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ज़िम्मेदार मीडिया : धोखेबाज़ क़ायनात

21 जून बीत गया और दुनिया समाप्त नहीं हुई। यह बड़ी शर्मनाक बात है। एक प्रतिष्ठित समाचार चैनल ने इतनी शिद्दत से दुनिया के समाप्त होने की घोषणा की थी, क्या उस चैनल की इज़्ज़त का भी ख्याल न किया, डूब मरना चाहिए ऐसी बेशर्म दुनिया को। आज अगर दुनिया समाप्त हो गई होती तो वह चैनल टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ चुका होता।
यह ढीठ रवैया पहली बार देखने को नहीं मिला है। इससे पहले भी कई छोटे-बड़े अवसर ऐसे रहे हैं जब नियति ने अंतिम समय पर अपना निर्णय बदलकर हमारे मीडिया की साख पर बट्टा लगाया है। अभी कुछ दिन पहले ही तूफान ने पर्सनली फोन करके मीडिया को बताया कि इस बार मुंबई को नेस्तोनाबूद करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। मीडिया के कर्मठ कर्मवीरों ने मुम्बई के चप्पे-चप्पे पर कैमरे और ओबी वैन तैनात कर दिए, नरीमन पॉइंट से लेकर जुहू चौपाटी तक पत्रकारों ने मोर्चा संभाल लिया कि जिस जगह से भी तूफ़ान एंट्री करेगा वहीं से लाइव कवरेज जारी हो जाएगी। एक-एक मिनिट पर नई प्लेट्स बनती रही। ग्राफिक डिजाइनरों ने सारी ताक़त झोंक दी कि कहीं तूफ़ान की एंट्री के शॉट्स फीके न रह जाएँ, ऐसा न हो कि तूफान मुंबई को तबाह कर दे और हम उसके ग्राफिक्स में कमज़ोर रह जाएँ। हर लहर का एक्सट्रीम क्लोज़ अप ऑन एयर हुआ। कौन जाने किस लहर पर तूफ़ान की सवारी आ जाए। मुंबई बचे या न बचे, लेकिन तूफान की एंट्री में चूक न हो जाए।
बेचारे पत्रकार लहर-लहर का नमक फाँकते रहे और तूफ़ान फुस्स हो गया। मुंबई को तबाह होते देखने के अरमान लिए बैठी जनता को निराशा से बचाने के लिए एकाध गिरे हुए पेड़ों को क्लोज़ अप शूट करके तबाही का टिपर चलाना पड़ा। एकाध जगह उड़ी टीन शेड के शॉट्स को मजबूरी में छतें उड़ने के वॉइस ओवर के साथ एयर करना पड़ा। तूफ़ान ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यहाँ तक कहा कि समुद्र के किनारे पड़े भारी-भरकम पत्थर हवा में उड़ने लगेंगे। तूफान के इस बड़बोलेपन को सच मानकर मीडिया ने एक सप्ताह तक माहौल बनाए रखा। कई चैनल्स ने तो भूत-प्रेत और सास-बहू जैसे महत्वपूर्ण बुलेटिन तक तूफ़ान की अगुआई में न्यौछावर कर दिए। लेकिन तूफ़ान शेख़चिल्ली की औलाद निकला। जो-जो मीडिया को बताया था, उसमें से एक भी बात सच नहीं निकली। दुनिया मुम्बई को तबाह होते देखने के लाइव नज़ारों से वंचित रह गई और निराश पत्रकार अपना साजो-सामान उठाकर ब्यूरो में वापस लौट आए।
