Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
वाह वाह!
नाम ही दशरथ था
काम तो
शतरथ वाला किया।
जुनून; लगन; मेहनत; सनक; दीवानगी
…इन सबसे आगे का शब्द खोज
बे शब्दकोश!
हुए होंगे कहीं पत्थर
जिनको तराशता था आदमी
मैंने तो आज
पत्थरों को
इक आदमी तराशते देखा।
सचमुच यार
सितार की झंकार
और बंसी की तान पर
थिरकती मुहब्बत से
ज़्यादा महँगी लगी
छैनी-हथौड़े की टंकार पर
उकरती मुहब्बत!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Jainism, Poetry
चलो बताएं आज तुम्हें वैज्ञानिक धर्म हमारा है
क्या हैं व्रत उपवास और क्या नियम त्याग संथारा है
हमें फर्क पड़ता है छोटी चींटी तक की पीर से
हमें अहिंसा मिली विरासत में भगवन् महावीर से
वृक्षों में जीवन होता है; अब ढूंढा विज्ञान ने
हमें बताया युगों पूर्व ये ऋषभदेव भगवान् ने
हमें लैंस की नहीं ज़रूरत जल के जीव बांचने को
हमें मिले हैं गुणस्थान अन्तस् का ताप जांचने को
शाकाहारी जीवन शैली, परहित का उपदेश मिला
हमें हमारे पुरखों से मानवता का सन्देश मिला
श्रावक श्रमण व्यवस्था वाला इक समाज विज्ञान मिला
जियो और जीने दो जैसा अद्भुत अविरल ज्ञान मिला
परिग्रह को जब पाप कहा तो साम्यवाद को नींव मिली
क्षमाभाव सर्वोपरि रक्खा; प्रेम-प्यार को जीभ मिली
हमने राणा के प्रताप को दानी भामाशाह दिए
जो अणुव्रत की नाव चलाएं तुलसी से मल्लाह दिए
हमने भारत के गौरव को चन्द्रगुप्त का मान दिया
बिम्बिसार, संप्राति, भोज और वीर अशोक महान दिया
हमने दिव्य प्रकाश पुंज; जब जब अंधियारी छाई; दिए
हमने अंतरिक्ष को भेदा विक्रम साराभाई दिए
जो हिंसा के घोर विरोधी, जन-गण के उन्नायक थे
वो बाबा गांधी भी तो इस जैन धर्म के गायक थे
अर्थमार्ग और मोक्षमार्ग का इक समतल आभास दिया
हमने अपनी भारत माँ को गौरवमयी इतिहास दिया
किसी जीव को नहीं सताएँ ये पावन संकल्प लिया
तर्कहीन धर्मांध न होवें ऐसा शास्त्र प्रकल्प लिया
जो मानवता की द्योतक है, मानव मन तक फैली है
वही अहिंसा जैनधर्म की मौलिक जीवन शैली है
लखनऊ में महावीर की प्रतिमा टूटी तब क्यों मौन रहे
वोटों की मंडी में सत्तर लाख की पीड़ा कौन कहे
भीतर माल ठूंस कर बाहर दाँत दिखाने बंद करो
मानवता की चिंता है तो बूचड़खाने बंद करो
हमने सदा पैरवी की है; पुरखों के सन्देश की
हमें ज़रूरत नहीं किसी न्यायालय के आदेश की
हम मानवता की रक्षा हित नियमों के मोहताज नहीं
हम तन-मन-धन से मानव हैं, कोरे ड्रामेबाज़ नहीं
हमने कभी नहीं पोसा है कर्मकांड के दूषण को
हमने शीश चढ़ाया केवल तर्कयुक्त आभूषण को
लो महत्व समझो सागर में मिलती जीवन धारा का
लो वैज्ञानिक मतलब समझो जैनों की संथारा का
जब शरीर अक्षम हो जाए बचने का कुछ ठौर न हो
जब मृत्यु प्रत्यक्ष खड़ी हो, राह कहीं पर और न हो
तब बेचैनी त्याग आत्मचिंतन दायित्व हमारा है
जीवन के अंतिम क्षण में निज का चिंत्वन संथारा है
जीवन के अंतिम अवसर का मधुर गान है संथारा
स्वास्थ्य शोथ कर देह समर्पण का विधान है संथारा
यह ऐसी तकनीक है जिससे जीवन का सुख नष्ट न हो
देह और अशरीर छूटने लगें तो किंचित कष्ट न हो
आत्मघात और संथारा के चिंतन में है इतना भेद
आत्मघात में मृत्यु प्रमुख है संथारा में मृत्यु निषेध
आत्मघात जैसी कायरता वीरों का तो तौर नहीं
