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श्रद्धांजलियों का ढोंग

कभी सुना था कि आपके जीवन का आकलन इस बात से किया जाता है कि आपके दुनिया से जाने के बाद लोग आपके बारे में क्या बोलते हैं। लेकिन अब लगता है कि किसी भी व्यक्ति के भीतर के घटियापन का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वह किसी की मौत को भुनाने के लिए किस हद्द तक गिर सकता है।
हम इस हद्द तक ढोंगी हैं कि किसी की मृत्यु तक का फायदा उठाना चाहते हैं। हमारा मीडिया किसी के मरते ही न्यूज़ बुलेटिन, कैप्सूल और पैकेजिंग की मारामारी में लग जाता है। कल्पना करो, तो आत्मा काँप जाती है कि क्या माहौल होता होगा न्यूज़रूम का। अरे बॉडी के शॉट्स आए क्या, अरे प्रोम्पटर पे देख कोई अपडेट है क्या, ब्रेकिंग प्लेट बनवाओ हरे रंग के कपड़े से लटका था, हॉस्पिटल लाइन-अप करो, ओबी लगवाओ, ओए बाप के शॉट्स आ गए, जल्दी फ्लैश कर, सुसाइड का कोई पुराना एनिमेशन निकाल यार, अमिताभ का ट्वीट लगा, बहन की बाइट ले, दोस्त रो रहा है, उसको बोल क्लोज़ अप ले….!
अब तो घृणा भी नहीं होती। कुछ लोग ऐसी ख़बर आते ही तुरन्त ट्वीट करके यह जताते हैं कि मरनेवाले से उनका गहरा दोस्ताना था। हर मरे हुए आदमी को संबोधित करके ट्वीट करते हुए बची हुई दुनिया में यह ढिंढोरा पीटते हैं कि दुनिया के सारे सेलिब्रिटीज़ उनके ख़ासम-ख़ास हैं। यह और बात है, जिससे व्यक्तिगत सम्बन्धों का दावा किया जाता है, वे उनसे किसी भी सोशल प्लेटफॉर्म पर कनेक्टेड नहीं होते। कुछ स्वयंभू सेलिब्रिटी किसी के मरते ही गूगल पर उसके परिवार के सदस्यों के नाम तलाशकर ऐसा ट्वीट तैयार करते हैं, जिससे लगे कि इसका मरनेवाले से पारिवारिक संबंध था और इसे परिवार के हर सदस्य की चिंता है।
तीसरी क़िस्म के लोग मनुष्यता की सीमा के पार जाकर भी अपने एजेंडे के प्रति कटिबद्ध हैं। किसी के मरते ही उनके भीतर का हिन्दू, उनके भीतर का मुस्लिम, उनके भीतर का वामपंथी, उनके भीतर का राष्ट्रवादी, उनके भीतर का सेक्युलर, उनके भीतर का सवर्ण, उनके भीतर का दलित अथवा उनके भीतर का भारतीय सक्रिय हो जाता है और उनके भीतर मर चुके मनुष्य के शव पर नंगा नाच करने लगता है। वे बेशर्मी से बताते हैं कि मरनेवाला ग़द्दार था, उसका मर जाना ही ठीक था। वे ढिठाई से सोशल प्लेटफार्म पर लिखते हैं कि उसने फलानी फ़िल्म में मुस्लिम का रोल किया था इसलिए उसके मरने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, उसने फलाने शो में यह कहा था, इसलिए उसका मर जाना ठीक है।
मैं कई बार सोचता हूँ कि जिस रावण ने राम जी की पत्नी का अपहरण किया, उस तक की मृत्यु पर राम संज़ीदा हो गए थे। फिर किसकी उपासना करते हैं ये मृत्यु के बाद किसी को गाली देने वाले लोग। फिर स्वतः ही उत्तर मिलता है, कि राम के जीवन के आदर्श मनुष्यों के लिए अनुकरणीय हैं, जो पहले ही अपने भीतर के इंसान की हत्या किए बैठे हैं, जिन्हें किसी मानव की मृत्यु से क्षोभ नहीं होता, उनको राम के आदर्शों की मृत्यु से कहाँ कष्ट होता होगा।
किसी की मृत्यु के बाद बची हुई दुनिया में जो काँव-काँव होती है, उसे देखकर समझ आता है कि हमारे पुरखों ने मृत्यु समाचार सुनकर दो मिनिट के लिए मौन हो जाने की परिपाटी क्यों बनाई थी।

