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हमारे मुहल्ले के पश्चिमी छोर पर श्याम का घर है और लगभग पूर्वी छोर पर छैनू रहता है। श्याम और छैनू के बीच लम्बे समय से तनातनी का माहौल बना हुआ है। दोनों के बीच जब-तब कहासुनी होती रहती है, जिसे मुहल्ले की चौपाल पर हाथापाई सिद्ध करनेवालों की कमी नहीं है।
बालकनी में सूखते कपड़ों पर मिट्टी फेंकने से लेकर, साइकिल के टायर की हवा निकालने तक के भयंकर आक्रमण दोनों एक-दूसरे पर करते रहते हैं।
चूंकि दोनों के घर मुहल्ले के दो अलग-अलग छोर पर हैं, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के पड़ोसियों के साथ दोस्ती गांठ रखी है। ताकि युद्ध के समय हमला करने के लिए दुश्मन के निकट ही वॉरबेस तैयार किया जा सके।
कुछ साल पहले परचून की दुकान पर मसूर की दाल खरीदते हुए दोनों का आमना-सामना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें परचूनिये का तराजू घायल हो गया और आधा किलो मसूर की दाल तबाह हुई। मुहल्ले की भाभियों ने नल से पानी भरने की लाइन में इस विषय पर गंभीर चर्चा का आयोजन किया। जोरदार बहस हुई और बहस का परिणाम यह निकला कि दोनों में से कोई भी कम नहीं है जीजी।
तब से इन दोनों को लेकर बच्चों से लेकर बूढ़े तक वीरता के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुहल्ले का लोकल कवि श्याम और छैनू की मुठभेड़ों की कल्पना करने में इतनी पोथियां भर चुका है कि उसका श्याम-छैनू महाकाव्य पढ़नेवाले लोग हमारे मुहल्ले को हल्दीघाटी और कुरुक्षेत्र से कम नहीं समझते।
छैनू को अगर पता चल जाए कि श्याम की घरवाली सब्जी खरीदने के लिए फेरीवाले का इंतज़ार कर रही है, तो वह अपनी ओर से मुहल्ले में घुसनेवाले हर सब्जीवाले को डांटकर भगा देता है। श्याम ने भी इस अपमान का बदला लेने के लिए जाने कितनी ही बार फेरीवालों को छैनू के घर तक पहुंचने से रोका है।
दोनों की दुश्मनी इतनी लोकप्रिय है कि मुहल्ले में कहीं कोई कुत्ता भी मर जाए तो उसे श्याम-छैनू युद्ध का शहीद घोषित कर दिया जाता है। बरसात में बिजली कड़क जाए तो ऐसा मान लिया जाता है कि श्याम-छैनू संग्राम का माहौल तैयार हो गया है।
पिछले महीने मुहल्ले के लोगों ने एक झन्नाटेदार तमाचे की गूंज सुनी। बस, फिर क्या था। कहानियों का सिलसिला निकल पड़ा। छोकरों ने एआई से वीडियो बना-बनाकर छैनू और श्याम के तमाचा युद्ध को लोकप्रिय कर दिया। लोकल कवि ने तमाचा, सपाटा, चाटा, रहपटा, थप्पड़ और लप्पड़ जैसे शब्दों के प्रयोग से युद्ध का वर्णन किया। भाभियों ने नल की लाइन में तमाचा-वॉर का आंखों देखा हाल सुनाया। चौपाल पर बुजुर्गों ने श्याम और छैनू के बहाने अपनी जवानी के वो किस्से सुनाए, जिनमें उनके गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा था। ये और बात है कि किस्से सुनाते समय उन्होंने तमाचा मारनेवाले और तमाचा खानेवाले किरदारों को बदल दिया था।
पिछले सप्ताह किसी ने श्याम के घर की बाहरी दीवार पर गाली लिख दी। श्याम ने अपने अनुभव से बिना पढ़े ही बता दिया कि यह गाली छैनू ने लिखी है। श्याम ने गाली इसलिए नहीं पढ़ी क्योंकि श्याम को पढ़ना नहीं आता। हालांकि छैनू को भी लिखना नहीं आता, लेकिन मुहल्लेवालों ने मान लिया है कि श्याम से दुश्मनी की शिद्दत में छैनू ने लिखना सीख लिया है।