बहुत दुःख होता है साहब। मीडिया के साथ यह खिलवाड़ अच्छा नहीं है। ख़ुद सूर्य ने मीडिया को फोन किया था कि इस बार के सूर्यग्रहण से दुनिया तबाह हो जाएगी। हालाँकि तूफ़ान वाले झूठ के ज़ख़्म अभी भरे नहीं थे, लेकिन फिर भी हमारी मुस्तैद मीडिया सूर्य के एक फोन कॉल का सम्मान करते हुए ज्योतिषियों, खगोल शास्त्रियों, वैज्ञानिकों और गणितज्ञों को लेकर स्टूडियो में बैठ गई। जब ये सब लोग स्टूडियो में पहुँच गए तब एंकर को ध्यान आया कि इनमें से किसी ने भी अगर कोई ग़लत बात बोल दी, तो उससे जनता में अफ़रा-तफ़री मच जाएगी। यह विचार आते ही एंकरों ने मोर्चा संभाला और ख़ुद बोलना शुरू कर दिया। जब तक बुलेटिन चला तब तक नॉनस्टॉप बोलते रहे। विशेषज्ञों से सवाल पूछे गए क्योंकि यह एंकरिंग का कर्तव्य था, लेकिन उन्हें जवाब देने का अवसर नहीं दिया गया क्योंकि यह एंकर का धर्म था। पहले से प्राप्त जानकारियों को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया गया, क्योंकि इस ग्रहण के बाद इतनी तबाही मचने वाली थी कि फिर शायद ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का वह स्पॉट देखने का मौका बेचारे दर्शकों को कभी न मिल पाता, इसलिए ‘तीन बजकर दस मिनिट पर ग्रहण समाप्त होगा’ – यह बात भी ब्रेकिंग न्यूज़ बना दी गई। इधर चंद्रमा ने सूर्य को एक कोने से घेरना शुरू किया, उधर एंकरों का स्वर ओज़ोन लेयर पार करने लगा। फायर रिंग का दृश्य बना और एंकर ऐसे उतावले होने लगे जैसे पहले से देखी हुई एक्शन फ़िल्म को दोबारा देखते हुए पड़ोसी को आगे का सीन बताने की उतावली में कोई कुर्सी का हत्था तोड़ दे। एंकरों का स्वर चंद्रमा पर पड़े विक्रम लैंडर से टकराने लगा। चंद्रमा अपनी गति के अनुसार सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुज़र गया। दुनिया बच गई लेकिन मीडिया मर गया। दुनिया तबाह नहीं हुई। सूरज की फोन कॉल फेक निकली।
क्या-क्या याद करें साहब। भारत में कोयले का स्टॉक ख़त्म होने की ख़बर हो या कोसी की बाढ़ में पूरा उत्तर भारत बह जाने की ख़बर; धूमकेतु टकराने की पक्की जानकारी हो या धरती के भीतर चल रही हलचल का आँखों देखा हाल; मीडिया हर ख़बर को सीरियसली लेता रहा और प्रकृति धोखा देती रही।
जनता सच से वंचित न रह जाए इसलिए बेचारे दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मन के भीतर भी ट्रांसमीटर फिट कर आए हैं। ट्रम्प हो या पुतिन, चीन हो या पाकिस्तान; उनके मन में जैसे ही कोई विचार आता है तुरंत यहाँ प्रोम्पटर पर बीप होने लगती है। चैनल्स तुरन्त उस विचार को अपने दर्शकों तक पहुँचा देते हैं। अब अगर कोई अपने मन में आए विचार पर न टिके तो इसमें मीडिया क्या करे? बात से पलटते हैं ट्रम्प और नाम बदनाम होता है भारतीय मीडिया का। ऐसी ही हरक़तों के कारण ‘हड़प्पा न्यूज़’ और ‘मोहनजोदड़ो टीवी’ जैसे चैनल्स किसी इनपुट को इग्नोर कर गए और उस समय दुनिया की तबाही की फुटेज तैयार न हो सकी। तब प्रकृति ने गच्चा न दिया होता तो आज उन सभ्यताओं के विनाश की वजह का ‘अनुमान’ न लगाना पड़ता। बस एक पैन ड्राइव खोजनी होती और सारा सीन एचडी फॉरमेट में देख पा रहे होते।