✍️ चिराग़ जैन

मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया

एक गर्भिणी हथिनी, तीन दिन तक अपने भीतर पल-पल बढ़ती टीस का कारण समझने की कोशिश में तड़प-तड़पकर मर गई। अपने जर्जर मुँह पर मनुष्य के बर्बर चेहरे के हस्ताक्षर लिए वह माँ अपने बच्चे को साथ लेकर दूर चली गई।
‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया’ की हिक़ारत के साथ उसके जलसमाधि ले ली। अपनी धर्मपरायणता का ढोंग करते मनुष्य ने कब अपने दिल में पत्थर विराजित कर लिए, पता ही न चला। स्वयं को गॉड फीयरिंग कहनेवाले आदमी के इस दुःसाहस को देखकर गॉड भी (अगर कहीं हो तो) काँप गया होगा।
हथिनी तो गणपति भाव से मनुष्य के भीतर उग आए पशु की कथा लिखकर चली गई, लेकिन उसकी मौन कराह मनुजता के ध्वंस का एक ऐसा अध्याय प्रारम्भ कर गई है, जिसका हर पलटता पृष्ठ मनुष्यता से हीन मनुष्य जाति के पटाक्षेप की वक़ालत करता रहेगा।
समुद्र से उठते भीषण चक्रवात, हवा में घुलता जा रहा विष, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघती सूनामी, रह-रहकर काँप उठती धरती, आग बरसाता आसमान, रिहायशी इलाक़ों में घुस आए तेंदुए, खेतों पर टूट पड़ते टिड्डीदल, खड़ी फसल पर गिरते ओले, हज़ारों की संख्या में बिछी चमगादड़ों की लाशें, जगह-जगह हो रहे गृहयुद्ध, चरमराती व्यवस्था में पनपती अराजकता और वर्चस्व की होड़ में अनदेखा होता अस्तित्व; चीख़-चीख़ कर मनुष्य को अल्पविराम का इंगित कर रहा है।
एक पल, ठहरकर संवेदनाओं को पोषित करने की सलाह दे रहा है। एक क्षण, बैठकर पैरों को विश्राम देने की दुहाई दे रहा है ताकि मस्तिष्क तक रक्त का संचरण हो सके और मस्तिष्क अपनी दिशा-दशा पर विचार करने में सक्षम हो पाए। एक लम्हा, रुककर धौंकनी बन चुके फेफड़ों में प्राणवायु भर लेने की सिफ़ारिश कर रहा है।
उस मूक संवेदना की इस दर्दनाक़ मौत को भी इस अल्पविराम का निमित्त नहीं बनाया गया तो पूर्णविराम लगाना प्रकृति की विवशता होगी।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Kerala Elephant Murder Case

