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मंच से मन तक कुछ अलग : डॉ. हरिओम पंवार

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा खोजना, अपनी अलग कहन तैयार करना और अपनी पठन्त के प्रभाव से अपनी विधा के नवागन्तुकों की महत्वाकांक्षा का लक्ष्य बन जाना किसी को ‘विशेष’ बनाता है। इसी वैशिष्ट्य का नाम है, डॉ. हरिओम पंवार।
मैं जब से कवि-सम्मेलन जगत् में प्रविष्ट हुआ हूं, तब से अब तक इनके लिए अनेक विशेषण और उपाधियां सुनने को मिलीं। किसी ने इन्हें ‘ओज का हिमालय कहा’ तो किसी ने ‘वीर रस का भीष्म पितामह’। किसी ने इन्हें ‘कवि-सम्मेलन की सफलता की गारण्टी’ कहा तो किसी ने ‘अग्नि की लपटों का शब्दानुवाद’। इन सब उपाधियों से सहमति प्रकट करते हुए मैं डॉ. हरिओम पंवार को एक ऐसे कवि के रूप में देखता हूं, जो जनमन की सबसे सटीक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं।
सामान्य-जन की चर्चा से जनमत का सबसे सटीक अनुमान सुन लेने की दक्षता हैं, डॉ. हरिओम पंवार। अख़बार की सुर्खियों में राजनीति का भविष्य टटोल लेने की दृष्टि का नाम है डॉ. हरिओम पंवार। हवा की दिशा देखकर देश की दशा भांप लेने का कौशल हैं डॉ. हरिओम पंवार।
उनकी इसी प्रतिभा ने उन्हें आधी सदी से भी अधिक समय से अनवरत अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बनाए रखा है। डॉ. हरिओम पंवार की कविताओं का यदि देश-काल-समय के मापदण्ड पर विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि वे हमेशा उस वृक्ष को सिंचित करते दिखाई दिए हैं, जिसमें सशक्त हो जाने की क्षमता हो। यही कारण है कि वे किसी भी मुद्दे पर सत्ता या विपक्ष के साथ खड़े होने की बजाय जनमन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
समकालीन विषयों पर लेखनी चलाना, तलवार की धार पर चलने से अधिक दुष्कर कार्य है। घट रही घटना पर कलम चलाने से यश मिलने की जितनी प्रबल संभावना होती है, अपयश की भी उतनी ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे में आलोचना से अक्षुण्ण रहकर आधी सदी का सामाजिक जीवन बिता देना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है।
डॉ. हरिओम पंवार के अमृत महोत्सव पर मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि स्वस्थ रहने का नुस्खा इस व्यस्त कवि की जीवनगाथा में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। सामाजिक जीवन जीते हुए सहयात्रियों के साथ मतभेद और कटुता के क्षण पूरी तरह समाप्त नहीं किये जा सकते। लेकिन इन क्षणों को डील करने के लिए जो सूत्र चाहिए, वह डॉ. हरिओम पंवार के पास नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। वे परस्पर व्यवहार में अपने किसी मनोभाव को अभिव्यक्त करने में लीपापोती करने में विश्वास नहीं करते। मन के भीतर कड़वाहट का विष निर्माण करने से बेहतर है, शब्दों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करके सहज हो जाया जाए।
यही कारण है कि उनके साथ यात्राएं करनेवाले जानते हैं कि वे जितनी जल्दी क्रुद्ध होते हैं, उतनी ही सरलता से क्रोध को बिसार भी देते हैं। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ की नीति का सबसे सटीक चित्रण कहीं मिलता है तो वह उनका आचरण है। किसी बात पर अड़ने की उनकी अवधि कुछ मिनिटों का दायरा कभी नहीं लांघती।
मैं डॉ. हरिओम पंवार जी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनके दीर्घायु और स्वस्थायु होने की कामना करता हूं। तथा एक युग का अमृतग्रंथ तैयार करने का विचार संजोनेवाले संपादन मण्डल के श्रम का अभिनंदन करता हूं।
✍️ चिराग़ जैन