पर इस बार कम से कम हमारे देश में ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। हमारी जनता मीडिया के साथ है। इतनी सब बातें झूठ निकलने के बावजूद, जनता ख़बरों पर अटूट विश्वास करती है। क्योंकि जनता जानती है कि पूरी क़ायनात हमारे चैनल्स को झूठा सिद्ध करने पर उतारू है। लेकिन हम इस सत्यवादी मीडिया को झूठा मानकर इसका साथ नहीं छोड़ सकते। हमने मीडिया को अभयदान दे रखा है कि सूरज, चांद, मंगल, धूमकेतु, बाढ़, तूफ़ान, भूकम्प, बादल, ट्रम्प, इमरान, पुतिन, कैमरून और कोरोना तक जहाँ से जो इनपुट मिले उसे जस का तस सुंदर ग्राफिक्स के साथ ब्रॉडकास्ट करो। क्योंकि अगर किसी दिन कोई इन्फॉर्मेशन सही निकली और दुनिया तबाह हो गई तो हमारा मीडिया दुनिया को क्या मुँह दिखाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

आपातकाले मतभेद नास्ते

22 मार्च 2020 के बाद हमारी ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी है -यह हमें स्वीकार करना चाहिए। वायरस की दहशत से शुरू हुई इस अंधी सुरंग से हमारे मन-मानस को कब और कैसे मुक्ति मिलेगी इसका सही-सही अनुमान लगाना कठिन है।
सरकारें अपनी-अपनी क्षमता और प्रवृत्तियों के अनुरूप निरंतर सक्रिय हैं। राजनैतिक उठापटक और पक्ष-विपक्ष की छीछालेदर भी अनवरत जारी है। इधर प्रकृति नित नई मुसीबत खड़ी कर रही है, उधर पड़ोसी राष्ट्रों की ओर से भी इस सुरंग के अंधकार को भयावह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
जब सूरज तपता है, तो ग़रीब की झोपड़ी भी तपती है और अमीर की कोठी भी। जब बादल बेकाबू होता है, तो पानी की मूसल भाजपाई को भी सताती है और कांग्रेसी को भी। जब भूकम्प आता है, तो मंदिर के गुम्बद भी थर्राते हैं और मस्जिद की मीनारें भी। जब बम गिरता है, तो डालियाँ भी ध्वस्त होती हैं और तने भी।
संकट, समस्त विविधताओं को एकाकार करने का अवसर है। पीड़ा, समस्त विवादों को मौन कर देती है। जब हवा सुहानी हो तो हम देह को विस्तार देकर उसका भोग करते हैं किन्तु जब आंधी आती है तो हम संकुचित होकर आत्मरक्षा करते हैं।
इस समय बीमारी, बेकारी और बमबारी की चिंताएँ सुरसा की तरह मुँह बाए देश की सुख-शांति को लील रही हैं। यह समय न तो इतिहास की भूलों को कोसकर वर्तमान की विफलताओं पर पर्दा डालने की अनुमति देता है, न ही वर्तमान की सत्ता को पदच्युत करके भविष्य के सपने देखने का अवसर देता है।
मँझधार में नाव नहीं बदली जाती। भारतीय लोकतंत्र में चाहे-अनचाहे लगभग हर सामाजिक व्यक्ति किसी न किसी राजनैतिक दल अथवा विचारधारा से जुड़ाव और असहमति महसूस करता है। ऐसे में वर्तमान सरकार से भी कुछ लोगों के मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सत्य है कि शत्रु का आक्रमण होने के बाद अपने पक्ष को समर्थन देना ही एकमात्र धर्म होता है। चुनौती के समाप्त होने तक अच्छा या बुरा, जो भी व्यक्ति हमारी ओर से मोर्चे पर खड़ा हो उसका समर्थन करना आवश्यक है। किसी सरकार की नीतियों और सोच को परिमार्जित करने का कार्य शांतिकाल में समीचीन होता है। यदि कोई सुझाव देना भी हो तो उसकी भाषा कटाक्ष अथवा उपालंभ से रहित होनी आवश्यक है।
