Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
विश्व राजनीति को कॉमेडी शो बनाने की सुपारी लेने वाले पहले नेता हैं डोनाल्ड ट्रंप। उन्हें अपने आप पर विश्वास है कि एक दिन वे नासा के वैज्ञानिकों की फौज भेजकर सूरज को भी उठवा लेंगे। वाशिंग्टन के किसी डुप्लेक्स में उसे नज़रबंद करेंगे। फिर मुँहमांगी क़ीमत पर दुनिया भर में धूप का धंधा करेंगे।
शीशियों में धूप भर-भरकर एक ठेला व्हाइट हाउस से निकलेगा और फेरीवाले की तरह ट्रंप गली-गली में धूप बेचेंगे। ठेले पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होगा कि “हमारी रूस या चीन में कोई ब्रांच नहीं है।”
अगर सूरज-चांद को किडनैप करने में नासा के वैज्ञानिक सफल नहीं हुए तो ट्रंप के क्रोध की अग्नि से नासा का नाश हो जाएगा।
मुझे विश्वास है कि सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपने आईने के सामने खड़े होकर आस्था और विश्वास से मंत्रोच्चार करते हैं कि ‘ट्रंप इज़ द बेस्ट प्रेसिडेंट एवर’।
इस मंत्र के प्रभाव से अचानक उनके आसपास रौशनी फैल जाती है। उनके दिमाग़ की बत्ती जल जाती है। वे तुरंत किसी की जड़ें खोदने लगते हैं और किसी की दीवार बनाने लगते हैं। जिस देश में दीवार बनानी हो, उसके प्रधानमंत्री को फोन करके भारतीय शराबियों के स्टाइल में बोलते हैं- ‘आज दीवार तेरा भाई बनाएगा।”
वे जानते हैं कि इस सृष्टि में वही ‘उचित’ है जो माननीय ट्रंप सर करते हैं। यदि कोई तुच्छ प्राणी उनके किसी कार्य की आलोचना करता है तो उसकी आलोचना ‘फेक न्यूज़’ से अधिक कुछ नहीं है।
विश्व राजनीति ने ऐसे लोग भी देखे हैं, जिन्होंने प्रश्नों के अनुसार ख़ुद को बदल लिया। विश्व राजनीति में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिन्होंने अपने अनुसार सवाल बदल दिए। लेकिन ट्रंप पहले ऐसे लीडर हैं, जो सवाल पूछनेवाले को ही बदल देते हैं।
रोज़ सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपना ट्विटर खोलकर दुनिया को कोई नयी टेंशन देना नहीं भूलते। उनकी एक गुड मॉर्निंग पूरी दुनिया की नींद उड़ा देती है। इसी को ट्रंप विश्व जागरण कहते हैं।
ट्रंप के आत्मविश्वास के आगे फैक्ट्स शर्म से सिर झुका लेते हैं। सूरज उनके ट्वीट पढ़कर यह जानने की कोशिश करता है कि आज निकलना है या नहीं। चीन की दीवार और मिस्र के पिरामिड रोज़ उनके दरबार में हाजिरी लगाकर यह पूछते हैं कि बॉस अभी हम ‘ग्रेट’ हैं या फिर आपकी किसी हरकत ने हमें टुच्चा सिद्ध कर दिया है?
मैं गूगल पर अमरीका का नक्शा देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे कोई चपटे से मुँह का आदमी अपने होंठों को पूरा खींचकर मुस्कुरा रहा हो। इस मुस्कान से उसकी दोनों आँखें बंद हो गई हैं। जिनसे वह देख नहीं पा रहा है कि पूरी दुनिया उस पर हँस रही है।
चूँकि वे स्वयं को महान मान चुके हैं इसलिए अपनी हरकतों को ‘लीला’ कहने में उन्हें संकोच नहीं होता। ट्रंप की महानता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि जबसे ये साहब अपनी पर उतरे हैं तब से दुनिया ने हिटलर, गद्दाफी, सद्दाम और किम जोंग को लानत भेजना बंद कर दिया है।
मुझे जब कभी हँसने का मन करता है तो मैं डोनाल्ड ट्रंप के भाषण सुनने लगता हूँ, क्योंकि बाकी सब कॉमेडियन तो हँसाने के पैसे लेते हैं…!
