Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दो घड़ी को
मैं किसी आकाश के रोमांच की
बांहें पकड़ कर;
उस धरा द्वारा मुझे सौगात में सौंपे गए
अविरल सुरक्षा भाव का
अपमान कर आया;
जो कि मुझको हर दफ़ा
अस्थिर उड़ानों से
पुनः नीचे उतर आने पे
बढ़कर थाम लेती है।
वे उड़ानें
(मैं जिन्हें उन्माद में
ऊँचाइयों पर ठहर जाने का
तरीका मान बैठा हूं)
महज ज़िद पर उतर आए
किसी बालक की ऐसी कूद भर है
जो थका कर मौन करती है मुझे
क्योंकि अभी
धरती के आकर्षण की सीमा
लांघ जाने का
अतुल साहस नहीं है
मेरी बचकाना उड़ानों में।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Poetry
शिक्षा के आँगन में गूंजी जब आवाज़ बग़ावत की
तब सीमाएँ पार हुईं थीं ज़्ाुर्रत और हिमाक़त की
उन हाथों ने कीचड़ फेंकी हिंदुस्तानी शानों पर
जिनका रोम-रोम गिरवी है भारत के एहसानों पर
जिस धरती पर चले गुडलने वो धरती भारत की है
जिसे पकड़ कर लगे संभलने, वो उंगली भारत की है
जिस बगिया से आम चुराए, वो बगिया भारत की है
जिस पर इस दुनिया में आए, वो खटिया भारत की है
जिससे पिट कर पढ़ना सीखे, सख्त छड़ी भारत की है
जिसमें तुमने पुरखे फूंके वो लकड़ी भारत की है
बचपन में जो माटी चाटी वो माटी भारत की है
जिस पर घात लगा बैठे हो, वो घाटी भारत की है
आतंकों के आका तुममें कैसी प्यास बढ़ा बैठे
जिस छाती से दूध पिया उसमें ही दाँत गढ़ा बैठे
हमें शांति से प्यार बहुत है, हिम से ढंके शिखर हैं हम
लेकिन ठण्डी हिम के नीचे ज्वालामुखी प्रखर हैं हम
मूढ़ समझकर छोड़ रहे थे शिशुपालों के पापों को
क्षण में दंतहीन कर देंगे आस्तीन के साँपों को
ग़लती अब अपराध बन गई, सब हिसाब हो जाएगा
जिसकी जड़ में पले सपोले, वृक्ष साफ हो जाएगा
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
कभी तो उम्मीद जी उठेगी
कहीं तो मंज़र हसीं रहेगा
कोई तो ऐसा भी वक़्त होगा
कि जिसको हम पे यकीं रहेगा
कुछेक लम्हों की बात सुनकर
दुआ का दामन न छोड़ देना
किसी चुभन की कसक से चिढ़कर
हसीन गुंचे न तोड़ देना
सुबह के माथे का ये पसीना
सबा को छूकर महक उठेगा
किसी तबस्सुम की बाँह थामे
मलाल यकदम चहक उठेगा
नसीब बदलेगा गर्दिशों का
यहीं हज़ारों कँवल खिलेंगे
इन्हीं उदासी भरे दिनों से
कभी मुहब्बत के पल मिलेंगे
सवाल बदलेंगे ज़िन्दगी के
जवाब अपने यही रहेंगे
हम आज भी सौ टका खरे हैं
हम उस घड़ी भी सही रहेंगे
ज़ेहन में जो भी उठे तमन्ना
उसे कहीं दिल में डाल लेना
नसीब जिस दिन गले लगा ले
हरेक हसरत निकाल लेना
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Jainism, Poetry
चलो बताएं आज तुम्हें वैज्ञानिक धर्म हमारा है
क्या हैं व्रत उपवास और क्या नियम त्याग संथारा है
हमें फर्क पड़ता है छोटी चींटी तक की पीर से
हमें अहिंसा मिली विरासत में भगवन् महावीर से
वृक्षों में जीवन होता है; अब ढूंढा विज्ञान ने
हमें बताया युगों पूर्व ये ऋषभदेव भगवान् ने
