Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
रामायण के राम से ही यह सिलसिला प्रारम्भ हो गया था कि सामाजिक जीवन जीने के लिए व्यक्तिगत जीवन की बलि चढ़ानी होगी। कबीर ने इस बात को बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो घर जारै आपना, चले हमारे साथ। सामाजिक जीवन की अपेक्षा होती है कि मनुष्य 24 में से 48 घंटे काम करे। ऐसे में जाने-अनजाने परिवार के लोगों का समय चोरी किया जाता है।
कभी-कभी यह प्रश्न मन को व्यथित करता है कि व्यष्टि की अनदेखी कर समष्टि को प्राथमिकता देनेवाले मनुष्यों के एकाकीपन का मोल कैसे चुकाया जाए? राम की पीर, बाबा तुलसी ने कही भर है किंतु उस पीड़ा को भोगने की कल्पना भी मन में सिहरन पैदा करती है। उधर कृष्ण जनहित में जारी हुए, तो जन्म से ही जन्मदात्री ने छोड़ दिया, यौवन में प्रेम छूट गया और पालनेवाली माँ की गोदी छूट गई। परिस्थितियों ने कृष्ण को इतना निष्ठुर बना दिया कि महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु, घटोत्कच्छ और यहाँ तक कि कर्ण और भीष्म तक कि मृत्यु पर भी समाज के हित को सर्वाेपरि रख स्थितप्रज्ञ बने रहे।
गंगापुत्र भीष्म, गौतम बुद्ध, कबीर, अशोक महान, पन्ना धाय, बिनोवा भावे, केशव बलिराम हेडगेवार, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, गुरु गोलवलकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, एपीजे कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी तक ऐसे हजारों व्यक्तित्व हैं जिनमें से कुछ ने पारिवारिक सुविधाओं को त्याग करके सामाजिक जीवन जीना शुरू किया तो कुछ ने सामाजिक जीवन में उतरकर पारिवारिक सुख त्याग दिए।
गुरु सिख परंपरा, सनातन संत समाज, जैन संत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक वृन्द, सीमाओं पर खड़े वीर जवान और बड़े पदों पर बैठे अफसर -ये सब वर्ग या तो अपने परिवार बसाते ही नहीं, बसाते हैं तो अपने दायित्वों के निर्वहन में परिवार की अनदेखी करते हैं और अंततः पारिवारिक सुखों से वंचित हो जाते हैं। पत्रकारिता, चिकित्सा, विज्ञान, विधि, अभियांत्रिकी, शोध, कला, राजनीति और रक्षण से जुड़े लोगों के जीवन में यह परिस्थिति कमोबेश होती ही है।
कहानियाँ सुनकर बहुत आसान लगता है किंतु एक बार यह अनुभूत करके देखें कि अपनों के अपनत्व का मूल्य चुकाकर समाज और मानवता की सेवा करनेवाले लोगों से उऋण होना लगभग असंभव है। वैचारिक मतभेद और निजि पसंद-नापसंद के कारण हम इन सब लोगों के सामाजिक योगदान की आलोचना कर सकते हैं, इन लोगों की आर्थिक स्थितियों से हम ईर्ष्या रख सकते हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सबके पास समाज से प्राप्त सुविधाएँ ज़रूर हैं लेकिन अपनों से मिलनेवाले सुख का सर्वथा अभाव है।
हम कई सदियों से ऐसे लोगों को आदर और निरादर की सौगात देते रहे हैं लेकिन इन लोगों की निष्ठा को प्यार से हम कभी नहीं नवाज़ सके और यही कारण है कि समाज के लिए सर्वस्व स्वाहा करनेवाले इन योगियों के जीवन में हम अपनत्व का एक भी पल नहीं सजा सके।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
विकास के स्वप्न का साकार रूप है- अभियांत्रिकी। किसी राष्ट्र के निर्माण में अभियंताओं की सर्वाधिक प्रत्यक्ष भूमिका होती है। भारत के वे योग्य सपूत जिन्होंने अनवरत साधना से हमें पगडंडी के स्थान पर पक्की सड़कें दीं; बैलगाड़ी से उतार कर गाड़ियों की सवारी कराई; चिट्ठियों पर आधारित संचार को मोबाइल की तकनीक दी और अंगीठी को इंडक्शन से रिप्लेस किया …उन सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा
बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है
मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है
चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो दीवारों पर लिखी हिदायतें हमारी बुरी आदतों का आईना हैं।
कल्पना करें तो शायद हम समझ पाएंगे कि अपने सपनों के घर की खूबसूरत दीवार पर तारकोल से ‘गधे के पूत, यहाँ मत मूत’ लिखनेवाला आदमी किस हद तक परेशान हुआ होगा। यत्र-तत्र-सर्वत्र मूत्रत्याग करने वाले निष्ठावान नागरिकों को रोकने की दिशा में पट्ट-लेखकों ने काफी विकास किया है। ‘देखो गधा पेशाब कर रहा है’; ‘यहाँ मूतने वाले तेरी माँ की…..’ और ‘यह मंदिर की दीवार है कृपया यहाँ मूत्रत्याग न करें’ जैसे बहुभाषी ग्रंथों से मूत्रसाधकों को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका तब ‘एक चित्र सौ शब्दों के समान होता है’ का अनुसरण करते हुए हमने मूत्रनीय दीवारों पर ईश्वर के विराट रूप की छोटी-छोटी टाइल्स लगवा दीं। किन्तु इतने पर भी मूत्रत्यागकर्ताओं ने हार न मानी और वे अपने पूज्य देव को बचाकर अन्य दीवारों पर कार्य निष्पादन करते रहे। साईं बाबा के भक्त को हिंदू देवताओं की तस्वीर न रोक सकी और घोर रामभक्त ने साईं बाबा की परवाह नहीं की। वैष्णव, शाक्त, शैव और न जाने क्या-क्या बहाने बनाकर साधकों ने भक्तिप्रवाह का उपाय खोज ही लिया। अंततः सभी देवताओं ने मीटिंग करके एक साथ एक ही दीवार पर चिपकना स्वीकार किया तब कहीं कुछेक दीवारों के भूमिगत जल में मूत्र संवर्द्धन बन्द हुआ।
विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का दावा करनेवाले हम लोग कितने सभ्य रहे होंगे इसके प्रमाण-पत्र पूरे देश में हिदायती सूचना-पट्टों पर शान से चिपके हुए हैं। कितने फख्र की बात है कि हमें डायरेक्टली ‘बेहया’ कहनेवाले वाक्य भी अपनी विनम्रता नहीं छोड़ते और सम्मानपूर्वक हमें लताड़ते हुए लिखते हैं- ‘कृपया पान की पीक यहाँ न थूकें।’ हम इस सम्मान से गद्गद हो उठते हैं और आभार ज्ञापन करते हुए उस इबारत पर अपने मुखारविंद से पीक अर्पण कर आगे बढ़ जाते हैं।
रेल के टॉयलेट में मग्गे से बंधी ज़ंजीर हमारी आदतों के गले में पहनाई गई स्वर्णकड़ी जैसी भूमिका निभाती है।
आज्ञाकारी हम इतने हैं कि हर बात बोर्ड पर लिखकर समझाई जाती है। ‘कृपया यहाँ न थूकें’ और ‘गंदगी न फैलाएँ’ जैसे सूचना पट्ट हमारी आदतों के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाते हैं। ‘कूड़ा कूड़ेदान में ही डालें’, ‘फाटक बंद हो तो लाइन पार न करें’, ‘ट्रांसफार्मर के आसपास पेशाब करना जानलेवा हो सकता है’ और ‘कृपया लाइन न तोड़ें’ जैसे प्रशासनिक वाक्यों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र में भी सूचनाओं का विपुल भंडार है। ‘जगह मिलने पर साइड दी जाएगी’, ‘जिनको जल्दी थी वो चले गए’, ‘उड़ के जावेगा के’, ‘कुत्ता भी बिना वजह नहीं भौंकता’ और ‘सड़क तेरे बाप की है क्या बे’ -जैसे वाक्य हमारे ट्रैफिक सेंस की गौरवगाथा के स्वर्णिम अध्याय हैं।
