Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दो घड़ी को
मैं किसी आकाश के रोमांच की
बांहें पकड़ कर;
उस धरा द्वारा मुझे सौगात में सौंपे गए
अविरल सुरक्षा भाव का
अपमान कर आया;
जो कि मुझको हर दफ़ा
अस्थिर उड़ानों से
पुनः नीचे उतर आने पे
बढ़कर थाम लेती है।
वे उड़ानें
(मैं जिन्हें उन्माद में
ऊँचाइयों पर ठहर जाने का
तरीका मान बैठा हूं)
महज ज़िद पर उतर आए
किसी बालक की ऐसी कूद भर है
जो थका कर मौन करती है मुझे
क्योंकि अभी
धरती के आकर्षण की सीमा
लांघ जाने का
अतुल साहस नहीं है
मेरी बचकाना उड़ानों में।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हर बार इन्हें मुफ्त के सपने न दिखा तू
इक बाद बदल डाल ये किस्मत का लिखा तू
ये मुफ्तख़ोरी देश को बर्बाद न कर दे
ऐ राजनीति इनको कमाना भी सिखा तू
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
ऐसा संवत्सर आया है
बूढ़ा अमुवा बौराया है
छोटी छोटी कैरी आई
झड़बेरी पर बेरी आई
शहतूतों का रंग लाल हुआ
सहजण का पेड़ कमाल हुआ
गेंदा फूला, गुडहल फूला
चिड़ियों ने फिर झूला झूला
पीपल पर कोंपल नई नई
पिलखन पर चिड़िया कई कई
नम हुए सूखते हुए सोत
झूमे तोते, झूमे कपोत
ककड़ी का हरियाला मौसम
आया खीरों वाला मौसम
खरबूजे की मीठी सुवास
तरबूज सजे हैं आसपास
कांजी, नीबू, जलजीरा भी
आम्बी का पना, कतीरा भी
लस्सी, शर्बत, सत्तू, मट्ठा
चुस्की, कुल्फी, चटनी चट्टा
नुक्कड़ पर प्याऊ की मढ़िया
अमराई में बैठक बढ़िया
पिकनिक का मूड बनाया है
छुट्टी से मन हर्षाया है
ऐसा संवत्सर आया है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिर्फ दिखावे भर के सारे उत्सव मेले हैं
सब अपने-अपने जीवन में निपट अकेले हैं
अपनेपन का नाम सुना है, शक्ल नहीं देखी
रिश्तों पर मिटने वालों की नस्ल नहीं देखी
बाहर से ख़ुश हैं पर भीतर बहुत झमेले हैं
वैभवशाली दिखने की इक होड़ लगी है रे
जर्जरता भी बाहर से बेजोड़ लगी है रे
हीरे बनकर घूम रहे मिट्टी के ढेले हैं
बेमतलब की प्रीत, ठिठोली पीछे छूट गई
मन से मन तक जाने वाली डोरी टूट गई
कौन बताए किसको किसने क्या दुःख झेले हैं
जिनसे अपनापन चाहा उनसे सम्मान मिला
संबंधों की नब्ज़ छुई तो मन बेजान मिला
वाणी पर है शहद दिलों में सिर्फ करेले हैं
क्या संबंधों वाले सारे किस्से झूठे थे
या सचमुच पिछली पीढ़ी के लोग अनूठे थे
क्या अब भी दुनिया में वैसे कुछ अलबेले हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए
लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए
एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए
कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिर्फ अपने किसी स्वार्थ को साधने
मैं दिखावा कभी भी न कर पाउँगा
मैं ग़लत को ग़लत ही कहूँगा सदा
झूठ बोला कभी तो बिखर जाउँगा
बस किसी एक झूठी ख़ुशी के लिए
भ्रम तुम्हें सौंप दूँ ज़िन्दगी के लिए
सत्य तो सत्य ही है सभी के लिए
अब बुरा होउंगा कल सँवर जाउंगा
आज कर्तव्य गर ये निभाऊँ नहीं
भ्रम तुम्हारा अगर तोड़ पाऊँ नहीं
और ख़ुद से नज़र मैं मिलाऊँ मैं
कुछ ठिकाना नहीं फिर किधर जाउंगा
यूँ अगर आज रिश्ता निभाना पड़े
हर किसी बात पर सिर झुकाना पड़े
सच समझते हुए मुँह चुराना पड़े
तन जियेगा मगर मन से मर जाऊंगा
आज तुमको अगर पा लिया झूठ से
दोस्ती का दिखावा किया झूठ से
गर तुम्हें आज बहला लिया झूठ से
देखना एक दिन मैं मुकर जाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन