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सोशल मीडिया

फेसबुक पर छा गए लिक्खाड़
लिखते हैं दनादन
हर किसी मुद्दे पे इनकी राय है तैयार

बहुत बेख़ौफ़ लिखते हैं
इन्हें लिखे हुए शब्दों की ताक़त का
कोई आभास तो हो
इन्हें मालूम हो
इनकी बिना सोची हुई हर बात
पल भर में
किसी की साख पर बट्टा लगाती है

हवस-सी हो गई है
सबसे पहले
अपनी एफबी वॉल पर
सबसे ज़ियादा लाइक पाने की

इन्हें मालूम है सब कुछ
विदेशी ताक़तों ने
किस तरह बाज़ार को शैदा किया है
और ये भी इल्म है
कौन किसने कब कहाँ
किस गाँव में पैदा किया है
कौन कब मर जाएगा
कैसे मरेगा
कौन से ट्रक में लदेंगी गाय
कब हिन्दू डरेगा
कोई तो हो, जो इन्हें ये सब
बयां करने से पहले
दो घड़ी को ही
मगर कुछ सोच लेने की
हिदायत दे

ये नहीं कर पाए तो
ये काम कर दे
जब नए युग के ये सारे वर्चुअल भगवान
अपनी वॉल पर
ज़िंदा यूसुफ़ खानों के मरने की
नई तहरीर लिख दें
तो उसे पढ़ कर
युसुफ जी
ख़ुद-ब-ख़ुद उस बात को
सच में बदल डालें

ये नहीं समझेंगे
जब ये लोग
लोहू से रची ग़ज़लेँ चुराकर
पोस्ट करते हैं
तो उन ग़ज़लों पे मिलने वाली हर तारीफ़
उस शाइर के हक़ को
छीन लेती हैं
किसी कविता को
उसके रचयिता के नाम से
महरुम करना
किसी बच्चे को बिन कारण
यतीमी के जहन्नुम में
पटक देने के जैसा है।

इन्हें कोई ज़रा समझाए
चाकू सिर्फ़ इक औजार है
बस सृजन जिसका काम है
इसे हथियार में तब्दील कर देना
गुनाह से भी कहीं ज़्यादा बुरा है
बड़ा इलज़ाम है।

✍️ चिराग़ जैन

ज़िंदगी

सादगी के आँगन में
चहकी है, खेली है
हाव-भाव बदले तो
ज़िंदगी अकेली है
ओढ़ी हुई बातों से
कष्ट में धकेली है
सहजता सफलता की
पक्की सहेली है

एक तरफ़ जकड़न है
क़ातिल शिकंजा है
नाख़ूनी रंजिश है
नफ़रत है, पंजा है
उसी के ज़रा पीछे
प्यार की हवेली है
सहजता से खुली हुई
गुदगुदी हथेली है

बचपन से सीखा है
उत्तर उन्हीं में है
जिन शब्दों से मिलकर
बनती पहेली है

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली का चुनाव

दिल्ली का चुनाव
चुनाव नहीं
बबाल था
एक तरफ़ पूरी बीजेपी थी
एक तरफ़ केजरीवाल था।

बीजेपी ने अपने रास्ते में
पहली खाई तब खोदी
जब दिल्ली जैसे छोटे चुनाव के लिये
रामलीला मैदान से दहाड़े थे पीएम मोदी।

और जीती हुई बाज़ी
विरोधियों के हाथ में तब देदी
जब सबके मना करने के बावज़ूद
छाँट कर लाए अपनी बुआ, बेदी।

इस फ़ैसले के बाद
दिल्ली के सारे लीडर
विभीषण हो गये
और सफ़लता के रास्ते
जो सुगम थे, अब भीषण हो गये।

उस पर और भी महान
साध्वियों और महाराजों के बयान
ऊपर से बेलगाम
किरण बेदी जी की ज़ुबान।

दुर्भाग्य का मास्टर पीस
एनडीटीवी के रवीश
जो कसर रह गई थी
वो भी पूरी कर दी
मैडम बेदी की हक़लाहटों के गले में
कुटी हुई मुलहठी भर दी।

मनोज तिवारी की लफ़्फ़ाज़ी
अमित शाह की जुमलेबाज़ी
जीत के नशे से चढ़ा गुमान
नये मेहमानों के लिये पुराने साथियों का अपमान
दिल्ली के सांसदों की कार्यकर्ताओं पर पकड़
और विजय रथ पर सवार चेहरों की अकड़
इन सब प्रहारों से प्रतिष्ठा का क़िला ढह गया
और कार्यकर्ताओं की अनदेखी करता नेतृत्व
एक-एक वोट के लिये तरसता रह गया

