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शिव : साधना सहजता की

शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं।
शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं।
शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है।
शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा कुछ है ही नहीं। शिव तो द्वाररहित हैं। शिव तो मार्गरहित हैं। मार्ग, द्वार, यात्रा ये सब तो भौतिक शब्द हैं! शिव इन सबसे परे हैं। शिव कोई संज्ञा नहीं हैं, वे तो एक घटना हैं। वे तो घटित होते हैं।
और घटना का कोई मार्ग अथवा द्वार नहीं हो सकता। वह तो कहीं भी घटित हो जाए। उसके घटित होने का बाद उस स्थल का मार्ग अथवा द्वार अवश्य हो सकता है। किंतु वह उस वैराट्य का स्मारक मात्र होगा। द्वार और मार्ग से जहाँ कोई पहुँचेगा वहाँ उसे उस घटना के चिह्न मिल सकते हैं… घटना तो घटित हुई और विलीन हो गयी।
इसीलिए शिव तक पहुँचने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं है। इसीलिए शिव का स्वरूप किसी प्रदेश, लोक जाति, देश, वर्ण, नस्ल, वर्ग, ग्रह, योनि, काल अथवा धर्म तक सीमित नहीं है। शिव असीम हैं। उन्हें जो देखे वो उसे ‘अपने’ लगते हैं।
शिव किसी एक के हो भी कैसे सकते हैं। शिव तो सबके हैं। सबकी पीड़ा का निदान हैं। शिव किसी भी प्रकार के परहेज से परे हैं। भूत, प्रेत, व्यंतर, मनुष्य, नाग, नक्षत्र, पशु, नदी, पर्वत, सुर, असुर और यहाँ तक कि मसान तक को शिव से अपनत्व मिल जाता है।
शिव के अर्द्धांग में प्रतिष्ठित पार्वती प्रेम का अस्तित्व हैं तो शिव के कण्ठ में विद्यमान विष उनके वात्सल्य का द्योतक है। चिताभस्म का लेप वैभत्स्य को जीवंत करता है, त्रिशूल पर ओज विराजित है और जटाओं से प्रस्फुटित गंगा आश्चर्य उत्पन्न करती है। शिव के गणों में हास्य के दर्शन होते हैं और हृदय में करुणा वास करती है। त्रिपुण्ड के मध्य स्थित नेत्र उन्हें रौद्र कर देता है तो निमीलित नयनों से वे अपने निर्वेद होने की सूचना देते हैं।
शिव के चरण पर्वत पर हैं और शीश पर चंद्रमा विद्यमान है। यह स्वरूप शिव के वैराट्य का प्रमाण है। मृगछाल और गंगोद्गम उनके प्राकृतिक होने का उद्घोष है। शिव समाधान का पर्यायवाची है। वहाँ समस्या कोई है ही नहीं। सभी समस्याओं के समाधिस्थ हो जाने की स्थिति है शिव। इस अद्भुत स्वरूप में किसी परहेज की संभावना ही नहीं है। वहाँ सब स्वीकार्य है। शिव के लिए ‘कुछ’ बनना नहीं पड़ता। शिव को पाने के लिए कुछ ओढ़ना नहीं पड़ता।
वहाँ तो ठीक वैसे ही पहुँचा जा सकता है, जैसे आप हैं। जितने अधिक स्वाभाविक होते जाएंगे, शिव का नैकट्य उतना ही अधिक होता जाएगा। कृत्रिमता हटी और शिव घटित हो गये। बनावट का विलीन हो जाना ही शिव का घटित होना है। विश्व में जो-जो असम्भव है, वह सब भी शिव के यहाँ सम्भव हो जाता है। वहाँ नकार है ही नहीं। वहाँ तो सब कुछ साकार है। वहाँ सब कुछ सम्भव है।
शिव का स्वीकार इतना बड़ा है कि उसके आगे कोई अस्वीकार टिक ही नहीं पाता। वे संसार के समस्त भावों को एक सरीखा स्वीकार कर लेते हैं। अन्यत्र आपको ऐसा कहीं नहीं मिलेगा। अन्यत्र ऐसा कहीं तलाशने भी न लगना। मन के भीतर घट रहे हर ‘अजीब’ को शिव के अतिरिक्त कहीं व्यक्त किया तो पागल कहलाओगे। किन्तु शिव के यहाँ सब स्वीकार्य है। वहाँ मन को खोलकर रख देना। वहाँ हर आवरण हटा देना। वहाँ हर नियम के दायरे से बाहर निकल आना। वहाँ हर नैतिकता के खोल से ऊपर उठ जाना। क्योंकि वहाँ कुछ अनैतिक नहीं। वहाँ कुछ अराजक नहीं। वहाँ कुछ अनावृत नहीं… वहाँ तो सब सहज ही सहज है।
इसलिए शिव को पाने की तपस्या सहज हो जाने की तपस्या है। सहज होने के लिए सर्वाधिक तपस्या करनी पड़ती है। बनावट के लिए तो दुनिया भर के पार्लर खुले हुए हैं। बनावट के लिए तो दुनिया भर के मठ, धर्मस्थल, विद्यालय, संस्थान, इदारे खुले हुए हैं। लेकिन सहज होने के लिए कोई इंस्टीट्यूट नहीं है। इन सब संस्थानों और इदारों से बच निकले तो आप शिव के निकट आ जाएंगे। स्वाभाविक होना सबसे कठिन काम है। क्योंकि इसमें कुछ करना नहीं होता। सायास कुछ न करना सबसे कठिन है। क्योंकि जब-जब कुछ सायास किया जाएगा तो वह आपको कृत्रिमता की ओर ले जाएगा, किन्तु जब आपकी अंतःचेतना आपसे अनायास ही कुछ करा लेगी तो वह प्राकृतिक होगा। उसमें कुछ असत्य नहीं होगा। उसमें कुछ असुन्दर नहीं होगा। वह तो पूर्ण सत्य होगा। वह तो पूर्ण सुन्दर होगा। वह तो शिव होगा।

✍️ चिराग़ जैन

युद्ध : एक अवसर

‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो सकती है लेकिन मेरे भीतर का कबीर इस सलाह को सुनकर प्रसन्न होने की बजाय भयभीत हो गया है।
युद्ध बाज़ार में खींच लाया गया है और अब बाज़ार इससे लाभ उठाने के लिए युद्धरत है। यह मानवीय संवेदना की मृत्यु की घोषणा है।
पत्रकारिता का काम है कि भूख से पीड़ित व्यक्ति की सूचना समाज तक पहुँचाए। कविता का दायित्व है कि वह उस भूखे तन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने योग्य संवेदना समाज में प्रसारित करे और राजनीति की प्रवृत्ति है कि वह उस भूखे को रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचाकर उसका श्रेय लेने का श्रम करे। किन्तु लाइक्स और शेयर्स की अंधी दौड़ में संलग्न समाज उस भूखे तन को नोच-नोच कर वायरल होने का उपाय ढूंढ रहा है।
लाइक्स और शेयर्स की यह होड़ इतनी वीभत्स है कि घर परिवार में मृत्यु होने पर ‘शव’ के चित्र और ‘शवदाह’ के वीडियो लाइव करने से भी हमें संकोच नहीं होता। चुम्बन से लेकर गर्भावस्था तक सब कुछ केवल लाइक्स बटोरने का ज़रिया हो चला है।
अमानुष होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि किसी की आह सुनकर हमारी आँख में आँसू आने की बजाय, उस आह को बेचने के विचार से हमारी आँखों में चमक आ जाती है। युद्ध के सभी वीडियो बाज़ार ही वायरल करा रहा है यह सत्य नहीं है किन्तु हर वायरल होती वीडियो की संवेदना का बाज़ार भाव टटोला जा रहा है यह भयावह है।
अपने समाज के युवक-युवतियों को जब ‘अश्लील’ और ‘लगभग अश्लील’ रील्स तथा शॉट्स बनाते देखता हूँ तो एहसास होता है कि ‘समाज’ नामक जिस किले में हमने अपने परिवारों को सुरक्षित कर दिया था उसकी दीवारों में दरार पड़ गयी है। टीन-एजर्स को जब सार्वजनिक वीडियो में ‘गालियाँ’ बकते देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि आँखों की हया और बड़े-बुजुर्गों के लिहाज का जो छप्पर हमने समाज पर डाल रखा था वह तार-तार हो गया है और हमारा समाज खुले आसमान के नीचे लगभग नंगा बैठा है।
इसके तन पर जो कुछ कतरनें बची हैं, उन्हें संवेदना की सीवन से न सीया गया तो आश्चर्य न करना कि बाज़ार में मातम की डिमांड होने पर पड़ोसी के घर का मातम बेचनेवाला यूट्यूबर अपने घर में ही प्रोडक्शन करने का जुगाड़ कर ले। अपराध का वीडियो आसानी से वायरल होता है, इस वीडियो को बनाने के लिए आपका नौनिहाल अपराध की राह पर किस दूरी तक जा सकता है, इसका अनुमान बहुत आवश्यक हो चला है। थोड़ी-सी उघाड़ करने से लाइक्स तेज़ी से आने लगे तो आपकी बेटियाँ लोभ के इस अंधकूप में जल्दी ‘सेलिब्रिटी’ बनने के लिए क्या कुछ कर जाएंगी इसका आभास बेहद ज़रूरी है।
हर आँसू, हर संवेदना, हर पीड़ा और हर रिश्ते को वायरल होने का एक अवसर मानना इन कर्णधारों को कितना बर्बर कर देगा… यह यथाशीघ्र अनुभूत कर लीजिए क्योंकि यदि ये शोर एक प्वाइंट और बढ़ गया तो फिर किसी भी तरह से आपकी बात इनके कानों तक नहीं पहुँच सकेगी। ‘कुछ भी’ करके वायरल होने की दौड़ लगाते इन होनहारों को रोक लो, वरना ये वायरल होने के लिए ‘कुछ भी’ कर जाएंगे…!

