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सम्मेद शिखर

सावधान देश के कर्णधारो!
सम्मेद शिखर के मुद्दे पर जैन समाज के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह घर के एक और बेटे को घर से बाहर कर देने का षड्यंत्र है। भारत के लगभग सभी सामाजिक संगठनों में तन-मन-धन से योगदान देनेवाले जैनियों ने कभी स्वयं को सनातनियों से अलग नहीं माना। व्यवसाय, व्यापार और नौकरी-पेशों से आजीविका जुटानेवाले जैनियों ने मंदिर, अस्पताल, शिक्षण संस्थान, धर्मशालाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, गौशाला और न जाने कितने ही लोककल्याणकारी प्रकल्पों की स्थापना की है। वैष्णोदेवी, बांकेबिहारी, काशी विश्वनाथ, खाटूश्याम, जगन्नाथजी, केदारनाथ, हरिद्वार, शिरडी, कामाख्या, स्वर्ण मंदिर और अन्य तमाम तीर्थस्थलों पर जैन समाज ने न केवल श्रद्धा से शीश झुकाया है, अपितु क्षेत्र के विकास हेतु उन्मुक्त हृदय से योगदान भी दिया है। अयोध्या के राम मन्दिर आंदोलन में जैन समाज मंदिर निर्माण की मांग करनेवालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला।
आस्था, उत्सव, संयम और अहिंसा की जीवनशैली वाले इस समाज ने न तो कभी इस देश के संविधान का अपमान किया न ही नागरिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। न कभी अपनी आस्थाएं किसी पर थोपने की कोशिश की और न ही कभी किसी की आस्थाओं को ढकोसला कहने का कार्य किया। अनुशासित इतने कि श्रवणबेलगोला में लाखों लोग जुटते हैं लेकिन कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। जैन साधुओं के चातुर्मास, पंचकल्याणक, पर्युषण पर्व और महावीर जयंती के महोत्सव में हज़ारों-लाखों की भीड़ जुटती है, लेकिन कभी कहीं अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
देश के संचालन हेतु ईमानदारी से अपना टैक्स जमा कराने वालों में जैन समाज अग्रणी है। भारतीय शौर्य के प्रतीक महाराणा प्रताप के टूटते आत्मबल को संबल देने के लिए अपनी पूंजी का तिनका-तिनका लुटा देनेवाले भामाशाह के के वंशज आज इस देश में अपनी आस्थाओं की रक्षा हेतु आंदोलन करने पर विवश हैं। गुरु के साहबज़ादों की ससम्मान अंत्येष्टि के लिए सोने की मोहरें बिछाकर आततायी का अहंकार तोड़नेवाले टोडरमल के बेटे आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। देश की आज़ादी के लिए अपने सीने पर लाठी खानेवाले लाला लाजपत राय के नौनिहालों से उनकी श्रद्धा का मेरुदंड छीना जा रहा है। मानस की चौपाइयों को अपने सुर और स्वर से सजानेवाले रवीन्द्र जैन का कुनबा आज चीखने को विवश है। अंतरिक्ष में भारतीय वैभव का ध्वज फहरानेवाले विक्रम साराभाई के कुटुम्बी आज सत्ता से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
प्रश्न झारखंड की सरकार या केंद्र की सरकार का नहीं है। प्रश्न यह है कि जब गिरनार के उर्जयन्त गिरी पर्वत को जैनियों से छीनकर ‘हिन्दू तीर्थ’ घोषित किया गया था, क्या तब जैन समाज की भावनाओं का किसी सत्ताधारी को रत्तीभर भी ख्याल आया था? प्रश्न यह है कि क्या उस समय जैन धर्मावलंबियों के साथ ठीक वही दुर्व्यवहार नहीं किया गया था, जो आक्रमणकारी मुग़लों के साथ किया जाता है?
और अब सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित करने का सरकारी दुस्साहस!
जैन समाज न तो कहीं बाहर से आक्रमण करके इस देश में आया है और न ही किसी तरह की विदेशी ताकतों के इशारे पर संचालित है। जैन संस्कृति न केवल इस देश की धरती पर उपजी है अपितु अपने स्वेद से इस देश को सींचने में भी उल्लेखनीय योगदान देती रही है। भोज, बिम्बिसार, अशोक और चन्द्रगुप्त सरीखे राजनैतिक पौरुष से जैन समाज ने इस देश का निर्माण किया है।
मान्यताओं का मतभेद हो तो हो, लेकिन हमारे पुरखों और हिन्दुओं के पुरखों में भी कहीं कोई भेद नहीं है। इसलिए शिखर जी की शुचिता को अक्षुण्ण रखने के लिए जारी इस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में भारत के वर्तमान सत्ताधीश यह बात अच्छी तरह से मन में बैठा लें कि यदि जैन समाज को पराया सिद्ध करने का कोई प्रयास किया गया तो अहिंसा की साधना करनेवाला यह समाज अहिंसा और अनुशासन से बड़ी से बड़ी साज़िश की चूल हिलाने में सक्षम है। यह याद रहे कि असहयोग और सविनय अवज्ञा सरीखे अहिंसक अस्त्रों का प्रभाव पहले भी इस देश ने देखा है। यह याद रहे कि सीने पर लाठी खाकर अपने प्राण देने वाले लालाजी के हाथ में कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनकी मृत्यु से उपजी ज्वाला ने ब्रितानिया शासन का भविष्य फूँक कर रख दिया। याद रहे कि भीतरी यात्रा में निमग्न शांत तपस्वियों की साधना भंग करनेवाले कालयवन, उन्हीं की नयनोर्जा से भस्म हो जाते हैं। याद रहे कि वर्चस्व की होड़ करनेवाला अंततः अपने अस्तित्व से हाथ धो बैठता है।