गाली कांड के अगले ही दिन छैनू की बाहरी दीवार गिर गई। श्याम सबको बता रहा है कि मैंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। लेकिन छैनू सबको बताता फिर रहा है कि श्याम मेरी दीवार पर गाली लिखकर गंदा न कर पाए, इसलिए मैंने दीवार खुद गिराई है। दीवार के मलबे से मुहल्ले का एक तरफ का रास्ता रुक गया है। गाली लिखी दीवार के सामने से गुज़रते हुए मुहल्ले की महिलाओं को शर्म आती है। लेकिन मुहल्ले के बच्चे अपना कष्ट भूलकर दो महान योद्धाओं की शौर्यगाथा सुना रहे हैं। भाभियां नल की लाइन में गालीवाली दीवार पर चर्चा करते हुए खीसें निपोर रही हैं। चौपाल पर बुज़ुर्ग अपनी जवानी की गालियों का सौंदर्यशास्त्र बखान रहे हैं और लोकल कवि ने कल रात ही गाली की दुनाली से युद्धक्षेत्र में हज़ारों सैनिकों को घायल किया है।
चिराग़ जैन
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जब आपको लगे कि संसार दुःखों का सागर है…! जब आपको लगे कि आपका ब्लड प्रेशर लो हो रहा है तो केवल एक काम कीजिए- किसी भी कम्पनी के ग्राहक सेवा केंद्र को फोन मिला लीजिए।
इसके बाद आपको संसार के कण-कण में व्याप्त कष्ट बौने लगने लगेंगे। आपका रक्तचाप इतना ऊपर चला जाएगा कि आप ख़ुद उसे नीचे लाने की दवाई खाने लगेंगे।
जिसने आईवीआर का आविष्कार किया है, वह ज़रूर कोई ध्यानी योगी रहा होगा। जो दुनिया के समस्त मनुष्यों को ध्यान का अनुभव करवाना चाहता होगा।
इसीलिए आईवीआर की ओर से जब विकल्प चुनने का मेन्यू पढ़ा जाता है तब सुननेवाला एकाग्रचित्त होकर इस मुद्रा में बैठ जाता है जैसे कोई धनुर्धर पूरी तन्मयता से अपने लक्ष्य पर निशाना साध रहा हो। क्योंकि धनुर्धर जानता है कि यदि निशाना चूक गया, तो उधर से मधुर आवाज़ में आकाशवाणी होगी “क्षमा करें, आपने ग़लत विकल्प चुना है, कृपया दोबारा प्रयास करें”।
आईवीआर पर समाधान ढूँढना ठीक ऐसा है जैसे भूसे में सूई खोजना। बीच-बीच में सूई आपकी हथेली को चूमकर उम्मीद बनाए रखेगी लेकिन हाथ आएगा केवल भूसा।
इस करेले में नीम का तड़का तब लगता है जब आप मशीन से उकताकर किसी मनुष्य से बात करने का विचार करते हैं। यह विकल्प इतना दुर्लभ है जैसे सागर से अमृत निकालना।
किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर आपने सागर मंथन प्रारंभ कर ही दिया तो अमृतघट से पहले इतना कुछ निकलेगा कि आप ख़ुद अमृत की खोज करना भूल जाएंगे। आपकी स्थिति उस प्राणी जैसी हो जाएगी जो अमर होने की इच्छा में मर जाता है।
और अगर आपने ढीठ होकर अमृतकलश हासिल कर ही लिया और आपको “हमारे ग्राहक सेवा प्रतिनिधि से बात करने के लिए नौ दबाएँ” के गोल्डन वर्ड्स सुनाई दे ही गए तो इस अमृत कलश का ढक्कन खोलना एक अलग कलेश है।
नौ दबाते ही एक अनहद संगीत बजना शुरू होगा, जिसमें हर थोड़ी देर में एक मीठी मशीनी आवाज़ सुनाई देगी- “आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें।”
महाराज सगर के पुत्रों ने ढेर होकर युगों तक प्रतीक्षा की थी, किंतु आईवीआर के शिकंजे में फँसा प्राणी प्रतीक्षा करते-करते ढेर हो जाता है।