‘मतदान अवश्य करें’, ‘राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाएँ’, ‘बस की सीट न फाड़ें’, ‘सीढ़ियों पर न बैठें’, ‘रिश्वत न लें, न दें’, ‘दलालों से सावधान’, ‘जेबकतरों से सावधान’ या ‘लेडीज सीट पर न बैठें’ और ‘बंदरों को न छेड़ें’ जैसे वाक्यों में सजा भारतीय लोकतंत्र पूरी दुनिया की चित्र प्रदर्शनियों में दमकता है, तो हमारा गौरवशाली इतिहास और भी प्रखर हो उठता है।
‘कृपया अस्पताल में शोर न करें’ और ‘एम्बुलेंस को रास्ता दें’ जैसे लौकिक मानवीय आदेशों से लेकर ‘जलती चिता में कचरा न डालें’ जैसे पारलौकिक सूचना पट्टों ने हमारी संवेदनाओं की हकीकत चेहरे पर जो श्रृंगार किया है उसे धोने के लिए पानी नहीं आँसुओं की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
आप रेडलाइट पर खड़े हैं अचानक आपके पीछे कोई हॉर्न बजाने लगता है। उसको इस बात पर आश्चर्य है कि जब कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा तो आप रेडलाइट का सम्मान क्यों कर रहे हो? आप बाजार से गुज़रते हैं। बीच सड़क पर कोई स्कूटर पार्क कर गया है। सारा ट्रैफिक रुक गया है। सबको परेशानी हो रही है। दस-पंद्रह मिनिट बाद स्कूटर का मालिक बेशर्मी से फोन कान पर लगाए आता है और स्कूटर स्टार्ट करके निकल जाता है।
सब लोग “उसके जाने के बाद” कुछ अपशब्द टाइप बड़बड़ाते हुए अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। नो पार्किंग के बोर्ड के ठीक नीचे पार्किंग करने वाले लोग; नो राइट टर्न से दाएं मुड़ने वाले लोग; यू-टर्न को ब्लॉक करने वाले लोग; पार्क के बेंच पर च्विंगम चिपकाने वाले लोग; बस की सीट फाड़ने वाले लोग; पैट्रोल पम्प पर पेट्रोल चुराने वाले लोग; अपने दूर के रिश्तेदार की पहुँच पर इतराने वाले लोग; चौराहों पर भीख देने वाले लोग; आसाराम की रिहाई के लिए जंतर-मंतर पर धरना देने वाले लोग; रेल लाइनों पर गंदगी फेंकते लोग; बिजली-पानी की चोरी करते लोग; रामपाल के लिए सेना को पथराने वाले लोग; रामवृक्ष के लिए पुलिस को दबोचने वाले लोग; रामरहीम के लिए देश जलाने वाले लोग और माँ की कसम देकर मेसेज फारवर्ड करने वाले लोग ….इन्हीं सब लोगों से मिलकर हमारे देश की जो तस्वीर बनती है उसमें सरकारी योगदान अथवा निकम्मेपन की कोई भूमिका नज़र तो नहीं आती लेकिन फिर भी हम अपने हर सामाजिक व नैतिक अपराध को सरकार तथा सिस्टम की ओट लेकर छुपा देने के अभ्यस्त हो गए हैं।
मैं सरकार और सिस्टम की तरफदारी या विरोध न करके केवल इतना भर सोचना चाहता हूँ कि जो सुई पिछले सात दशक से सिस्टम की ख़राबी पर अटकी है उसे एक बार जनता की अथक ईमानदारी से आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता! क्या आवश्यक है कि बर्बरीक बनकर इस देश की महाभारत को एकटक निहारते रहा जाए और हर मृत जयद्रथ तथा अभिमन्यु को वीरता के ख़िताब की डुगडुगी थमाकर उससे निंदा का रस प्राप्त किया जाए?
क्या एक सप्ताह मात्र के लिए हम यह प्रयोग नहीं कर सकते कि सरकारी नीतियों के उलाहनों को छोड़कर हम आत्म अनुशासन से इस देश की छोटी छोटी समस्याओं को बढ़ने से रोक पाएं। क्या अपने बच्चों को कल सड़क पर बेहिचक चलने देने के लिए आज हम अपनी गाड़ी थोड़ी दबा कर पार्क नहीं कर सकते? क्या कल अपनी बिटिया के निडर जीने की सुविधा देने के लिए आज अपने बेटों को संस्कार का छोटा-सा पाठ नहीं पढ़ा सकते। क्या कल अपने देश पर फख्र करने के लिए आज अपने आलस्य व प्रमाद का त्याग नहीं कर सकते? क्या हम देश को बदलने की ख़्वाहिश के लिए अपनी आदतों को सुधारने की कोशिश नही कर सकते!!!
✍️ चिराग़ जैन