उधर, भागदौड़ से भरी ज़िंदगी यकायक ठहर गई है। एकाकीपन और निठल्लापन जनता को भीतर ही भीतर खाए जा रहा है। जनता अवसाद और नकारात्मकता के माहौल से घिरती जा रही है। ऐसे में सरकार का भी दायित्व है कि वह जनता की भावनाओं को सम्मान दे। जनता के क्षोभ और नैराश्य को बढ़ानेवाली कोई भी घटना, बयान या हरक़त इस समय सरकार की ओर से न हो, तो जनता का सरकार पर विश्वास बढ़ेगा।
समय विपरीत हो तो विनम्रता से सबको एक सूत्र में बंध जाना चाहिए। माला कितनी भी बेतरतीब हो, लेकिन वह अलग-थलग पड़े मोतियों से तो ज़्यादा ही महत्व रखती है।

✍️ चिराग़ जैन

सस्ता है तो महंगा पड़ेगा

कोई लागत से भी कम क़ीमत पर माल बेच रहा है, तो समझ लो कि वह व्यापार नहीं कर रहा, वरन बाज़ार पर कब्ज़ा कर रहा है। बाज़ार का एक ही धर्म है, मुनाफ़ा। जो आज इस धर्म से विमुख दिख रहा है, उसका कल कट्टर होना तय है। क़ीमत बहुत कम हो तो नीयत ख़राब होगी। सुनते हैं, दूध-दही पीनेवाले देश में चाय मुफ़्त बाँटी गई थी। लोगों ने मुफ़्त में चाय की चुस्की ली और चाय के व्यापारियों ने देश लूट लिया।
हमारे देश में एक मध्यमवर्गीय आदमी टैक्सी करने से डरता था। टैक्सीवालों की मनमानी और उनकी गुंडागर्दी से त्रस्त लोगों को जैसे ही आठ रुपये प्रति किलोमीटर का रेट दिखा तो लोग लपककर रेडियो टैक्सी में घूमने लगे। कूपन, ऑफर और न जाने कितना पैसा फेंककर इन कम्पनियों ने डेढ़ साल में हर मोबाइल में अपनी उपस्थिति बना ली। लोग पुरानी टैक्सियों और ऑटो रिक्शा को छोड़कर, धड़ल्ले से रेडियो टैक्सी की सुविधा के अभ्यस्त हो गए। फिर कोई कूपन नहीं, सर्ज लगने लगा, रेट बढ़ते-बढ़ते औसतन बीस-पच्चीस और कभी-कभी तीस-पैंतीस रुपये प्रति किलोमीटर तक जाने लगे।
खिलौनों की क़ीमतें अचानक से बाज़ार में औंधे मुँह गिरीं। शानदार पैकेजिंग के साथ चीनी सामान ने भारतीय व्यापार पर कब्ज़ा कर लिया। चीन का दृष्टिकोण व्यापक था। वह सस्ते खिलौने बेचकर भारत की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ कर रहा था। आज भारतीय बाज़ारों से चीन को खदेड़ना कितना महंगा पड़ रहा है, यह हम सबके सामने है।
हम कलाकारों के पास बहुत से लोग आते हैं कि हम आपका प्रमोशन मुफ्त में करना चाहते हैं। हम आपका डिजिटल मार्केटिंग का सारा काम करेंगे, आपको कोई पैसा नहीं ख़र्च करना पड़ेगा। सारा काम हम करेंगे, और आपको कुछ पैसा भी दे देंगे। इतनी विनम्रता हमें ख़ुश कर देती है और हम ख़ुशी-ख़ुशी जंगल के शेर से सर्कस के शेर बनने को तैयार हो जाते हैं।
जब कोई टेलीकॉम कंपनी मुफ्त में मोबाइल सेवा देती है, जब कोई पैथोलॉजी लैब नगण्य क़ीमत में हज़ारों रुपये के टेस्ट करने का दावा कर रही हो, जब कोई राजनैतिक दल मुफ़्त समान बाँटकर वोट मांग रहा हो तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। ये सब व्यापारी हमारी लालची प्रवृत्ति और स्थापित व्यापारियों की बेध्यानी या गुंडागर्दी का लाभ उठाकर बाज़ार में दस्तक देते हैं।