आप स्वयं को ‘महत्वपूर्ण’ मानते हुए भागीरथ की भाँति तपस्या करते रहते हैं। फोन इसलिए नहीं काटते क्योंकि फोन काटते ही अब तक की गई साधना व्यर्थ हो जाएगी।
फाइनली आपके पेशेंस की कठिन परीक्षा लेने के बाद अनहद का संगीत बंद होता है। रिसीवर उठने की खड़खड़ी होती है और उधर से एक अदद मनुष्या का दिव्य स्वर सुनाई देता है। नमस्कार, मैं मोनिका आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आप मेले में खोए हुए बच्चे की तरह माँ से मिलने पर रोना चाहते हैं। उसे बताना चाहते हैं कि उस तक पहुँचने के लिए आपने कितने महान कष्ट झेले हैं।
लेकिन मोनिका मशीन की तरह बोलती है “आपको हुई असुविधा के लिए मैं क्षमा चाहूंगी मिस्टर जैन। बताइए मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आपको लगा जैसे मजनू पूरा रेगिस्तान पार करके भूखा-प्यासा लैला के पास पहुँचा, लेकिन लैला ने उससे पानी तक नहीं पूछा और रूखे बेहद रूखे स्वर में पूछा- “बताओ, क्यों आए हो?”
आप खून का घूंट पीकर याद करते हो कि आपने ये फोन मिलाया क्यों था! जब तक आपको याद आता है तब तक कठिन तपस्या से प्रकट हुई देवी विलीन हो चुकी होती है, फोन कट चुका होता है और आप संसार चक्र में घूमते प्राणी की भाँति दोबारा कस्टमर केयर का नंबर डायल करने लगते हो।
चिराग़ जैन

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इस समय पूरी दुनिया की राजनीति का एक ही ध्येय वाक्य है- “नैतिकता गई तेल लेने!”
इसलिए जहाँ कहीं तेल मिल सकता है वहाँ के लिए पूरी दुनिया के नेता कान में तेल डालकर बैठे हैं।
चूँकि तेल तिलों से ही निकलता है इसलिए तेल की हवस में दुनिया भर के मासूम लोग तिल-तिल कर पिस रहे हैं। आसमान से आग बरस रही है और राजनीति का खून ठण्डा हो चुका है।
वेनेजुएला को गंगू तेली सिद्ध करके जैसे ही अमरीकी राजा भोज ने ईरानी पानी पर धार धरनी चाही, ईरान ने सिर पर कफन बांधकर अमरीका का पानी उतार दिया।
इजरायल के कंधे पर बंदूक रखकर अमरीका ईरान को आंखें दिखाने निकला था। दोनों ने छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल कहकर ईरान पर शिकंजा कसा। अब दोनों की हालत ऐसी है जैसे सांप के मुँह में छछूंदर।
उधर ईरान भी मुँह में घास के तिनके दबाए रंगा सियार बना बैठा है। दिन भर ईरान के श्रीमान शांति की बातें करते हैं और रात भर ईरान के विमान बम बरसाते हैं। मुँह पर स्माइल, बगल में मिसाइल।
ईरान को देखकर ऐसा लगता है, जैसे उसकी इमारतें नींव पर नहीं, मिसाइलों पर खड़ी हों। ईरान की ताकत के बारे में मीडिया चैनल जब बताते हैं तो ऐसा लगता है मानो ईरान के घरों में टीवी और एसी के रिमोट भी वास्तव में मिसाइल के रिमोट हैं, जिनका मोड बदलकर उनसे टीवी ऑपरेट करने का काम लिया जा रहा है।
ईरान के तेवर ऐसे लगते हैं मानो कह रहा हो, “अब तो तेल देखो, तेल की धार देखो।”
ईरान-इजरायल आमने-सामने हैं। रूस और यूक्रेन पहले ही एक-दूसरे के चिकोटी काट रहे हैं। ओमान, यूएई और खाड़ी के अन्य देश घुन की तरह बिना मतलब ही चने के साथ पिस रहे हैं। मनुष्यता, लोकतन्त्र और विश्व-समुदाय को भाड़ में झोंककर अमरीका भड़भूजा बनने की कोशिश कर रहा है। उसे लगता था कि ईरान अकेला चना है, और अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा?