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली : एक करवट इतिहास की

दिल्ली – यह केवल एक शहर का नाम नहीं, बल्कि एक अंदाज़ है ज़िन्दगी का। अपने साथ न जाने कितने ही किस्से-कहानियाँ लेकर अपने नम इतिहास के साथ ये शहर, ज़िंदा भी है और आबाद भी।
तोमर, पिथौरा, सीरी, सैयद, लोधी, तुग़लक़, ग़ुलाम, मुग़ल, खि़लजी,और अंग्रेज सभी ने इस शहर को अपने-अपने अंदाज़ में बसाया और अपने-अपने तरीके से उजाड़ा है।
दिल्ली के लगभग हर इलाके ने इतिहास की कोई न कोई करवट ज़रूर देखी है। अनंगपाल तोमर और रायपिथौरा से लेकर जॉर्ज माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू तक न जाने कितने ही तख़्त-ओ-ताज बनते-बिगड़ते देखे हैं इस ज़मीन ने।
लालकोट, किलोकरी, सीरीफोर्ट, सफदरजंग, लोधी गार्डन, तुगलकाबाद, निज़ामुद्दीन, कुतुब मीनार, हुमायूँ का मक़बरा, खानखाना मक़बरा, सब्ज़ गुम्बद, शाहदरा, लालक़िला, जामा मस्जिद, फतेहपुरी मस्जिद, फव्वारा चौक, शीशगंज साहिब, बंगला साहिब, नानकसर साहिब, मजनू का टीला, ख़ूनी दरवाज़ा, दिल्ली दरवाज़ा, नजफगढ़… हर जगह इतिहास के बेहद क़ीमती ज़र्रे जड़े हुए हैं। एक-एक इमारत की अपनी एक मुक़म्मल कहानी है।
कभी मौक़ा मिला तो इन सब कहानियों को आपके साथ साझा करूँगा।

दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा उसी ने लूटा है

यह शेर कहानी का केवल एक पहलू बयां करता है। हक़ीक़त यह है कि इस शहर ने हर लुटेरे से कुछ न कुछ रेहन रखवा लिया है, जो तारीख़ के ख़ज़ाने में आज तक महफ़ूज़ है।
मुहम्मद शाह रंगीला की अय्याशियों की वजह से नादिरशाह के हमले को छोड़ दें, तो बाक़ी कोई ऐसा न रहा, जिसने दिल्ली की सरज़मीन पर क़दम रखा हो और इस शहर को कुछ देकर न गया हो। कुछ तो अपना दिल ही इस शहर को देकर दीवाने हो गए।
कहानी कहने बैठें तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि इस शहर को ज़ौक़-ओ-ग़ालिब की दिल्ली कहा जाए या ज़फ़र-ओ-दाग़ की दिल्ली! इसे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का शहर कहा जाए या रायपिथौरा का शहर! इसके निर्माण के लिए शाहजहां को शुक्रिया कहें या सर लुटियन्स को इस शहर के निर्माण का थैंक्स बोला जाए। चांदनी चौक से गुज़रते हुए फव्वारा चौक पर गुरु तेग़ बहादुर के शिष्यों की क़ुर्बानी याद करके मत्था टिकता है तो ख़ूनी दरवाज़े को देखकर 1857 के विद्रोह के सर्वमान्य नायक बहादुशाह ज़फ़र के शहज़ादों के बलिदान याद आते हैं।
जिधर देखो, उधर अतीत का कोई सफ़हा वक़्त की हवाओं पर संगीत सुनाता दिखाई देता है। ऐतिहासिक इमारतों की इस शहर में इतनी तादात है कि दर्जनों बहुमूल्य इमारतें कभी मंज़रे-आम पर रौशन ही नहीं हो पातीं। वज़ीराबाद में जमुना के किनारे मौजूद खण्डहर, लोदी कॉलोनी में नजफ़ खां का मक़बरा और नजफगढ़ का दिल्ली गेट रोज़ दिखाई देता है लेकिन उसका इतिहास जानने की जिज्ञासा शायद ही किसी को होती हो।
तीर्थ करने चलो तो यह शहर किसी तीर्थक्षेत्र से कम नहीं है। मंदिरों की एक पूरी फेहरिस्त है यहाँ। चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर से शुरू करके कालकाजी शक्तिपीठ, झंडेवालान, छतरपुर, पांडवकालीन भैरों मंदिर, इस्कॉन, लोटस टैम्पल, चांदनी चौक का लाल मंदिर, महरौली का अहिंसा स्थल, दादाबाड़ी, लोदी रोड का साईं मंदिर और मलाई मंदिर के अलावा गली-गली में आस्था के इन केंद्रों की बहुतायत है।
औलियाओं की फ़क़ीरी याद करो तो हज़रत निज़ामुद्दीन से लेकर अब्दुर्रहीम ख़ानखाना, अमीर खुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब और बख़्तियार काकी की दरगाह तक का सफ़र किया जा सकता है।
स्वाद के दीवानों के लिए बालूशाही, मालपुए, कुल्फी, हलवा-नागौरी, कचौड़ी, बेड़मी, गोलगप्पे, परांठे, कलमी वड़े और न जाने कितने ही लज़ीज़ व्यंजनों के विकल्प मिल जाएंगे।
मौसम इतना मेहरबान है कि सर्दी, गर्मी और बरसात का भरपूर मज़ा लेता है यह शहर। हर सुख के साथ दुःख जुड़ा होता है इसलिए कोहरा, चिल्ला, लू और बाढ़ भी इसके मुक़द्दर में आ ही जाती है।
गुलमोहर, नीम, अमलतास, पिलखन, कीकर, पलाश, बोगनबेलिया, मधुमालती, गूलर, पपीते और बरगद यहाँ ख़ूब फलते-फूलते हैं।
मकर संक्रांति, वसन्त पंचमी, फूलवालों की सैर, होली, महावीर जयंती, हनुमान जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, गणगौर, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, पर्यूषण, वाल्मीकि जयंती, क्षमावाणी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, प्रकाश पर्व, ईद, मुहर्रम, छठ पूजा, करवा चौथ, क्रिसमिस, न्यू ईयर, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती यहाँ उत्सव का माहौल बनाए रखते हैं।
दिल से जीनेवालों के लिए यह शहर अपनी शानदार किस्सागोई के साथ बेहतरीन पनाहगाह है।

✍️ चिराग़ जैन

जैन धर्म के अनुयायी

हम जैन धर्म के अनुयायी
हम नियम निभाने वाले हैं
श्रावक अणुव्रत के धारी हैं
श्रमणों ने महाव्रत पाले हैं

हम सिद्धशिला का लक्ष्य बना, अरिहंतों की पूजा करते
आचार्य कथित पथ को तजकर, नहीं काम कोई दूजा करते
पाठक परमेष्ठी से पढ़कर
मुनि मार्ग को जाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

वैभव के मग चलते-चलते हम राह अचानक मोड़ गये
हम बाहुबली के वंशज हैं, जो जीत-जीत कर छोड़ गये
हम भामाशाह, राष्ट्रहित में
सर्वस्व लुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

दिन ऐसा एक नहीं जाता, जब हम जपते नवकार नहीं
जिसमें हो अहित चराचर का, ऐसा करते व्यापार नहीं
हो लोभ न जिसमें उतना ही
हम लाभ कमाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

