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सृजन और आलोचना

जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें
जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें
हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं
अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें
✍️ चिराग़ जैन

झाँसी की रानी

उन हाथों में बिजली की तेज़ी थी; तलवारों से पूछो
दुर्गा का साक्षात रूप थी; युग के हरकारों से पूछो
आँखों में अंगार, पीठ पर ममता लेकर ऊँचाई से
कैसे कूदी थी इक रानी; जाकर दीवारों से पूछो

हिम्मत की राहों में जब भी आईं तो चुक गयी दीवारें
कैसे कूदेगी अम्बर से रानी; उत्सुक भयी दीवारें
चण्डी स्वयं विराज रही थी उस दिन झाँसी की रानी में
रानी के तेवर देखे तो धरती तक झुक गयी दीवारें
✍️ चिराग़ जैन

देशभक्ति

कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन

हिंदुस्तान बोलेगा

अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा

✍️ चिराग़ जैन

बिरहन की होली

आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो

✍️ चिराग़ जैन

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