भ्रष्टाचार की परंपरा

कोरोना विश्व भर में महामारी की तरह फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस संकट से उबरने के उपाय खोज रहे हैं। ‘जान है तो जहान है’ के सिद्धांत पर चलते हुए जान बचाने के लिए काम-धंधे, आवागमन, मेलजोल आदि सब बन्द कर दिए गए हैं। दुनिया भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर रहे हैं। लेकिन दुनिया, शेयरों के गिरने की परवाह छोड़कर कोरोना की चपेट में आए लोगों की संख्या का हिसाब रखने में व्यस्त है। अमरीका, इटली, चीन जैसे देशों में आपातकाल घोषित हो गया है। सरकारें अपने बजट का बड़ा हिस्सा इस आफत से निपटने में ख़र्च कर रही हैं। विद्यालयों में परीक्षाएँ महत्वपूर्ण नहीं रह गईं; स्टेडियम के लिए खेल महत्वहीन हो गए; बाज़ार के लिए व्यापार द्वितीयक हो गया; सीमाओं ने आग उगलना बन्द कर दिया; यहाँ तक कि कोई ख़ास आतंकी घटना भी सुखिऱ्यों में नहीं आ रही।
लेकिन इस स्थिति में भी भारतीय जनमानस के रक्त में प्रवाहित बेईमानी पर कोरोना का कोई असर नहीं दिखाई दिया। बात-बात में संस्कृत के श्लोक उध्दृत करनेवाले हम भारतीय इस आपातकाल में भी मास्क पर दस-दस गुना मुनाफ़ा बटोरने में लगे हैं। ‘तुम क्या लाए थे, और क्या ले जाओगे’ के उपदेश देने वाले हम भारतीय सेनिटाइजर में मिलावट करके लोगों के जीवन से खेल रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ‘आत्मा न कभी पैदा होती है, न कभी मरती है।’
हरिश्चंद्र, राजा शिवि, भामाशाह, विक्रमादित्य और अशोक के वंशज हम भारतीय प्रयोग किये हुए मास्क को दोबारा ‘पॉलीथिन’ में पैक करके संक्रमण के प्रसार में सहयोग कर रहे हैं ताकि संविधान में उल्लिखित ‘समानता के अधिकार’ के तहत कोई नागरिक कोरोना के स्पर्श से वंचित न रह जाए। जब सौ-पचास लोग मर लेंगे तब गोदाम में भरे मास्क और सेनिटाइजर महंगे दामों पर बेचे जाएंगे क्योंकि हम जानते हैं कि यदि आज मास्क को तीन सौ रुपये में बेचने का लोभ छोड़ दिया जाए तो परमपिता परमात्मा इस त्याग से प्रसन्न होकर ऐसी परिस्थिति का वरदान देंगे कि वही मास्क हज़ार रुपये में बिक सकेगा।