ईरान इस बात को दिल पर ले गया। अपने तिरस्कार से चिढ़कर वह भाड़ में ऐसा उछला कि भाड़ तो न फूटा लेकिन भड़भूजे की आँख जरूर फोड़ दी।
दर्द से बिलबिलाता हुआ निज़ाम जब अचानक लोकतंत्र की वक़ालत करने लगा तो समझ आया कि कानून अंधा नहीं, काणा होता है।
रूस, चीन, अमरीका और फ्रांस जैसे शांतिदूत पूरी दुनिया में कहते फिरते हैं कि लड़ाई मत करो। और अगर करनी ही है तो हमारे हथियारों से करो। चीन युद्धग्रस्त देशों में चायनीज शांति मॉल खोलने की फ़िराक़ में रहता है। सस्ती मरहम पट्टी से लेकर सस्ती शांति तक सब कुछ चीन सप्लाई करता है। बाकी सारे दादा लोग आग बेचकर कमाते हैं और चीन जैसे खलीफा पानी बेचकर कमाते हैं।
इन सबको देखकर ऐसा लगता है जैसे चार भाइयों ने बाज़ार पर कब्जा कर लिया है। पहला भाई भरे बाजार में सांड छोड़कर लोगों को घायल करवाता है। दूसरे की बीच बाजार में एम्बुलेंस सर्विस है। तीसरे का बाजार के बाहर अस्पताल है और चौथे ने गांव के बाहर किसी की जमीन घेरकर श्मशान बना रखा है।
रात को चारों अपनी-अपनी बही मिलाकर दिन भर का मुनाफ़ा बाँट लेते हैं। धीरे-धीरे पूरा गांव, मुनाफ़ा बनकर इनकी तिजोरियों में बंद हो जाएगा।
और ये चारों अपनी तिजोरियां उठाकर ये कहते हुए गांव छोड़ देंगे कि इन तिलों में अब तेल नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन

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दुनिया में होली शायद एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसकी तैयारी में नहाना कतई ज़रूरी नहीं है। बल्कि यूँ कहें कि होली के लिए तैयार होते समय नहाना निषेध है।
अन्य त्योहारों की तरह इस दिन नए-नए नहीं, पुराने-पुराने कपड़े पहने जाते हैं।
छेदवाली बनियान पर घिसे हुए परिधान पहनकर सजे हुए लड़कों की टोलियाँ सड़कों पर हुड़दंग करती हैं। लड़कियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे ब्यूटीशियन ने उनके गालों पर काजल पोतकर, दाँतों पर हरे-नीले रंग की लिपस्टिक घिस डाली हो।
अचानक लड़कों की टोली में से एक हीरो की नज़र लड़कियों की टोली की एक हीरोइन से मिलती है। लिपे-पुते थोबड़ों में बल्ब की तरह चमकती दो जोड़ी जवान आँखें चार होती हैं। उनमें फागुन का गुलाबी रंग उतरने लगता है।
‘हुड़दंग’ जैसा परम कर्तव्य भूलकर नायक झेंपता है और अपनी भीगी हुई कमीज को अपनी हथेलियों से इस्तरी करने की चेष्टा करता है।
उधर, नायिका भी अपने झूतरों में से एक लट टटोलकर उसे कान के पीछे सेट करती है। तभी इस रोमांटिक मूमेंट पर पानी से भरा एक फुग्गा बम की तरह गिरता है। गुब्बारे से आहत नायिका के मुख से ‘उई माँ’ का मधुर स्वर निकलता है। वह अपने घटनास्थल को सहलाती हुई पानी-पानी होने लगती है।
जस्ट डिक्लेअर्ड नायक अपनी नायिका की ‘आह’ से बिलबिला जाता है और गुब्बारा मारनेवाले बालकों को कोसने लगता है। उसे उन बच्चों में नटखट कन्हैया नहीं, बल्कि क्रौंच पक्षी को तीर मारनेवाला क्रूर शिकारी दिखाई देता है।