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सत्ताधीशो!
गिरिडीह में मधुबन से पारसनाथ पर्वत की ओर जानेवाली सड़क पर पांव रखते ही जैन धर्मावलंबियों के अंतःकरण में सम्मेद शिखर की आस्था का अनहद नाद गूंजने लगता है। गुणायतन, तेरापंथी कोठी, भूमिया जी, बीसपंथी कोठी और विमल समाधि मंदिर के दर्शन करते हुए जब कोई जैन तीर्थयात्री सम्मेद शिखर की यात्रा प्रारम्भ करता है, उस क्षण उसकी शिराओं में पावनता का एहसास प्रवाहित होने लगता है।
वैभव और संपन्नता का जीवन जीनेवाला जैन समुदाय बहुत कम सुविधाओं के बावजूद शिखर जी की यात्रा में अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। अर्थ के बल पर अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होटल और परिसर बनवा लेना जैनियों के लिए बिल्कुल भी कठिन नहीं है, किंतु इन सुविधाओं के साथ इस क्षेत्र की पावनता के सम्मुख जो संकट उत्पन्न होगा; उसके लिए जैन समाज का कोई भी नुमाइंदा कभी तैयार नहीं हो सकता।
सम्मेद शिखर हमारे लिए एक तीर्थक्षेत्र ही नहीं अपितु दैवीय ऊर्जा का एक भंडारगृह भी है। सत्तू, गुलदाना और बेसन के सेव खाकर पर्वत की जो कठिन यात्रा जैन मतावलंबी करते हैं उसे ‘यात्रा’ नहीं, ‘वंदना’ कहा जाता है।
यह अकेली संज्ञा ही जैन समाज के लिए इस तीर्थक्षेत्र का महत्व स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। अपनी काया से इस दुर्गम पर्वत की यात्रा को ‘वंदना’ कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि हमारे लिए यह पूरा पर्वत एक वेदी है, जिस पर अपनी काया के संपूर्ण अस्तित्व के समर्पण के साथ ‘वंदना की जाती है।
सुनने में आया है कि झारखंड सरकार इस पर्वत को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने जा रही है। यह सुनना जैन समाज के लिए ठीक ऐसे ही है, ज्यों कोई हमारे देवता को शो-पीस कहकर बेचने की बात कर रहा हो। जैसे कोई आस्था की किसी हाट में कीमत लगा रहा हो।
पर्यटन इन्द्रियों की लिप्सा की पुष्टि करता है और अध्यात्म इन्द्रियों को जीतने की राह दिखाता है। इन दोनों विरोधाभासी विषयों को एक साथ रखना कम से कम आस्था के अस्तित्व पर तो कुठाराघात होगा ही होगा।
जैन समाज भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुगामी है। पारसनाथ पर्वत पर न हिम है, न ही वन्यजीव! इस पर्वत की यात्रा का मार्ग भी बहुत रमणीक नहीं है। आस्थाओं के कुछ केंद्र यहाँ अवश्य हैं, जिनकी सादगी और एकरूपता आपके ‘भौतिक पर्यटकों’ का मनोरंजन करने में सक्षम नहीं हैं। इस क्षेत्र की सादगी का अर्थ अध्यात्म के बटोही को समझ आता है। इसलिए इसे पर्यटक स्थल घोषित करना सरकार की एक अपरिपक्व तथा अनावश्यक सोच का उदाहरण बनेगा।
भारत आस्थाओं का देश है। जैन दर्शन और जैन समाज ने देश के उन्नयन हेतु अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवा की है। देश के अर्थ की जड़ों को अपने स्वेद से सींचनेवाला जैन समुदाय पूरे विश्व में शान्तिप्रिय जीवनशैली के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि जैन समाज को अपने तीर्थक्षेत्र की शुद्धता को बचाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है तो यह विषय समूचे भारतीय समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ देगा।
जैन समाज आहत है। अहिंसा के अनुगामी अनशन और आंदोलन की राह पर निकल पड़े हैं। भामाशाह के बेटे अपनी श्रद्धा की शुचिता मांग रहे हैं। देश के राजनैतिक सिंहासन पर उनका राज है, जो आस्था और धार्मिक भावना का अर्थ भी समझते हैं और ताकत भी!
ऐसे मे सरकार को चाहिए कि पर्यटन की चकाचौंध से जैन समाज के इस आस्था केंद्र को दूर रखे क्योंकि आत्मा के स्तर पर घटित होनेवाली लौ की ज्योति भौतिकता की हैलोजन से बहुत ऊपर होती है। क्योंकि यदि इस आंदोलन में जैन समुदाय को कड़वे शब्द बोलने पड़े तो झारखंड की सरकार भारत की मीठी संस्कृति से आँखें नहीं मिला सकेगी।
क्योंकि स्वर्णभद्र कूट से जो हवाएँ टकराती हैं, उनके विघटन की ख़बर तक छापने कभी कोई नहीं आया!

