+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

पराजित विजेता

आंधी के आघात सहे हैं
ये शाखों के साथ बहे हैं
सूखे हुए पड़े जो भू पर
इनके कोमल गात रहे हैं
हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये
अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर भरते हैं ये
मिट्टी में मिलकर भी अपना, कण-कण उपवन को देते हैं
कोंपल को भोजन मिल पाए, इस कोशिश में मरते हैं ये
जिनको धूर्त समझते हो तुम
ये कल तक भोले-भाले थे
जो सूखे बदरंग हुए हैं
कल तक ये भी हरियाले थे
शुष्क हवा के हाथों छलकर, अब ये ख़ुद से रूठ गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

जिनको पग-पग खोट मिला हो, वे जन खरे नहीं रह पाते
जो पत्ते अंधड़ से जूझे, फिर वो हरे नहीं रह पाते
आदर्शों के सपने छोड़ो, कड़वी मगर हकीकत ये है
जिनसे सबने प्यास बुझाई, वे घट भरे नहीं रह पाते
इतनी काली रात नहीं थी
ऐसी कठिन बिसात नहीं थी
डाली ने उकसाया वरना
आंधी की औकात नहीं थी
अंधड़ आया, डाली लचकी, ठूठ मुनाफा लूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

साथी अवसरवादी निकले, बीच युद्ध में बात बदल ली
अड़ने की आदत थी उनकी, वह आदत उस रात बदल ली
तेज़ हवा ने वार किया तो डाली झूम-झूमकर नाची
तनकर खड़े तने ने झुककर, पल में अपनी जात बदल जी
जिसकी देह पड़ी धरती पर
उसने प्रण को पूजा होगा
लेकिन इतना तो निश्चित है
जो हारा, वो जूझा होगा
जिसने केवल जान बचाई, उसके दर्पण टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

✍️ चिराग़ जैन

बोनसाई

आदेशों का दास नहीं है शाखा का आकार कभी
ले तक सीमित मत करना पौधे का संसार कभी

जड़ के पाँव नहीं पसरे तो, छाँव कहाँ से पाओगे
जिस पर पंछी घर कर लें वो ठाँव कहाँ से लाओगे
बालकनी में बंध पाया क्या, बरगद का विस्तार कभी

कोंपल, बूटे, कलियाँ, डाली; ये सब कुछ आबाद रहे
तब ही आती है ख़ुशहाली, जब मौसम आज़ाद रहे
नभ में चहक नहीं भर सकता, पिंजरे का परिवार कभी

सीमा में जकड़े बिरवे की सहज सुगंध नदारद है
जो तितली की बाँह पकड़ ले, वो मकरंद नदारद है
नकली पेड़ों पर बरसा है, क्या बादल का प्यार कभी

नज़रों को दौड़ाना सीखो, विस्तारों को मत छाँटो
घर में चहक भरी रखने को, चिड़िया के पर मत काटो
पलकों में भर पाता है क्या, सूरज का उजियार कभी

✍️ चिराग़ जैन

बुनियादों की मज़बूती

धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे
तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी
आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी
सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे
तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

अपनेपन का आलिंगन भी कुछ पल ही मन को भाता है
प्रेम घड़ी भर दूर नहीं हो, तो वह पिंजरा बन जाता है
बेमतलब की भावुकता का बोझ डुबो ही देता किश्ती
तब कुछ व्यवहारिक पतवारें, मझधारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

जड़ की अनदेखी करते हैं, फुनगी पर इतरानेवाले
फिर-फिर धरती पर आते हैं, उड़कर ऊपर जानेवाले
जब ख़ुद के ईश्वर होने से ईश्वर का मन ऊब गया है
तब कुछ इंसानी लीलाएँ, अवतारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

✍️ चिराग़ जैन

दशरथ

ना तो किसी रोग से टूटा
ना ही समरांगण में हारा
जिस राजा का शौर्य अमर था
उसको कोपभवन ने मारा
उसकी देह धराशायी थी, जिसका नाम स्वयं दशरथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

वाणी से विषबाण चलाकर, जीवन का अमरित ले बैठी
जिसने हर रण जीता उसको इक रानी की जिद ले बैठी
होनहार बलवान थी वरना
फूल छोड़, काँटे क्यों चुनती
रानी कान भरे बैठी थी
राजा की अनुनय क्या सुनती
अपने घर के उपवन में ही पीड़ादायक कंटकपथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

