल को चैलेंज किया है पीएम ने खुल्लमखुल्ला
येदुरप्पा ने बुकिंग भी करा ली, शपथ रट डाली
कर्नाटक की है जंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
बिन मतलब के लंबे-लंबे भाषण पेल रहे हो तुम
छोटे बच्चों से भी बोगस दावे ठेल रहे हो तुम
समझ न आता आख़िर कैसे ख़ुद को झेल रहे हो तुम
कभी-कभी ऐसा लगता है घर-घर खेल रहे हो तुम
कभी बोलने की बाज़ियां लगा लीं, या शायरी सुना ली
उड़ती रही पतंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
देश फूँक कर अपनी कोठी जगमग ही तो करनी है
सिर्फ़ क्रीज़ पर टिके हुए कुछ ठक-ठक ही तो करनी है
तुम आपस में शर्त लगाकर टाइम पास करो अपना
क़ाग़ज़ देखो या मत देखो, बकबक ही तो करनी है
ये तो जनता है बड़ी भोली-भाली, बजाती रही ताली
बनी रही उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
जो चुप्पी साधे थे वो भी होंठ खोलना सीख गए
बीजेपी वाले दलितों का मोल तोलना सीख गए
ख़ुद मोदी जी ने माना है, अच्छे दिन तो आए हैं
कांग्रेसी मोदीशासन में झूठ बोलना सीख गए
कभी जातियों पे रोटियाँ पका लीं, कहीं पे बकी गाली
यूँ चढ़ता रहा रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
सब अपनी-अपनी कहते हैं, कौन बताओ होश में है
सिर्फ़ जीत जाने की इच्छा हर इक के उद्घोष में है
उसकी वैसी हरक़त जितना पैसा जिसके कोष में है
बीजेपी तो मस्ती में है, कांग्रेस आक्रोश में है
कहीं मावस में भी है दीवाली, कहीं पे जेब ख़ाली
ये वोट की है जंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
इस गर्मी में काॅमेडी का हीटर किसने आॅन किया
ये कहते हैं पाण्डव दल ने कौरव दल को फोन किया
चंद दिनों में टाॅप इन्होंने बकवासों का ज़ोन किया
दिल्ली ले जाकर भाई को जैसे-तैसे मौन किया
कभी पान की दुकान खुलवा ली, या गाय पलवा ली
ये कैसा नया रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
मनोरंजन पर भारी इस विप्लव के छक्के-चैके हैं
इस भाई ने दही-बड़े भी देसी घी में छौंके हैं
जब ज़ुबान चलती है तो फिर कौन जो उसको रोके है
नहीं डायना अच्छी लगती, ऐश्वर्या जी ओके हैं
जो दबी थी वो जी की कह डाली, यूँ आरज़ू निकाली
जवानी की उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क सब कुछ प्राइवेट हुए सर जी
हटी सब्सिडी गैस तेल के ऊँचे रेट हुए सर जी
लालक़िले के केअर टेकर मोटे सेठ हुए सर जी
हमें बताओ टैक्स के पैसे किनकी भेंट हुए सर जी
तुमने अपनी तो सेलरी बढ़ा ली, या रैलियाँ निकालीं
तमाशा करो बंद भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
मई 2014 में हमने अपना स्वाभिमान पाँच वर्ष के लिए एक कॉन्ट्रेक्टर को आशाओं की लीज़ पर दिया था। कॉन्ट्रेक्टर ने कॉन्ट्रेक्ट शुरू होने से पहले ही सपनों की बड़ी किश्त प्रत्येक भारतवासी को अदा भी की। हम उन सपनों की हुंडी को मन में दबाए हुए स्वाभिमान के लालकिले का विकास होने का इंतज़ार करते रहे। कॉन्ट्रेक्ट शुरू होते ही लालकिले के परंपरागत प्रवेश-पत्र बंद करके नए पत्रक छपवाए गए। हमें बताया गया कि इन नए पत्रकों के चलन से असामाजिक तत्वों का लालक़िले में प्रवेश असम्भव हो जाएगा। बाद में जब नए पत्रकों के बंडल लेकर असामाजिक तत्व लालक़िले के अंदर ही उनकी कालाबाज़ारी करते पकड़े गए तो कॉन्ट्रेक्टर ने शिकायतकर्ता को ही सुरक्षा में सेंध लगाने के ज़ुर्म में प्रतिबंधित करवा दिया। हम अपनी ही इमारत में प्रवेश के लिए कतारें बनाए खड़े रहे।
कुछ रोज़ बाद हमारे स्वाभिमान की प्राचीर पर कॉन्ट्रेक्टर के मित्र ने अपने मोबाइल फोन का विज्ञापन चिपका दिया। एक-एक मेहराब नए फोन के इश्तिहार से ढाँप दी गई। प्रचारकों ने बताया इन्हीं इश्तिहारों के पीछे विकास का कबूतर अंडे देगा। हम संतुष्ट हो गए।