✍️ चिराग़ जैन

दादा लखमी : एक जीवन जो सांग बन गया

‘ये नाचणिये-गावणिये बावळे ही होवे सै।’ -फिल्म में यह संवाद दो बार प्रयोग किया गया और दोनों बार सिनेमा हॉल में ठहाका गूंज गया। लेकिन फ़िल्मकार ने यह संवाद चुटकुले की तरह नहीं बल्कि फलसफे की तरह प्रयोग किया है। यह फ़िल्मकार का कौशल है कि इससे फूटने वाले ठहाके में भी इसका फलसफा अपना पूरा प्रभाव छोड़ता है।
ये चमत्कार इस एक संवाद में ही नहीं, अपितु पूरी फिल्म में रह-रहकर उभरता है।
किसी के जीवन पर फिल्म बनाते समय पटकथा को स्तुतिगान बनने से बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है, और दादा लखमी का फ़िल्मकार इस चुनौती को साधने में काफ़ी हद तक सफल रहा है।
लगभग सवा सौ साल पहले का हरियाणा परदे पर उतारने के लिए कल्पना, अनुमान तथा शोध के बिल्कुल सही अनुपात के प्रमाण पूरी फिल्म में उपस्थित हैं।
जिन गांवों में दिन भर धूल उड़ती हो वहाँ पीले और सफेद रंग में ज़्यादा फर्क़ नहीं होता -यह बात फिल्म के कॉस्ट्यूम डिजाइनर से लेकर आर्ट डायरेक्टर तक सबको अच्छी तरह याद है। फ़िल्मकार जानता है कि थोड़ी ज़्यादा तपी हुई सुराही भी फेंकने की बजाय मंदिरों में प्रयोग कर ली जाती है। फ़िल्मकार अनुमान लगा सका है कि मसान के लिए अलग से ज़मीन अलॉट नहीं की जाती होगी इसलिए गांव की ओर आने वाली पगडंडी के पास ही एक संटी पर टँकी उल्टी हांडी गांव में उपलब्ध सुविधाओं का पूरा चित्र प्रस्तुत करने में सफल हुई है। सार्वजानिक सभाओं के बैनर सफेद कपड़े पर नील से लिखकर ही तैयार किए गए हैं और चारपाई बाण की ही बुनी हुई है। बायोस्कोप के विषय में उस समय की धारणा; गलियों में बीन बजाते जोगी; पोषमपा, खो-खो और पिट्ठू गरम जैसे खेल, चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाता बुढ़ापा, गालियों में हुड़दंग करते बच्चे और ऐसी दर्जनों बारीकियों ने परदे पर हरियाणवी संस्कृति को जीवंत कर दिया है। बर्तन से लेकर रपट वाली जूतियों तक, कहीं भी किसी चूक की गुंजाइश नहीं दिखाई देती।
ग्रामीण जीवन का दर्द भी मसखरा होता है -यह तथ्य रात मे पति को खाना खिलाती निर्धन गृहिणी के ठहाके में पूरी ताक़त के साथ गूँजता महसूस हुआ। ग़रीबी ने जिसकी बोली का रस सोख लिया था, वो माँ भी जब अपने पति को अपने मनमौजी बेटे से नरमी से पेश आने को कहती है तो दर्शकों की आह, सिसक कर पूरे हॉल को नम कर देती है। गूंगे बाबा तक की फूली हुई साँसें फिल्म की कहानी में बड़े सलीके से पिरो दी गई हैं। किसी शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण दिखाने के लिए ‘लाठी’ का जो इस्तेमाल किया गया है, वह संवेदना यह स्पष्ट करती है कि पण्डित लखमीचंद जैसे दार्शनिक कवि पर फिल्म बनाने के लिए ‘दादा लखमी’ फिल्म का फ़िल्मकार पूरी तरह सक्षम है।
फिल्म में सांग का संगीत अपनी पूरी भव्यता के साथ उतरा है। उत्साह में अत्याधुनिक वाद्य प्रयोग करने से एक सच्ची कहानी भी, बनावटी लग सकती थी -शायद यही सोचकर संगीत तैयार करते समय कहानी के काल और स्थान का पूरा ध्यान रखा गया है। और हाँ, ताशे भी बजे हैं तो उनका रूप-रंग वही है, एकदम ओरिजिनल! जिस रागणी का जहाँ प्रयोग किया गया है, वो ठीक उसी जगह के लिए रची गई महसूस होती हैं।
यशपाल शर्मा ने ‘मर-मर के हार गए’ गीत में जो अभिनय किया है, वह मन को आश्चर्य से और आँखों को आँसुओं से भर गया। मेघना मलिक ने हरियाणवी माँ की भूमिका के साथ शत प्रतिशत न्याय किया है। राजेंद्र गुप्ता ने भी अपने अभिनय के अनुभव को अपने किरदार में सलीके से प्रयोग किया है। किशोर लखमी जब गुरु की आवाज़ से बंधकर खिंचा चला जाता है, उस सीन में गूंगे फकीर का बेलौस नाच मन को घुँघरू कर गया।
थापा, सोहन, बेबे, वैद्य, दीपचंद, राजाराम, फेंकू -हर कलाकार ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है। संवेदना, हास्य और करुणा की दीवारों पर फकीरी का छप्पर डालकर उस ढाँचे को जुनून और दीवानगी के रंग में रंगकर यशपाल शर्मा ने उस घरौंदे पर एक तख्ती लटका दी है, जिस पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा है- “दादा लखमी”!

