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तमाशबीनों का लोकतंत्र

कितना शानदार लोकतंत्र है हमारा। पाँच दिन से पूरा देश तमाशबीन बनकर जनमत के मखौल का खेल देख रहा है। कांग्रेस जानती है कि पैसे फेंके जाएंगे तो उसके विधायक बिक जाएंगे, इसलिए उसने जनता के जीते हुए प्रतिनिधियों को बाक़ायदा नज़रबंद कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि बहुमत साबित करने के लिए विधायक तोड़ने होंगे। वह यह भी जानती है कि बहुमत साबित हुआ, तो उसकी धूर्तता सबके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगी। राज्यपाल जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए हर हद्द तक का भ्रष्टाचार होगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस में से कोई भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
कार्यपालिका जानती है कि निजी हितों के लिए अनधिकृत रूप से पैसे का नक़द लेन-देन अपराध है। कार्यपालिका यह भी जानती है कि नोटबन्दी के बाद से इतनी बड़ी नक़दी अपने पास रखना अपराध है। मीडिया जानती है कि शतरंज की बिसात पर पैसे फेंककर काले घोड़ों को सफेद करने की जुगत चल रही है। सोशल मीडिया धड़ल्ले से इस ख़रीद-फ़रोख़्त पर चुटीले, तीखे, कड़वे और चटखारे भरे संदेश वायरल कर रहा है।
भाजपा के प्रवक्ता से पूछो कि यह क्या हो रहा है तो वह चुपके से अपनी पार्टी के इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करते हुए दलील देते हैं कि हरियाणा में इंदिरा गांधी ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए यही किया था, तब हम इसे अपराध मानते थे लेकिन अब हमारी बज्जी है, इसलिए अब हम इसे अपराध नहीं मानते।
कांग्रेस के प्रवक्ता से पूछो कि गोवा में आप सबसे बड़ी पार्टी की दुहाई देकर सरकार बनाने का दावा कर रहे थे तो फिर अब आप आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों चले गए। कांग्रेसी प्रवक्ता इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहता है कि गोवा में हमने वह बात कही, जिससे हमें लाभ हो रहा था और कर्नाटक में भी हम वही बात कह रहे हैं जिससे हमें लाभ मिले अब ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हों तो इसमें हमारी क्या ग़लती है?
सोशल मीडिया पर जो कांग्रेस को आइना दिखाए उसे ‘अंधभक्त’ कहकर ज़लील किया जाएगा। जो भाजपा का सच बोलने की कोशिश करे उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर अपमानित किया जाएगा।
जनता पूछती है कि सबसे ज़्यादा वोट कांग्रेस को पड़े तो सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा की कैसे आ गईं। उत्तर मिलता है कि सीटों का बँटवारा इस तरह से किया गया है कि चाहे एक वोट का अंतर हो, लेकिन सीट जीतने का जुगाड़ हो जाएगा।
जनता पुनः पूछती है कि फिर सबसे ज़्यादा सीट वाली पार्टी के सामने कम सीटों वाले दो मिलकर कैसे सरकार बना सकते हैं। उत्तर मिलता है कि दोनों पार्टियों ने तय कर लिया है कि मिल-बाँटकर मलाई खा ली जाएगी इसलिए रैलियों की गाली-गलौज को भूलकर गले लग जाओ।
जनता पुनः पूछती है कि हमने तो रैलियों की बातें सुनकर ही आपको वोट दिया था। उत्तर मिलता है कि हमने भी वोट लेने के लिए ही रैलियाँ की थीं। हमारा उद्देश्य जनकल्याण नहीं था, चुनाव जीतना था। पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है साहब। रात-दिन एक करने पड़ते हैं। इलेक्शन मैनेजमेंट कोई हँसी-खेल नहीं है। इतनी मेहनत से मिले वोटों को विपक्ष में बैठकर बर्बाद तो नहीं कर सकते ना। जहाँ इतना पैसा लगा, वहाँ थोड़ा और सही। एक बार कुर्सी मिल गई तो छह महीने में सारा ख़र्चा निकल आएगा।
जनता भौंचक्की होकर पूछती है कि चुनाव आयोग तो बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए सीमित धन व्यय करना होता है। उत्तर मिलता है, छोड़ो यार, किस युग में जी रहे हो। उतने पैसे में कोई पार्षद का चुनाव भी न जीत पाएगा। ये सब औपचारिकता के लिए लिखा जाता है। सबको पता है कि इलेक्शन कितने करोड़ों का खेल है।
जनता की आँखे फट जाती हैं। वह प्रश्नवाचक दृष्टि से चुनाव आयोग की ओर देखती है। चुनाव आयोग जनता से मुँह फेरकर खड़ा हो जाता है। जनता आशा से भरकर कार्यपालिका की ओर देखती है तो पुलिसवाला उसे डाँटकर बोलता है- ‘अबे तैने वोट दे दिया ना, अब अपना हिल्ला कर, ये बड़े लोगों के काम हैं इन पचड़ों में क्यों पड़ता है?’ जनता हिम्मत करके न्यायपालिका की ओर देखती है तो न्यायपालिका अपने काले कोट में से पट्टी फाड़कर कस के अपनी आँखों पर बांध लेती है।
जनता हारकर मीडिया के पास पहुँची, तब तक ख़बर आ गई थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक रिसोर्ट से ग़ायब हो गए। पूरे चैनल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कोई कांग्रेस के प्रवक्ता को लाइन अप कर रहा है। कोई बीजेपी के प्रवक्ता का फोनो कर रहा है। कोई ग्राफिक बना रहा है। जनता ठिठककर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाती है। स्टूडियो में आवाज़ गूंजती है – ‘कट, कट, कट, अरे यार ये फ्लोर पर कौन बैठा है इसे बाहर करो। …स्पॉट दादा देखो ज़रा!’
…बिजली की गति से दो स्पॉट बॉय आते हैं और जनता को उठाकर स्टूडियो से बाहर फेंक देते हैं।
जनता अपने हाथ में टिफिन पकड़े अपने दफ़्तर की ओर चल देती है। हाज़िरी रजिस्टर पर आधे दिन की तनख़्वाह कटवाती है और शाम को छुट्टी होने का इंतज़ार करने लगती है।