रत्नत्रय को धारण करके, हम चार कषाय अहित मानें
पाँचों पापों से दूर रहें, छह द्रव्य, तत्व सातों जानें
कर नष्ट अष्ट कर्मों को हम
अष्टम भू पाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम शांत सहज जीवन जीते, लड़ने की देते राय नहीं
कैसी भी कठिन समस्या हो, अड़ने से कोई उपाय नहीं
हम अनेकांत के साधक हैं
स्याद्वाद सिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम चेतन से मतलब रखते, तन से रखते हैं मोह नहीं
इसलिए हमें सुख-दुःख देते, ये लौकिक मिलन-बिछोह नहीं
जिसको अपना कहते उसको
शिवमार्ग दिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम पर्व मनाते हैं ऐसे, पूरे दिन का उपवास करें
निस्पृह जीवन जीने वाले, दश धर्मों का अभ्यास करें
हम मृत्यु महोत्सव से पथ का
पाथेय जुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

✍️ चिराग़ जैन

डॉ कुमार विश्वास

अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!

✍️ चिराग़ जैन

डॉ अशोक चक्रधर

हिन्दी की वाचिक परम्परा में अनेक विभूतियों का संसर्ग मिला है। मंच पर सक्रिय होने के कारण ऐसे अनेक सितारों को स्पर्श करने का अवसर मिला है जिन्हें हमेशा दूर से ही देख सका था।
ऐसे ही एक दीप्त नक्षत्र हैं- डॉ अशोक चक्रधर। कवि-सम्मेलनीय व्यस्तताओं के बीच अनवरत सृजन तथा शोध में संलग्न रहने का फ़ार्मूला क्या है -यह मैंने अशोक जी से सीखा। उनसे मिलने पर ज्ञात हुआ कि हमें जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला है। इसीलिए बहु-अवधान का कौशल विकसित किये बिना एक ही जीवन में ढेर सारे काम करना सम्भव नहीं है।
सामान्यतया कवि-सम्मेलनीय यात्राओं में हम लोग बातचीत और हँसी-ठट्ठा करके समय काटते हैं, लेकिन अशोक जी ज्यों ही यात्रा में निकलते हैं तो वे अपने तीन संस्करण बना लेते हैं। पहले क्लोन का काम होता है कि साथ के कवियों की बातचीत को सुनते हुए बीच-बीच में हुंकारा भरकर उसमें अपनी उपस्थिति बनाए रखे और आवश्यक होने पर उसमें पूरे मनोयोग से सम्मिलित भी हो। ठीक इसी समय में दूसरे क्लोन को प्रशंसकों की मुस्कान का प्रत्युत्तर देते हुए सेल्फ़ी और ऑटोग्राफ आदि में संलग्न रहना होता है। और इसी के समानांतर तीसरे अशोक जी अपने आईपैड या मोबाइल पर कोई लेख, स्क्रिप्ट, कविता या कांसेप्ट लिखने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार एक ही समय में अपने मस्तिष्क को तीन अलग-अलग दायित्वों में लगाकर वे हर पल तिगुना जीवन जी रहे होते हैं।
सृजनशील रहना या काम करना सामान्यतया लोगों की विवशता होती है। कुछ लोग इसे शौक़ बना लेते हैं और बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम करने का रोग हो जाता है। अशोक जी, ये तीसरी तरह के लोगों में हैं। काम करने का रोग इतना भयावह है कि उसमें अपनी मानसिक पीड़ा तो दूर, दैहिक रोग भी दिखाई देना बंद हो जाता है।
अभी हाल ही में एक दुर्घटना के कारण उनके उत्तरदायी कंधों में कुछ टूट-फूट हो गयी। कंधे का अस्थिभंग जब टीसता है तो दुनिया के समस्त कार्य अनावश्यक लगने लगते हैं। इस बात को अनुभूत करके मैंने और अन्य कवियों ने उनका हालचाल जानने के लिए भी उन्हें कम-से-कम ही फोन मिलाया कि कहीं फोन उठाने में उन्हें कष्ट न सहना पड़े। लेकिन इस एकांत का लाभ उठाकर अशोक जी ने आईसीयू में लेटे-लेटे अपने आईपैड पर अपनी नातिन के जन्मदिन की शानदार किताब तैयार कर दी।
कविग्राम में उनका एक नियमित स्तम्भ प्रकाशित होता है। गत माह उन्हें तीसरी लहर के कोरोना ने जकड़ लिया और उनके ज्वर का पारा ऊर्ध्वगामी हो गया। 20 जनवरी को मैंने उन्हें कहा कि इस बार आपके स्तम्भ के बिना अंक निकाल लेंगे, और मैं सम्पादकीय टिप्पणी में स्तम्भ प्रकाशित न होने की कोई वजह लिख दूंगा। लेकिन अशोक जी को मेरी बात अच्छी न लगी। उन्होंने मुझे कहा कि महीने की आखि़री तारीख़ तक रुक जाओ, तब तक न लिख सका तो तुम निर्णय ले लेना। मैंने पत्रिका पूरी तरह तैयार करके रख ली और 31 जनवरी को यह सोचकर उसे फाइनल पैक कर दिया कि अब अशोक जी का लेख नहीं छप सकेगा। उन्हें फोन करने से इसलिये बच रहा था कि कहीं वे लिखने का दबाव न महसूस करें। लेकिन 31 जनवरी की सुबह 10 बजे उनका फोन आया कि उन्होंने स्तम्भ लिखकर भेज दिया है। फोन पर अपनी सद्य-सृजनोपरांत उपजने वाले उत्साह के साथ उन्होंने स्तम्भ के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
वे स्तम्भ सुना रहे थे और मैं उनके बुखार का ताप महसूस कर रहा था। उस दिन मैंने एक बार फिर सीखा कि सृजनशील व्यक्ति को स्वस्थ होने के लिए आराम की नहीं काम की ज़रूरत होती है।
आज पद्मश्री डॉक्टर अशोक चक्रधर का जन्मदिन है। अपने कंधे की पीड़ा को अंगरखे से ढाँप कर वे उसी कंधे पर अपनी गर्दन टिकाए जन्मदिन की बधाइयों का मुस्कुराते हुए उत्तर दे रहे होंगे।