✍️ चिराग़ जैन

मतदान

लो मान लिया ये राजनीति छल-छद्मों की इक मंडी है
लो मान लिया इस महफ़िल की हर सूरत बहुत घमंडी है
लेकिन हमने भी कब पुरख़ों के सपनों का सम्मान किया
70 वर्षों में कहीं कभी क्या 100 प्रतिशत मतदान किया
ये लोकतंत्र जनप्रतिनिधियों की करनी का हरकारा है
हम चुन कर प्रत्याशी भेजें इतना तो काम हमारा है
आज़ादी की परवाज़ों में सीमाओं के कन्ने भी हैं
अधिकारों की बातें हैं तो, कर्तव्यों के पन्ने भी हैं
कुछ लोग वोट की ताक़त को हल्के में लेते रहते हैं
फिर सत्ता, सिस्टम, शासन को ही गाली देते रहते हैं
उंगली पर स्याही लगी नहीं, सत्ता पर कीचड़ डाल रहे
कर लोकतंत्र की अनदेखी, शासन में दोष निकाल रहे
वोटिंग के दिन पिकनिक जाने वाले भी क्या ग़द्दार नहीं
ऐसे लोगों को शासन की निंदा तक का अधिकार नहीं
हम खाएं क़सम इस बार कोई मत व्यर्थ नहीं जाने देंगे
जनता की मर्ज़ी के बिन अब ना सत्ता हथियाने देंगे
जनता की निष्क्रियता को उनकी ताक़त क्यों बन जाने दें
अपनी मेहनत से सींची फसलें टिड्डों को चर जाने दें
जनता का प्रतिनिधि कैसा हो ये हम सबको तय करना है
अबकी पूरे माहौल को फिर से लोकतंत्रमय करना है
बस एक वोट भी सत्ता की जड़ में मट्ठा भर सकता है
बस एक वोट आकाओं का जबड़ा खट्टा कर सकता है
बस एक वोट सच के रथ का पहला घोड़ा बन सकता है
बस एक वोट झूठों के पथ पर बाधा बन तन सकता है
जो सीना छलनी करता है, उसके सीने पर चोट तो दें
इसको, उसको, चाहे जिसको, हम जाकर अपना वोट तो दें
इस बार फरवरी सात गढ़ेगी नई इबारत दिल्ली में
जब सौ प्रतिशत मतदान से गर्वित होगा भारत दिल्ली में
इस बार वोट की ताक़त का जलवा देखेंगे दिल्ली में
इस बार सही जनमत का इक बलवा देखेंगे दिल्ली में
जिस दिन मेरी इन बातों का सम्पूर्ण असर हो जाएगा
उस दिन समझो इस भारत का गणतंत्र अमर हो जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव: एक ढोंग

लीजिये जनाब
फिर से आ गया चुनाव
चुनाव मतलब शोर-शराबा
रैली-वैली
वादे-शादे
भाषण-वाषण
गाली-वाली
इसके हिस्से उसकी थाली
उसके हिस्से इसकी थाली
कुछ की सूरत भोली-भाली
कुछ की बातें जाली-जाली
मेरी बज्जी
तेरी बज्जी
बिन मतलब की मत्था-पच्ची
मेरा पहला, तेरा पहला
इसका नहला, उसका दहला
इसकी बेग़म, उसका गुल्ला
हल्ला-गुल्ला
खुल्लम-खुल्ला
बैनर-शैनर
झंडे-वंडे
यानी सबके सब हथकंडे
हर नुक्कड़ पर कुछ मुस्टंडे
इसने मारे उसको अंडे
उसने मारे इसको डंडे
जब होगा वोटिंग का वन डे
उसके अगले दिन सब ठंडे
सबके एक सरीखे फंडे
थोड़े-थोड़े तुम मुस्टंडे
थोड़े-थोड़े हम मुस्टंडे
आओ मिलाएँ अपने झंडे
वोटर ठगा-ठगा बेचारा
देख रहा है भाईचारा
देख-देख ये ग़ज़ब नज़ारा
वोटर को चढ़ गया बुखारा
जब तक उसने किया उतारा
फिर चुनाव आ गया दोबारा।

✍️ चिराग़ जैन

फिर से बीता इक और साल

फिर से बीता इक और साल
कुछ दीवारों पर बदल गया
टेबल पे कैलेण्डर बदल गया
ऑफिस का रजिस्टर बदल गया
लेकिन ऐसे बदलावों से
कब तन बदला कब मन बदला
ना सुख बदले ना दुःख बदले
ना मानव का जीवन बदला
इस बार नई उम्मीद जगे
इस बार जगत सारा बदले
आशाओं के उजियारे में
अन्तस का अँधियारा बदले

✍️ चिराग़ जैन

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