✍️ चिराग़ जैन

पुलिस विभाग

ट्रेन में चलनेवाले मुसाफिरों से पैसे वसूलते पुलिसवालों का वीडियो देखा। मन क्षोभ और घृणा से भर गया। खाकी वर्दी की धौंस और सरकारी तंत्र के निकम्मेपन पर थूक रहा था पूरा वीडियो। सत्तर साल हो गए इस देश को आज़ाद हुए। सवा सौ करोड़ भारतीयों को मूलभूत सुविधाएँ देने में पूरी तरह नाकाम यह सिस्टम शर्म आ जाने की सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका है।
पुलिस विभाग की अभद्रता, ढिठाई और निष्ठुरता ने जनहित के ढोंग की हर लम्हा खिल्ली उड़ाई है। अपराध और शोषण से त्रस्त नागरिक भी इन थानों में घुसने से कतराता क्यों है -इस प्रश्न का उत्तर न तो सरकार के पास है, न ही पुलिस की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे आयोजनों के आयोजकों के पास।
भारत के विकास कार्यों हेतु रात-दिन मेहनत करके टैक्स चुकानेवाला नागरिक भी यदि किसी स्थिति में पुलिस की सहायता लेना चाहे तो उसे दुर्व्यवहार झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है। थाने में सहायता मिले या न मिले, एकाध गाली हर किसी को मिल ही जाती है। जनता के टैक्स के पैसों पर पलनेवाला ये विभाग, जनता की जेब से रिश्वत लूटनेवाला ये विभाग, जब किसी सभ्य नागरिक को गरियाता है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई खाना खाने के बाद पत्तल में छेद कर रहा हो।
रिश्वत लेकर कार्रवाई करना और गाली-गलौज करना इस विभाग के कुछ नुमाइंदों को इतना भा गया है कि जो कुछ लोग ईमानदार होकर किसी पीड़ित की वास्तविक मदद करना भी चाहते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय हो जाना पड़ता है या फिर इनके रंग में रंग जाना पड़ता है। शहरों की पढ़ी-लिखी जनता भी इस महकमे की कारगुज़ारियों से बच नहीं पाती, फिर गाँव-कस्बों के सीधे-सादे लोगों का तो कहना ही क्या!
इस देश की पुलिस को रामायण के बाली की तरह यह वरदान प्राप्त है कि जो भी नागरिक बिना किसी एप्रोच के किसी पुलिसवाले के सामने खड़ा हो जाएगा, उसका इज़्ज़तदार होने का भरम समाप्त हो जाएगा और चंद मिनिटों में वह स्वयं को अपराधी मानने लगेगा।
देश के हुक्मरानो! खरबों रुपये के घोटाले आपको मुबारक़, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आपको मुबारक़, देश के चुनावों की राजनीति भी आपको मुबारक़, राहुल-मोदी की महाभारत भी आप जानो; इस देश के आम नागरिक को अपनी समस्या बताकर बिना प्रताड़ित हुए थाने से घर लौट सकने की स्थितियाँ इस देश को सौंप दीजिये ताकि आप जब देश की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरने का ढोल पीटें तो कोई वायरल वीडियो आपके रंग में भंग न डाल सके।

✍️ चिराग़ जैन

गणतंत्र दिवस

आज राजपथ पर महाराष्ट्र की झाँकी निकली तो महाकवि भूषण के घनाक्षरी से पूरा वातावरण काव्यमय हो गया। अभी भूषण की धमक गूंज ही रही थी कि छत्तीसगढ़ की झाँकी महाकवि कालिदास की विशाल मूर्ति और मेघदूत के श्लोकोच्चार के साथ पुनः कविता का जयघोष करती निकल गई।

कल गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर भोपाल में था। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग ने राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन किया था। जिस समय “अंग्रेजो भारत छोड़ो” के उद्घोष को राजद्रोह घोषित करके स्वाधीनता के नायकों को जेल में ठूसा जा रहा था उस समय एक ब्राह्मण के बेटे ने उसी नारे को थोड़ा सलीके से रचकर जनता के आक्रोश को जीवंत रखने का विद्वतकर्म किया। जब तक अंग्रेज सरकार को यह ज्ञात हुआ कि “दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है” एक फिल्मी गीत मात्र न होकर स्वाधीनता संग्राम का उद्घोष है; तब तक आज़ादी की ललक फिल्मी पर्दे पर चढ़कर पूरे देश में फैल चुकी थी।

प्रदीप जी ने ऐसे ऐसे विलक्षण गीत रचे कि अनायास ही भारतीय शौर्य के अद्वितीय गायक बन गए। स्वाधीनता के बाद जब 62 की लड़ाई में भारतीय बेटों की अर्थियां पूरे देश को उद्वेलित कर रही थीं तब मेजर शैतान सिंह भाटी की शहादत से बेचैन होकर प्रदीप जी ने वह अमर तराना रच दिया जिसके बिना भारतीय राष्ट्रप्रेम की कथा लिखी ही नहीं जा सकती। 26 जनवरी 1963 को पहली बार लता जी ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में “ऐ मेरे वतन के लोगो” को स्वर दिया तो ऐसा लगा जैसे किसी झुंझलाए हुए बच्चे से किसी ने उसका हाल पूछ लिया हो। एक गीत ने पूरे देश की आँखें नम कर दी। भारतीय सेना के शौर्य की गाथा इस करीने से बयान हुई कि युद्ध की पीर लोगों में सिहरन पैदा कर गई।

