निभा ले मुझको
मौत ने ज़िन्दगी का मोल लगा रखा है
अपने इक़रार की क़ीमत दे, बचा ले मुझको
मेरे किरदार का हर रंग तो चुभता भी नहीं
एक मौसम ही समझ के तू निभा ले मुझको
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
मौत ने ज़िन्दगी का मोल लगा रखा है
अपने इक़रार की क़ीमत दे, बचा ले मुझको
मेरे किरदार का हर रंग तो चुभता भी नहीं
एक मौसम ही समझ के तू निभा ले मुझको
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
क्या हुआ हासिल बुलंदी पर पहुँच कर ऐ ख़ुदा
जश्ने-दिल यां जश्ने अब्रां, जश्ने-रूह, जश्ने-सबा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
नसीहतें अनसुनी रहेंगी, यही रवायत पनप रही है
पुरानी आफ़त तो टल गई पर नई मुसीबत पनप रही है
कहीं तिज़ारत, कहीं ज़रूरत, कहीं पे वहशत पनप रही है
अमां हटाओ भी दौरे-नौ में कहाँ शराफ़त पनप रही है
इधर मेरे घर में एक नन्हीं, हसीं नज़ाक़त पनप रही है
उधर मेरे मन में सुर्ख़ियों की तमाम दहशत पनप रही है
किसी की मजबूरियों के घुटने कभी टिकें तो ये याद रखना
जहाँ दबाया था हसरतों को वहीं बग़ावत पनप रही है
वो एक हिंदू, ये एक मुस्लिम, वो इसका दुश्मन, ये उसका दुश्मन
इसी तरह के फ़िज़ूल जुमलों पे अब सियासत पनप रही है
हरेक सच को बयान कर दें, पलट के रख दें हरेक बाज़ी
तुम्हारी मजबूरियों के दम पर, हमारी हिम्मत पनप रही है
जो एक आदत-सी हो गई है, तुम्हें हमारी ख़ुशामदों की
तुम्हारी आदत की आड़ लेकर, हमारी चाहत पनप रही है
बहुत दिनों तक संभाले रखी, तो ये मरासिम को लील लेगी
अभी मिटा दो दिमाग़ो-दिल से, अगर शिक़ायत पनप रही है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा
उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल
यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा
हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है
अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा
तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा
आज उन लोगों के आंगन में बसी है पछुआ
जिनके पुरखों ने कलेजे में संजोई पुरवा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
तुझको सबसे मलाल है, सच्ची
यार तू भी कमाल है, सच्ची
इश्क़ वालों का हाल मत पूछो
बस कि जीना मुहाल है सच्ची
उम्र भर मुंतज़िर रही नज़रें
एक पल का सवाल है सच्ची
जाने कब कैसा रूप धर लेगी
ज़िन्दगानी छिनाल है सच्ची
मुझसे ज़्यादा मुझे तबाह करे
इतनी किसकी मज़ाल है सच्ची
✍️ चिराग़ जैन
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