Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
कभी मुद्दा, कभी चेहरा, कभी पाला बदलता है
सियासतदां सियासत के लिए क्या-क्या बदलता है
न पूछो वक़्त अपने साथ में क्या-क्या बदलता है
सुबह से शाम होने तक मेरा साया बदलता है
यहाँ हर आदमी उस गाम पर चेहरा बदलता है
जहाँ जाकर मेरे किरदार का ओहदा बदलता है
हुनर का वो भी इक मैयार होता है जहाँ जाकर
हुनर अपने तरीक़े से ही ये दुनिया बदलता है
सुलह हो भी तो आख़िर किस तरह मुमक़िन हो उससे, जो
सफ़ाई सुनने से पहले हर इक शिक़वा बदलता है
मिसालें दी नहीं जा सकतीं सफ़रे-क़ामयाबी की
कि इसका काफ़िला हर दौर में रस्ता बदलता है
कभी शाहों को भी लाचार देखा है बिसातों पर
कभी शतरंज की बाजी कोई प्यादा बदलता है
मरासिम जो बदल पाते नहीं गर्दिश की राहों पर
ग़ज़ब होता है जब उनको भी ये पैसा बदलता है
बहुत देखा शराफ़त के सफ़र पर राहगीरों को
कोई रस्ता बदलता है, कोई हुलिया बदलता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक
तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक
कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक
अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
शहीदों ने लिखी थी कल हमारे नाम आज़ादी
मगर हमने बना डाली है इक इल्ज़ाम आज़ादी
‘ग़ुलामी की ज़दों में ज़िन्दगी दुश्वार होती है’
हमें चुपके से दे जाती है ये पैग़ाम आज़ादी
कमाई से कहीं मुश्क़िल है दौलत की हिफ़ाज़त भी
संभाले रख नहीं पाए कई सद्दाम आज़ादी
घड़ी भर को नज़र चूकी, अंधेरा हो गया ग़ालिब
छिनी दिन की, ज़रा सी चूक से, हर शाम आज़ादी
भला ऐसा हुआ क्या था कि केवल छह महीने में
कोई तेरे हवाले कर गया हे राम आज़ादी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
सच के कारण मिली नफ़रत क़ुबूल है लेकिन
झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती
यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं
पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती
भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है
तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती
उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था
अब मेरी एक भी आदत नहीं अच्छी लगती
कैसे इस दौर के बच्चों को दुआ दे कोई
इनको पुरख़ों की नसीहत नहीं अच्छी लगती
काम जिस शख़्स का चलता हो बेइमानी से
उसको दुनिया में शराफ़त नहीं अच्छी लगती
क़ायदा जिसने मुहब्बत का पढ़ लिया हो चिराग़
उनको फिर कोई शरीयत नहीं अच्छी लगती
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
भली कहाँ है भला ये तनाव की आदत
ज़रा-सी बात से आँखों में ताव की आदत
हरेक राह से मंज़िल तलक़ पहुँचता है
नहीं चुनाव पे निर्भर बहाव की आदत
माँ ने चीज़ें भी सहेजी सदा रिश्तों की तरह
हमने अपनाई नहीं रखरखाव की आदत
कभी ये देश धड़ी में हिसाब करता था
सभी को पड़ गई है आज पाव की आदत
ख़ामोश रह के सबको पार लगा देती है
एक दिन नाव डुबोएगी नाव की आदत
भरा, बड़ा, नरम, लदा, उदार और भारी
इन्हीं में तो सदा दीखी झुकाव की आदत
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं
लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं
जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं
साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं
मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं
✍️ चिराग़ जैन