दर्पण मैला हो तो
धृतराष्ट्रों को विदुरों की हर बात कसैली लगती है
दर्पण मैला हो तो सारी शक्लें मैली लगती हैं
✍️ चिराग़ जैन
धृतराष्ट्रों को विदुरों की हर बात कसैली लगती है
दर्पण मैला हो तो सारी शक्लें मैली लगती हैं
✍️ चिराग़ जैन
जब-जब आयुध पर अहंकार की परत चढ़ी इतिहासों में
तब चंद्रहास को रावण-ग्रीवा भेंट मिली है ग्रासों में
जब शास्त्रनीति की अनदेखी कर, तीर चलाए जाते हैं
तब अर्द्धरात्रि में सोते बच्चे मार गिराए जाते हैं
अविवेक शक्त हो जाए तो, हर रेख लांघता रण तय है
नि:शस्त्रो की हिंसा तय है, गर्भस्थों का तर्पण तय है
जब धर्म विफल हो जाता है, आवेशों को समझाने में
तब द्रोणपुत्र को देर नहीं लगती पिशाच बन जाने में
ऋषिकुल से जब भी ग्रहण किये दुर्द्धर्ष शस्त्र रघुबीरों ने
मंत्रों से मन को शुद्ध किया ऋषियों ने और फकीरों ने
यह शस्त्रशुद्धि का उपक्रम केवल ढोंग नहीं, आवश्यक है
यह शक्ति-शौर्य को इंगित है कि दुरुपयोग निजघातक है
रण में जब क्रोध चढ़े सिर पर, रणचण्डी तांडव करती हो
जब काल खड़ा गुर्राता हो, जब भू पर मौत विचरती हो
जब युद्ध चरम पर आ पहुँचे, जब तप्त शिराएँ दहती हों
जब शव पर चलना पड़ता हो, जब रक्त तटीना बहती हो
जब भले बुरे का भान न हो, जब नेत्र बड़े हो जाते हों
जब जबड़े भिंचने लगते हों, जब रोम खड़े हो जाते हों
जब अपने घावों की पीड़ा का ध्यान न हो, आभास न हो
जब महासमर में ध्वंस मचाने में कोई संत्रास न हो
जब हृदय शून्य हो जाता हो, मस्तिष्क गौण हो जाता हो
जब देह शेष रह जाती हो, कारुण्य मौन हो जाता हो
जब क्रोध धधकता हो भीषण, सारा विवेक खो जाता हो
वैरी का लोहू पी-पीकर, जब नर, पिशाच हो जाता हो
ऐसे आवेगुद्वेगों में संयत रहने का ध्यान रहे
विध्वंस मचाने से पहले मानवता का कुछ भान रहे
शर का संधान करे उस क्षण, दो नयन निमीलित हो जाएँ
आक्रोश, क्रोध, आवेश, ध्वंस इक क्षण को कीलित हो जाएँ
गाण्डीव उठाए जब अर्जुन, उस पल उसको यह भास रहे
छूटा शर लौट न पाएगा, बस इतना भर अहसास रहे
दिव्यास्त्र साधने से पहले, योधा पल भर यह ध्यान धरे
क्या यह क्षण टल भी सकता है, इसका उत्तर अनुमान करे
झंझा के तेज झखोरे में, अंतर दीपक को आड़ मिले
हिंसा से घिरते चेतन को, सत्पथ का एक किवाड़ मिले
इस हेतु दहकते शोलों पर, थोड़ी बौछार ज़रूरी है
इस हेतु शस्त्र संधान समय में मंत्रोच्चार ज़रूरी है
✍️ चिराग़ जैन
सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा
बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा
✍️ चिराग़ जैन
रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है
मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है
चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है
✍️ चिराग़ जैन
इक कमीशनखोर से उसकी कमीशन छीन ली
उसने मासूमों से सारी ऑक्सीजन छीन ली
हाकिमों ने वहशियों के साथ बस इतना किया
दे के उनको ट्रांसफर उनकी डिवीजन छीन ली
✍️ चिराग़ जैन
अगर पूरी हक़ीक़त जानने की चाह रखते हो
अमां फिर मुल्क के हालात अख़बारों से मत पूछो
जहाँ तक हो सके हर शख़्स की बढ़कर मदद कीजे
तरक़्क़ी आएगी कैसे? -ये सरकारों से मत पूछो
हमें अब अम्न की बातें महज बकवास लगती हैं
वतन से प्यार करनेवालों की खिल्ली उड़ाते हैं
सियासत के नुमाइंदे वतन को खा रहे जमकर
कभी मुम्बई निगलते हैं, कभी दिल्ली उड़ाते हैं
हमारी फ़िक्र घुटकर रह गई है एक बुलेटिन तक
बसों में वक़्त कटने के लिए बातें भी करते हैं
महज फ़ीगर समझ बैठे हैं हम भी आदमी को अब
हमें सिहरन नहीं होती कहीं जब लोग मरते हैं
हमें मसरूफ़ करके रोज़ बेमतलब के मुद्दों में
सियासत चैन से अपनी ज़मीनें सींच आती है
हमें गंगाजली और आबे-ज़मज़म की क़सम देकर
हुक़ूमत पैग पटियाला लपककर खींच आती है
अगर हम आपसी नफ़रत का थोड़ा शोर कम कर दें
तो फिर अहले-रियाया की आवाज़ें मर नहीं सकती
अगर हम रोज़मर्रा के मसाइल को तवज्जोह दें
सियासत फिर कोई भी बदतमीज़ी कर नहीं सकती
✍️ चिराग़ जैन