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तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता...

लाचारी

उनको जाने क्या-क्या सहना पड़ता है ख़ुद से आँख चुराकर रहना पड़ता है हम तो केवल सच से काम चलाते हैं उनको थोड़ा झूठ भी कहना पड़ता है ✍️ चिराग़...

असल मुद्दा क्या है

एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी...

रचनाकार

जीवन के तमाम प्रश्नचिन्हों के मध्य भी अपने भीतर के कबीर और तुलसी को बचाए रखनेवाले रचनाकार, वर्तमान के ऐसे विस्मयादिबोधक हैं, जिन्हें युग का सम्बोधनकारक बनने के लिए केवल युग के प्रारम्भ की घोषणा करनी है। ✍️ चिराग़...

सृजन और आलोचना

जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें ✍️ चिराग़...

बुजुर्गों का रुआब

अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं। सोसाइटी के बाहर इस समय...
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