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय राजनीति में दो पक्ष होते हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की दृष्टि में विपक्ष होते हैं। भारत की राजनीति एक सधे हुए नाटक की तरह है जिसकी बाकायदा एक पटकथा है। इस पटकथा में हर पक्ष के अलग-अलग संवाद हैं।
पाँच साल में एक बार मतदान की पर्चियों से यह तय किया जाता है कि कौन-सा पक्ष कौन से संवाद बोलकर नाटक में शामिल होगा।
जिस पक्ष को अधिक सीटें मिलती हैं उसे जनता सरकार कहने लगती है। जिस पक्ष के पास सीटों की संख्या कुछ कम रह जाती है वह किसी भी तरह सरकार में आने की कोशिश करने लगता है।
दुनिया दिखावे के लिए इस व्यवस्था को लोकतंत्र कह दिया जाता है। हालाँकि इस तंत्र में लोक जमूरे की तरह नाचता है और तंत्र दर्शकदीर्घा में बैठा हुआ आनंद लेता है।
जिस पक्ष को सरकार कहलाने का सौभाग्य नहीं मिल पाता उसे जनता के वे दुःख-दर्द भी दिखाई देते हैं, जो ख़ुद जनता को भी नहीं दिखते। इसलिए वह लगातार सरकार को निर्मम, भ्रष्टाचारी और अलोकतांत्रिक सिद्ध करने में लगा रहता है।
जिस पक्ष को जमूरों ने सरकार सिद्ध किया होता है, उसे जमूरों के आचरण की सारी खामियां दिखने लगती हैं। हर सरकार जनता की दुर्दशा के लिए पिछली सरकारों को दोषी ठहराने में व्यस्त रहती है।
जनता इस नाटक से कभी बोर नहीं होती। लेकिन दर्शक दीर्घा में बैठे सरकारी पक्ष को कभी-कभी गुस्सा आ जाता है।
वह उठकर घोषणा कर देता है कि अब जिसे भी नाचना है वो केवल हमारी डुगडुगी पर नाचेगा। विपक्ष की डुगडुगी पर नाचने वालों के हाथ-पैर बांध दिए जाएंगे।
सम्वेदनशीलता का अभिनय करता हुआ विपक्ष डुगडुगी छोड़कर दर्द की शहनाई बजाने लगता है। वह दबी हुई आवाज़ में चीखता है कि यह लोकतन्त्र की हत्या है। लेकिन जिसकी डुगडुगी नहीं सुनी गई उसकी शहनाई कौन सुनेगा?
शहनाई बजाते-बजाते विपक्ष की साँस फूलने लगती है।
सरकार को थका-हारा विपक्ष देखकर अच्छा लगता है। हाथ-पैर बंधे हुए बन्दरों की बेचैनी सरकार के लुत्फ़ को बढ़ा देती है। बंधे हुए बंदर शहनाई पर नाचने की कोशिश करते हैं, लेकिन ज़रा-सा हिलने की कोशिश से भारी-भरकम बेड़ियाँ उन्हें धराशायी कर देती हैं। बेचारे बंधक आँखों की पुतलियाँ हिलाने से भी घबराने लगते हैं।
सरकार को जंजीर-डांस देखने की लत लग जाती है। धीरे-धीरे वह अपनी डुगडुगी पर नाचनेवालों के भी हाथ-पैर बांध देती है।
जनता बेचारी परेशान होकर सरकार अलट-पलट कर देती है तो दोनों पक्ष आपस में संवाद बदल लेते हैं। पटकथा ज्यों की त्यों रहती है। सम्वाद जस के तस रहते हैं। बस, बोलनेवाले बदल जाते हैं।
नाटक चलता रहता है और जमूरे आपस में लड़ने लगते हैं। ताज़ा समाचार मिलने तक इस व्यवस्था को लोकतन्त्र ही कहा जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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‘चार पैग व्हिस्की, दो बोतल बीयर, ओ माई डियर, हैप्पी न्यू ईयर’ -बचपन में ग्रीटिंग कार्ड पर इस गोत्र की शायरी लिखी जाती थीं।