कितने महान हैं हम। महामारी फैलती है तो हम दवाइयों की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। प्यार फैलता है तो हम वेलेंटाइन डे पर गुलाब की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। दरगाहों और तीर्थों पर मेले लगते हैं तो जेब काटने के टेंडर भरे जाते हैं। बाढ़ और भूकम्प आता है तो पीड़ितों की सहायता के लिए चंदा उगाकर खा जानेवाले समाजसेवी अवतरित हो जाते हैं।
बीमारी आती है तो हमें ज्ञात होता है कि केमिस्ट बेईमान हैं। दंगे होते हैं तो हमें पता चलता है कि पुलिस बेईमान है। नोटबन्दी होती है तो सरकार बताती है कि बैंकर बेईमान हैं। ऑडिट होता है तो पता चलता है कि पूरा दफ्तर बेईमान है। न्यायपीठ बैठती है तो पता चलता है कि जिन दफ्तरों को ईमानदारी की क्लीन चिट मिली है उनका ऑडिटर बेईमान है। नई सरकार बनती है तो पता चलता है कि पिछली सरकार बेईमान थी।
हम किताबों में पढ़ते आए हैं कि भारत विविधता में एकता वाला देश है। किंतु जब ज़िन्दगी पढ़ी तो देखा कि यहाँ विविधता ही विविधता है। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि कोई भारतीय चाहे कोई भी व्यवसाय करे, वह अवसर मिलने पर उसमें बेईमानी ज़रूर करेगा। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि हर व्यवसाय के पास अपने आपको सबसे ज़रूरी, सबसे जनहितकारी और सबसे आध्यात्मिक बताने के लिए जुमले मौजूद हैं। यह भारत का सौंदर्य है कि यहाँ हर नागरिक यह चाहता है कि गुनाहों के बहीखाते में किसी और का नाम लिखा जाए और मुनाफ़े की पंक्ति में पहला नम्बर हमारा हो।
जिला अस्पताल के शवगृह में शव-सुपुर्दगी की पर्ची काटनेवाला बाबू भी रोते-बिलखते परिजनों से सौ रुपैये ऐंठते हुए सरकार के भ्रष्टाचार को गाली देता है क्योंकि ऐसा करने से उसके अपराध की फोकस लाइट फैलकर पूरे परिवेश के धब्बे दिखाने लगती है।
संस्कार, अध्यात्म और परंपरा का फटा ढोल पीटनेवाला हमारा समाज इस योग्य भी नहीं बचा है कि किसी को बेईमान कह सके। यह पूरे समाज की बीमारी है। इसमें कोई एक जाति, कोई एक सम्प्रदाय, कोई एक धर्म, कोई एक विचारधारा, कोई एक वाद, कोई एक भाषा, कोई एक क्षेत्र, कोई एक वर्ण, कोई एक लिंग, कोई एक व्यवसाय या कोई एक पीढ़ी अलहदा नहीं है। बेईमानी ने पूरे देश को एकसूत्र में बांध रखा है।
कोरोना को भारत में प्रवेश किये दो सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। एक बार इस वायरस की शिराओं में यहाँ की आबो-हवा घुल जाने की देर है, फिर यह वायरस भी कुछ ले-दे के लोगों को बीमार करना बंद कर देगा।