कल के समारोह में ये सारे किस्से एक-एक कर जीवंत हो गए। मंच पर प्रदीप जी की सुपुत्री मुटुल जी और कैफ भोपाली साहब की सहबज़ादी परवीन कैफ उपस्थित थीं। गत चार दशक से भारत में वीर रस के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठापित डॉ हरिओम पँवार को राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पित किया गया।

सुबह गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए टेलीविज़न ऑन किया तो लता जी वही अमर गीत गाती दिखीं। दूर कहीं किसी समारोह से ‘कर चले हम फिदा’ की स्वरलहरी सुनाई दी। अभी होशंगाबाद जाने के लिए टैक्सी मंगाई तो रेडियो पर “ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम” सुन रहा हूँ।

भारत की जनता में गहरे तक बसे इस देशभक्ति के जज़्बे को सलाम। ज़माने भर की व्यस्तताओं के बीच भी कैसे अचानक से हमारी देशभक्ति अपने विराट रूप में प्रकट होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध जाती है; यह सुखकारी है।

इस देशभक्ति के जीर्णोद्धार में “वंदेमातरम” से लेकर “जन-गण-मन” तक और “सारे जहाँ से अच्छा” से लेकर “ऐ मेरे प्यारे वतन” तक के असंख्य गीतों का योगदान हमारे कवि हृदय में नई ऊर्जा का संचरण कर देता है।

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम एक खुला पत्र

श्री मान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री
दिल्ली सरकार

सरजी!
हमें इस बात का भान है कि आप जब से सरकार में आए हैं, तब से पूरी क़ायनात आपके खि़लाफ़ हो गई है। पूरे देश की राजनीति, नौकरशाही और व्यवस्था सिर्फ इसी प्रयास में है कि आपको कुर्सी से कैसे हटाया जाए।
स्वयं प्रधानमंत्री आपके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। उधर राज्यपाल ने आपके सुख-चैन की सुपारी दे रखी है। यहाँ तक कि ईश्वर भी आप ही से चिढ़कर स्मॉग भेजने लगा है। और तो और आपकी ईमानदारी और लोकप्रियता से जलकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, शाज़िया इल्मी, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा और ख़ुद अन्ना हज़ारे तक अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा न होने पर आपको अकेला छोड़ गए हैं।
दिल्ली पुलिस, डीडीए जैसे महत्वपूर्ण विभाग साज़िशन आपके नियंत्रण से बाहर रखे गए हैं। महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में आपको निमंत्रित न करके अपमानित किया जाता है। आपकी सरकार के आयोजनों को सुरक्षा का अड़ंगा लगाकर अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया के सारे बेईमान मिलकर आपके खि़लाफ़ हो गए हैं। और रही-सही कसर आपका स्वास्थ्य पूरी कर देता है। कभी मानसिक तो कभी शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी आपका खासा समय व्यतीत हो जाता है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए हिम्मत तो नहीं हो रही किन्तु एक मतदाता होने के नाते मैं आपको सूचित करना अपना अधिकार समझता हूँ कि जिस केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री होने का आप लुत्फ़ उठा रहे हैं, वह दिल्ली इन दिनों बहुत समस्याओं से घिरी हुई है।
आपकी गाड़ियों का क़ाफ़िला जिन चौराहों से दनादन दौड़ता हुआ निकलता है, उन चौराहों पर किन्नरों की उपस्थिति आपकी सरकार की नपुंसकता का मज़ाक उड़ाते हुए आपके मतदाताओं को सरेआम लूटती है। पुलिसवाले यह नंगा नाच देखते हैं और ख़ामोशी से स्टॉप लाइन क्रॉस करनेवालों से पैसे वसूलते रहते हैं।
डीटीसी के ड्राइवर ढिठाई से यातायात नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी लम्बी-चौड़ी बस से आम आदमी को खदेड़कर यह संदेश देते हैं कि सरकार ने आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझ लिया है, जिसकी जान की किसी को कोई परवाह नहीं है।
पार्किंग वाले 20 रुपये घंटे को पचास रुपये करने पर आमादा हैं और अनधिकृत पार्किंग में धड़ल्ले से गाड़ियों की वसूली की जा रही है। कानूनी निष्क्रियता का इतना अंधेरा छा गया है कि सिग्नल पर लालबत्ती का रंग लोगों को दिखना बंद हो गया है।
रेहड़ी-पटरीवाले आपके संरक्षण में घटोत्कच्छ की भाँति पूरी सड़क घेरने लगे हैं और रोड टैक्स चुकानेवाले वाहन चालक रोड ढूंढ रहे हैं। टूटी हुई सड़कें और टूटती जा रही हैं।
आपको झुग्गी-झोंपड़ियों में अपने राजनैतिक भविष्य का सूर्य दिखाई देता है और मध्यमवर्गीय दिल्ली अपनी ख़ामोशी का परिणाम झेलती जा रही है। सरकारी विज्ञापन आपकी सरकार को रामराज्य घोषित करना चाहते हैं किंतु उन विज्ञापनों को पढ़नेवाला दिल्लीवासी उनमें सिस्टम की बेशर्मी और ढिठाई पढ़ता है।
अगले वर्ष चुनाव है सरजी! दिल्ली की क़ानून व्यवस्था और यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। यदि इन खंडहरों पर ढंग से लीपापोती नहीं की गई तो पोलिंग बूथ जाने के लिए घर से निकला आपका वोटर ट्रैफिक जाम में फँसकर रह जाएगा।