‘आपकी सारी प्रॉब्लम होंगी फिक्स, ख़ुशी-ख़ुशी बीतेगा ट्वेंटी ट्वेंटी-सिक्स’; ‘नीचे से निकला आलू, 2026 चालू’ और ‘ऊपर से गिरा बम, 2025 ख़तम’ -इन महान कविताओं से इस बार भी नये साल की शुरुआत हो ही गई।
देश के एक महान कवि ने मुझे दो साहित्यिक पंक्तियों से नववर्ष की बधाई दी। ‘गाय दूध देती है लात मारकर, हैप्पी न्यू ईयर आँख मारकर।’ इन महान पंक्तियों में जो आँख मुझे मारी गई थी, वो अभी तक मेरी आँख में खटक रही है। मैंने उनका संदेश पढ़ा और सूर-कबीर से लेकर तुलसी और ग़ालिब तक को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी।
पहले के ज़माने में शुभकामनाएं देने में पैसे और समय दोनों ख़र्च होते थे। ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने या बनाने के लिए परिश्रम करना पड़ता था। फिर उसे पोस्ट करने डाकखाने तक जाना भी पड़ता था। इसलिए उसी को शुभकामनाएं दी जाती थीं, जिससे कुछ ख़ास लगाव हो।
अब हमारे हाथ में मोबाइल है। अब हम रजाई में पड़े-पड़े ही हज़ारों लोगों को शुभकामनाएं भेज देते हैं। एआई की मदद से रेडीमेड पोस्टरों पर अपना खूबसूरत चेहरा चिपकाकर हम थोक के भाव पर्सनल शुभकामनाएं भेजते हैं।
31 दिसंबर की दोपहर से ही हम अपने-अपने मोबाइल से शुभकामनाएं दागने लगते हैं। चारों ओर शुभकामनाओं की बाढ़ आ जाती है। सबके इनबॉक्स लबालब भर जाते हैं। व्हाट्सएप बल्क मैसेजिंग को स्पैम समझकर अकाउंट रेस्ट्रिक्ट कर देता है। अब इन पश्चिमी लोगों को क्या पता कि त्योहार कैसे मनाए जाते हैं।
रेस्ट्रिक्शन के साथ ही व्हाट्सएप का बिज़नेस पैकेज परचेज़ करने का ऑफर आने लगता है। तब हम भारतीयों को समझ आता है कि त्योहार की आड़ में पैसे कैसे कमाए जाते हैं।
पूरा त्योहार शुभकामनाओं के उत्तर देते हुए ही बीत जाता है। धूमधाम से मनाए जानेवाले त्योहार अब कॉपी-पेस्ट से मनने लगे हैं।
शुभकामनाओं की आमद इतनी स्पीड से होती है कि उन्हें बिना पढ़े ही ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ लिखना पड़ता है।
पिछले वर्ष एक जनवरी को ही मेरे एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया था। मैंने क्लिपबोर्ड पर ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ की मुहर बना रखी थी। शोक संदेश का डिजाइनर मैसेज भी एआई से तैयार करके भेजा गया था। मैंने भी उसे बिना डाउनलोड किए उसके नीचे अपना क्लिपबोर्ड चिपका कर भेज दिया। तब से पूरा साल बीत गया, वे मेरी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
डिजिटली भेजी गई सामग्री को यदि सच में डाउनलोड करना संभव होता तो इस एक जनवरी को मैंने लगभग तीन चार क्विंटल केक और चॉकलेट खा लिया होता।
मैंने एक बेकरी पर जाकर केक और चॉकलेट से उनके हालचाल पूछे। उन्होंने भी एआई की एक रेडीमेड शायरी पढ़कर अपना दर्द बयान किया- ‘आग लगे इस डीप फेक को, नये साल में भी कोई नहीं पूछ रहा केक को।’