अगर कोई दोस्त आवश्यकता से अधिक अपनापन दिखाकर आपके घर पर पैसा लुटा रहा है तो उसकी दोस्ती को टटोल लेना आवश्यक है।
बाज़ार की यह नीति अब राजनीति में भी धड़ल्ले से चल रही है। हमारी सरकार आई तो आपको बिजली फ्री मिलेगी; हम आपको राशन फ्री देंगे; हम आपका कर्ज़ा मुआफ़ कर देंगे; हम आपसे बस में यात्रा के पैसे नहीं लेंगे… इन जुमलों से सत्ता हथियाने में सभी दल सक्रिय हैं।
आपको भूख लगने पर रोटी कमाने की शिक्षा देनेवाला व्यक्ति देखने में क्रूर लग सकता है लेकिन वह वास्तव में आपका गुरु होता है, जो आपको आत्मनिर्भर बनाना चाहता है। लेकिन भूख लगने पर आपकी झोली में रोटी डाल देनेवाला व्यक्ति चुपके से आपको भिखारी बना रहा होता है।

✍️ चिराग़ जैन

सिस्टम का तम

हम खोखले आदर्शों और तन्त्रीय विफलताओं के एक ऐसे शिकंजे में जकड़े जा चुके हैं, जिसमें से निकलने के लिए शिकंजे को जड़ समेत उखाड़ देने की शक्ति से कम बात न बनेगी।
संविधान एक ऐसी किताब है, जिसको किसी लोकतंत्र की रीढ़ कहा जा सकता है। किन्तु इस रीढ़ में स्लिपडिस्क कैसे किया जाता है, यह कला हमारी विधायिका को बख़ूबी मालूम है। विधायिका इसे हारमोनियम की तरह प्रयोग करती है। सुर इसमें सारे हैं, लेकिन किस खटके को कब दबाकर अपने मतलब का राग अलापा जाए, यह ज्ञान राजनीति के ककहरे में सिखा दिया जाता है। सत्ता संभालने से पूर्व इसी किताब की शपथ उठाई जाती है। जब शपथ-ग्रहण चल रहा होता है, तब शपथ लेनेवाले को भी ज्ञात होता है कि इस शपथ से बड़ा झूठ दुनिया में कोई नहीं है। शपथ दिलानेवाला भी जानता है कि शपथ की शब्दावली पूर्ण होने तक भी यह शपथ नहीं टिकेगी। लेकिन शपथ-ग्रहण की औपचारिकताओं का अभिनय चलता रहता है और विनम्रता की भूमिका अदा करता ‘जनप्रतिनिधि’ बिना पैसा ख़र्च किये एक मिनिट से भी कम समय में पूरे देश को यह बता देता है कि ‘मैं (नया मसीहा) अब तुम्हारा देश चूसने के लिए अधिकृत हो गया हूँ।’
ये शब्द सुनते ही पूरी ब्यूरोक्रेसी उसके जूते के नम्बर के मुताबिक अपनी खोपड़ी सेट कर लेती है। वह जिस क्षेत्र पर पिकनिक मनाने निकलता है, वहाँ तहलका मच जाता है। इससे अधिक क्या तबाही होगी कि उस क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों की नींद उड़ जाती है। अधिकारी रात-दिन दफ़्तर में रहकर चप्पे-चप्पे पर अपनी और अपने कर्मचारियों की खोपड़ियाँ बिछाते हैं कि पता नहीं किस चप्पे पर साहब का मन जूता मारने को मचल उठे, वह चप्पा ख़ाली रहा तो साहेब को कितनी निराशा होगी। ध्यान रहे कि हमारी संवेदनशील ब्यूरोक्रेसी यह सब श्रम साहेब को ख़ुश करने के लिए करती है, जनता को ख़ुश करने के लिए नहीं। साहेब भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए ब्यूरोक्रेसी का दिल दुखाये बिना, वे ख़ुश होकर लौट आते हैं। दोनों के बीच का यह समर्पण देखकर जनता की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ जाते हैं।