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भाषा से खेलने का अधिकार केवल उसे प्राप्त है, जिसने भाषा की आत्मा को स्पर्श करके उसकी संवेदना के सबसे महीन तंतुओं को महसूस किया हो। शब्द का सिंगार करके उसकी अर्थ-व्यवस्था को बलवती बनानेवालों को भाषा की समृद्धि का श्रेय मिलता है।
आदरणीय डॉ अशोक चक्रधर, उन एकाध हिंदीभाषियों में से एक हैं, जो इस श्रेय के सम्यक अधिकारी हैं। किसी कवि की रचनाधर्मिता जब कविता गढ़ते-गढ़ते, शब्द भी गढ़ने लग जाए तो यह इस बात की सूचना है कि उसकी सर्जना अपनी भाषा के शब्दकोश की सीमा के पार निकल गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसकी भावभूमि के लिए भाषा में उपलब्ध शब्दों का आकाश छोटा रह गया है।
इस बिंदु पर कवि कविता के साथ-साथ शब्द रचने लगता है। कभी ये शब्द आस-पड़ोस की भाषाओं से अपनी भाषा के संयोग का प्रतिफल होते हैं, तो कभी अपनी ही भाषा की पुरातन परम्परा से टटोलने पर हाथ लगते हैं, जिन्हें कवि नई साज-सज्जा के साथ पुनः लोकार्पित कर देता है। यही कारण है कि इन शब्दों का कोई विलग शब्दकोश न होने के बाद भी ये बिना समझाए समझ आ जाते हैं। ये शब्द इतने समर्थ होते हैं कि ये न केवल अपना अर्थ स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपना सन्दर्भ तक आसानी से समझा देते हैं।
डॉ अशोक चक्रधर के सृजनलोक में ऐसे अनेक शब्द मौजूद हैं जिन्हें किसी विशेष सन्दर्भ के लिए उन्होंने बाक़ायदा रचा है। उनकी अनेक रचनाओं में निरर्थक शब्दों से अर्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है। बच्चों की तोतली बोली में शब्द जब अपना रूप बदलकर अष्टवक्र हो जाता है, तब उसके दर्शन को पकड़कर उसे भी लिपिबद्ध करने का सामर्थ्य उनकी अनुभूति को लब्ध है।
वर्तमान में अशोक जी की रचनात्मक चेतना लोक-अभिरुचियों की चिंता से ऊपर उठकर शाश्वत साहित्य की साधना में संलग्न है। यह सृजन की तुरियावस्था है। यहाँ दैहिक पीड़ा, व्याधि, यश, लोभ और लौकिक सफलता की तमाम बेड़ियाँ छूट चुकी होती हैं। यहाँ मनुष्य लोक से मुक्ति पाकर बोध का आनंद भोगने लगता है। यहाँ कवि मुक्तिबोध होने लगता है।

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