मोबाइल की स्क्रीन पर घिसते-घिसते हमारे नसीब की रेखाएँ मिट गई हैं। जिन हाथों से हम हाथ मिलाते थे, वे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। जिन आँखों से हम अपनों को देखते थे, वे मोबाइल में गड़ी हुई हैं। हम अपने-अपने हिस्से का नकलीपन निभा रहे हैं। और हमें ग़लतफ़हमी है कि हम त्योहार मना रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत की राजनीति में आजकल ऑफ बीट सेक्युलरिज्म का दौर चल रहा है। सबने अपने-अपने महापुरुषों और अपने-अपने त्योहारों का कॉपीराइट करा लिया है। इसलिए जब भी कोई त्योहार आता है तो हर खेमे के लोग अपने-अपने कलैंडर खोलकर बैठ जाते हैं और उसके जवाब में अपने किसी महापुरुष की कोई घटना लेकर ताल ठोक देते हैं।
जिस खेमे का त्योहार होता है, उसकी ओर से बधाइयों के मैसेज भेजे जाते हैं और बाकी सारे खेमे एकजुट होकर उन बधाइयों के नीचे गालियाँ लिखने का काम करते हैं। इस तरह सबके मिले-जुले परिश्रम से सोशल मीडिया कंपनियों पर चांदी बरस रही है।
अभी 25 दिसंबर के दिन यही स्थिति बनी। स्वयं को सेक्युलर समझनेवालों ने बड़े दिन के अवसर पर अपने बड़े दिल का प्रदर्शन करने के लिए चैटजीपीटी की मदद से क्रिसमिस के सजावटी पोस्टर तैयार किये और डायरेक्ट मदर मेरी के आंगन में बधाइयाँ गाने पहुँच गए।
उनकी यह हरक़त भाजपा की सोशल मीडिया आर्मी को रास नहीं आई और उन्होंने सैंटाक्लॉज़ को ट्रोल करने के लिए कमर कस ली। जहाँ-जहाँ सैंटा, जीसस या क्रिसमिस लिखा दिखा, वहाँ-वहाँ कार्यकर्ताओं माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सौवीं जयंती का पोस्टर चिपका दिया।
हर पोस्ट के साथ यह कहते हुए लानत भेजी जाने लगी कि, ‘पश्चिमी सभ्यता के त्योहार याद रहे और अपने अटल जी की जयंती को भूल गए।’
ये और बात है कि किसी महापुरुष को भूल जाने की लानत भेजनेवाले ख़ुद महामना मदनमोहन मालवीय जी की जयंती को भूले हुए थे। बहरहाल, क्योंकि अटल जी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया की वार में अपना पलड़ा भारी पड़ रहा था तो मालवीय जी को परेशान करने की क्या ज़रूरत थी?
इधर भाजपा अटल जी की सौवीं जयंती का पांचजन्य बजा चुकी थी, उधर एक अलग खेमा पहले ही गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों की कुर्बानी को याद करने का अभियान छेड़ चुका था। इस खेमे का जोश इतना अधिक था कि 26 दिसंबर की घटना से ही 25 दिसंबर के त्योहार को चारों खाने चित्त कर दिया गया था।
क्रिसमस का उत्साह दीवार में चिन गया और भाजपा ने अटल जी की जन्मशती का उत्सव धूमधाम से मना लिया।
उधर कट्टर सेक्युलरों ने भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी-अपनी हार्डडिस्क का हज़ारों टीबी डाटा खंगाल मारा और भाजपा नेताओं की चर्चप्रेयर की तस्वीरें खोज-खोजकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीं।