सनक का साक्षात् धूमकेतु : डोनाल्ड ट्रम्प

डोनाल्ड ट्रम्प को देखकर मुझे उस खिलौने की याद आती है, जिसे चाबी भरकर ज़मीन पर छोड़ दिया गया है। जिसमें किसी ने सोलर बैटरी डाल दी है और अब यह खिलौना तब तक नहीं रुकेगा, जब तक दुनिया में परमानेंट सनसेट न हो जाए।
जिसने इस खिलौने का आविष्कार किया है, उसने इसके सिर में से ब्रेन और सीने में से हार्ट निकालकर, उन दोनों स्थानों पर भी ओवर-कॉन्फिडेंस का पाउडर भर दिया है। उनके इसी बायोलॉजिकल ढांचे का परिणाम है कि उन्होंने सोचने और महसूस करने में मानवीय सीमाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
ट्रम्प जीपीएस से रास्ता नहीं पूछते, बल्कि रास्ता, ट्रम्प से जीपीएस पूछता है। ट्रम्प सांस नहीं लेते, बल्कि सांस जीवित रहने के लिए ट्रम्प के नथुनों में घुसती है। ट्रम्प हवाईजहाज में नहीं उड़ते, बल्कि हवाईजहाज उड़ने के लिए ट्रम्प को अपने हृदय में विराजमान करता है। वह दिन दूर नहीं जब हवाईजहाज के पायलट अपनी कॉकपिट में ट्रम्प के फोटो पर माला-वाला चढ़कर जहाज उड़ाया करेंगे।
सामान्य इंसानों की तरह ट्रम्प की शिक्षा-दीक्षा भी सामान्य नहीं रही है। बल्कि उन्हें मास्टरजी एक खाली शीट दिया करते थे, जिस पर वे अपनी अलौकिक शैली में कुछ चीट-मकौड़े बना दिया करते थे। इसके बाद पूरी सृष्टि के जीव मिलकर उनकी इस लिपि को पढ़ने का प्रयास करते थे। ट्रम्प दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए, लेकिन उनकी उत्तरपुस्तिकाएं आज तक डीकोड नहीं की जा सकी हैं। संभव है उसी लिपि को डीकोड करने के उद्देश्य से नासा ने अंतरिक्ष में अपने स्टेशन बनाए हों, ताकि इस महान जीव के शिलालेखों को अन्य आकाशगंगाओं तक पहुंचाकर, उनका अर्थ समझा जा सके।
वे जो कुछ करते हैं, वह महान और ऐतिहासिक होता है। विश्व में सबसे बड़ा, विश्व में सबसे उंचा और विश्व में सबसे लम्बा उनके हर कार्य के साथ जुड़ जाता है। और यह बात तो दुनिया भी मानती है कि फेंकने के मामले में वे विश्व में सबसे लम्बी फेंकते हैं।