-आपका दिल्लीवासी
✍️ चिराग़ जैन

प्रश्न पूछना पाप है

साहब ने शतरंज की चाल चली। चार-पाँच चाल चलने के बाद, साहब हारने लगे। आँख बचाकर शतरंज की टेबल से उठकर, वे लूडो खेलने लगे। देश शतरंज को भूल गया और लूडो देखने लगा। थोड़ी देर बाद लूडो में भी साहब की सारी गोटियाँ पिट गईं। देश साहब की बुद्धिमत्ता पर लगाने के लिए प्रश्नचिन्ह लेने दौड़ा और जब तक वापस लौटकर आया तो साहब कैरम खेलते पाए गए। किसी जिज्ञासु ने पूछा कि लूडो और शतरंज का क्या हुआ तो साहब उसे बताने लगे कि शतरंज में मेरी गोटी लाल होने लगी तो लूडो के वज़ीर को कैरम की रानी ने शह दे दी। अभी-अभी बेसबॉल के रैकेट से दो सफेद गोटियाँ बाहर पहुँचाई हैं।
‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि सफेद गोटियाँ विपक्षियों ने बाहर भेजी हैं!’ -जिज्ञासु आश्चर्यचकित होकर बोला।
प्रश्न सुनकर साहब के चेहरे पर महानता के चिन्ह उभर आए, लेकिन वे विनम्र होते हुए बोले- ‘यही तो हमारा बड़ा दिल है रे। हम काम करके क्रेडिट नहीं बटोरते।’
‘लेकिन आधार, मनरेगा, मंगल यान, एफडीआई के क्रेडिट लेने के लिए तो आपने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं।’ -जिज्ञासु, साहब की विनम्रता को सत्य समझकर पूछने की हिम्मत कर बैठा।
सहब ने विनम्रता का कुर्ता उतार फेंका और राष्ट्रभक्ति की कमीज़ चढ़ाते हुए चिल्लाए- ‘अब ऊँची कूद में भी सीमा नहीं पार करूंगा तो विरोधी खिलाड़ी मुझे हरा देंगे। और मैं नहीं चाहता कि मैं हार जाऊँ और भारत की जनता को नज़रें झुकानी पड़ें।’
जिज्ञासु ने नहले पर दहला फेंकते हुए पूछा- ‘पर अपने कट्टर विरोधियों को अपनी पार्टी जॉइन करवाने के कार्य से आपने समर्थकों को नज़रें झुकाने पर विवश किया है।’
अब साहब का धैर्य डोल गया। वे अपनी फुलप्रूफ प्लानिंग का वर्णन करते हुए बोले- ‘मिस्टर जिज्ञासु! समर्थक हमारी पेड ऑडियन्स हैं। उनको स्पॉन्सर्स की उंगलियों पर तालियाँ बजानी होंगी। अभी किसी नेता के पाला बदलने पर थोड़ी ज़िल्लत उठानी होगी लेकिन कुछ दिन बाद इनके ज़ख़्मों पर नारंगी ब्रांड का मरहम लगाकर इन्हें मैनेज कर लेंगे। फिर भी स्थिति न संभली, तो आस्था की एस्टरॉयड डोज़ से फ़ास्ट रिलीफ़ की व्यवस्था कराई जाएगी।’
जिज्ञासु दुःखी होकर बोला कि यह तो चीटिंग है। पेड ऑडियन्स और डोपिंग दोनों ही खेल के नियम के खि़लाफ़ है।
अब साहब ने जिज्ञासु को कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अपने राइट हैंड को एसएमएस किया- ‘नेक्स्ट टारगेट जिज्ञासु भाई।’
दस मिनिट में राइट हैंड का रिप्लाई आया- ‘टारगेट अचीव्ड।’