त्योहार का उत्साह ऐसा रहा कि सबने एक-दूसरे को धूमधाम से गालियां देकर रात काट दी। सुबह फेसबुक मेमोरी ने याद दिलाया कि इसी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में पिछले साल ज़ोर-शोर से मनाया गया था। तुलसी मैया इस वर्ष भी अपने पूजन के महामहोत्सव की राह तकती रह गईं लेकिन सोशल मीडिया आर्मी को इस बार अपने आंगन की तुलसी दिखाई ही नहीं दी।
अपने-अपने त्योहार के शुभ अवसर पर सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगे हैं। गले मिलने के अवसरों पर हम गिरेबान में झाँकने की नसीहतें देने लगे हैं। उपहार के मौकों पर उपहास की गुंजाइश तलाशी जा रही हैं। उत्साह और उन्माद के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। और जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ये महाभारत जारी है, उन्हें दीपावली, ईद और क्रिसमिस में कोई अंतर नज़र नहीं आता।
✍️ चिराग़ जैन
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देश की यातायात व्यवस्था देखकर मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। पूरी दुनिया सड़कों के रास्ते दफ्तर पहुँचती है और दफ्तर पहुँचकर चुनौतियों से जूझने लगती है। हम भारतीय चुनौतियों से जूझते हुए दफ्तर पहुँचते हैं और दफ्तर पहुँचकर चैन की साँस लेने लगते हैं।
अन्य देशों के लोग गाड़ी की पिछली सीट पर बैठकर अख़बार पढ़ते हैं, लेकिन हम सड़कों के अप्रतिम सौंदर्य के कारण गाड़ी में अख़बार नहीं पढ़ पाते, इसलिए दफ्तर पहुँचकर अख़बार पढ़ने लगते हैं।
चूँकि हम भारतीय बड़े दिलवाले लोग हैं इसलिए तीन लेन की सड़क पर पाँच लेन बनाने में कभी नहीं कतराते। सड़क पर बनी सफेद-पीली पट्टियां हमारी शक्ल देखती रह जाती हैं और हम उनके अरमानों को कुचलकर लहराते हुए निकल जाते हैं।
हम पश्चिम की तरह यू टर्न के लिए सड़क को चौड़ा नहीं करते, बल्कि उसके लिए मेन लेन को भी संकरा कर देते हैं। प्रेम गली अति सांकरी…!
होंगे वे और देश जहाँ पैदल चलने के लिए फुटपाथ बनाए जाते हैं। हम वसुधैवकुटुम्बकम वाले तो इन फुटपाथों पर सपरिवार निवास करते हैं। दुनिया बैडरूम में हाइवे का चित्र लगाती है, हम हाईवे पर ही बैडरूम बना लेते हैं। खुले आसमान के नीचे…!
चूँकि सड़कें राष्ट्र की धरोहर हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए यातायात पुलिस की भी सुविधा है। ये कर्मठ सेवक सड़क पर कभी भी, कहीं भी बैरिकेड्स लगाकर चले जाते हैं। इनका विश्वास है कि बैरिकेड्स अपने आप गाड़ियों को नैतिकता की प्रेरणा देते रहेंगे।
बीच के डिवाइडर पर लगी रेलिंग कहीं भी अपनी महान सड़कों के चरण स्पर्श करने सड़क पर उतर आती है। रिपेयर करने के बाद बचे हुए पत्थर, बजरी आदि को वहीं सड़क पर छोड़ दिया जाता है ताकि जनता अपने नेताजी का एहसान याद रख पाए।
पेड़ की डालियाँ अगर झुककर ट्रैफिक सिग्नल का चेहरा छिपा दें तो हम अनुमान से चौराहा पार करते रहते हैं लेकिन डाली और सिग्नल के इस प्रणय में खलल नहीं पड़ने देते।
रेलिंग, बैरिकेड्स, पेड़ों की डालियों, भिखारियों, रेहड़ियों, गड्ढों और कचरे से जो जगह बच जाती है वहाँ मवेशी विचरण करते हैं। क्योंकि ‘सबै भूमि गोपाल की!’