अपने कीर्तिमानों की लिस्ट बनाने के लिए वे घटनाओं के मोहताज नहीं हैं। उनसे जुड़कर छोटी से छोटी घटना भी महान हो जाती है। किसी दिन वे यह भी घोषणा कर सकते हैं कि वे विश्व में सबसे नीला कोट पहनते हैं या फिर वे पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो हंसते हुए आंखें बंद कर लेता है।
वे एक विराट पुरुष हैं। पूरी कायनात उनके आगे हाथ बांधकर उनसे पूछती रहती है, ‘मेरे बाप, आखिर तू चाहता क्या है।’ यह प्रश्न सुनकर वे अपने होंठों को उड़न-तश्तरी के आकार में फैला लेते हैं, उनकी आंखें मुंद जाती हैं, उनके हाथ-पैर थिरकने लगते हैं और वे परम-आनन्द की मुद्रा में नृत्यमग्न हो जाते हैं।
उनके मस्तिष्क को ठीक करने के उद्देश्य से जब कोई हवा का झोंका उनकी जुल्फ़ों के गहन जंगल में प्रवेश करता है, तो वे अपने सिर को ऐसे झटकते हैं कि हवा के झोंके गश खाकर गिर जाते हैं। समझ नहीं आता कि वे हवा से चिढ़कर ऐसा कर रहे हैं या फिर उन्हें आनन्द आ रहा है। अंततः हवा को सीधे पूछना पड़ता है, ‘हुज़ूर, कृपया स्पष्ट बताएं कि मैं चलूं या रुकूं?’
जब वे किसी की प्रशंसा का ट्वीट करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई लड़की, ब्याह से पहले, अपने होनेवाले ससुराल के विषय में अपनी सहेलियों को बता रही हो। ससुराल के लोग तो छोड़ो, ससुराल की गली के कुत्ते-बिल्लियों को भी श्रेष्ठ सिद्ध कर रही हो। लेकिन जब वे किसी की आलोचना का ट्वीट करते हैं, तो ऐसा लगता है कि ब्याह के बाद ससुराल से मायके लौटी लड़की अपनी सास और ननद को भर-भर कर गालियां दे रही हो।
हिटलर, मुसोलिनी, गद्दाफी और यहां तक कि तुगलक जैसे ऐतिहासिक सनकी भी ट्रम्प की प्रतिभा के आगे नतमस्तक हैं। दुनिया के अनेक देश इस सनकवीर की महानता का अनुभव कर चुके हैं।
दरअस्ल ट्रम्प, धरती पर आ गिरे एक ऐसे पिंड हैं, जो अपनी गैलेक्सी का रास्ता भटक गए हैं। दुनिया उन्हें भटका हुआ मुसाफ़िर न समझ ले, इसलिए वे दुनिया को भटकाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