ऐसी अनगिनत प्रेम-कहानियाँ होली की व्यस्तता में ध्वस्त हो जाती हैं।
एलीट क्लास के लोग ऐसी सड़कछाप होली नहीं मनाते! वे लोग बाकायदा किसी कोठी में होली का आयोजन रखते हैं। चिट्टे सफेद सूट पहनकर लेडीज होली स्पेशल ब्यूटी पैकेज लेती हैं। इस पैकेज में ब्यूटीशियन उनके गालों पर तीन अलग-अलग रंग की गुलाली लकीरें खींच देती है। यह गुलाल स्किन फ्रेंडली होता है।
ऐसा होलिया मेकअप करा के ये श्वेतवसना लेडीज आयोजन स्थल पर पहुँचती हैं, जहाँ श्वेत कुर्ते-पाजामे पहनकर जेन्ट्स लोग ठंडाई गटक रहे होते हैं।
बिसलेरी के पानी में ऑर्गेनिक कलर्स मिलाकर, छींटे मारते हुए, मेहमानों का स्वागत किया जाता है।
म्यूजिक सिस्टम पर गाने चल रहे होते हैं। जिनमें ‘कहियो रे मंगेतर से’ और ‘रंग बरसे’ की रिपीट वैल्यू देखते ही बनती है। ये दोनों ट्रेक उस एक ही दिन में इतनी बार बज लेते हैं कि फिर पूरे साल के लिए इनके गले बैठ जाते हैं।
एकाध कहासुनी और एकाध हाथापाई होली के रंगीन माहौल का बाई प्रोडक्ट होता है। बाई प्रोडक्ट मतलब वह उत्पाद, जो दो-तीन दिन तक डाइनिंग टेबल पर रखा रहता है और जब खराब होने के कगार पर पहुंच जाता है तो वह प्रोडक्ट कामवाली बाई को ये कहते हुए दिया जाता है- “शांता, तीन दिन से तेरी होली की मिठाई रखी है, तुझे देना ही भूल गई थी।”
होली बनावट छोड़कर असली चेहरे बाहर लाने का अवसर है, इसीलिए होली के दिन किसी भी भारतीय नागरिक की सूरत उसके आधार कार्ड से मिल ही जाती है।
✍️ चिराग़ जैन

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भारत में इन दिनों शादियों का सीज़न चल रहा है।
हमारे यहां शादी एक ईवेंट भर नहीं बल्कि बाकायदा एक बोर्ड परीक्षा है, जिसमें आपकी कमर से लेकर आपकी प्लेट और आपका धैर्य तक सब नप जाता है।
सबसे अलग कार्ड बनाने के चक्कर में शादियों के कार्ड में इतनी क्रिएटिविटी घुसेड़ दी जाती है कि जिस इन्फॉर्मेषन के लिए कार्ड भेजे जाते हैं, उसे लैंस लेकर ढूंढना पड़ता है।
आप घर से किसी शादी में जाने के लिए निकलो तो गाड़ी में बैठते ही मोबाइल पर कार्ड खोलकर वेन्यू तलाषा जाता है। कार्ड खुलते ही पहले घंटियां बजती हैं। फिर सितार बजता है, फिर एक-एक अक्षर हौले-हौले आसमान से अवतरित होता है। अपने धैर्य के चरम तक पहुंचकर आपको पता चलता है कि नेविगेषन में क्या लिखकर गाड़ी स्टार्ट करनी है।
घंटों के मेकअप से सजी-धजी औरतें और ट्रैफिक जाम से इर्रिटेट होकर जले-भुने आदमी जब तक विवाह स्थल तक पहुंचते हैं तब तक उनके बीच एकाध गाड़ी-युद्ध हो चुका होता है। ‘चाचा की छादी में जलूल-जलूल आना’ -कहनेवाले बच्चे मम्मी-पापा का महासंग्राम देखकर सहमे हुए छादी में पहुंच पाते हैं।
आयोजन स्थल की सजधज देखकर आपको लगता है जैसे आपका रिष्तेदार रातोंरात अम्बानी हो गया है। गेट पर चार-पांच कैमरामैन एक साथ आपकी फोटो खींचते हैं। आप खुद को सेलिब्रिटी समझते हुए पूरे तेवर के साथ पोज़ देते हैं। इतिहास गवाह है कि विवाहस्थल पर खींची गई ये वेलकम फोटो आज तक किसी ने नहीं देखी।