हमें लैंस की नहीं ज़रूरत जल के जीव बांचने को
हमें मिले हैं गुणस्थान अन्तस् का ताप जांचने को
शाकाहारी जीवन शैली, परहित का उपदेश मिला
हमें हमारे पुरखों से मानवता का सन्देश मिला
श्रावक श्रमण व्यवस्था वाला इक समाज विज्ञान मिला
जियो और जीने दो जैसा अद्भुत अविरल ज्ञान मिला
परिग्रह को जब पाप कहा तो साम्यवाद को नींव मिली
क्षमाभाव सर्वोपरि रक्खा; प्रेम-प्यार को जीभ मिली
हमने राणा के प्रताप को दानी भामाशाह दिए
जो अणुव्रत की नाव चलाएं तुलसी से मल्लाह दिए
हमने भारत के गौरव को चन्द्रगुप्त का मान दिया
बिम्बिसार, संप्राति, भोज और वीर अशोक महान दिया
हमने दिव्य प्रकाश पुंज; जब जब अंधियारी छाई; दिए
हमने अंतरिक्ष को भेदा विक्रम साराभाई दिए
जो हिंसा के घोर विरोधी, जन-गण के उन्नायक थे
वो बाबा गांधी भी तो इस जैन धर्म के गायक थे
अर्थमार्ग और मोक्षमार्ग का इक समतल आभास दिया
हमने अपनी भारत माँ को गौरवमयी इतिहास दिया
किसी जीव को नहीं सताएँ ये पावन संकल्प लिया
तर्कहीन धर्मांध न होवें ऐसा शास्त्र प्रकल्प लिया
जो मानवता की द्योतक है, मानव मन तक फैली है
वही अहिंसा जैनधर्म की मौलिक जीवन शैली है
लखनऊ में महावीर की प्रतिमा टूटी तब क्यों मौन रहे
वोटों की मंडी में सत्तर लाख की पीड़ा कौन कहे
भीतर माल ठूंस कर बाहर दाँत दिखाने बंद करो
मानवता की चिंता है तो बूचड़खाने बंद करो
हमने सदा पैरवी की है; पुरखों के सन्देश की
हमें ज़रूरत नहीं किसी न्यायालय के आदेश की
हम मानवता की रक्षा हित नियमों के मोहताज नहीं
हम तन-मन-धन से मानव हैं, कोरे ड्रामेबाज़ नहीं
हमने कभी नहीं पोसा है कर्मकांड के दूषण को
हमने शीश चढ़ाया केवल तर्कयुक्त आभूषण को
लो महत्व समझो सागर में मिलती जीवन धारा का
लो वैज्ञानिक मतलब समझो जैनों की संथारा का
जब शरीर अक्षम हो जाए बचने का कुछ ठौर न हो
जब मृत्यु प्रत्यक्ष खड़ी हो, राह कहीं पर और न हो
तब बेचैनी त्याग आत्मचिंतन दायित्व हमारा है
जीवन के अंतिम क्षण में निज का चिंत्वन संथारा है
जीवन के अंतिम अवसर का मधुर गान है संथारा
स्वास्थ्य शोथ कर देह समर्पण का विधान है संथारा
यह ऐसी तकनीक है जिससे जीवन का सुख नष्ट न हो
देह और अशरीर छूटने लगें तो किंचित कष्ट न हो
आत्मघात और संथारा के चिंतन में है इतना भेद
आत्मघात में मृत्यु प्रमुख है संथारा में मृत्यु निषेध
आत्मघात जैसी कायरता वीरों का तो तौर नहीं
हम वंशज हैं महावीर के कायर या कमज़ोर नहीं
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दुर्घटना घटे सड़क पर तो हम रुकने को तैयार नहीं
आँखों के आगे जुल्म बढ़े तो हम करते प्रतिकार नहीं
अब हमको फर्क नहीं पड़ता चालीस मरे या चार मरे
पानी बन गया लहू वह जो बढ़कर भीषण हुंकार भरे
जब भूखी उम्मीदें टूटीं खलिहान जले हम मौन रहे
जब धनिया की अस्मत लूटी पत्थर पिघले हम मौन रहे
लालच ने जब नैतिकता का दर्पण तोड़ा हम मौन रहे
लाचारी को ताक़त ने जब बेघर छोड़ा हम मौन रहे