सब कुछ अभिनय मात्र है। औपचारिकताओं की इतनी लंबी फेहरिस्त है कि जीवन और औपचारिकताओं की होड़ में जीवन हमेशा छोटा रह जाता है।
संविधान में एक मज़ेदार बात और लिखी है कि संविधान का अपमान करनेवाले को बख़्शा नहीं जाएगा। इस बात ने संविधान को धर्मग्रन्थ बना दिया है। अब अगर किसी को इस किताब को जलाते, पटकते, गिराते, फाड़ते देखा गया या इस किताब पर प्रश्नचिन्ह लगाते देखा गया तो वह राष्ट्रद्रोही माना जाएगा लेकिन अगर कोई विधिवत इसको पढ़कर इसके साथ खिलवाड़ करे तो उसे पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
हमारा संविधान इतना लचीला है कि अगर मेरा इस तंत्र के किसी रेशे से पंगा हो जाए तो इस लेख में संविधान को महज एक किताब कहने के अपराध में मुझ पर कार्रवाई हो जाएगी और मुझे तंत्र के रेशों को ख़ुश करना आ जाए तो फिर पूरी किताब मेरे पक्ष में काम करने लगेगी।
हमारे यहाँ वक़ालत में न्याय दिलाने की पढ़ाई नहीं कराई जाती, बल्कि यह सिखाया जाता है कि इस किताब को किस कब किस एंगल पर रखकर न्याय को और जटिल बनाया जा सकता है। जो जितना जटिल बना दे, वह उतना बड़ा वक़ील। न्यायाधीश अपने कोर्ट में अधिवक्ताओं के इस कौशल को देखकर प्रसन्न होते रहते हैं। न्यायाधीश जानते हैं कि वक़ील अपने लाभ के लिए केस को लंबा किये जा रहे हैं। अदालतें न्याय नहीं देतीं, वे वैराग्य देती हैं। जो दो लोग विवाद के चरम तक पहुँचकर अदालत में आए हों, उन्हें यह ज्ञान कराया जाता है कि ‘जो लोग आपस में लड़ते हैं उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।’ यह ज्ञान होते ही वे दोनों लड़ाके कोर्ट की कैंटीन में बैठकर हँसी-ख़ुशी आपस का विवाद सुलझा लेते हैं। दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुक जाते हैं और विवाद सुलझ जाता है। इससे समाज में आपसी सौहार्द, विनम्रता, मेलमिलाप और भाईचारा बढ़ता है। एक पंथ, दो काज हो जाते हैं। अदालतों का मनोरंजन भी हो जाता है और विवाद भी स्वतः सुलझ जाते हैं। लेकिन ध्यान रखना कि इन अदालतों के विरोध में कुछ भी कहा तो कहीं के नहीं रहोगे।
कार्यपालिका का तो कहना ही क्या। वे इस तंत्र के सबसे सरल सोपान हैं। कोई छिपाव नहीं। कोई हिप्पोक्रेसी नहीं। कोई ड्रामेबाज़ी नहीं। सीधी बात, पैसा है तो ठीक, वरना रगड़ दिए जाओगे। अब यह मत सोचने लगना कि कैसे रगड़ दिए जाओगे। शुरू से यही बात समझा रहा हूँ। पुलिसवाला नाराज़ हो गया तो किसी को भी, किसी भी समय चार-पाँच धाराएँ लगाकर धर लेगा। वे धाराएँ सही हैं या ग़लत -इसे सिद्ध करने के लिए अदालत जाना पड़ेगा। वहाँ चल रहे मनोरंजन कार्यक्रम में बीच-बीच में एकाध सीन आपका भी जुड़ जाएगा। उसमें न्याय तलाशने के लिए संविधान टटोलोगे तो अंत में यही ज्ञान होगा कि तंत्र से पंगा नहीं लेने का, वरना धरे जाओगे!