भीतर बड़े से लॉन में सब लोग अलग-अलग गोलमेज सम्मेलन कर रहे होते हैं। महिलाएं एक-दूसरे की ड्रेस देख रही होती हैं और पुरुष एक-दूसरे की महिलाएं।
कुछ रिष्तेदार स्नेक्स से लेकर मेन कोर्स तक एक-एक काउंटर का ऐसे मुआयना कर रहे होते हैं जैेसे हस्तिनापुर के युवराज महाभारत के युद्ध के लिए वेन्यू का मुआयना कर रहे हों।
डेढ़ दो घंटे स्नेक्स से काम चलाने के बाद जैसे ही इनके हाथ में खाने की प्लेट आती है, ये उसका ऐसा सिंगार करते हैं जैसे किसी ने फेसबुक, इंस्टा, यूट्यूब, ट्वििटर और लिंक्डइन एक ही स्क्रीन पर खोल लिए हों। वेक्यूम क्लीनर की स्पीड से भोजन निपटाकर वर-वधू को आषीर्वाद देने की सुधि आती है।
वर-वधू स्टेज पर ऐसे रखे होते हैं जैसे किसी ने पापड़ बेलकर धूप में डाल दिए हों। स्टेज के सामने एक कोने में डीजे लगा होता है। फ्लोर पर नाचनेवाले माइकल जैक्सन सारी दुनिया को भूलकर बेतहाषा नाचते रहते हैं।
ढाई-तीन घंटे में नाच-गाना-खाना वगैरा निपटाकर सभी उत्साही रिष्तेदार ‘चल खुसरो घर आपने’ का अनुसरण करते हुए घर लौट जाते हैं।
वर-वधू अपने-अपने परिवार और जबरदस्ती रोक लिए गए दो-चार खास रिष्तेदारों के साथ फेरों पर बैठ जाते हैं। शेरवानी और लहंगे का वजन अब तक दोनों को थकाकार चूर कर चुका होता है।
इधर फेरे हो रहे होते हैं और उधर हलवाई से लेकर बैंक्व्ट हॉल तक के कर्मचारी अपना-अपना सामान बटोरने लगते हैं।
रथ की तरह सजी मारुति और जूठे पतीले उठाकर ले जाने वाली ठेली साथ-साथ खड़ी होती है तो लगता है कि समाजवाद आ गया।
विदाई कराकर एक दिन के अम्बानी वापस अपने बसेरों में लौट जाते हैं। और उस वेन्यू पर अगले दिन फिर किसी परिवार को ‘अम्बानी फील’ देने की तैयारी होने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन

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लो जी, बाज़ार में भी स्त्रीलिंग चांदी ने पुल्लिंग सोने की मोनोपॉली पर धावा बोल दिया है। अब खरे सोने की सामने टंच चांदी अकड़ कर चलने लगी है।
मैं तो उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भतीजे के ब्याह से विदा होते समय बुआजी, मुँह बिचकाते हुए कहेंगी- ‘भाभी ने सोने के कंगन में बहका दिया। इकलौती ननद हूँ। एक जोड़ी चांदी की पजेब ही दे देती।’
चांदी की ऐसी चांदी हुई है कि सोने को उबासी आने लगी है। सोना ऐसा उपेक्षित-सा बैठा है जैसे राजेश खन्ना को धक्का देकर भीड़ ओमप्रकाश के ऑटोग्राफ लेने दौड़ पड़ी हो। इसी स्पीड से चांदी की कीमतें बढ़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब लोग सोने के गहनों पर चांदी की पॉलिश करवाने लगेंगे।
सर्राफा बाज़ार चांदी कूट रहा है और चांदी मिल्खा सिंह की स्पीड से भागी चली जा रही है। हमारे बाज़ारों में ज़रा-सी हलचल होते ही भविष्यवाणियों का बाज़ार गरम हो जाता है।
मेरे एक रिश्तेदार ने मुझसे पूछा- ‘कुछ मार्किट-वार्किट में इन्वेस्ट किया है या नहीं?’