दुनिया को होगा अपने राजमार्गों पर अभिमान। हमने तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों के सम्मान में गीत लिखे हैं- ‘गड्डी जांदी है छलांगां मार दी।’
हम भारतीयों का कलाप्रेम देखना हो तो किसी ट्रक का सौंदर्य देख लो। नजरबट्टू से लेकर चुटीले तक सब कलात्मक। यहाँ तक कि हॉर्न में भी गाना भरवा रखा होता है। रात के अंधेरे में रेस-पैडल पर ईंट रखकर पालथी मारकर पैग लगाता ट्रक-ड्राइवर, जब अस्सी-नब्बे की स्पीड में ट्रक दौड़ाते हुए हॉर्न से मधुर संगीत बजाने लगता है तो ऐसा लगता है, मानो स्वर लहरियां बिखेरती हुई किसी गंधर्व की सवारी आ रही है।
मैंने अपने ड्राईवर से पूछा कि ख़तरा किसे कहते हैं तुम्हें पता है। उसने बाईं ओर स्टीयरिंग घुमाकर एक गाड़ी को ओवरटेक किया और बोला- “साहब, ख़तरा तो बाएं हाथ का खेल है।”
✍️ चिराग़ जैन

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जो लोग रुपये के गिरने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उन्हें मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि रुपया सरकार के कारण नहीं, तुम्हारी फटी हुई जेब के कारण गिरता है।
यदि तुमने अपनी जेब सिल ली होती तो रुपया नहीं गिरता। सरकार उचित नीतियां बनाकर सारा रुपया अपने पास सुरक्षित करना चाहती है तो जनता शोर मचाने लगती है।
अब ले लो मज़े, और रखो अपने पास। अब गिर गया ना रुपया। अब पड़ गया चैन?
जेब नहीं सिल पाए तो कम से कम जुबान ही सिल लो। देश की करंसी के विषय में ऐसी गिरी हुई बातें करनेवालों को राष्ट्रद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
जिसे गिरना हो वो गिरेगा ही। शादियों में लोग आसमान की ओर रुपये उछालते हैं, लेकिन रुपया फिर ज़मीन पर आ गिरता है। अब जिसे गिरने की आदत पड़ गई हो, उसे कोई कहाँ तक उछाल सकेगा?
सोशल मीडिया पर रुपये की गिरावट को लेकर बड़ा मज़ाक बनाया जा रहा है। ये काफ़ी गिरी हुई हरकत है। गिरते को गरियानेवाला नजरों से गिर जाता है।
रुपया बेचारा कब से ललचायी नज़रों से नब्बे के अंक को देख रहा था। हमारी नीतियों ने अथक परिश्रम करके उसे नब्बे पार करवाया है। इस उपलब्धि पर सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए लेकिन जिन्हें केवल आलोचना करनी है उनका कोई इलाज नहीं है।
यह सरकार का बड़प्पन है कि दूसरों की गलतियों की सज़ा चुपचाप भुगत रही है। दरअस्ल रुपया नेहरू जी के कारण गिरता है क्योंकि नेहरू जी ने रुपया गोल बनाया। अब गोल है तो लुढ़केगा ही। यदि उन्होंने रुपया चौकोर बनाया होता तो रुपया कभी नहीं गिरता।
डॉलर ने रुपये को छेड़ते हुए कहा- “आज खुश तो बहुत होगे तुम। जो रुपया गिरे हुओं को भी चढ़ा देता था, आज वो ख़ुद गिरा पड़ा है।”
इस पर रुपये ने खनकता हुआ जवाब दिया- “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।”
डॉलर ने चिकोटी काटकर बात आगे बढ़ाई- “रुपये को उठाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।”
रुपये ने थोड़ा दार्शनिक होते हुए जवाब दिया- “कौन कमबख्त उठने के लिए गिरता है, हम तो गिरते हैं ताकि बाज़ार उठ सके।”
डॉलर फिर बोला- “बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे, तेरा डॉलर।”
रुपया गिरे हुए गुरूर से बोला- “मुझ पर एक एहसान करना, मुझ पर कोई एहसान मत करना।”
डॉलर ख़ुद पर इतराते हुए बोला- “हमारा डॉलर गिरा होता तो हमारी सरकार उसे उठाने के लिए जी-जान लगा देती।”
अब हमारे नेताजी बोले- “मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता डॉलर सेठ!”
डॉलर अपना सा मुँह लेकर रह गया। हमारे नेताजी ने जेब से रुपया निकाला और ख़ुद की नजर उतारते हुए डायलॉग बोला- “बाबूमोशाय, बात ऊँची होनी चाहिए, सच्ची नहीं।”
✍️ चिराग़ जैन