हम वंशज हैं महावीर के कायर या कमज़ोर नहीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
किसी की बात में आकर बँटा आँगन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
जहाँ के खेत में बंदूक बोते थे भगत बाबा
जहाँ की जेल में जगते थे, सोते थे भगत बाबा
जहाँ हमको मिला दुश्मन की दहशत का नमूना था
जहाँ फाँसी के फंदे को भगतबाबा ने चूमा था
उसी लाहौर को अब जुर्म का घर दिया तुमने
जहाँ पुरखों की यादें थीं वहाँ डर भर दिया तुमने
हमारे तीरथों को ख़ून से तर कर दिया तुमने
न जाने किसके बहकावे में ये अनबन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
नहीं भूले अभी तुम चावड़ी बाज़ार की गलियाँ
कराची की हमें भी याद हैं दिन रात रंगरलियाँ
हुई तक़सीम तो जैसे ज़फ़र का ख़्वाब टूटा था
बिलख उट्ठे थे लाला लाजपत, पंजाब टूटा था
पुराने दिन करोगे याद तो ये पीर समझोगे
छिनी है प्यार की कितनी बड़ी जागीर समझोगे
तुम्हें क्योंकर नहीं देते हैं हम कश्मीर समझोगे
जहाँ ख़ुशियाँ मनानी थी वहीं मातम मना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
ज़रा सी जि़द बड़ी कर ली, वतन छोटा बना डाला
खरी आज़ादी की ख़ुशियों को भी खोटा बना डाला
ख़ज़ाना छोड़ कर अब ठीकरों की मांग करते हो
ज़ेह्न में नफ़रतें रख दोस्ती का स्वांग करते हो
सभी गर सब्ज़ हैं तो फिर बताओ ज़र्द कितने हैं
करोड़ों प्यार वाले हैं तो दहशतगर्द कितने हैं
ये दहशतगर्द अपनी क़ौम के हमदर्द कितने हैं
अमां तुम पीतलों को सोच में कुन्दन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
चलो छोड़ो ये बातें क्या हुआ होगा आज़ादी पर
किसे किस बात ने गहरे छुआ होगा आज़ादी पर
कहीं जिन्ना अड़े होंगे, कहीं नेहरू अड़े होंगे
मगर इक़बाल, गांधी और आगा रो पड़े होंगे
खुले आँगन में इक परिवार जब हारा सही था क्या
यहाँ जब भाई ने ही भाई को मारा सही था क्या
ज़रा सोचो हुआ था जो वो बँटवारा सही था क्या
अरे, ताउम्र ना मिलने का कैसे मन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दुर्घटना घटे सड़क पर तो हम रुकने को तैयार नहीं
आँखों के आगे जुल्म बढ़े तो हम करते प्रतिकार नहीं
अब हमको फर्क नहीं पड़ता चालीस मरे या चार मरे
पानी बन गया लहू वह जो बढ़कर भीषण हुंकार भरे
जब भूखी उम्मीदें टूटीं खलिहान जले हम मौन रहे
जब धनिया की अस्मत लूटी पत्थर पिघले हम मौन रहे
लालच ने जब नैतिकता का दर्पण तोड़ा हम मौन रहे
लाचारी को ताक़त ने जब बेघर छोड़ा हम मौन रहे
निर्बल की आह-कराह सुनी, दिल दहल गया, हम मौन रहे
टीवी पर चर्चाएँ सुन ली, मन बहल गया, हम मौन रहे
अपराध घटित होता है तो देखा करते हैं मौन खड़े
फिर ये कहकर बढ़ जाते हैं, छोड़ो पचड़े में कौन पड़े
शोषित पर अत्याचार हुआ, शोषक ने अट्टाहास किया
नुक्कड़ पर खड़े बतोलों ने, उपहास किया, परिहास किया
अख़बारों को हेडलाइन मिली, टीवी ने ख़ूब विलास किया
हम भी संवेदनहीन हुए, हमने भी टाइमपास किया
उम्मीद कभी चलकर अपने द्वारे तक आई तो होगी
रातों में किसी बिचारी ने साँकल खटकाई तो होगी
हमने ख़ुद बंद किया बढ़कर सब खिड़की रौशनदानों को
गुलदस्ते लेकर पहुँच गए जब बेल मिली सलमानों को
छोड़ो ये चर्चा कब कितना नुकसान हुआ घोटालों से