एक दिन कॉन्ट्रेक्टर किसी विदेशी के साथ रिक्शा में बैठकर चांदनी चौक आया और मुनादी कर दी कि लालक़िले से चावड़ी बाज़ार होते हुए फतेहपुरी तक बुलेट ट्रेन दौड़ेगी। किसी ने हाथ जोड़कर पूछा कि चावड़ी बाजार में संकरी गलियों के कारण हाथठेला भी ठीक से नहीं निकल पाता। शिकायत सुनकर कॉन्ट्रेक्टर का पारा चढ़ गया। वे लताड़ते हुए गुर्राए- ‘तुम्हारा कभी भला नहीं हो सकता। हम बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं और तुम हाथ ठेले पर अटके हो।’ शिकायतकर्ता अपना-सा मुँह लेकर अपने ठेले पर बैठ गया और कॉन्ट्रेक्टर का रिक्शा रास्ते के हथठेलों को खदेड़ता हुआ लालक़िले में घुस गया।
आज ख़बर आई है कि कॉन्ट्रेक्ट समाप्त होने में डेढ़ साल बचा है और ठेकेदार ने स्वाभिमान की इमारत की बुनियाद को पाँच साल के लिए सबलैट कर दिया है। विकास का कबूतर सबलेटिंग के इसी कॉन्ट्रेक्ट के पीछे जा छुपा है। ज़्यादा हो-हल्ला न करना, नहीं तो विकास का कबूतर डर जाएगा और अंडे देने का प्रोग्राम टालकर पिकनिक मनाने विदेश चला जाएगा।
लेकिन भाईसाहब की निष्पक्षता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। डालमिया जैसे उपेक्षित उद्योगपति को कॉन्ट्रैक्ट देकर उन्होंने सिद्ध किया है कि खरबूजा किसी एक अम्बानी की बपौती नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
हाथी ने पेड़ के नीचे सो रहे चार चूहों को अपनी ताकत के मद में कुचल दिया। जंगल की पुलिस ने अदालत में हाथी पर मुक़द्दमा दायर किया। चूहों की औकात के मुताबिक़ मुक़द्दमा धीमी गति से चलता रहा और हाथी आराम से जंगल में ज़िन्दगी बसर करता रहा। इस बीच जंगल में चुनाव हुए और राजा के सिंहासन पर लकड़बग्गा बैठ गया।
हाथी ने मौक़ा देखते ही लकड़बग्गे से दोस्ती गाँठनी शुरू कर दी। वह एक शिष्ट नागरिक की तरह नवनिर्वाचित राजा के शपथग्रहण में समय से पूर्व खड़ा मिला। राजा ने जब भी कोई योजना या अभियान चलाया तो हाथी कार्यकर्ता की तरह ज़मीन पर लेट-लेटकर राजा के अभियान में भाग लेने लगा। इस बीच चूहोंवाले मुक़द्दमे के फैसले की घड़ी आ गई। सारे जंगल में चर्चा थी कि हाथी को फाँसी होगी। भयभीत हाथी ने राजा से अपनी वफ़ादारी का फल मांगा।
राजा ने चूहों की वोटिंग वेल्यू, हाथी की फेस टीआरपी और अपनी लोकप्रियता के ग्राफ़ का हिसाब लगाया और न्यायालय ने जादुई तरीके से सबूतों के अभाव में हाथी को निर्दाेष साबित कर दिया।
सारा जंगल देखता रह गया। अदालत की काफ़ी थू-थू हुई। दबे स्वरों में कुछ जानवरों ने राजा की भी निंदा की। राजा को महसूस हुआ कि इस मामले में हस्तक्षेप करके, उसने अपनी लोकप्रियता को हानि पहुँचाई है। राजा ने हाथी को बोला अब मुझसे मिलना-जुलना कुछ कम करो। अहसानमंद हाथी ने राजा की बात मान ली। अब हाथी राजा के किसी अभियान में दिखाई नहीं देता था।
इसी बीच हाथी का एक और पुराना पाप उघड़ आया। उसने सालों पहले खरगोशों के दो बच्चे मनोरंजन के लिए मार दिए थे। यह मुक़द्दमा भी अपनी कछुआ चाल से धीरे-धीरे टल रहा था। अब इसके फ़ैसले की घड़ी आ गई। हाथी ने पहले की तरह लकड़बग्गे से मिलने की कोशिश की लेकिन राजा के निर्देश की वजह से मुलाक़ात संभव न हो सकी। हाथी इस उम्मीद में बैठा रहा कि राजा अपने वफ़ादार को दोबारा वफ़ादारी का इनाम देगा।
उधर राजा ने फिर हिसाब लगाया। सबसे पहली बात तो यह कि तीन महीने बाद खरगोशिस्थान में चुनाव हैं। वहाँ खरगोशों के काफ़ी वोट हैं। खरगोश समुदाय वैसे ही लकड़बग्गे की सरकार से नाराज़ है। अगर हाथी को सज़ा हो गई तो खरगोशों की वोट लकड़बग्गे की पार्टी को मिल जाएंगी। फिर पिछली बार चूहोंवाले केस में हुए फैसले से जो इमेज डैमेज हुई थी, वह भी बैलेंस हो जाएगी। सारा गणित लगाकर लकड़बग्गा सो गया।
सुबह अदालत का फैसला आया। पूरे जंगल को उम्मीद थी कि हाथी को अधिकतम तीन साल की सज़ा होगी लेकिन अदालत ने हाथी को पाँच साल की सज़ा सुनाई।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जंगल में न्याय उसे कहा जाता है जिसके होने से लकड़बग्गे को ज़्यादा वोट मिल जाएँ। बाकी सब अन्याय है।
✍️ चिराग़ जैन