मुहल्ला स्तरीय अमरीका-ईरान युद्ध

हमारे मुहल्ले के पश्चिमी छोर पर श्याम का घर है और लगभग पूर्वी छोर पर छैनू रहता है। श्याम और छैनू के बीच लम्बे समय से तनातनी का माहौल बना हुआ है। दोनों के बीच जब-तब कहासुनी होती रहती है, जिसे मुहल्ले की चौपाल पर हाथापाई सिद्ध करनेवालों की कमी नहीं है।
बालकनी में सूखते कपड़ों पर मिट्टी फेंकने से लेकर, साइकिल के टायर की हवा निकालने तक के भयंकर आक्रमण दोनों एक-दूसरे पर करते रहते हैं।
चूंकि दोनों के घर मुहल्ले के दो अलग-अलग छोर पर हैं, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के पड़ोसियों के साथ दोस्ती गांठ रखी है। ताकि युद्ध के समय हमला करने के लिए दुश्मन के निकट ही वॉरबेस तैयार किया जा सके।
कुछ साल पहले परचून की दुकान पर मसूर की दाल खरीदते हुए दोनों का आमना-सामना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें परचूनिये का तराजू घायल हो गया और आधा किलो मसूर की दाल तबाह हुई। मुहल्ले की भाभियों ने नल से पानी भरने की लाइन में इस विषय पर गंभीर चर्चा का आयोजन किया। जोरदार बहस हुई और बहस का परिणाम यह निकला कि दोनों में से कोई भी कम नहीं है जीजी।
तब से इन दोनों को लेकर बच्चों से लेकर बूढ़े तक वीरता के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुहल्ले का लोकल कवि श्याम और छैनू की मुठभेड़ों की कल्पना करने में इतनी पोथियां भर चुका है कि उसका श्याम-छैनू महाकाव्य पढ़नेवाले लोग हमारे मुहल्ले को हल्दीघाटी और कुरुक्षेत्र से कम नहीं समझते।
छैनू को अगर पता चल जाए कि श्याम की घरवाली सब्जी खरीदने के लिए फेरीवाले का इंतज़ार कर रही है, तो वह अपनी ओर से मुहल्ले में घुसनेवाले हर सब्जीवाले को डांटकर भगा देता है। श्याम ने भी इस अपमान का बदला लेने के लिए जाने कितनी ही बार फेरीवालों को छैनू के घर तक पहुंचने से रोका है।
दोनों की दुश्मनी इतनी लोकप्रिय है कि मुहल्ले में कहीं कोई कुत्ता भी मर जाए तो उसे श्याम-छैनू युद्ध का शहीद घोषित कर दिया जाता है। बरसात में बिजली कड़क जाए तो ऐसा मान लिया जाता है कि श्याम-छैनू संग्राम का माहौल तैयार हो गया है।
पिछले महीने मुहल्ले के लोगों ने एक झन्नाटेदार तमाचे की गूंज सुनी। बस, फिर क्या था। कहानियों का सिलसिला निकल पड़ा। छोकरों ने एआई से वीडियो बना-बनाकर छैनू और श्याम के तमाचा युद्ध को लोकप्रिय कर दिया। लोकल कवि ने तमाचा, सपाटा, चाटा, रहपटा, थप्पड़ और लप्पड़ जैसे शब्दों के प्रयोग से युद्ध का वर्णन किया। भाभियों ने नल की लाइन में तमाचा-वॉर का आंखों देखा हाल सुनाया। चौपाल पर बुजुर्गों ने श्याम और छैनू के बहाने अपनी जवानी के वो किस्से सुनाए, जिनमें उनके गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा था। ये और बात है कि किस्से सुनाते समय उन्होंने तमाचा मारनेवाले और तमाचा खानेवाले किरदारों को बदल दिया था।
पिछले सप्ताह किसी ने श्याम के घर की बाहरी दीवार पर गाली लिख दी। श्याम ने अपने अनुभव से बिना पढ़े ही बता दिया कि यह गाली छैनू ने लिखी है। श्याम ने गाली इसलिए नहीं पढ़ी क्योंकि श्याम को पढ़ना नहीं आता। हालांकि छैनू को भी लिखना नहीं आता, लेकिन मुहल्लेवालों ने मान लिया है कि श्याम से दुश्मनी की शिद्दत में छैनू ने लिखना सीख लिया है।
गाली कांड के अगले ही दिन छैनू की बाहरी दीवार गिर गई। श्याम सबको बता रहा है कि मैंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। लेकिन छैनू सबको बताता फिर रहा है कि श्याम मेरी दीवार पर गाली लिखकर गंदा न कर पाए, इसलिए मैंने दीवार खुद गिराई है। दीवार के मलबे से मुहल्ले का एक तरफ का रास्ता रुक गया है। गाली लिखी दीवार के सामने से गुज़रते हुए मुहल्ले की महिलाओं को शर्म आती है। लेकिन मुहल्ले के बच्चे अपना कष्ट भूलकर दो महान योद्धाओं की शौर्यगाथा सुना रहे हैं। भाभियां नल की लाइन में गालीवाली दीवार पर चर्चा करते हुए खीसें निपोर रही हैं। चौपाल पर बुज़ुर्ग अपनी जवानी की गालियों का सौंदर्यशास्त्र बखान रहे हैं और लोकल कवि ने कल रात ही गाली की दुनाली से युद्धक्षेत्र में हज़ारों सैनिकों को घायल किया है।