निर्बल की आह-कराह सुनी, दिल दहल गया, हम मौन रहे
टीवी पर चर्चाएँ सुन ली, मन बहल गया, हम मौन रहे
अपराध घटित होता है तो देखा करते हैं मौन खड़े
फिर ये कहकर बढ़ जाते हैं, छोड़ो पचड़े में कौन पड़े
शोषित पर अत्याचार हुआ, शोषक ने अट्टाहास किया
नुक्कड़ पर खड़े बतोलों ने, उपहास किया, परिहास किया
अख़बारों को हेडलाइन मिली, टीवी ने ख़ूब विलास किया
हम भी संवेदनहीन हुए, हमने भी टाइमपास किया
उम्मीद कभी चलकर अपने द्वारे तक आई तो होगी
रातों में किसी बिचारी ने साँकल खटकाई तो होगी
हमने ख़ुद बंद किया बढ़कर सब खिड़की रौशनदानों को
गुलदस्ते लेकर पहुँच गए जब बेल मिली सलमानों को
छोड़ो ये चर्चा कब कितना नुकसान हुआ घोटालों से
पहले ये सोचो औलादें क्यों सस्ती हुई निवालों से
छोड़ो इन बातों की चर्चा सरकार हमें क्या दे पाई
पहले ख़ुद से ये तो पूछो क्यों भूखा मरा सगा भाई
कुछ रंग-बिरंगे चोलों ने भड़काया तो हम भड़क गए
पत्थर की गिरी इमारत तो हम सबके बाजू फड़क गए
लेकिन तब ख़ून नहीं उबला, ना गुस्से को सुर-साज मिला
जब पन्द्रह दिन की बच्ची को दिल्ली में नहीं इलाज मिला
हमने कब किसकी रक्षा की, अपराधों से, आघातों से
निष्क्रियता पर पर्दे डाले कुछ रटी रटाई बातों से
शासन पर प्रश्न उठाएंगे, सत्ता को जी भर कोसेंगे
सिस्टम से आस लगाएंगे, अपने आलस को पोसेंगे
क्या ये सचमुच आवश्यक है हम सच से पीठ किए बैठें
क्या से सचमुच आवश्यक है अवसर पर होंठ सिए बैठें
ये क्या हो गया हमें आख़िर, धमनी में ख़ून नहीं है क्या
निष्क्रियता को बंदी कर ले, ऐसा क़ानून नहीं है क्या
खादी, खाकी, व्हाइट कालर, ये सब हममें से ही तो हैं
इक्के, बेग़म, राजा, जोकर, ये सब हममें से ही तो हैं
केवल इतना भर अंतर है, केवल इसके ही हैं झगड़े
कुछ खिड़की के इस पार खड़े, कुछ खिड़की के उस पार खड़े
यूँ तो हममें से हर कोई बढ़-चढ़कर बात बनाता है
जिसका जिस पर वश चलता है, वो उससे स्वार्थ सधाता है
हम किस दिन ये सच समझेंगे सारा नुक्सान हमारा है
जिसको दिन-रात कोसते हैं, वो हिन्दुस्तान हमारा है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ईश्वर के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी
धरती डोली, हड़कंप मचा
ईश्वर ने यह भूकंप रचा
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार
क्षण भर में भीषण वज्रपात
धन-जन हानि और प्राणघात
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा
जो चला गया उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा
दुनिया हर वर्गभेद भूली
मानवता की आशा फूली
हर दिशा सहायक हो आई
ज़ख़्मों का मरहम ले आई
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले
अब कैसा भी भूचाल चले
हम फिर से गाँव बसा लेंगे
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे
ईश्वर तेरे सुत दीन नहीं
भय से हारें वो हीन नहीं
कल फिर से सृजन करेंगे हम
फिर तेरा भजन करेंगे हम
✍️ चिराग़ जैन