*नोट : इस लेख को गणपति भाव से पढ़ें और पूरा अर्थ ग्रहण करने के उपरांत ही प्रतिक्रिया दें। यदि द्रोणाचार्य की तरह आधा पढ़कर बुद्धि के कपाट बंद कर लिए तो युधिष्ठिर के सिर तो केवल अर्द्धसत्यभाषण का पाप आएगा किन्तु आधी बात से निर्णय पर पहुँचने वालों की हानि अधिक होगी।

✍️ चिराग़ जैन

जनता चुपचाप देखेगी

कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और मीडिया की मौज हो गई। भाजपाई बता रहे हैं कि पार्टी को अपने ख़ून-पसीने से सींचनेवाले किसी नेता को साइड लाइन करना नैतिकता नहीं है। यह बयान सुनते ही शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और के एन गोविंदाचार्य जैसे ढेर सारे नाम स्मृतियों में तैर गए। कांग्रेसी बता रहे हैं कि जो दल बदल रहा है वह तुम्हारा भी सगा नहीं होगा। यह बयान सुनते ही नवजोत सिंह सिद्धू, बी डी शर्मा, घनश्याम तिवारी और जनार्दन सिंह गहलोत जैसे नाम ठठाकर हँसने लगे।
भाजपाइयों को कांग्रेस का इतिहास याद आ गया और वे सीताराम केसरी, नरसिम्हा राव और डॉ प्रणब मुखर्जी के अपमान की गाथाएँ सुनाने लगे। ये गाथाएँ सुनकर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी की आँखें डबडबा आईं।
कांग्रेस में दो लीडरों के आगे सबकी प्रतिभा को दबाने की परंपरा रही। भाजपा में भी प्रतिभाशाली नेतृत्व को सलीक़े से साइड लाइन करने के अनगिन उदाहरण मिल जाएंगे।
प्रश्न कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, पीडीपी, जदयू, राजद, द्रमुक, अद्रमुक, झामुमो या अन्य किसी दल का है ही नहीं। यह शुद्ध रूप से सत्ता की लड़ाई है, जिसमें विचारधारा, नैतिकता, राष्ट्रहित, जनहित, धर्म, सम्प्रदाय, विदेशनीति, अर्थनीति जैसे तमाम शब्द खिलवाड़ की तरह प्रयोग किये जाते हैं।
राजनीति का एक ही सिद्धांत है, हमारे साथ रहो, नहीं तो हमसे गाली खाओ। यह सिद्धांत सभी का है। बेशर्मी और ढिठाई से प्रवक्ता बनकर चैनल्स पर बैठनेवाले रीढ़विहीन लोगों के घर में दर्पण की उपस्थिति निषेध होती है। राजनीति की चौखट पर क़दम रखते ही लाज के चीर स्वतः उतार फेंकने होते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल लेने से कुछ नहीं बदलेगा। चैनल जब कभी सिंधिया परिवार के इतिहास पर बहस करेंगे तो भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ता आपस में संवाद बदल लेंगे। ड्रामा वैसा ही चलेगा। अब कांग्रेस झाँसी की रानी के साथ हुए विश्वासघात पर सिंधिया परिवार को ग़द्दार बनाने पर तुल जाएगी और भाजपा सुभद्राकुमारी चौहान को कम्यूनिस्ट घोषित करके उस कविता और उस दौर के इतिहास को साज़िश करार दे देगी।
तमाशा चलता रहेगा। लीडर अवसर देखकर दल बदलते रहेंगे। आलाकमान समय की नज़ाक़त को देखते हुए सुखरामों को गले लगाते रहेंगे। कार्यकर्ता तो बेचारा जमूरा है। आज उसे कहा जाएगा कि हमने सिंधिया से कुट्टा कर ली है। और कार्यकर्ता फेसबुक पर उसके नाम की गारी गाने लगेगा। कल उसे कहा जाएगा कि अब हमने उससे अब्बा कर ली है और कार्यकर्ता उसके नाम की बधाई गाने लगेगा।
विधायकों को रिजॉर्ट में क़ैद करके ईद के बकरों की तरह ख़रीदने की परंपरा पुष्ट हो रही है और कार्यकर्ता चुनाव के दिन लाइन में लगकर वोट देने की अपील करते रहेंगे। आदर्श नागरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए व्हील चेयर तक पर लदकर वोट डालने जाएगा और समझदार लीडर उसके वोट को हथियार बनाकर लोकतंत्र की टांगें काट डालेगा।
न्यायालय अपील होने तक प्रतीक्षा करेगा और राजनीति क़ानूनी ख़ामियों का लाभ उठाकर न्याय को फाँसी पर लटकाते रहेंगे। कार्यपालिका नपुंसक ख़सम की तरह ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत पर जिस रात की जो दुल्हन होगी, उसी के तलवे चाटती रहेगी। और मीडिया इस पूरे दंगल में अपनी हाट बिछाकर टीआरपी बटोरती रहेगी।
जनता चुपचाप देखेगी। क्योंकि जनता ने कसम खाई है –
हम, भारत के लोग…!