✍️ चिराग़ जैन

ग्राहक सेवा केंद्र

जब आपको लगे कि संसार दुःखों का सागर है…! जब आपको लगे कि आपका ब्लड प्रेशर लो हो रहा है तो केवल एक काम कीजिए- किसी भी कम्पनी के ग्राहक सेवा केंद्र को फोन मिला लीजिए।
इसके बाद आपको संसार के कण-कण में व्याप्त कष्ट बौने लगने लगेंगे। आपका रक्तचाप इतना ऊपर चला जाएगा कि आप ख़ुद उसे नीचे लाने की दवाई खाने लगेंगे।
जिसने आईवीआर का आविष्कार किया है, वह ज़रूर कोई ध्यानी योगी रहा होगा। जो दुनिया के समस्त मनुष्यों को ध्यान का अनुभव करवाना चाहता होगा।
इसीलिए आईवीआर की ओर से जब विकल्प चुनने का मेन्यू पढ़ा जाता है तब सुननेवाला एकाग्रचित्त होकर इस मुद्रा में बैठ जाता है जैसे कोई धनुर्धर पूरी तन्मयता से अपने लक्ष्य पर निशाना साध रहा हो। क्योंकि धनुर्धर जानता है कि यदि निशाना चूक गया, तो उधर से मधुर आवाज़ में आकाशवाणी होगी “क्षमा करें, आपने ग़लत विकल्प चुना है, कृपया दोबारा प्रयास करें”।
आईवीआर पर समाधान ढूँढना ठीक ऐसा है जैसे भूसे में सूई खोजना। बीच-बीच में सूई आपकी हथेली को चूमकर उम्मीद बनाए रखेगी लेकिन हाथ आएगा केवल भूसा।
इस करेले में नीम का तड़का तब लगता है जब आप मशीन से उकताकर किसी मनुष्य से बात करने का विचार करते हैं। यह विकल्प इतना दुर्लभ है जैसे सागर से अमृत निकालना।
किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर आपने सागर मंथन प्रारंभ कर ही दिया तो अमृतघट से पहले इतना कुछ निकलेगा कि आप ख़ुद अमृत की खोज करना भूल जाएंगे। आपकी स्थिति उस प्राणी जैसी हो जाएगी जो अमर होने की इच्छा में मर जाता है।
और अगर आपने ढीठ होकर अमृतकलश हासिल कर ही लिया और आपको “हमारे ग्राहक सेवा प्रतिनिधि से बात करने के लिए नौ दबाएँ” के गोल्डन वर्ड्स सुनाई दे ही गए तो इस अमृत कलश का ढक्कन खोलना एक अलग कलेश है।
नौ दबाते ही एक अनहद संगीत बजना शुरू होगा, जिसमें हर थोड़ी देर में एक मीठी मशीनी आवाज़ सुनाई देगी- “आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें।”
महाराज सगर के पुत्रों ने ढेर होकर युगों तक प्रतीक्षा की थी, किंतु आईवीआर के शिकंजे में फँसा प्राणी प्रतीक्षा करते-करते ढेर हो जाता है।
आप स्वयं को ‘महत्वपूर्ण’ मानते हुए भागीरथ की भाँति तपस्या करते रहते हैं। फोन इसलिए नहीं काटते क्योंकि फोन काटते ही अब तक की गई साधना व्यर्थ हो जाएगी।
फाइनली आपके पेशेंस की कठिन परीक्षा लेने के बाद अनहद का संगीत बंद होता है। रिसीवर उठने की खड़खड़ी होती है और उधर से एक अदद मनुष्या का दिव्य स्वर सुनाई देता है। नमस्कार, मैं मोनिका आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आप मेले में खोए हुए बच्चे की तरह माँ से मिलने पर रोना चाहते हैं। उसे बताना चाहते हैं कि उस तक पहुँचने के लिए आपने कितने महान कष्ट झेले हैं।
लेकिन मोनिका मशीन की तरह बोलती है “आपको हुई असुविधा के लिए मैं क्षमा चाहूंगी मिस्टर जैन। बताइए मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आपको लगा जैसे मजनू पूरा रेगिस्तान पार करके भूखा-प्यासा लैला के पास पहुँचा, लेकिन लैला ने उससे पानी तक नहीं पूछा और रूखे बेहद रूखे स्वर में पूछा- “बताओ, क्यों आए हो?”
आप खून का घूंट पीकर याद करते हो कि आपने ये फोन मिलाया क्यों था! जब तक आपको याद आता है तब तक कठिन तपस्या से प्रकट हुई देवी विलीन हो चुकी होती है, फोन कट चुका होता है और आप संसार चक्र में घूमते प्राणी की भाँति दोबारा कस्टमर केयर का नंबर डायल करने लगते हो।