यही बात तो मैं समझा रहा हूँ। लेकिन किसको समझा रहा हूँ। उस जनता को, जो दस-पाँच हज़ार करोड़ के घोटाले को भ्रष्टाचार मानना बंद कर चुकी है। उस जनता को, जो तंत्र के किसी तिनके से पहचान निकलते ही ख़ुद भ्रष्टाचारी होने को तैयार बैठी है। उस जनता को, जो एप्रोच और रिश्वत की सरल राह पर चलने को धर्म मान बैठी है। उस जनता को, जो दो-चार मर्डर और एकाध बलात्कार करनेवाले को वोट दे आती है। उस जनता को, जो अपनी ख़ामोशी से राजनीति को शोषक, न्यायपालिका को अकर्मण्य और कार्यपालिका को भ्रष्ट होने के अवसर उपलब्ध कराती है।
और कौन समझा रहा है? मैं, जो इस कालखण्ड में अपनी समझ के अनुसार परत-दर-परत आकलन करने के बावजूद सम्पूर्ण क्रांति के एकमात्र उपाय की ओर इंगित करने से इसलिए बचता हूँ कि इस तंत्र से पंगा कौन ले!
हम निराशा के उस छोर को छू रहे हैं, जहाँ उम्मीदों की लाशें सड़ांध मारने लगी हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, दफ़्तर, चुनाव, कला, मीडिया, कृषि सब जगह माफ़िया काम कर रहा है। देश की जड़ों में जो घुन लगा है, वह भी अब भूखा मर रहा है। चीख़ने की ज़रूरत है और हम बोलने में भी हिचक रहे हैं।
इस तंत्र के कुछ ऐसे अंग हैं, जो गुप्त रूप से तंत्र में विद्यमान हैं। तंत्र के विविध रेशे अपनी सुविधा के अनुसार इन अंगों का उपभोग करते रहते हैं।
युवा इस बात से ख़ुश हैं कि ‘यूट्यूब पर फलाने बंदे की वीडियो देखकर मज़ा आता है, क्योंकि वो सबकी जमकर लेता है।’ जो जितना अश्लील, वह उतना हिट। और हम शालीनता के लबादे में अश्लील होने का अवसर तलाशते किंपुरुष।
युवा अबोध हैं, इसलिए बिना झिझके अश्लीलता को लाइक करते हैं। हम समझदार हैं इसलिए चोरी-छिपे मन ही मन लाइक करते हैं, पर बाहर से शालीन बने रहते हैं।
इस दोहरे चरित्र के साथ तन्त्रीय विफलताओं के इस शिकंजे को उखाड़ना असम्भव है। हम रोज़ ख़ुद से झूठ बोलते हैं कि सब सही हो जाएगा। क्योंकि ज्ञान हमें झूठ बोलना सिखाता है और व्यवहारिक ज्ञान हमें ख़ुद से झूठ बोलना सिखाता है।

✍️ चिराग़ जैन

श्रद्धांजलियों का ढोंग

कभी सुना था कि आपके जीवन का आकलन इस बात से किया जाता है कि आपके दुनिया से जाने के बाद लोग आपके बारे में क्या बोलते हैं। लेकिन अब लगता है कि किसी भी व्यक्ति के भीतर के घटियापन का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वह किसी की मौत को भुनाने के लिए किस हद्द तक गिर सकता है।
हम इस हद्द तक ढोंगी हैं कि किसी की मृत्यु तक का फायदा उठाना चाहते हैं। हमारा मीडिया किसी के मरते ही न्यूज़ बुलेटिन, कैप्सूल और पैकेजिंग की मारामारी में लग जाता है। कल्पना करो, तो आत्मा काँप जाती है कि क्या माहौल होता होगा न्यूज़रूम का। अरे बॉडी के शॉट्स आए क्या, अरे प्रोम्पटर पे देख कोई अपडेट है क्या, ब्रेकिंग प्लेट बनवाओ हरे रंग के कपड़े से लटका था, हॉस्पिटल लाइन-अप करो, ओबी लगवाओ, ओए बाप के शॉट्स आ गए, जल्दी फ्लैश कर, सुसाइड का कोई पुराना एनिमेशन निकाल यार, अमिताभ का ट्वीट लगा, बहन की बाइट ले, दोस्त रो रहा है, उसको बोल क्लोज़ अप ले….!