✍️ चिराग़ जैन

सद्भाव की ख़ुशबू

भारत का भविष्य न तो उन अराजकों से प्रश्न पूछेगा, जो बंदूकें लहराते हुए ‘हीरो’ बनने का सपना पाल रहे हैं; न ही उन छुटभैये लीडरों से सवाल करने जाएगा, जो दंगे भड़काकर राष्ट्रीय टेलिविज़न की सुखिऱ्यों में दर्ज होने का ख़्वाब देख रहे हैं। आनेवाली पीढ़ियों के सामने यदि सामाजिक विद्वेष की कहानी का कोई भी पन्ना फड़फड़ाया तो वह काग़ज़ का एक टुकड़ा उस महान संस्कृति के लिए कठघरा बन जाएगा, जो स्वयं के विश्वगुरु होने का दम भरती है।
जो लोग इन दंगों में मारे गए हैं, उनके वंशजों को जब भारतीय संस्कृति की महानता की कहानी पढ़ाई जाएगी तब उनकी आँखों में घृणा मिश्रित आश्चर्य दहक उठेगा। फिर उसी घृणा को आधार बनाकर तब के राजनैतिक मनसूबे साधे जाएंगे। जब कोई हमें वर्तमान की स्थितियों पर उकसाने में सफल नहीं हो पाता तब वह इतिहास का ही कोई पन्ना फाड़कर हवाओं में उस पर दर्ज नफ़रतों का धुआँ घोलने लगता है।
जातीय विद्वेष की वर्तमान स्थिति इस अभ्यास का प्रमाण है। पीढ़ियों पहले किसी वर्ग विशेष द्वारा किसी व्यक्ति विशेष पर किया गया अन्याय आज जातीय घृणा की प्राणवायु बन गया है। शम्बूक के वंशजों को यह बताया जाता है कि देखो तुम्हारे पुरखे के साथ कितना अन्याय किया गया। और राम के वंशजों को यह बताया जाता है कि तुम्हारे पुरखों ने शबरी और निषाद को गले लगाया फिर भी इन लोगों को संतोष नहीं मिलता। ये पन्ने लहरानेवाले उनसे ज़्यादा ख़तरनाक़ हैं, जो सड़क पर बंदूक लहरा रहे हैं।
इसीलिए भविष्य बंदूकों से नहीं, पन्नों से पृष्ठ पूछेगा। जिन्होंने बंदूक उठा ली, जिन्होंने पत्थर फेंके, जिन्होंने आग लगाई और जिन्होंने लूटपाट की वे सब आज नहीं तो कल पकड़े जाएंगे, आज नहीं तो कल मर जाएंगे। उनके प्रति किसी के मन में कोई दया भी नहीं होगी। उनके पक्ष में भी कोई खड़ा न होगा। लेकिन जिन्होंने बंदूक उठवाई, जिन्होंने घृणा से भरे लेख लिखे, जिन्होंने आग में घी डाला, जिन्होंने नफ़रत के पन्ने लहराए उन सबकी बातें कभी नहीं मरेंगी। उन सबके शब्द हमेशा वातावरण में मंडराते रहेंगे।
भूखे से रोटी छीनना तो अपराध है लेकिन भूखे के सामने रोटी का गुणगान करना पाप है। क़ानून केवल अपराध का दंड देता है लेकिन पाप का दंड पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। जब समुंदर उफ़ान पर हो तब उसमें और पानी डालनेवालों को भी उतना ही ख़तरा होता है, जितना उसमें से पानी निकालने वालों को। जब कोई मुद्दा गर्म हो तब उसके पक्ष में बोलना भी उतना ही नुकसानदायी है जितना उसके विरोध में बोलना। कई बार मौन से स्थितियाँ आसान हो जाती हैं। अराजकता का उद्देश्य होता है कि वह ध्यान आकर्षण करे। यदि उस पर ध्यान दिया जाए या उस पर चर्चा की जाए तो वह प्रोत्साहित होती है।
हमें सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया को सकारात्मकता की ख़बरों से पाटने की ज़रूरत है। हमें अपनी हर पोस्ट से यह संदेश देना होगा कि चर्चाओं में रहना है तो बुराई का रास्ता छोड़ना होगा। मांग कोई भी हो, अगर उसको कहने का सलीका विधि-सम्मत नहीं होगा तो उसे अखबारों में नहीं छापा जाएगा। उपद्रव के समाधान हेतु सरकारी तंत्र तो सक्रिय होगा लेकिन मीडिया उसके समाचारों की पल-पल रिपोर्टिंग करके उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा। हमारे व्हाट्सएप्प से कोई भी ऐसा समाचार प्रसारित नहीं होगा जो किसी उपद्रव का प्रचार करता हो। ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’ – यह डायलॉग उनकी सोच को संचालित करता है, तो हम उनका ज़िक्र करना छोड़ दें। जिसकी चर्चा करना छोड़ दो वह हमारे मस्तिष्क से बाहर हो जाता है।
हमें इन नकारात्मकताओं को इतिहास से बाहर करना है तो इसके लिए पहला क़दम यही होगा कि इन्हें चर्चाओं से बाहर किया जाए। यदि इनकी चर्चा बन्द हो गई तो वे मनसूबे भी मर जाएंगे जो इन लपटों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकना चाहते हैं, और वे कुंठाएँ भी मर जाएंगी जो पीढ़ियों पहले हुई किसी घटना की टीस से वर्तमान को सड़कों पर नंगा करने में जुटी हैं। फिर भविष्य के पास इतिहास को कोई सफ़हा उड़ता हुआ पहुँचेगा तो उससे सद्भाव की ख़ुशबू आएगी, पथराव की दुर्गंध नहीं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Delhi Riots