सपनों ने सत्कार न चाहा, बेटे ने अधिकार न चाहा
जो पत्नी सबसे प्यारी थी, उसने उस पल प्यार न चाहा
पत्नी बात नहीं सुनती थी
बेटा दर्द नहीं कहता था
मन पर इतना भार उठाए
राजा मन भर दुःख सहता था
वो जिनको अन्याय मिला था, उसका मौन अधिक घातक था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

जिस पर तन-मन वार दिया था, उसने मन पर वार किया था
वाणी से तलवार चलाकर, राजा का मन मार दिया था
एक पुराना पाप फला था
शीतल जल से कण्ठ जला था
जिससे निश्छल प्रेम किया था
उसने अवसर जान छला था
मन टूटा, फिर साँसें उखड़ीं, यश-वैभव सब क्षत-विक्षत था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

✍️ चिराग़ जैन

विजय का मंत्र

जो समर्पित हो गया मजबूर होकर
वह तुम्हारा हित करेगा; भूल जाओ
जो न अपने मन मुताबिक जी रहा हो
वह तुम्हारे हित मरेगा; भूल जाओ

कर्ण इक एहसान के वश में विवश थे
द्रोण इक प्रतिशोध के कारण खड़े थे
शल्य इक षड्यंत्र से आहत हुए थे
भीष्म इक प्रण की विवशता में लड़े थे
मन बचा पाया नहीं जो, शूर होकर
वह तुम्हारा ध्वज धरेगा; भूल जाओ

पाप बर्बर हो उठेगा जीत कर भी
तुम स्वयं की हार से भी प्यार करना
मूढ़ता संख्या जुटाती ही रहेगी
तुम निहत्थे मित्र का सत्कार करना
कृष्ण जिसके साथ हो, भरपूर होकर
वह किसी सूरत डरेगा; भूल जाओ

बैठ मत जाना थकन से चूर होकर
पास आएगी विजय; कुछ दूर होकर
जब निराशा टीस दे नासूर होकर
तब करो निर्माण; चकनाचूर होकर
स्वयं को स्वीकार ले जो क्रूर होकर
वह कभी दुःख से भरेगा; भूल जाओ

✍️ चिराग़ जैन

गीत की चेतावनी

आज फिर एकांत की उंगली पकड़कर
सोच को अपनत्व की बाँहों में भरकर
कोई बोला प्राण का संगीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

अक्षरों के वस्त्र ओढ़े हैं बदन पर
भंगिमा में भाव का विस्तार देखो
शब्द के आभूषणों से हूँ अलंकृत
नयन में रस की अलौकिक धार देखो
मैं सुदामा की झिझकती पोटली हूँ
कृष्ण बनकर भोगिये, नवनीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

अन्तरे तुमसे अभी रूठे हुए हैं
त्रस्त हैं मुखड़े तुम्हारी बेरुख़ी से
पंक्तियाँ करके प्रतीक्षा थक चुकी हैं
कथ्य गुमसुम मौन फिरते हैं दुःखी से
आओ, इन सबकी उदासी दूर कर दो
मर न जाए मन, बहुत भयभीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

व्यस्तता की ओट में भूले सृजन को
जन्म के सौभाग्य का अपमान है ये
कंकड़ों की चाह में मोती न छोड़ो
शौक मत समझो इसे, वरदान है ये
ताक पर रख दो जगत् के मानकों को
हार के उस पार हासिल जीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

छोड़कर वर्चस्व की हर होड़, आओ
जान लो, अस्तित्व मुझसे ही बचेगा
जीत हो या हार हो या हो उदासी
देखना एकांत मुझको ही रचेगा
लोग सुख में साथ, दुःख में दूर होंगे
इस प्रथा से एकदम विपरीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

एक दिन जब चेतना भी गौण होगी
तब तुम्हारा चिह्न बनकर मैं रहूंगा
कण्ठ, स्वर, वाणी, अधर सब लुप्त होंगे
तब तुम्हारी बात जग से मैं कहूंगा
सौंपकर अपना समूचा सत्य मुझको
पाइए अमरत्व, कालातीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!