✍️ चिराग़ जैन

सीता की पाती

मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!

तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम
मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम
मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

कैसे जनता सिंहासन की हर लाचारी समझेगी
दीवारें और छत भी कैसे बात तुम्हारी समझेंगी
थोड़ा दुःख ही साझा करती, रहती मैं यदि पास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!

पहले उससे रण करना था, जिसने हमको कष्ट दिया
अब उसका पालन करना है, जिसने सब सुख ध्वस्त किया
तब वल्कल में शर साधा, अब महलों में संन्यास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

राजमुकुट ने कब-कब काटा, मैं समझूँ या तुम समझो
इस सौदे में कितना घाटा, मैं समझूँ या तुम समझो
आदर्शों की क्या क़ीमत है, मुझको है आभास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

छोड़ चलूँ इस राजमहल को, ख़़ुद से कहते तो होंगे
मुस्कानों के पीछे छिपकर, आँसू बहते तो होंगे
पर मर्यादा ही जीतेगी, है मुझको विश्वास सुनो
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!

मेरी पीड़ा ले जायेगी मुझको माँ के आँचल तक
तुम जलता मन ले जाओगे इक दिन सरयू के जल तक
साँसों के उस पार मिलेगी हमको सुख की साँस सुनो!
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!

✍️ चिराग़ जैन

कविता सुनने की तमीज़

शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर
शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं

कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो कविता-पाठ नाद बनने की बजाय शोर बनकर रह जाता है।
लेकिन बीते बुधवार अर्द्धचंद्र की संतुलित चांदनी में गुलाबी सर्दी की मीठी बयार के बीच, कविता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बैठक में सुनाने वालों को भी सुनने वालों से कम आनंद नहीं आया होगा।
यूँ समझ लीजिए कि खेत से निकलकर फसल मंडी में बिकने की बजाय बीज बन रही थी। श्रोता दीर्घा में श्रीमती ममता कालिया, डॉ सरिता शर्मा, गुणवीर राणा,
श्लेष गौतम, सुदीप भोला, राजीव राज, निकुंज शर्मा, रामायण धर द्विवेदी, स्वयं श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश आकुल, गौरव दुबे, शिखा दीप्ति, शंभू शिखर, रमेश मुस्कान, मध्यम सक्सेना, ओम निश्छल, कुमार संजाॅय सिंह, सुमित अवस्थी, अरुण महेश्वरी, विमल त्यागी, आयुष और अदिति सरीखे सावचेत मन विद्यमान हों। काव्यपाठ के लिए कबीरी तेवर के यश मालवीय जी हों, किशन सरोज सरीखी गीतता से युक्त विनोद श्रीवास्तव जी हों और ऑलपिन पर शहद लगाने का हुनर रखने वाले शायर इक़बाल अशहर हों। संचालन के माइक पर कविता तिवारी हों। व्यवस्था को चाक चौबंद रखने के लिए प्रवीन पाण्डेय जैसे कुशल व्यवस्थापक हों और इस पूरे वृत्त के निर्माण का केन्द्रबिन्दु डॉ कुमार विश्वास का सम्मोहक व्यक्तित्व हो तो ऊर्जा और आनंद के लिए वहाँ घटित होना स्वाभाविक था।