अवसरवादी देशभक्ति

राजधानी दिल्ली का एक क्षेत्र विशेष दंगों की चपेट में है और मीडिया ट्रम्प की यात्रा का इंच-इंच कवर कर रहा है। सरकार मेहमाननवाज़ी में व्यस्त है और घर में भाण्डे बज रहे हैं। सीएए का विरोध या समर्थन दो दिन बाद भी किया जा सकता है यार! हद्द हो गई। क्या हम इतने भी सभ्य नहीं रह गए हैं कि किसी मेहमान के सामने ‘झूठा ही सही’ लेकिन सद्भाव का परिचय दे सकें।
कभी-कभी आश्चर्य होता है। आखि़र किस समाज के लिए यह राजनेता अपना जीवन न्यौछावर करने पर अड़े हैं! हम सुरक्षा में लगे पुलिसवालों को गोली मारेंगे, फिर यह भी चाहेंगे कि कोई हमें नक्सली न कहे। हम धर्म की टोपी पहनकर पत्थरबाज़ी करेंगे और फिर यह चाहेंगे कि हमारे धर्म को आतंकवादी न कहा जाए। शर्म आनी चाहिए। जहालत की भी कोई सीमा होती है।
मोदी जी को यह चिंता है कि दिल्ली के स्कूलों की प्रदर्शनी हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री वहाँ न हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री इस बात से ख़ुश हैं कि अमरीकी दूतावास ने यह घोषणा कर दी है कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति पर अमरीकी प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी, यह आपकी आंतरिक राजनीति के कारण हुआ है। क्या कर रहे हो भाई! हम हर पल गिरते जा रहे हैं। मोदी विरोधी इस बात पर चुटकुले बना रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री के मुँह से डोनाल्ड की जगह ‘दोलाण्ड’ निकल गया। भाजपाई यह बता रहे हैं कि ट्रम्प भारत इसलिए आए हैं क्योंकि मोदी की तूती बोल रही है। कोई इस बात पर जुमलेबाज़ी कर रहा है कि ट्रम्प ने पाकिस्तान को दोस्त बताकर भारत की डिप्लोमेसी के मुँह पर तमाचा मार दिया। कोई यह सिद्ध करने पर उतारू है कि ट्रम्प ने आतंकवाद ख़त्म करने की बात करके पाकिस्तान की इज़्ज़त उतार दी। …क्या है यह सब।
भारतीय समाज भयंकर संकटों से जूझ रहा है। एक वर्ग विशेष सरकारी राजहठ से लोहा लिए बैठा है। राजा बालहठ को झुकाने पर अड़ा हुआ है। जनता में साम्प्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है। राजनैतिक चर्चाएँ दुश्मनी का सबब बनती जा रही हैं।
समाज भक्तों और चमचों में बँटा जा रहा है। ‘भारत माता की जय’ का सर्वग्राह्य उद्घोष एक राजनैतिक दल की बपौती हो चला है। समाज का सौहार्द बिगाड़ने के लिए धर्म, सम्प्रदाय और जातियाँ पहले से ही विद्यमान थीं; अब पार्टी भी आग में घी का काम कर रही है। कांग्रेसी लोग, मोदी समर्थकों को मूढ़ मान चुके हैं और मोदी समर्थकों ने मोदी विरोधियों को ग़द्दार मान लिया है।
कोई शाहीन बाग़ जाकर ख़ुद को रामभक्त बताता है और बिना लाइसेंस की बंदूक से गोली दाग देता है। कोई महिला कॉलेज में घुसकर हस्तमैथुन करता मिलता है। कोई पत्थरबाज़ी के बीच पुलिस पर गोली चला देता है। आखि़र कर क्या रहे हैं हम? यह भयावह वर्तमान भविष्य के प्रति प्रश्नचिन्ह खड़े करने लगा है।
एक सरकार कार्यविहीन योजना में समय नष्ट करती रही, दूसरी सरकार योजनविहीन कार्यों में पूंजी लुटा रही है। मीडिया अमरीका के चिड़ियाघर में जन्मे भालू के बच्चे दिखाकर टीआरपी बटोर रहा है और न्यायपालिका तारीखें बढ़ाकर अपनी नौकरी बचाए रखने में दक्ष हो गई है। कार्यपालिका कभी पैसा खाने में व्यस्त है तो कभी गोली खाने को मजबूर।
समान नागरिक आचार संहिता की बात करो तो उनको आपत्ति है जो धर्म की आड़ में संविधान के नियमों का मज़ाक़ बनाए जा रहे हैं। समान नागरिक आचार संहिता की बात न करो तो वे बौखलाते हैं जो संविधान की आड़ में एक धर्म विशेष को अपना वोटर बनाए रखना चाहते हैं।
सरकार और तंत्र को गाली देनेवाले लोग ट्रैफिक नियमों को भी मानने को तैयार नहीं हैं। सब, ख़ुद को छोड़कर बाक़ी सबको अपराधी सिद्ध करने पर तुले हैं। हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कवि अपने लिए तालियाँ बटोर रहा है, पत्रकार अपने लिए टीआरपी तलाश रहा है, राजनीति वोट तलाश रही है और कार्यपालिका अवसर!
कुछ लोग अराजकता के समर्थन में केवल इसलिए हैं क्योंकि वह अराजकता मोदी के खि़लाफ़ बढ़ रही है। कुछ लोग अराजकता के विरोध में केवल इसीलिए हैं कि इससे मोदी जी को चुनाव में फ़ायदा मिलेगा और हमें मोदीवादी होने का अवसर। संविधान, जनहित, नैतिकता, मनुष्यता और सभ्यता जैसे शब्द बेमआनी हो गए हैं और हम रवीश बनाम सुधीर चौधरी में बँटते-बँटते असभ्यता के शिखर की ओर अग्रसर हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Donald Trump’s India visit and Delhi Riots

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