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गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है इस शरारत से भी...

दिखावा

मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता ✍️ चिराग़...

एक जिल्द में बांध दो

एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान ✍️ चिराग़ जैन

रिसाला

याद है मुझको अभी भी मैंने तुमको एक जीती-जागती कविता कहा था। सुन के तुम शरमा गई थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए मेरी आँखों में उतर आई थी तुम। याद है मुझको कि उस लम्हा बिना सोचे ही तुमने टप्प से उत्तर दिया...

मिलन का क्षण

प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए और सूखा हुआ मन हरा हो गया सीप को बून्द का बून्द को सीप का प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी अनबने रास्तों पर चली इक नदी जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर वो...

ओ माधो जी!

ओ माधो जी! कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी काफ़ी सजी-धजी लगती थी यूँ लगता है तुमने उसको नहलाने में अपनी आँखों का सब पानी ख़र्च कर दिया! वो जो गै़रत वाला जोड़ा तुम हरदम पहने रहते थे कल मैंने उस ही जोड़े में रूह तुम्हारी लिपटी देखी आँखें झुकी हुई थी उसकी गर्दन नीचे गड़ी...
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