इस महफ़िल में हर पंक्ति पर प्रतिक्रिया थी। आँसू को भी कविता बना लेने वाले ये श्रोता कभी दर्द में डूबी हुई किसी ग़ज़ल पर ठठाकर हँस पड़ते थे, तो कभी किसी आनंद की अभिव्यक्ति को सुनकर उस आनंद के पार्श्व में विराजित टीस पर त्राटक करने लगते थे। कभी मिसरा-ए-सानी की अदायगी से पहले ही किसी चुटकी से महफ़िल में ठहाका गूँज जाता था तो कभी किसी गीत-सूक्ति पर कोई दो श्रोता आँखों ही आँखों में हज़ारों बातें कर गुज़रते थे। लेकिन श्रोता दीर्घा की यह जीवंतता कविता-पाठ के लिए व्यवधान न होकर संगत बनी जाती थी।
बहुत दिन बाद ऐसे कविता सुनी, जैसे आज से एक दशक पहले मंच पर बैठकर हम और हमारे वरिष्ठ सुनते थे। जीवंतता और आनंद की कोई कमी नहीं होती थी, प्रत्युत्पन्नमति के अस्त्र से कविता पाठ कर रहे कवि के साथ थोड़ी छेड़छाड़ और शरारत भी हो जाती थी लेकिन इस सबसे काव्यपाठ में व्यवधान नहीं होता था। लोगों का मानना है कि उस दिन केवी कुटीर में अच्छा कवि होने की झलकी दिखाई गई, जबकि मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम की श्रोतादीर्घा वाले कैमरे को मास्टर बनाकर एडिटिंग की जाए तो दुनिया समझ पाएगी कि- “देखो, ऐसे सुनी जाती है कविता!”

✍️ चिराग़ जैन

याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है
मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम
याद फिर से आ रही हो तुम

त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं
चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है
हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे
उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं
याद के उस छोर पर बाँहें पसारे तुम खड़ी हो
सज रही तुम पर वही कुमकुम
याद फिर से आ रही हो तुम

फिर तुम्हारी देह का मकरंद मन में घुल रहा है
आह, मेरे ओंठ आपस में अचानक गुंथ गए हैं
साँस बढ़-चढ़कर स्वयं सिसकारियाँ बनने लगी हैं
नैन फिर आनन्द की हद तक पहुँच कर मुंद गए हैं
कान में एहसास का संगीत गूंजे जा रहा है
सज उठी फिर याद की अंजुम
याद फिर से आ रही हो तुम

✍️ चिराग़ जैन

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है
प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं
संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी
कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं

सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन
पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे
पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन
बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे
प्रेम पिंजरा अगर बन गया तो तुम्हें
प्रेम का साथ भी झिल सकेगा नहीं

देह की पीर के पार आनंद है
भोग में, योग में, जोग में हर जगह
जो भी सुविधा जुटाते रहे काय की
वो घिरे हैं किसी रोग में हर जगह
देह के नेह में प्राण घुट जाएंगे
हो तुम्हें कुछ भी हासिल सकेगा नहीं

✍️ चिराग़ जैन

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