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छलना

मटक-मटक लट झटक-झटक; हिया- पट खटपट खटकाती है गुजरिया ठक-ठक-ठक खटकात नटखट मोरे हिवड़ा के पट, बतलाती है गुजरिया लाग न लपट, तज अंगना का वट झट जमना के तट, चली आती है गुजरिया लेवे करवट जब मन का कपट उस पल झटपट नट जाती है गुजरिया ✍️ चिराग़...

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली मटकिया मटकती कटि में दबात है गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है क्वारी पनिहारी लिए...

वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों हो गए हैं...

गुमान के असर से बचा

चलो किसी तरह मैं मुश्क़िले-सफ़र से बचा ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा ये दुनिया हर किसी पे उंगलियाँ उठाती है तू अपनी सोच को...

सुन्दरी

कारे-कारे कजरारे नैन तोरे प्यारे-प्यारे गीले-गीले लागत हैं नदिया के कूल से सौंधी-सौंधी खुसबू महकती है केसन में मानो अभी नहा के आई हो गोरी धूल से मस्तानी की दीवानी मुस्कान देख लें तो रोम-रोम खिले गुलदाऊदी के फूल से मीठी-मीठी बोली, मो से बोले तो मिठाई लागे औरन से बोले...
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