अब तो घृणा भी नहीं होती। कुछ लोग ऐसी ख़बर आते ही तुरन्त ट्वीट करके यह जताते हैं कि मरनेवाले से उनका गहरा दोस्ताना था। हर मरे हुए आदमी को संबोधित करके ट्वीट करते हुए बची हुई दुनिया में यह ढिंढोरा पीटते हैं कि दुनिया के सारे सेलिब्रिटीज़ उनके ख़ासम-ख़ास हैं। यह और बात है, जिससे व्यक्तिगत सम्बन्धों का दावा किया जाता है, वे उनसे किसी भी सोशल प्लेटफॉर्म पर कनेक्टेड नहीं होते। कुछ स्वयंभू सेलिब्रिटी किसी के मरते ही गूगल पर उसके परिवार के सदस्यों के नाम तलाशकर ऐसा ट्वीट तैयार करते हैं, जिससे लगे कि इसका मरनेवाले से पारिवारिक संबंध था और इसे परिवार के हर सदस्य की चिंता है।
तीसरी क़िस्म के लोग मनुष्यता की सीमा के पार जाकर भी अपने एजेंडे के प्रति कटिबद्ध हैं। किसी के मरते ही उनके भीतर का हिन्दू, उनके भीतर का मुस्लिम, उनके भीतर का वामपंथी, उनके भीतर का राष्ट्रवादी, उनके भीतर का सेक्युलर, उनके भीतर का सवर्ण, उनके भीतर का दलित अथवा उनके भीतर का भारतीय सक्रिय हो जाता है और उनके भीतर मर चुके मनुष्य के शव पर नंगा नाच करने लगता है। वे बेशर्मी से बताते हैं कि मरनेवाला ग़द्दार था, उसका मर जाना ही ठीक था। वे ढिठाई से सोशल प्लेटफार्म पर लिखते हैं कि उसने फलानी फ़िल्म में मुस्लिम का रोल किया था इसलिए उसके मरने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, उसने फलाने शो में यह कहा था, इसलिए उसका मर जाना ठीक है।
मैं कई बार सोचता हूँ कि जिस रावण ने राम जी की पत्नी का अपहरण किया, उस तक की मृत्यु पर राम संज़ीदा हो गए थे। फिर किसकी उपासना करते हैं ये मृत्यु के बाद किसी को गाली देने वाले लोग। फिर स्वतः ही उत्तर मिलता है, कि राम के जीवन के आदर्श मनुष्यों के लिए अनुकरणीय हैं, जो पहले ही अपने भीतर के इंसान की हत्या किए बैठे हैं, जिन्हें किसी मानव की मृत्यु से क्षोभ नहीं होता, उनको राम के आदर्शों की मृत्यु से कहाँ कष्ट होता होगा।
किसी की मृत्यु के बाद बची हुई दुनिया में जो काँव-काँव होती है, उसे देखकर समझ आता है कि हमारे पुरखों ने मृत्यु समाचार सुनकर दो मिनिट के लिए मौन हो जाने की परिपाटी क्यों बनाई थी।

✍️ चिराग़ जैन

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