Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ढेर सा है
स्कूल के इक रूम में
बच्चों के बस्तों का
और उन बस्तों के बच्चों का!
धूल में लथपथ
कोई आदिल कभी जब
स्कूल से घर लौटता था
तो वो अम्मी की ढेरों गालियों से
होके कमरे तक पहुँचता था
आज वो आँगन में है
और खून से लथपथ
मगर अम्मी के होंठों से
कोई अल्फाज़ गिरता ही नहीं है।
उसे कुछ बोल दे अम्मी
तो वो चुपचाप अपने कमरे में जाए
ज़रा आराम कर ले।
बहुत गुस्से में थे
अल्ताफ के अब्बू
मेरे बेटे के मातम में
मुहल्ले भर से कोई भी नहीं आया।
फिर अपने दोनों घुटनों पर
टिकाकर हाथ
गो उठते हुए बोले-
अरे वो भी सब भी तो
अपने घरों के
मातमों की फ़िक्र में मसरूफ़ होंगे।
अमां जेहादियों
तुमने तो अपनी गोलियों से
जिस्म छलनी कर दिया अल्लाह का भी।
तुम अपने मकसदों से अब बहुत आगे निकल आये
तुम्हारे नाम से अब खौफ़ क्या
नफरत पनपती है।
तुम्हारी प्यास का चारा
क्या केवल खून है
पानी नहीं है
ये हरक़त
नौनिहालों को ज़िबह करने की
बचकानी नहीं है।
ख़ुदा की रहमतों की बात छोड़ो
ख़ुदा तुमको कहर के भी नहीं लायक समझता है
तुम्हें जिस बाप ने पैदा किया
वो खुद को नालायक समझता है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
जानते हैं
मोदी जी के स्वच्छता अभियान की गाड़ी
पिक-अप क्यों नहीं ले रही
क्योंकि जिस देश में कभी
दूध की नदियाँ बहती थीं
वहाँ दूध की थैलियाँ
नदियों को बहने नहीं दे रही।
शहरों से गाँवों तक
मस्तक से पाँवों तक
मेलों से ठेलों तक
रेलों से जेलों तक
खेलों से झूलों तक
कॉलेज से स्कूलों तक
फ़िल्मों से चैनल तक
एंकर से पैनल तक
नारों-विचारों तक
ख़त से अख़बारों तक
सब्ज़ी से राशन तक
रैली से भाषण तक
पर्ची से चंदे तक
सेवा से धंधे तक
कूड़ा ही कूड़ा है
जर्जर इक मूढ़ा है
जिस पर हम बैठे हैं
बिन कारण ऐंठे हैं
दर्द की दवाई हो
बात ना हवाई हो
अल्लाह दुहाई हो
अब कुछ सफ़ाई हो
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
बेकार की बात है श्रीमान
मोदी जी को क्या पता
किसे कहते हैं सफ़ाई अभियान
सफ़ाई अभियान के प्रति,
सबसे ज़्यादा गंभीर हैं
हमारे देश के पति।
जिन्हें घर में घुसने से पहले
साफ़ करनी पड़ती है
मोबाइल की कॉल डिटेल,
कम्प्यूटर छोड़ने से पहले
साफ़-सुथरी बनानी पड़ती है
अपनी ई-मेल।
अरे साहब
झाड़ू उठाकर सफ़ाई करने को
हम बड़ा काम कैसे मानें,
पत्नी के प्रश्नव्यूह से
साफ़ निकल कर दिखाओ
तो जानें।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।
तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।
तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।
जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे
उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।
लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।
नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
चन्द्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है
तुम दमक का दंभ भरना बाद में।
जब तुम्हारे चाटुकारों का
जुगनवी दल
फुदकने के लिए अंधियार पा ले
और लाखों बून्द जैसी तारिकाएँ
जब घड़ी भर टिमटिमा लें
तब दिखना नूर अपनी चांदनी का
रात में सोए हुओं को
और रोते श्वान, गीदड़,
उल्लुओं को।
रात के आकाश में बिखरे पड़े
बूंदी के दानों में
किसी लड्डू से तनकर बैठ जाना।
रात भर हँसना
सड़क पर लड़खड़ाते मद्यपों पे
और जी भर भागना
खाली सड़क पर
तेज सरपट दौड़ती
कुछ गाड़ियों के साथ।
तब तलक रुक कर निहारो
दूर पश्चिम में
दिवाकर की दमकती
आख़िरी किरणों से बिखरे रंग।
देख लो,
दिन भर मनाकर रौशनी का जश्न
कैसा जा रहा निस्संग।
वो अभी दिन भर के टूटे
कामगारों की
थकन लेकर गया है।
चंद्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
जाने ये कैसा बदरा है
बदरा के भीतर मदिरा है
जब छलकी तो सब झूम उठे
जैसे मृदंग से धूम उठे
पीपल ने छेड़ी तान अलग
बूंदों ने गाया गान अलग
पुरवा ने ऐसा रास रचा
बिजुरी ने जी भर नाच नचा
पंछी कलरव करते डोले
कच्चे स्वप्नों ने पर खोले
बचपन बौराया तब भू पर
हाथों से बूंदें छू-छू कर
ऐसा मेघों में रोर हुआ
इक उत्सव-सा हर ओर हुआ
धुल गई धरा, खुल गई पवन
पावन पावन है अंतर्मन
श्वासों में शीतलता आई
नयनों में चंचलता छाई
सब कष्ट ग्रीष्म के भूल गए
बागों में झूले झूल गए
जिस क्षण जल से संलिप्त हुई
वसुधा की तृष्णा तृप्त हुई
ऐसा मौसम का ज्वर आया
प्यासों में पानी भर आया
जाने ऐसा क्या कृत्य करा
सब कुछ लगता है हरा-हरा
✍️ चिराग़ जैन