पहले ये सोचो औलादें क्यों सस्ती हुई निवालों से
छोड़ो इन बातों की चर्चा सरकार हमें क्या दे पाई
पहले ख़ुद से ये तो पूछो क्यों भूखा मरा सगा भाई
कुछ रंग-बिरंगे चोलों ने भड़काया तो हम भड़क गए
पत्थर की गिरी इमारत तो हम सबके बाजू फड़क गए
लेकिन तब ख़ून नहीं उबला, ना गुस्से को सुर-साज मिला
जब पन्द्रह दिन की बच्ची को दिल्ली में नहीं इलाज मिला
हमने कब किसकी रक्षा की, अपराधों से, आघातों से
निष्क्रियता पर पर्दे डाले कुछ रटी रटाई बातों से
शासन पर प्रश्न उठाएंगे, सत्ता को जी भर कोसेंगे
सिस्टम से आस लगाएंगे, अपने आलस को पोसेंगे
क्या ये सचमुच आवश्यक है हम सच से पीठ किए बैठें
क्या से सचमुच आवश्यक है अवसर पर होंठ सिए बैठें
ये क्या हो गया हमें आख़िर, धमनी में ख़ून नहीं है क्या
निष्क्रियता को बंदी कर ले, ऐसा क़ानून नहीं है क्या
खादी, खाकी, व्हाइट कालर, ये सब हममें से ही तो हैं
इक्के, बेग़म, राजा, जोकर, ये सब हममें से ही तो हैं
केवल इतना भर अंतर है, केवल इसके ही हैं झगड़े
कुछ खिड़की के इस पार खड़े, कुछ खिड़की के उस पार खड़े
यूँ तो हममें से हर कोई बढ़-चढ़कर बात बनाता है
जिसका जिस पर वश चलता है, वो उससे स्वार्थ सधाता है
हम किस दिन ये सच समझेंगे सारा नुक्सान हमारा है
जिसको दिन-रात कोसते हैं, वो हिन्दुस्तान हमारा है
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Free Verse, Poetry
मन दुखी है
मेरा ही नहीं… सबका
आज सिर्फ़ क़लाम साहब ही
सुपुर्द-ए-ख़ाक़ नहीं हुए
उनके साथ ही दफ़्न हो गई
ये उम्मीद भी
कि इस देश का मीडिया
कभी ज़िम्मेदार होगा
इस देश का मीडिया
कभी संवेदनशील होगा
इस देश का मीडिया
कभी इस देश का होगा।
मीडिया ने बोला नहीं
पर साफ़-साफ़ बता दिया
याक़ूब ज़्यादा बिकाऊ था…
अच्छा ही हुआ
हमारे क़लाम साहब
नहीं बिके
आख़िरी दिन भी।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Free Verse, Poetry
आह!
कलाम साहब नहीं रहे!
जीवन की अंतिम श्वास तक
सक्रिय और सकारात्मक रहकर
आप नहीं रहे!!
देह ही हारी होगी
मन तो जीवित ही था आपका
चिकित्सकों ने काश मन टटोला होता
तो कह न पाते कि “ही इज़ नो मोर…”
सुना है “लिवेबल प्लेनेट अर्थ” पर बोल रहे थे आप
महसूस हुआ होगा इस दौरान
कि ये प्लेनेट अब लिवेबल रहा नहीं।
आपने कभी जुड़ने ही नहीं दिया अपने साथ
कोई वाद, कोई धर्म, कोई विशेषण।
आप मानव थे
सिर्फ़ मानव…
भरपूर मानव।
आपने कभी कुछ नहीं लिया इस देश से
आपने कभी कुछ नहीं मांगा इस देश से
यहाँ तक कि
अंतिम समय इतना भी समय नहीं दिया
कि कोई कुछ दे सके आपको।
आपने कभी प्रवचन नहीं दिया
आपका हर आचरण एक संदेश देता था।
एक लम्बे समय बाद बच्चों को कोई ऐसा मिला था
जिसके जैसा बनने के सपने देखे गये।
बच्चों जैसी जो निश्छल खिलखिलाहट आपकी सखी थी
वह आपके अन्तर्मन की जीवंत एक्स-रे थी।
आप राष्ट्रपति ही नहीं थे कलाम साहब
आप तो हृदयाधिपति थे इस देश के
आप धड़कते रहोगे यौवन के सीने में
आप खिलते रहोगे बच्चों की मुस्कान में
आप पुलकते रहोगे उत्सवों में
आप दौड़ते रहोगे धमनियों में
बन्द गले का सूट पहने
जब कोई लम्बे सफ़ेद बालों वाला
खिलखिलायेगा हाथ हिलाकर
तब सब कहेंगे
ये तो कलाम साहब जैसा है यार!
✍️ चिराग़ जैन