✍️ चिराग़ जैन

मुँह पर स्माइल, बगल में मिसाइल

इस समय पूरी दुनिया की राजनीति का एक ही ध्येय वाक्य है- “नैतिकता गई तेल लेने!”
इसलिए जहाँ कहीं तेल मिल सकता है वहाँ के लिए पूरी दुनिया के नेता कान में तेल डालकर बैठे हैं।
चूँकि तेल तिलों से ही निकलता है इसलिए तेल की हवस में दुनिया भर के मासूम लोग तिल-तिल कर पिस रहे हैं। आसमान से आग बरस रही है और राजनीति का खून ठण्डा हो चुका है।
वेनेजुएला को गंगू तेली सिद्ध करके जैसे ही अमरीकी राजा भोज ने ईरानी पानी पर धार धरनी चाही, ईरान ने सिर पर कफन बांधकर अमरीका का पानी उतार दिया।
इजरायल के कंधे पर बंदूक रखकर अमरीका ईरान को आंखें दिखाने निकला था। दोनों ने छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल कहकर ईरान पर शिकंजा कसा। अब दोनों की हालत ऐसी है जैसे सांप के मुँह में छछूंदर।
उधर ईरान भी मुँह में घास के तिनके दबाए रंगा सियार बना बैठा है। दिन भर ईरान के श्रीमान शांति की बातें करते हैं और रात भर ईरान के विमान बम बरसाते हैं। मुँह पर स्माइल, बगल में मिसाइल।
ईरान को देखकर ऐसा लगता है, जैसे उसकी इमारतें नींव पर नहीं, मिसाइलों पर खड़ी हों। ईरान की ताकत के बारे में मीडिया चैनल जब बताते हैं तो ऐसा लगता है मानो ईरान के घरों में टीवी और एसी के रिमोट भी वास्तव में मिसाइल के रिमोट हैं, जिनका मोड बदलकर उनसे टीवी ऑपरेट करने का काम लिया जा रहा है।
ईरान के तेवर ऐसे लगते हैं मानो कह रहा हो, “अब तो तेल देखो, तेल की धार देखो।”
ईरान-इजरायल आमने-सामने हैं। रूस और यूक्रेन पहले ही एक-दूसरे के चिकोटी काट रहे हैं। ओमान, यूएई और खाड़ी के अन्य देश घुन की तरह बिना मतलब ही चने के साथ पिस रहे हैं। मनुष्यता, लोकतन्त्र और विश्व-समुदाय को भाड़ में झोंककर अमरीका भड़भूजा बनने की कोशिश कर रहा है। उसे लगता था कि ईरान अकेला चना है, और अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा?
ईरान इस बात को दिल पर ले गया। अपने तिरस्कार से चिढ़कर वह भाड़ में ऐसा उछला कि भाड़ तो न फूटा लेकिन भड़भूजे की आँख जरूर फोड़ दी।
दर्द से बिलबिलाता हुआ निज़ाम जब अचानक लोकतंत्र की वक़ालत करने लगा तो समझ आया कि कानून अंधा नहीं, काणा होता है।
रूस, चीन, अमरीका और फ्रांस जैसे शांतिदूत पूरी दुनिया में कहते फिरते हैं कि लड़ाई मत करो। और अगर करनी ही है तो हमारे हथियारों से करो। चीन युद्धग्रस्त देशों में चायनीज शांति मॉल खोलने की फ़िराक़ में रहता है। सस्ती मरहम पट्टी से लेकर सस्ती शांति तक सब कुछ चीन सप्लाई करता है। बाकी सारे दादा लोग आग बेचकर कमाते हैं और चीन जैसे खलीफा पानी बेचकर कमाते हैं।
इन सबको देखकर ऐसा लगता है जैसे चार भाइयों ने बाज़ार पर कब्जा कर लिया है। पहला भाई भरे बाजार में सांड छोड़कर लोगों को घायल करवाता है। दूसरे की बीच बाजार में एम्बुलेंस सर्विस है। तीसरे का बाजार के बाहर अस्पताल है और चौथे ने गांव के बाहर किसी की जमीन घेरकर श्मशान बना रखा है।
रात को चारों अपनी-अपनी बही मिलाकर दिन भर का मुनाफ़ा बाँट लेते हैं। धीरे-धीरे पूरा गांव, मुनाफ़ा बनकर इनकी तिजोरियों में बंद हो जाएगा।
और ये चारों अपनी तिजोरियां उठाकर ये कहते हुए गांव छोड़ देंगे कि इन तिलों में अब तेल नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

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