Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ध्वंस मुँह बाये खड़ा है
मृत्यु का पहरा कड़ा है
घाट धू-धू जल रहे हैं
हर लहर मातम जड़ा है
यह बिखरने का नहीं, हिम्मत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
मृत्यु का विकराल वैभव इस जगत् पर छा चुका है
आँसुओं के अर्घ्य से कब काल का ताण्डव रुका है
अब हमें अड़ना पड़ेगा
अनवरत बढ़ना पड़ेगा
श्वास पर विश्वास रखकर
यह समर लड़ना पड़ेगा
आत्मबल से भाग्य का रुख मोड़ आने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
चाह अमृत की रखी पर, विष उलीचा है जलधि ने
सृष्टि भर के प्राण दूभर कर दिये फिर से नियति ने
काल प्रलयंकर बना है
मृत्यु हर कंकर बना है
जब हवा में विष घुला है
तब कोई शंकर बना है
फिर इसी जलधाम से अमृत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
अपशकुन पर ध्यान क्यों दें, हम शकुन के गीत गाएँ
इस अंधेरे से डरें क्यों, क्यों न इक दीपक जलाएँ
हर लहर का क्रोध फूटे
साथ जीवट का न छूटे
सिर्फ़ हिम्मत साथ रखना
टूटती हो नाव टूटे
यह प्रलय पर पाँव रखकर पार जाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक ज़रा-सा झोंका आया
नैया ने खाये हिचकोले
जिन लहरों पर तैर रही थी
उन लहरों पर डगमग डोले
बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए
जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए
जिनको हल करना है इस पल
कब वो प्रश्न बहुत गहरे हैं
इक नदिया है, इक नैया है
इक हम हैं और कुछ लहरें हैं
इस क्षण कहीं और देखा तो समझो हम नापैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
जितनी जटिल समस्या होगी, उतना बड़ा सबक लाएगी
सुख में तो कुछ तिनके डाली पर कोयल भी रख आएगी
लेकिन जब आंधी आएगी
जब डाली से बौर झड़ेगा
तब अपने जीवन की रक्षा
पेड़ आम का स्वयं करेगा
वो क्या सोचे सावन-भादो, जिसके दूभर चैत हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
बाहर से जीते-जीते हैं, भीतर से हारे-हारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
अपने सिर पर ओट रखी है, सारी दुनिया की सिरदर्दी
इनकी दिनचर्या लगती है, घर भर को आवारागर्दी
सामाजिक जीवन जीने की चाहत ने सब कुछ छीना है
जो सबको जीवित रख पाये, वो जीवन इनको जीना है
ये बेचारे, केवल अपनी नींदों के ही हत्यारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
लगने को लगता है, लेकिन इनका दिल भी सख्त नहीं है
आँसू इनको भी आते हैं, पर रोने का वक़्त नहीं है
सबका सुख-दुःख ढोते फिरते, सबकी नाराज़ी सहते हैं
सबके साथ खड़े होते पर, जीवन भर तन्हा रहते हैं
इनकी तन्हाई से पूछो, इनके भी आँसू खारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
सीधा-सादा जीवन जीकर, ये भी उम्र बिता सकते थे
मुट्ठी भर आमदनी करके, रूखी-सूखी खा सकते थे
लेकिन इन लोगों ने अपने सपनों का सम्मान किया है
अपना जीवन मुश्किल करके, दुनिया का आसान किया है
थोड़े इनमें अवगुण हैं पर, गुण भी तो कितने सारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
हर एक मुहूरत का जग में सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बर्तन की खनखन चौके में
पायल की रुनझुन आंगन में
मेरे होंठो पर सजती है
गीतों की गुनगुन सावन में
जीवन के सोलह सपनों का सिंगार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
हर रोज़ सुबह की रंगोली
होली, दीवाली मुझसे है
रिश्तों की शोभा मुझसे है
घर की ख़ुशहाली मुझसे है
जीवन की पहली कोशिश का सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बचपन में माँ का नाम हूँ मैं
यौवन की मीठी शाम हूँ मैं
अस्वस्थ बुढापे की ख़ातिर
हर इक पीड़ा पर बाम हूँ मैं
जीवन की हर इक दुविधा का उपचार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
इस दुनिया में प्यार रहे तो
भावों का सत्कार रहे तो
कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है
बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है
जो रांझे के साथ हुई थी हम वो भूल सुधारेंगे कब
अपने मन से बिन मतलब की दुनियादारी मारेंगे कब
इनको सुख से जीने दें इस बार; समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
नज़रें टकराने पर जो आवाज़ हुई, वो शोर नहीं है
मन ही मन सब कह लेता है, पर फिर भी मुँहजोर नहीं है
अपनी इच्छाएं बिसरा कर उसकी मुस्कानें बोते हैं
इक-दूजे की ख़्वाहिश पूरी करके दुगने ख़ुश होते हैं
शुद्ध मुनाफे का ऐसा व्यापार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
दुनिया को मन में फूले सब फूल दिखाई दे जाते हैं
आँखों-आँखों चलने वाले शब्द सुनाई दे जाते हैं
चेहरे का कब, क्यों, कैसा था रंग समझ में आ जाता है
पलकों के झुकने का हर इक ढंग समझ में आ जाता है
तो फिर इस दुनिया की ख़ातिर प्यार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब लालकिला बदरंग हुआ
हथियार चले हुड़दंग हुआ
उस दिन पानी-पानी क्यों था सारा का सारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
इस लालकिले ने कितने ही तख़्तों की उलट-पलट देखी
साज़िश देखीं, धोखे देखे, इतिहासों की करवट देखी
जब भी कोई दुश्मन आया, तब-तब हुंकारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
प्राचीर बहुत शर्मिंदा थी, वीरों की कुर्बानी रोई
गणतंत्र हुआ था शर्मसार, छिपकर चूनर धानी रोई
धरती में गड़ता जाता था उस दिन दुखियारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
उस दिन इसकी दीवारों पर बदनुमा दाग़ इक दंगा था
सबका अपना इक झंडा था, अपमानित खड़ा तिरंगा था
कैसे उजियारे में बदले इतना अंधियारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
अब इसके दरवाज़े आकर, बातों का मेला रहने दो
कुछ देर सियासत बन्द करो, कुछ देर अकेला रहने दो
अब कुछ भी कैसे झेलेगा, भाषण या नारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
शासन अधिकार लिए बैठा, जनता कर्त्तव्य बिसार गयी
उस दिन दोनों की मनमानी हर मर्यादा के पार गयी
शासित और शासक की जिद्द में पिसता बेचारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
✍️ चिराग़ जैन