✍️ चिराग़ जैन

बच सकते हैं तो बच लें

बधाई हो!
एक बार फिर हमें धर्म के कपड़े उतारने का मौक़ा मिला है। इस बार हमाम में हिन्दू धर्म खड़ा है। कीचड़ का एक थेपा कोई हिंदू संतों पर फेंकेगा तो बदले में हिन्दू लोग भर-भर बाल्टी कीचड़ पादरियों और मौलवियों के थोबड़े पर दे मारेंगे। बाबागिरी की आड़ में अय्याशी कर रहा कोई कुकर्मी नंगा हुआ तो हमने सभी संतों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सामान्यीकरण की यही आदत हमें सामाजिक कुरीतियों से दूर नहीं होने देती। आसाराम गिरफ्तार हुए और हम हिंदुओं को चिढा-चिढ़ाकर नाचने लगे। इमाम बुख़ारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई और हम मुसलमानों को गालियाँ बकने लगे। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप तय हुए और हम सभी हिंदुओं को आतंकवादी सिद्ध करने पर तुल गए। अफजल को फाँसी हुई और हमने हर मुसलमान को आतंकी मान लिया। एक भिंडरवाला अपराध कर के भागा और हमने हर सरदार को ज़िंदा जला देने की कसम उठा ली।
इस जल्दबाज़ी में हम यह समझ ही नहीं पाते कि किसी एक डेरे के सेम्पल से पूरी सिख परंपरा का चरित्र नहीं समझा जा सकता। दो जैनियों के हवाला में लिप्त होने से पूरा जैन समाज चोर सिद्ध नहीं होता। ठीक वैसे ही ज्यों एक अम्बेडकर के संविधान लिख देने से हर बौद्धिस्ट कानून का ज्ञाता नहीं हो जाएगा। एक उंगली पर गर्म तेल गिर जाए तो पूरे शरीर पर बरनॉल नहीं डाली जाती। रामरहीम एक व्यक्ति है जिसे श्रद्धा की वेदी में बैठाया गया था। अब उसके अपराधों ने उसे आदर की वेदी से उतार कर अपराध के परिणाम तक पहुंचा दिया।
इससे वेदी बदनाम नहीं होती। कोई विवेकानन्द उस वेदी को छुए बिना ही हज़ारों रामरहीमों की करतूत से अपनी परंपराओं को अनछुआ रखने के लिए पर्याप्त है। घटना विशेष से व्यक्ति के चरित्र का आकलन और व्यक्ति विशेष से पूरी संस्कृति का आकलन एक ऐसा अपराध है जिसे हम युगों-युगों से करते आ रहे हैं। विकास के जो स्वप्न हम देख रहे हैं उसको साकार करने के लिए इस चूक से अपनी पीढ़ियों को मुक्त कराना हमारा दायित्व है।

✍️ चिराग़ जैन

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