मैंने संकोच के साथ डींग हांकते हुए कहा- ‘जी गोल्ड बॉन्ड लिए हैं कुछ।’
उन्होंने हिकारत से मेरी ओर देखकर कहा- ‘कुछ नहीं रखा गोल्ड में, सिल्वर देखो बेटा सिल्वर।’
मैंने गोल्ड के मुँह पर ऐसी लानत पहले कभी नहीं देखी थी।
घर-परिवार का कोई समारोह हो या फिर चाय की दुकान, हर महफ़िल में कोई न कोई कॉन्फिडेंट भविष्यवक्ता अपने अनुभव से बता रहा होगा कि चांदी छह लाख तक जाएगी। शेयर बाज़ार का यह सबसे बड़ा लाभ है, जिनकी जेब में फूटी कौड़ी न हो, वो भी हज़ार-लाख-करोड़ की बातें करने का लुत्फ़ उठा सकते हैं। और जिसने हज़ार-पाँच सौ इन्वेस्ट कर दिये हों, उसे तो टाटा, बिड़ला से लेकर अम्बानी, अडानी तक को धंधा सिखाने का लाइसेंस मिल जाता है।
नुक्कड़ की चर्चाओं में उपस्थित अर्थशास्त्री चांदी की बढ़ती कीमतों का कारण भी बताते रहते हैं। एक विद्वान सोलर एनर्जी में चांदी की खपत का पत्ता फेंकता है तो दूसरा रूस-यूक्रेन यूद्ध से चांदी को जोड़कर उसे लाजवाब कर देता है। कोई इसे डोनाल्ड ट्रंप की शरारत बता रहा है तो कोई एलन मस्क की सीक्रेट बिज़नेस पॉलिसी को सार्वजनिक करके चांदी की कीमतों का भेद खोल देता है।
मैं भी घर से साबुन खरीदने निकला था, लेकिन नुक्कड़ की बातें सुनकर चांदी खरीदने निकल पड़ा। नहाना-धोना तो होता रहेगा, अगर चांदी नहीं खरीदी तो रातोंरात अमीर होने के मौके से हाथ धो बैठूंगा।
जिन फिल्मी गीतों में चांदी शब्द का प्रयोग हुआ है, मैंने उन्हें गुनगुनाना भी बंद कर दिया है। कहीं ऐसा न हो कि चांदी मेरे मुँह से बाहर निकल जाए और मैं रेंकता रह जाऊँ।
इन दिनों चांदी ने जो छलांग लगाई है, उस पर चांदी को ऊँची कूद का गोल्ड मेडल दिया जा सकता है। ओलम्पिक संघ ने इस विषय पर विचार भी किया लेकिन फिर ये सोचकर मन मसोस लिया कि कहीं चांदी राजकुमार के स्टाइल में ये न कह दे- ‘जानी, हम चांदी हैं, गोल्ड-वोल्ड जैसों को हम मुँह नहीं लगाते।’
✍️ चिराग़ जैन